Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
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अध्याय 100 / 154

Adhyāya 100

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय १००

श्लोक 6.3.1

॥ तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्जमिति

|| teShAM khalveShAM bhUtAnAM trINyeva bIjAni bhavantyANDajaM jIvajamudbhijjamiti

हिन्दी अर्थ

स हैवं भरुतवा मनसोऽन्नमयतवं ¦ उतने देता घनक मनक त त्यक्षीकतुमिच्छन्पश्वदशादानि मयताफो परयकष करनेकी इच्छति हनं सोखवे दिन वह अपने पताके एवघुक्तवन्तं पिताह-शृणु इस प्रकार कते हुए उष ्ः । पिताने कहा-- इस सम्बन्धं तत्र कारणं येन ते तान्युगादीनि कारण घुन, निरते कि व ५

English

'Of all living things there are indeed three origins only , that which springs from an egg (oviparous), that which springs from a living being (viviparous), and that which springs from a germ.

अध्याय १००

श्लोक 6.3.2

सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति

seyaM devataikShata hantAhamimAstisro devatA anena jIvenAtmanAnupravishya nAmarUpe vyAkaravANIti

हिन्दी अर्थ

वृह उश्वसे बोख--दे सोम्थ ! जिस प्रकार बहुत-से ईधनसे भजवर्ति हुए अज्निका एक जुगनृक्रे बराबर अङ्गाश रह नाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार है सोम्य तेरी सोलह तं होवाच यथा रोके हे। उससे आरुणिने कहा--ि सोभ्य महतो महत्परिमाणस्या- सोम्यं ¡ लोकम जि प्रकार हैषनसे करि हुए-वद़राये हुए बहुत स हाश्चाथ हैनमुपससाद तह यकि च पषच्छ

English

'That Being (i. e. that which had produced fire, water, and earth) thought, let me now enter those three beings (fire, water, earth) with this living Self (gîva âtmâ) , and let me then reveal (develop) names and forms.

अध्याय १००

श्लोक 6.3.3

तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत्

tAsAM trivR^itaM trivR^itamekaikAM karavANIti seyaM devatemAstisro devatA anenaiva jIvenAtmanAnupravishya nAmarUpe vyAkarot

हिन्दी अर्थ

उसने भोजन स्रि श्र फिर उसके ( आरुणिके ) पास अय।। तब उसने जो कुछ पूछा वह सव उसे उपर्थित हो गया सदह तथेवाश्च अुक्तान्‌। उसने उसी प्रकार ( पिकि अयानन्तर हनं पत्तर सुश्रपुरू उसके पश्चात्‌ वह युननेकी इच्छपे पससाद । त होपगते पुत्रं यत्कि- उस अपने पिताके समीप भया ।

English

'Then that Being having said, Let me make each of these three tripartite (so that fire, water, and earth should each have itself for its principal ingredient, besides an admixture of the other two) entered into those three beings (devatâ) with this living self only, and revealed names and forms.

अध्याय १००

श्लोक 6.3.4

तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति

tAsAM trivR^itaM trivR^itamekaikAmakarodyathA tu khalu somyemAstisro devatAstrivR^ittrivR^idekaikA bhavati tanme vijAnIhIti

हिन्दी अर्थ

उससे आर्णिने कहा- है सोम्य निस प्रकार बहुतसे इधनसे बढ़ हुए अग्निका एक सयोतमात्र अङ्गारा रह जाय ओर्‌ उते तृणसे सम्पन्न कर परज्विति कर द्या जाय तो वह उसकी ( अपने पूवं तं होवाच पुनः पिता यथा किर उससे पिताने कहा- हितस्ेत्ादि सोम्य निस॒प्रकार-महतो ऽ- सोम्य सहतोऽभ्याहितस्पेत्यादि भ्याहितस्यः इत्यादि प्दोका अर्थं एव सोम्य ते षोडक्रानां कखानामेका कठाति- (इसी भकार है सोम्य । तेरी सोच कलर्स एक कख अवरिष्ट रह गयी थी । वह अनद्वारा, वृद्धो पराप्त अर्थात्‌ प्रज्वछ्ति कर दी

English

'He made each of these tripartite; and how these three beings become each of them tripartite, that learn from me now, my friend!

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 100
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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