अध्याय १४
श्लोक 2.1.1
द्वितीयोऽध्यायः ॥ समस्तस्य खलु साम्न उपासनँ साधु यत्खलु साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति
dvitIyo.adhyAyaH || samastasya khalu sAmna upAsana{\m+} sAdhu yatkhalu sAdhu tatsAmetyAchakShate yadasAdhu tadasAmeti
हिन्दी अर्थ
अथोताप्याहुः स्वसंवेद्यं साम , इसके अनन्तर ठेस भी कहते £ । करने योग्य साम हमें प्राप्त हो ग ९३३ ¡हे ।' बतः इस निपातका आश्य अतः वह जो कोई पुरुष साम साधु है यानी साम साधुगुणविशिष्ट हे-एेसी उपा्ना करता है अर्थात् लोकविषयक पाच प्रकारकी सामोपाततना कानि पुनस्तानि साधुदृष्टि- रफिरवे साधृदृ्िविशिष्ट उपासन , विशिष्टानि समस्तानि सामा- श्रने योग्य समत सामकोन-पे है
English
Meditation on the whole of the Sâman is good, and people, when anything is good, say it is Sâman; when it is not good, it is not Sâman.