अध्याय १८
श्लोक 2.5.1
॥ ऋतुषु पञ्चविधँ सामोपासीत वसन्तो हिंकारः ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनम्
|| R^ituShu pa~nchavidha{\m+} sAmopAsIta vasanto hiMkAraH grIShmaH prastAvo varShA udgIthaH sharatpratihAro hemanto nidhanam
हिन्दी अर्थ
भवन्ति हास्य पशवः, उसे प्श प्राप होते है ओर उह = होता है अर्थात् वह त्यागाद्मियुज्यत इत्यथंः॥२। एवं दानादिपे युक्त होता है ग्राणविषयक पोच प्रकारक सामोषसना हिंकारो वाक्पस्तावशवश्ुरुद्रीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो प्ा्णोमिं पच प्रकारके परोवरीय ( उत्तरोत्तर उककृष्ट ) गुणविरिष्ट सामकी उपासना करे । उनम प्राण हिंकार हे, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ हे, श्रोत्र प्रतिहार है ओर मन निधन है । ये उपासना
English
Let a man meditate on the fivefold Sâman as the seasons. The hiṅkâra is spring, the prastâva summer (harvest of yava, &c.), the udgîtha the rainy season, the pratihâra autumn, the nidhana winter.