Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
21
अध्याय 21 / 154

Adhyāya 21

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय २१

श्लोक 2.8.1

॥ अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविध्ँ सामोपासीत यत्किंच वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः

|| atha saptavidhasya vAchi saptavidh{\m+} sAmopAsIta yatkiMcha vAcho humiti sa hiMkAro yatpreti sa prastAvo yadeti sa AdiH

हिन्दी अर्थ

उसके पड अनुगत है, इससे वे हिंकार करते हैँ । अतः वे दी ईस आदिव्यरूप सामके दिंकारभाजन दहै त्य पुपजीव्यत्वेनेति विद्यात्‌ । याद्रमरूपम्‌,स हिंकारो भक्तिस्त. त्रदं सामान्यं यत्तस्य हिंकारः अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः षरशसाकामाः

English

Next for the sevenfold Sâman. Let a man meditate on the sevenfold Sâman in speech. Whenever there is in speech the syllable huṅ , that is hiṅkâra, pra is the prastâva, â is the âdi, the first, i.e. Om,

अध्याय २१

श्लोक 2.8.2

यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम्

yaduditi sa udgItho yatpratIti sa pratihAro yadupeti sa upadravo yannIti tannidhanam

हिन्दी अर्थ

तथा सूर्यके पले-पहर उदित होनेपर जो टप होता है वह प्रस्ताव है । उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी है, अतः वे परसतुति परयक्षपतुति ओर प्रशंसा परोक्षसतुति की इच्छावलि है, क्योंकि वे अथ यत्प्रथमोदिते सवित्‌- तथा सूर्के पहटे-पहर उदित सूपं तदस्यादिर्याख्यस्य साम्नः दीनेपर जो उत्का स्प होता है वह॒ इस आदिप्यसंज्ञफ सामक तत्वात्‌ आदित्यका जो रूप सङ्गववेलाम ८ सुर्योदयके तीन सुतं पश्चात्‌ कारम ) रहता है वह॒ आदि है । उसके उस रूपके अनुगत पक्षिगण है; क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन करनेवाटे है, इसलिये

English

Ud is the udgîtha, pra the pratihâra, upa the upadrava, ni the nidhana.

अध्याय २१

श्लोक 2.8.3

दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान्वाचि सप्तविधँ सामोपास्ते

dugdhe.asmai vAgdohaM yo vAcho doho.annavAnannAdo bhavati ya etadevaM vidvAnvAchi saptavidha{\m+} sAmopAste

हिन्दी अर्थ

रदमीनां सङ्गमनं सङ्गमो यस्यां वेखमे गो यानी सूकिरणोंका सङ्गम होता है अथवा जिसमे गर्जाका वेलायां गवां बा त्सैः सा सङ्ग बसे सङ्गम होता है उसे सङ्गववेला तथा अब जो मध्यदिवसमे मादवित्यका रूप होता है वह उद्गीथ है । इसके उस रूपके देवताङोग अनुगत है । इसीसे वे प्रजापतिसे उदन्न हुए प्राणियोमे सर्वश है, क्योंकि वे इस सामक उद्गीथमक्तिके ९, टीक्‌ मध्याहमे भादिव्यका छलजुमष्यन्दिनि इत्यथः । स प दोग है बह उदूमीयमकि उद्रीथमक्तिस्तदस्य देवा अन्वा- उसके उस रूपके अनुगामी देषता-

English

Speech yields the milk, which is the milk of speech itself, to him who knowing this meditates on the sevenfold Sâman in speech. He becomes rich in food, and able to eat food.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 21
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.