Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
52
अध्याय 52 / 154

Adhyāya 52

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अध्याय ५२

श्लोक 3.15.1

॥ अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलँ स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन्विश्वमिदँ श्रितम्

|| antarikShodaraH kosho bhUmibudhno na jIryati disho hyasya sraktayo dyaurasyottaraM bila{\m+} sa eSha kosho vasudhAnastasminvishvamida{\m+} shritam

हिन्दी अर्थ

1 राजा जानश्रुति ओर रैक्वका उपाख्यान - दृष्टिके अ वर्णन पहु ष्यासः पुरस्तादणितः । अथे- शिके अध्यासक्रा वर्णन पए जनत सतान-परम्परामे उन्न एवं उसके पुत्रका पोत्र श्रदवपूक दनेवाख एवं बहुत दान करनेवाला था जोर उसके यहाँ दान करनेके ठि वहुत-सा अन्न पकाया जाता था । उसने, इस आयसे कि रोग सब जगह न्यहनि गृहे यस्यासौ बहुपाक्यः। विशिष्टे देशे काले च करिमधि- याश्चक्रे कारितवानित्यथः । सवत

English

The chest which has the sky for its circumference and the earth for its bottom, does not decay, for the quarters are its sides, and heaven its lid above. That chest is a treasury, and all things are within it.

अध्याय ५२

श्लोक 3.15.2

तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदँ रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदँरुदम्

tasya prAchI digjuhUrnAma sahamAnA nAma dakShiNA rAj~nI nAma pratIchI subhUtA nAmodIchI tAsAM vAyurvatsaH sa ya etamevaM vAyuM dishAM vatsaM veda na putraroda{\m+} roditi so.ahametamevaM vAyuM dishAM vatsaM veda mA putraroda{\m+}rudam

हिन्दी अर्थ

तत्वं सति राजनि तस्मिन्‌ वहा इस प्रकार रहता हुभा इ उसी समय रात्रिम उधरसे हंस उड़कर गये । उनमेसे एक हंसौ दूसरे हंससे कहा- “अरे ओ भट्लक्ष ओ भल्लाक्ष देख, नान पीत्रायणका तेज चुखोकके समान कैर इभा है; तू उसका सदं न ऋ ।

English

Its eastern quarter is called Guhû, its southern Sahamânâ, its western Râgñî, its northern Subhûtâ . The child of those quarters is Vâyu, the air, and he who knows that the air is indeed the child of the quarters, never weeps for his sons. 'I know the wind to be the child of the quarters, may I never weep for my sons.'

अध्याय ५२

श्लोक 3.15.3

अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनामुनामुना प्राणं प्रपद्येऽमुनामुनामुना भूः प्रपद्येऽमुनामुनामुना भुवः प्रपद्येऽमुनामुनामुना स्वः प्रपद्येऽमुनामुनामुना

ariShTaM koshaM prapadye.amunAmunAmunA prANaM prapadye.amunAmunAmunA bhUH prapadye.amunAmunAmunA bhuvaH prapadye.amunAmunAmunA svaH prapadye.amunAmunAmunA

हिन्दी अर्थ

अथ ह हंसा निशायां रात्रा- । उसी समय निशा अर्थात्‌ सर्ति । उषरते हंस उड़कर गये । रकि + ˆ राजाकी ष्टके सामने होकर ॐ। । क्षीत्ेसा पाठ समङ्ञना चाहिये उससे दूसरे अग्रगामी हंसने कहा-“अरे त किंस महत्वसे युक्त रहनेवारे इस राजके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ! क्या तु इसे गाड़ीवाटे रेक्वके समान बतखता है ¢ इसपर उसने

English

'I turn to the imperishable chest with such and such and such .' 'I turn to the Prâna (life) with such and such and such.' 'I turn to Bhûh with such and such and such.' 'I turn to Bhuvah with such and such and such.' 'I turn to Svah with such and such and such.'

अध्याय ५२

श्लोक 3.15.4

स यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदँ सर्वं भूतं यदिदं किंच तमेव तत्प्रापत्सि

sa yadavochaM prANaM prapadya iti prANo vA ida{\m+} sarvaM bhUtaM yadidaM kiMcha tameva tatprApatsi

हिन्दी अर्थ

तमेवयुक्तवन्तं प्र ईइतरो- इस भरकार कते हए उस हंससे अरे ! यह बेचारा राजा तो बहत जान्तेनिंङ- निकृषटोऽयं राजा तुच्छ है । मला किस रूपमे वतंमान- यथा करतायविजित्ायाधरेयाः संयन्त्येवमेनश्सव तदभिसमेति यत्कि प्रजाः साधु कर्वन्ति यस्तद्वेद

English

'When I said, I turn to Prâna, then Prâna means all whatever exists here--to that I turn.'

अध्याय ५२

श्लोक 3.15.5

अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम्

atha yadavochaM bhUH prapadya iti pR^ithivIM prapadye.antarikShaM prapadye divaM prapadya ityeva tadavocham

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार चतक्रीडाम कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवलि . ुरुषके अधीन उससे निम्न शरेणीके सारे पासे हो जाते है उसी प्रकार प्रना जो कुछ सत्कर्म करती है वह सव उस (रेक) को प्राप्तो यथा लोकै कृतायः कृतो निस भकार रोकरमे चतक्रीडाके खचस्य महम्‌ नामायो चयूतसमये नामक पासा परसिद्ध है, जव यूते प्रासद्धश्तुरङ्कः, स प्रवृत्त हुए. पुरर्पोका वह कृतनामक संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्कारे ह सयुग्वानमिव रेक

English

'When I said, I turn to Bhûh, what I said is, I turn to the earth, the sky, and heaven.'

अध्याय ५२

श्लोक 3.15.6

अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम्

atha yadavochaM bhuvaH prapadya ityagniM prapadye vAyuM prapadya AdityaM prapadya ityeva tadavocham

हिन्दी अर्थ

इस बातको जानश्रति पेत्रायणने घन ल्या । दूसरे दिन सवेरे उठते ही उसने सेवकसे कहा-अरे भया तू गाड़ीवाटेरेक्वके समान मेरी सतुति क्या करता है / इसपर सेवकने पूछा-- थह जो गाद़ीवाल राजाने कदा- "नि प्रकार छतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाटे स्षके अधीन उससे निम्नवतीं समस्त पासे हो जाते है उसी प्रकार उस रैक्वको जो कुछ परजा सतकमं करती हे, वह सब

English

'When I said, I turn to Bhuvah, what I said is, I turn to Agni (fire), Vâyu (air), Âditya (sun).'

अध्याय ५२

श्लोक 3.15.7

अथ यदवोचँस्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येव तदवोचं तदवोचम्

atha yadavocha{\m+}svaH prapadya ityR^igvedaM prapadye yajurvedaM prapadye sAmavedaM prapadya ityeva tadavochaM tadavocham

हिन्दी अर्थ

तदु ह तदेतदीदृशं हंसवाक्य- महल्की छतपर स्थित राजा रक्राद्‌ः म्रशसारूपञुपरुश्राव विद्रानकी प्ररंसारूप यह इस परकार- शरुतवान्दम्यतरस्थो राजा जान- का॒हंसका वचन शुन स्था । वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर भँ उसे नहीं पा सका" एसा कहता हुमा रोर आया तब उससे राजान कहा-अरे जहां ब्राह्मणकी खोज की नाती है वहो उसके पस जा' सह क्षत्ता नगरं ग्रामं वा वह सेवकं नगर या प्राममे जाकर गत्वान्विष्य रेक्वं॑नाविदं न वहो खोननेके अनन्तर शवेन रेकको यत्र ब्राह्मणस्य ब्रह्मविद एका- राजाने उस सेवकसे कदा- अरे

English

'When I said, I turn to Svah, what I said is, I turn to the Rig-veda, Yagur-veda, and Sâma-veda. That is what I said, yea, that is what I said.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 52
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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