Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
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अध्याय 6 / 154

Satyakama Jabala — Truth as the Door to Truth

चतुर्थ प्रपाठक — सत्यकाम जाबाल

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पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय ६

श्लोक 1.6.1

नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति ।समिधं सोम्याहर ।उप त्वा नेष्ये ।न सत्यादगाः

naitadabrāhmaṇo vivaktumarhati | samidhaṃ somyāhara | upa tvā neṣye | na satyādagāḥ

हिन्दी अर्थ

गुरु ने कहा: "कोई अब्राह्मण ऐसा सत्य नहीं बोल सकता। हे सौम्य, समिधा लाओ — मैं तुम्हारा उपनयन करूँगा। तुम सत्य से नहीं डिगे।"

English

"None but a Brahmana could speak so. Bring the firewood, dear one — I will initiate you. You have not departed from truth."

अध्याय ६

श्लोक 1.6.2

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः

manomayaḥ prāṇaśarīro bhārūpaḥ satyasaṅkalpa ākāśātmā sarvakarmā sarvakāmaḥ sarvagandhaḥ sarvarasaḥ

हिन्दी अर्थ

वह मनोमय है, प्राण उसका शरीर है, प्रकाश उसका रूप है, सत्य उसका संकल्प है, आकाश उसकी आत्मा है। वह सभी कर्मों में, सभी कामनाओं में, सभी गंधों में, सभी रसों में है।

English

He is made of mind, his body is life-force, his form is light, his resolve is truth, his Self is space, he is all actions, all desires, all smells, all tastes.

अध्याय ६

श्लोक 1.6.3

यथा सोम्य नद्यः सर्वाः समुद्राद्यन्ति समुद्रं प्राप्य नाम रूपे विहाय समुद्र एव भवन्ति

yathā somya nadyaḥ sarvāḥ samudradyanti samudraṃ prāpya nāma rūpe vihāya samudra eva bhavanti

हिन्दी अर्थ

हे सौम्य! जैसे सभी नदियाँ समुद्र की ओर बहती हैं और समुद्र में पहुँचकर अपने नाम और रूप खो देती हैं — वे समुद्र ही बन जाती हैं।

English

As rivers, dear one, all flow to the ocean, and on reaching it their name and form dissolve — they become the ocean itself.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 6
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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