अध्याय ७६
श्लोक 5.3.1
॥ श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानाँ समितिमेयाय तँ ह प्रवाहणो जैवलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति
|| shvetaketurhAruNeyaH pa~nchAlAnA{\m+} samitimeyAya ta{\m+} ha pravAhaNo jaivaliruvAcha kumArAnu tvAshiShatpitetyanu hi bhagava iti
हिन्दी अर्थ
किन्तु जो इस प्रकार इन पञ्चाभियोको जानता है वह उनके साय आचरण ( संसर्गं ) रता हा भी पापसे र्पति नही होता । वह शुद्ध पवित्र छोर पुण्यलोका भागी होता है, नो इस प्रकार जानता है, जो सोऽयं पुण्यलोको मवति । कितु जो उपयुक्त पश्चानिर्योको जानता है वह उन महापापियोके इत्यादिलिङ्गात् । आख्यायिका "वह देवेताओक्षा सन्न है! देव- गण उसका भक्षण रते है रेषा
English
Svetaketu Âruneya went to an assembly of the Pañkâlas. Pravâhana Gaivali said to him: 'Boy, has your father instructed you?' 'Yes, Sir,' he replied.