Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
17
अध्याय 17 / 119

Adhyaya 17

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अध्याय १७

श्लोक 1

नृपत्वम् अहम् इच्छामि यदि मे सुकृतं भवेत् ।ततस् तं चक्रवाकौ द्वाव् ऊचतुः सहचारिणौ आवां ते सचिवौ स्यावस् तव प्रियहितैषिणौ

nṛpatvam aham icchāmi yadi me sukṛtaṃ bhavet | tatas taṃ cakravākau dvāv ūcatuḥ sahacāriṇau āvāṃ te sacivau syāvas tava priyahitaiṣiṇau

हिन्दी अर्थ

षष्टिं वर्षाणि धर्मात्मा यज्ञेषु विनियोजयत्॥ २६ अनेक प्रकारके द्रव्य और उत्तम रत्न दक्षिणारूपमें अक्रूरयज्ञा इति ते ख्यातास्तस्य महात्मन: । बहन्नदक्षिणा: सर्वे सर्वकामप्रदायिन: अथ दुर्योधनो राजा गत्वा तु मिथिलां प्रभु: । गदाशिक्षां ततो दिव्यां बलभद्रादवाप्तवान् आनीतो द्वारकामेव कृष्णेन च महात्मना

English

⁶¹ It is a religious ceremony which only an Emperor can perform when he becomes Lord Paramount after subjugating all the Powers. The king Shamika was not satisfied with his being the king of one Province only.

अध्याय १७

श्लोक 2

तथेत्य् उक्त्वा च तस्यासीत् तदा योगात्मनो मतिः एवं ते समयं चक्रुः सुवाक्तं प्रत्यभाषत

tathety uktvā ca tasyāsīt tadā yogātmano matiḥ evaṃ te samayaṃ cakruḥ suvāktaṃ pratyabhāṣata

हिन्दी अर्थ

ज्ञातिभेदभयात् कृष्णस्तमुपेक्षितवानथ अपयाते तथाक्रूरे नावर्षत् पाकशासनः ततः प्रसादयामासुरक्रूरं कुकुरान्थकाः कन्यां च वासुदेवाय स्वसारं शीलसम्मताम्। अक्रूरः प्रददौ धीमानू् प्रीत्यर्थ कुरूनन्दन अथ विज्ञाय योगेन कृष्णो बश्ुगतं मणिम्। सभामध्ये गतं प्राह तमक्रूरं जनार्दन:

English

Vaishampayana said:—Of the fourteen beautiful wives of Vasudeva, Rohini, of Puru's race, was the first Madirā, the second, Vaishākhi the third, Bhadrā the fourth, Sunāmā the fifth, Sahadevā the sixth, Devaki the seventh, Shāntidevā the eighth, Shridevā the ninth, Devarakshita the tenth, Vrikadevi the eleventh, Upadevi the twelfth, Sutanu the thirteenth, and Badarvā the fourteenth. The last two were his female attendants (1–3). Rohini, of Puru's race, was the daughter of Vālhika. O king, she was the first and most beloved wife of Anākadundhuvi (4). Vasudeva begat on Rohini his eldest son Rāina, Shārana, Shatha, Durdhama, Damana, Swabhra, Pindāraka, Ushinara, and a daughter by name Chitrā. O descendant of Kuru, it was Chitrā who passed by the name of Subhadrā (5–6). Vasudeva begat on Devaki the highly illustrious Shouri.⁶² Rāma begat on Revati his beloved son Nishatha. Arjuna begat on Subhadrā the mighty car-warrior Abhimanyu. Akrura begat Satyaketu on the daughter of the king of Kāshi (7-8). Hear, now, of the heroic sons whom Vasudeva begat on his seven noble wives (9). Bhoja and Viyaya were the sons of Shāntideva. Vrika deva and Gada were the sons of Sunāmā (10). Devarakshitā obtained Upāsangavara as his son. Vrikadevi, the daughter of the Trigarta king, gave birth to the high-souled Agāvaha. His priest Shaishirāyana once grew desirous of testing the manhood (of his brother-in-law Gārgya, the priest of the Yādavas) (11–12). On account of a false charge being laid home to him⁶³ Gārgya was filled with anger and remained like black iron for twelve years (13). He then began to live with a cow-herd's daughter. A nymph, by name Gopāli, came to him in this guise (14). By the command of Shulapāni⁶⁴ Gārgya, made his human wife conceive, the embryo whereof was irrepresible and never to die (15). She gave birth to a highly powerful king by name Kālayavana. Horses, having their heads like those of bulls, used to carry him in battle (16). O king that child grew up in the city of the king of Yavanas⁶⁵ who had no issue. And accordingly he was named Kālayavana (17). Growing desirous of entering into a battle that king questioned the twice born ones. Thereat the omniscient Nārada asked him to fight with the members of Vrishni and Andhaka families (18). Thereupon starting for Mathurā with one Akshouhini⁶⁶ of soldiers Kālayavana sent his messenger to the house of Vrishnis and Andhakas (19). Thereupon being united the Vrishnis and Andhakas, making the highly intelligent Krishna their president, held a conference in fear of Kālayavana (20). Then honoring Pinaki⁶⁷ thev resolved upon flying away from the charming city of Mathurā and thought of settling down in Kushasthali Dwarkā.⁶⁸ He, who being pure and self-controlled, listens to the story of Krishna's birth, becomes learned, happy and freed from debts (21–22).

अध्याय १७

श्लोक 3

यस्मात् कामप्रधानस् त्वं योगधर्मम् अपास्य वै अवरं वरं प्रार्थयसे तस्माद् वाक्यं निबोध मे

yasmāt kāmapradhānas tvaṃ yogadharmam apāsya vai avaraṃ varaṃ prārthayase tasmād vākyaṃ nibodha me

हिन्दी अर्थ

षष्टिवर्ष गते काले यद्रोषो5भून्ममानघ। स संरूढो5सकृत्प्राप्तत्ततः कालात्ययो महान् ततः कृष्णस्य वचनात् सर्वसात्त्वतसंसदि। प्रददौ त॑ मर्णिं बश्लुरक्लेशेन महामतिः ददौ हष्टमना: कृष्णस्तं मर्णिं बश्चवे पुनः दिये॥ २६॥ उन महात्माके किये हुए वे सब यज्ञ अक्रूर- यज्ञोंके नामसे प्रसिद्ध हैं, उनमें बहुत-सा अन्न और बहुत- सी दक्षिणाएँ दी गयीं तथा उन सभी यज्ञोंमें ऋत्विजोंकी सब प्रकारकी कामनाएँ पूर्ण की गयीं॥ २७॥ इसी समय

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 4

राजा त्वं भविता तात काम्पिल्ये नगरोत्तमे भविष्यतः सखायौ च द्वाव् इमौ सचिवौ तव

rājā tvaṃ bhavitā tāta kāmpilye nagarottame bhaviṣyataḥ sakhāyau ca dvāv imau sacivau tava

हिन्दी अर्थ

शक्तिशाली राजा दुर्योधनने मिथिलापुरीमें जाकर बलदेवजीसे दिव्य गदा-विद्याकी शिक्षा ग्रहण की॥ २८॥ तदनन्तर वृष्णि और अन्धकवंशी महारथी तथा महात्मा श्रीकृष्ण बलरामजीको प्रसन्न करके द्वारकामें ही बुला लाये भरतश्रेष्ठ ! रात्रिमें सोये हुए महाबली सत्राजित् और उनके बन्धुओंको शतधन्वाके द्वारा मरवाकर अक्रूर (अपने कुटुम्बी कतिपय) अन्धकवंशियोंको साथ लेकर भाग गये थे, किंतु श्रीकृष्णने जातिमें फूट पड़नेके भयसे उनकी उपेक्षा कर दी, परंतु अक्रूरके चले जानेपर इन्द्रदेबने वर्षा करना बंद कर दिया॥ ३०-३१॥ जब अनावृष्टि होनेसे राज्यके मनुष्य प्रायः दुर्बल होने लगे, तब कुकुर और अन्धकवंशियोंने अक्रूरकों अनुनय- विनय करके (द्वारका लौटनेके लिये) राजी कर लिया॥ ३२॥ फिर क्‍या था, उन दानपति अक्रूरके द्वारकापुरीमें वापस आते ही सहस्ञक्ष इन्द्रने समुद्रके तटवर्ती प्रदेशपर जोरोंसे वर्षा करनी आरम्भ कर

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 5

शप्त्वा तान् अभिभाष्याथ चत्वारश् चक्रुर् अण्डजाः तांस् त्रीन् अभीप्सतो राज्यं व्यभिचारप्रधर्षितान्

śaptvā tān abhibhāṣyātha catvāraś cakrur aṇḍajāḥ tāṃs trīn abhīpsato rājyaṃ vyabhicārapradharṣitān

हिन्दी अर्थ

बहिनका, जो कुमारी थी, श्रीकृष्णके साथ उनको प्रसन्न करनेके लिये विवाह कर दिया॥ ३४॥ तदनन्तर जनार्दन श्रीकृष्णने योगके द्वारा यह जानकर कि मणि अक्रूरके पास है, सभामें बैठे हुए अक्रूरसे (एक दिन) कहा-- ॥ ३५॥ “माननीय विभो! जो मणिरत्न स्यमन्तक आपके पास है, आप उसे दे दीजिये, अनार्यताका व्यवहार न कौजिये॥ ३६॥ निष्पाप अक्रूरजी! साठ वर्ष पहले (मणिके कारणसे) जो रोष मुझे चढ़ा था, वही रहा है (अतः: उस मणिको मुझे दे दीजिये) ' इस प्रकार श्रीकृष्णके कहनेपर महाबुद्धिमान् अक्रूरजीने सम्पूर्ण सात्त्तोंकी सभामें वह मणि बिना कष्ट पाये ही श्रीकृष्णको अर्पण कर दी॥ ३८ ॥ तदनन्तर अक्रूरजीके हाथसे सरलतापूर्वक मणि पा जानेपर अरिदमन श्रीकृष्णने

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 6

शप्ताः खगास् त्रयस् ते तु योगभ्रष्टा विचेतसः तान् अयाचन्त चतुरस् त्रयस् ते सहचारिणः

śaptāḥ khagās trayas te tu yogabhraṣṭā vicetasaḥ tān ayācanta caturas trayas te sahacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

मनमें प्रसन्न होकर वह मणि फिर अक्रूरजीको दे दी स कृष्णहस्तात् सम्प्राप्तं मणिरलं स्यमन्तकम्। आबदध्य गान्दिनीपुत्रो विरराजांशुमानिव आ ब्रह्मभुवनाच्चापि यशःख्यातिर्न संशय: । भविष्यति नृपश्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते तब श्रीकृष्णके हाथसे मिली हुई मणिरत्न स्यमन्तक- मणिको गलेमें बाँधकर गान्दिनीपुत्र अक्रूर सूर्यके समान सुशोभित हुए॥ ४० ॥ इस प्रकार जो मनुष्य पवित्र होकर सावधानतापूर्वक इस कथाको नित्यप्रति सुनता है, उसको

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 7

तेषां प्रसादं चक्रुस् ते अथैतान् सुमनाब्रवीत् सर्वेषाम् एव वचनात् प्रसादानुगतं तदा

teṣāṃ prasādaṃ cakrus te athaitān sumanābravīt sarveṣām eva vacanāt prasādānugataṃ tadā

हिन्दी अर्थ

फलरूपमें सम्पूर्ण सुख प्राप्त होते हैं॥४१॥ नृपश्रेष्ठ ! उसकी कीर्ति ब्रह्मलोकतक पहुँचती है, इसमें कुछ संदेह नहीं है, यह मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण्येकोनचत्वारिशो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवशरपर्वमें (बलदेवजीके द्वारा दुर्वोधनको गदा-विद्याकी शिक्षाविषयक) उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 8

अन्तवान् भविता शापो युष्माकं नात्र संशयः इतश् च्युताश् च मानुष्यं प्राप्य योगम् अवाप्स्यथ

antavān bhavitā śāpo yuṣmākaṃ nātra saṃśayaḥ itaś cyutāś ca mānuṣyaṃ prāpya yogam avāpsyatha

हिन्दी अर्थ

जनमेजयका भगवान्के वराह, नृसिंह, परशुराम, श्रीकृष्ण आदि अवतारोंका रहस्य पूछना प्रादुर्भावानू पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः। सतां कथयतामेव वाराह इति नः श्रुतम् न कर्मगुणसंतानं न हेतुं न मनीषितम् किमात्मको वराह: स का मूर्ति: का च देवता। किमाचारः प्रभावो वाकिं वा तेन पुरा कृतम्

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 9

सर्वसत्त्वरुतज्ञश् च स्वतन्त्रो ऽयं भविष्यति पितृप्रसादो ह्य् अस्माभिर् अस्य प्राप्तः कृतेन वै

sarvasattvarutajñaś ca svatantro 'yaṃ bhaviṣyati pitṛprasādo hy asmābhir asya prāptaḥ kṛtena vai

हिन्दी अर्थ

यज्ञार्थ समवेतानां मिषतां च द्विजन्मनाम्। महावराहचरितं कृष्णद्वैपायनेरितम् जनमेजयने कहा--ब्रह्मन्! मैंने कथा कहनेवाले सज्जनोंके मुखसे अमिततेजस्वी विष्णुके अवतारोंमें वराह अवतारकी भी बात पुराणोंमें सुनी है (वराह शब्दका आध्यात्मिक अर्थ वर और अह अर्थात् श्रेष्ठ यज्ञ है) ॥ १॥ परंतु मैं उन वराह भगवान्के (सर्वकार्य- जनकत्वरूप) चरित्रको, (अपूर्वस्वरूपका आविष्कार करनेकी) विधिको, (अनुष्ठानकी आवश्यकतारूप) विस्तारको तथा उनके कर्म (अर्थात् उसके कर्मसे तृप्त होनेवाले देवता आदि) तथा गुण-देश-द्र॒व्य-काल आदि एवं संतान (प्रयोगविधि)-को, हेतु अर्थात् अधिकारको और वे किस अभिभप्रायसे त्यागात्मक स्वरूपको ग्रहण करते हैं, उसे मैं कुछ नहीं समझता (अतः आप मुझे

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 10

गां प्रोक्षयित्वा धर्मेण पितृभ्य उपकल्पताम् अस्माकं ज्ञानसंयोगः सर्वेषां योगसाधनः

gāṃ prokṣayitvā dharmeṇa pitṛbhya upakalpatām asmākaṃ jñānasaṃyogaḥ sarveṣāṃ yogasādhanaḥ

हिन्दी अर्थ

ये सब बातें समझाइये ) ॥ २॥ (इस प्रकार वराहावतारके अधियज्ञस्वरूपकी बात पूछनेके अनन्तर अब राजा जनमेजय उनके आधिहैविक रूपके विषयमें पूछते हैं--) उन वराहका वास्तविक स्वरूप क्‍या है ? उनकी मूर्ति (बाहरी आकृति) कैसी है? उनका (अधिष्ठातृ) कैसा है और उन्होंने उस अवतारमें क्‍या किया था ?॥ ३॥ मैंने कृष्णद्वैपायनजीका कहा हुआ महावराहका चरित्र यज्ञमें एकत्रित हुए ब्राह्मणोंके वाद-विवादमें सुना है (परंतु उसका तत्त्व मेरी समझमें नहीं आया) यथा नारायणो ब्रह्मन् वाराहं रूपमास्थित: । दंट्रया गां समुद्रस्थामुज्जहारारिसूदन:

English

⁶² A name of Krishna.

अध्याय १७

श्लोक 11

इदं च वाक्यसंदर्भ+ +श्लोकम् एकम् उदाहृतम् पुरुषान्तरितं श्रुत्वा ततो योगम् अवाप्स्यथ

idaṃ ca vākyasaṃdarbha+ +ślokam ekam udāhṛtam puruṣāntaritaṃ śrutvā tato yogam avāpsyatha

हिन्दी अर्थ

विस्तरेणैव कर्माणि सर्वाणि रिपुघातिन: । श्रोतुमिच्छाम्यशेषेण हरे: कृष्णस्य धीमत: कर्मणामानृपूर्व्याच्च प्रादुर्भावाश्च ये विभो:। याचास्यप्रकृतिर््रहांस्तांमे व्याख्यातुमहसि कर्थ च भगवान् विष्णु: सुरशत्रुनिषूदन:। वसुदेवकुले धीमान् वासुदेवत्वमागतः देवलोकं॑ समुत्सृज्य मर्त्मलोकमिहागत:

English

⁶² A name of Krishna.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 17
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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