अध्याय २१
श्लोक 1
नरो विगतकल्मषः श्रद्दधानः प्रसन्नात्मा ।बुधस्य तु महाराज विद्वान् पुत्रः पुरूरवाः तेजस्वी दानशीलश् च यज्वा विपुलदक्षिणः
naro vigatakalmaṣaḥ śraddadhānaḥ prasannātmā | budhasya tu mahārāja vidvān putraḥ purūravāḥ tejasvī dānaśīlaś ca yajvā vipuladakṣiṇaḥ
हिन्दी अर्थ
हुए थे। मेरु पर्वत उसका कूबर (आगेका भाग) था। तारे ही उसमें रंग-बिरंगे फूलोंके रूपमें सजे थे तथा ग्रह-नक्षत्र उसमें डोरीके रूपमें लगे थे उस समय इन्द्र आदि समस्त देवताओंने जय-जय शब्दका उच्चारण किया और हाथ जोड़कर शरण देनेवाले विष्णुभगवान्की शरण ग्रहण को ॥ २९ ॥ विष्णुको देवता प्रिय हैं, अतएवं उन्होंने देवताओंकी उस वाणीको सुनकर महायुद्धमें दानवोंके नाश करनेका अपने मनमें विचार किया॥ ३० ॥ उत्तम आकाशमें विराजमान उन पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने सब देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वकत यह बात कही--॥ ३१॥ “देवताओ ।! तुम्हारा कल्याण हो! अब लिये गये--यों समझना चाहिए। (अब) तुम त्रिलोकीका राज्य अपना ही मानो और उसपर अधिकार करो '
English
⁸² _i e._, He assumed one form of universal intelligence.