Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
21
अध्याय 21 / 119

Adhyaya 21

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अध्याय २१

श्लोक 1

नरो विगतकल्मषः श्रद्दधानः प्रसन्नात्मा ।बुधस्य तु महाराज विद्वान् पुत्रः पुरूरवाः तेजस्वी दानशीलश् च यज्वा विपुलदक्षिणः

naro vigatakalmaṣaḥ śraddadhānaḥ prasannātmā | budhasya tu mahārāja vidvān putraḥ purūravāḥ tejasvī dānaśīlaś ca yajvā vipuladakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

हुए थे। मेरु पर्वत उसका कूबर (आगेका भाग) था। तारे ही उसमें रंग-बिरंगे फूलोंके रूपमें सजे थे तथा ग्रह-नक्षत्र उसमें डोरीके रूपमें लगे थे उस समय इन्द्र आदि समस्त देवताओंने जय-जय शब्दका उच्चारण किया और हाथ जोड़कर शरण देनेवाले विष्णुभगवान्की शरण ग्रहण को ॥ २९ ॥ विष्णुको देवता प्रिय हैं, अतएवं उन्होंने देवताओंकी उस वाणीको सुनकर महायुद्धमें दानवोंके नाश करनेका अपने मनमें विचार किया॥ ३० ॥ उत्तम आकाशमें विराजमान उन पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने सब देवताओंसे प्रतिज्ञापूर्वकत यह बात कही--॥ ३१॥ “देवताओ ।! तुम्हारा कल्याण हो! अब लिये गये--यों समझना चाहिए। (अब) तुम त्रिलोकीका राज्य अपना ही मानो और उसपर अधिकार करो '

English

⁸² _i e._, He assumed one form of universal intelligence.

अध्याय २१

श्लोक 2

ब्रह्मवादी पराक्रान्तः शत्रुभिर् युधि दुर्जयः आहर्ता चाग्निहोत्रस्य यज्ञानां च दिवो महीम्

brahmavādī parākrāntaḥ śatrubhir yudhi durjayaḥ āhartā cāgnihotrasya yajñānāṃ ca divo mahīm

हिन्दी अर्थ

यहाँ नीलकण्ठजीने शिलाका अर्थ मैनसिल और उच्चयका अर्थ नीवीबन्ध या नारा दिया है। देवाः प्रीतिं परां जग्मुः प्राप्पेवामृतमुत्थितम् ततस्तमः संहियते विनेशुश्च बलाहका:। प्रववुश्च शिवा वाता: प्रसन्नाश्न दिशो दशा नीरजस्का बभुर्मार्गा नाकमार्गादयस्त्रय:

English

⁸³ A name of Indra from _Puru_ much _Huta_ worshipped or invoked.

अध्याय २१

श्लोक 3

सत्यवादी पुण्यमतिः काम्यः संवृतमैथुनः अतीव त्रिषु लोकेषु यशसाप्रतिमः सदा

satyavādī puṇyamatiḥ kāmyaḥ saṃvṛtamaithunaḥ atīva triṣu lokeṣu yaśasāpratimaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

महर्षबो वीतशोका वेदानुच्चैरधीयते। यज्ञेषु च हवि: स्वादु शिवमश्नाति पावक: प्रवृत्तधर्मा: संवृत्ता लोका मुदितमानसा:। प्रीत्या परमया युक्ता देवदेवस्थ भूपते। विष्णो: सत्यप्रतिज्ञस्य श्रुत्वारिनिधने गिरम् सत्यप्रतिज्ञ भगवान् विष्णुके वाक्यसे आश्वासित हो देवता अत्यधिक प्रसन्न हुए, मानो उनको क्षीरसागरसे प्रकट हुआ अमृत मिल गया॥ ३३॥ उस समय अन्धकार प्रभावाले नक्षत्र चन्द्रमाकी और प्रकाशमान ग्रह सूर्यकी प्रदक्षिणा करने लगे॥ ३५ ॥ ग्रहोंने आपसमें टकराना छोड़ दिया, नदियोंका जल निर्मल हो गया तथा देवयान, पितृयान और मोक्षमार्ग नामक तीनों मार्ग भी रज (धूल या

English

⁸⁴ This refers to the celebrated episode of Pralhada. He was the son of the Demon king Hiranyakasipu. He began worshipping Vishnu who was an enemy of Hiranykasipu. He prosecuted his son in various ways and afterwards was killed by Vishnu in his man-lion form.

अध्याय २१

श्लोक 4

तं ब्रह्मवादिनं क्षान्तं धर्मज्ञं सत्यवादिनम् उर्वशी वरयाम् आस हित्वा मानं यशस्विनी

taṃ brahmavādinaṃ kṣāntaṃ dharmajñaṃ satyavādinam urvaśī varayām āsa hitvā mānaṃ yaśasvinī

हिन्दी अर्थ

रजोगुण)-से रहित हो गये॥ ३६॥ नदियाँ ठीक ढंगसे बहने लगीं, समुद्रोंका क्ुब्ध होना बंद हो गया, मनुष्योंके मनोंमें इन्द्रियोंको शुभ कामोंमें लगानेकी इच्छा होने लगी॥ ३७॥ महर्षि शोकरहित होकर उच्चस्वरसे वेदध्वनि करने लगे, अग्रिदेव भी यज्ञोंमें पवित्र और स्वादु हविका भक्षण करने लगे॥ ३८ ॥ पृथ्वीनाथ ! सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले देवपूज्य भगवान् विष्णुके द्वारा की गयी शत्रुनाशकी प्रतिज्ञा सुनकर प्राणी अपने मनमें प्रसन्न होकर परम प्रीतिसे यज्ञ आदि धर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त हो गये इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्वर्यतारकामये द्विचत्वारिंशो5ध्याय:

English

⁸⁵ A sacred fire perpetually maintained by a householder, received from his father and transmitted to his descendants, and from which fires for sacrificial purposes are lighted.

अध्याय २१

श्लोक 5

तया सहावसद् राजा दश वर्षाणि पञ्च च पञ्च षट् सप्त चाष्टौ च दश चाष्टौ च भारत

tayā sahāvasad rājā daśa varṣāṇi pañca ca pañca ṣaṭ sapta cāṣṭau ca daśa cāṣṭau ca bhārata

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आश्र्यतारकामय संग्रामविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ततो भयं विष्णुमयं श्रुत्वा हैतेयदानवाः। उद्योगं विपुलं चक्रुर्युद्धाय युधि दुर्जया: मयस्तु काझ्जनमयं त्रिनल्वान्तरमव्ययम्। चतुश्चक्रं विक्रमन्त॑ सुकल्पितमहायुधम् वैशम्पायनजी कहते हैं-- जनमेजय ! तदनन्तर मुख्यतः: भगवान् विष्णुकी ओरसे भय प्राप्त हुआ है, यह सुनकर रण-दुर्जय हैत्यों और दानवोंने युद्धके लिये बड़ा भारी

English

⁸⁶ The monthly Srāddha or funeral repast in honour of the manes held on the day of new moon.

अध्याय २१

श्लोक 6

वने चैत्ररथे रम्ये तथा मन्दाकिनीतटे अलकायां विशालायां नन्दने च वनोत्तमे

vane caitrarathe ramye tathā mandākinītaṭe alakāyāṃ viśālāyāṃ nandane ca vanottame

हिन्दी अर्थ

हुआ, जिसका विस्तार बारह सौ हाथका था। उसमें चार पहिये लगे थे। वह रथ टूटने या बिगड़नेवाला नहीं था। कैसी ही विषम भूमि क्‍यों न हो, उसमें वह आगे बढ़ जाता था। उस रथमें बड़े-बड़े आयुध सुन्दर ढंगसे सजाकर रखे गये थे। उसमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं, जिनसे मधुर ध्वनिका विस्तार होता रहता था। रथके ऊपरी भागमें उसकी रक्षाके लिये चीतेकी खाल मढ़ी गयी थी। उस रथमें भाँति-भाँतिके रत्न जड़े गये थे तथा खचितं रलजालैश् हेमजालैश्व भूषितम्॥ ३ सोनेकी जालियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं॥ १--३॥ ईहामृगगणाकीर्ण पक्षिभिश्व विराजितम्।

English

⁸⁹ A vessel used at sacrifices for drinking the juice of the acid asclepias; a kind of ladle or spoon.

अध्याय २१

श्लोक 7

उत्तरान् स कुरून् प्राप्य मनोररथफलद्रुमान् गन्धमादनपादेषु मेरुशृङ्गे तथोत्तरे

uttarān sa kurūn prāpya manorarathaphaladrumān gandhamādanapādeṣu meruśṛṅge tathottare

हिन्दी अर्थ

हेमकेयूरवलयं. स्वर्णमण्डलकूबरम् गजेन्द्राम्भोदसदृशं लम्बकेसरवर्चसम् दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम् अध्यतिष्ठद्रणाकाडश्ली मेरुं दीम्तमिवांशुमान्। तारस्तु क्रोशविस्तारमायसं वायसध्वजम्

English

⁹⁰ A wooden mortar used for cleaning rice.

अध्याय २१

श्लोक 8

एतेषु वनमुख्येषु सुरैर् आचरितेषु च उर्वश्या सहितो राजा रेमे परमया मुदा

eteṣu vanamukhyeṣu surair ācariteṣu ca urvaśyā sahito rājā reme paramayā mudā

हिन्दी अर्थ

शैलोत्करसमाकीर्ण नीलाझ्जनचयोपमम्। काललोहाष्टचरणं लोहेषायुगकूबरम्। तिमिराषद्टारकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम् आयसैःपरिघैः: कीर्ण क्षेपणीयैस्तथाशएमशभि: प्रासे: पाशैश्व विततैरवसक्तैश्व मुद्रैः। शोभितं त्रासनीयैश्व तोमर: सपरश्रथे: उसका धुरा बहुत अच्छा था। वह रथ अच्छी श्रेणीके रथोंमें भी सबसे अच्छा था। उसकी बैठक बड़ी सुन्दर थी। वह देखनेमें पर्वत-जैसा जान पड़ता था। उसमें जीव-जन्तुओंके चित्र अड्भित थे। भाँति-

English

⁹¹ A species of grass used in many solemn and religious observances; hence called sacrificial grass.

अध्याय २१

श्लोक 9

देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिर् अभिष्टुते राज्यं स कारयाम् आस प्रयागे पृथिवीपतिः

deśe puṇyatame caiva maharṣibhir abhiṣṭute rājyaṃ sa kārayām āsa prayāge pṛthivīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

भाँतिके पक्षियोंके चित्र भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके भीतर दिव्यास्त्र और तरकस रखे गये थे। उस रथसे मेघगर्जनाके समान गम्भीर घर्घर-शब्द होता रहता था। गदाओं और परिघोंसे परिपूर्ण वह विशाल रथ मूर्तिमान् समुद्र-सा जान पड़ता था। उस रथमें जहाँ- जहाँ संधिस्थलोंको बाँधे रखनेके लिये पट्टियाँ लगी थीं, वहाँ-वहाँ वे पट्टिकाएँ सुवर्णनिर्मित केयूर और वलयके सदृश शोभा पाती थीं। उसका कूबर सोनेका मण्डल-सा जान पड़ता था। ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित वह ऊँचा रथ सूर्यमण्डलसे विभासित मन्दराचल-सा जान पड़ता था। दूरसे देखनेपर उसका रंग बड़े-बड़े गजराजों, मेघोंकी घटाओं तथा भालुओंके समान जान पड़ता था। उसमें एक हजार रीछ जुते हुए थे। उसकी घरघराहट सहस्रों मेघोंकी गर्जनाको तिरस्कृत किये देती थी। वह दीपतिमान् दिव्य रथ आकाशमें भी चल सकता था और शत्रु-पक्षके रथोंको तोड़-फोड़ डालनेमें समर्थ

English

⁹² A ladle with a double extremity or two oval collateral excavations made of wood and used to pour ghee upon the sacrificial fire.

अध्याय २१

श्लोक 10

उत्तरे जाह्नवीतीरे प्रतिष्ठानेमहायशाः ।एक एवपुरा देवः प्रणवः सर्ववाङ्मयः ।देवो नारायणो नान्य एको ऽग्निवर्ण एव च ॥ पुरूरवस एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप ।अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वम् एयिवान् ।तस्य पुत्रा बभूवुस् ते षड् इन्द्रोपमतेजसाः दिवि जाता महात्मान आयुर् धीमान् अमावसुः विश्वायुश् चैव धर्मात्मा श्रुतायुश् च तथापरः ।दृढायुश् च वनायुश् च शतायुश् चोर्वशीसुताः

uttare jāhnavītīre pratiṣṭhānemahāyaśāḥ | eka evapurā devaḥ praṇavaḥ sarvavāṅmayaḥ | devo nārāyaṇo nānya eko 'gnivarṇa eva ca || purūravasa evāsīt trayī tretāmukhe nṛpa | agninā prajayā rājā lokaṃ gāndharvam eyivān | tasya putrā babhūvus te ṣaḍ indropamatejasāḥ divi jātā mahātmāna āyur dhīmān amāvasuḥ viśvāyuś caiva dharmātmā śrutāyuś ca tathāparaḥ | dṛḍhāyuś ca vanāyuś ca śatāyuś corvaśīsutāḥ

हिन्दी अर्थ

था। युद्धकी आकाडुक्षा रखनेवाला मयासुर उस रथपर सवार हुआ मानो अंशुमाली सूर्य दीप्तिमान् मेरु पर्वतपर आरूढ़ हुए हों। तार नामक हैत्य लोहेके बने हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ, जिसका विस्तार एक कोसका था; उसके ऊपर कौएके चिहसे सुशोभित ध्वजा फहरा रही थी। उसके भीतर शिलाखण्डोंके समूह भरे हुए थे। वह नीली कज्जलशशिके समान प्रतीत होता था। उसमें काले लोहेके आठ पहिये लगे थे। उसके ईषादण्ड (हरसे या बम), जुआ और कूबर भी लोहेके ही बने हुए थे। उसकी कान्ति काले कोयलेके समान काली थी, वह अपनी घरघराहटसे गरजता हुआ मेघ-सा जान पड़ता था। उसके ऊपर लोहेकी बहुत बड़ी जाली लगी हुई थी, जिसमें झरोखे शोभा पाते थे। वह रथ लोहेके परिघों तथा फेंकने योग्य पत्थरोंके गोलोंसे भरा था। बहुत-से भाले, विस्तृत पाश, बहुसंख्यक लटकते हुए मुद्र, डरावने तोमर और

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 11

आयोः पुत्राश् तथा पञ्च सर्वे वीरा महारथाः स्वर्भानुतनयायां च प्रभायां जज्ञिरे नृप ।नहुषः प्रथमं जज्ञे वृद्धशर्मा ततः परम् दम्भो रजिर् अनेनाश् च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः

āyoḥ putrāś tathā pañca sarve vīrā mahārathāḥ svarbhānutanayāyāṃ ca prabhāyāṃ jajñire nṛpa | nahuṣaḥ prathamaṃ jajñe vṛddhaśarmā tataḥ param dambho rajir anenāś ca triṣu lokeṣu viśrutāḥ

हिन्दी अर्थ

फरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह शत्रुओंके लिये दूसरे मन्दराचलकी भाँति उदित हुआ था, उस श्रेष्ठ रथमें एक हजार गधे जुते हुए थे॥४--१२॥ स्फुरहन्तौष्ठवदन: संग्रामं सो5 भ्यकाड्क्षत व्यूहितो दानवैव्यूहैः परिचक्राम वीर्यवान् श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुख: स्थित:

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 12

रजिः पुत्रशतानीह जनयाम् आस पञ्च वै राजेयम् इति विख्यातं क्षत्रम् इन्द्रभयावहम्

rajiḥ putraśatānīha janayām āsa pañca vai rājeyam iti vikhyātaṃ kṣatram indrabhayāvaham

हिन्दी अर्थ

अभवद् हैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदित: हैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान् हसंस्तिष्ठति हैत्यानां प्रमुखे स महाग्रह: क्रोधमें भरा हुआ विरोचन नामक हैत्य हाथमें गदा लिये उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हो गया। वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था, मानो कान्तिमान् शिखरसे युक्त कोई पर्वत खड़ा हो॥ १३॥ दानव हयग्रीव शत्रुओंकी

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 13

यत्र देवासुरे युद्धे समुपोढे सुदारुणे देवाश् चैवासुराश् चैव पितामहम् अथाब्रुवन्

yatra devāsure yuddhe samupoḍhe sudāruṇe devāś caivāsurāś caiva pitāmaham athābruvan

हिन्दी अर्थ

सेनाको कुचल डालनेमें समर्थ था। उसने एक हजार घोड़ोंसे जुते हुए रथको अपना वाहन बनाया टंकारता हुआ हैत्य-सेनाके अग्रभागमें खड़ा हो गया, उस समय वह बरोहों (जटाओं)-से युक्त बरगदके समान प्रतीत होता था॥ १५॥ खर नामक हैत्य अपने नेत्रोंसे रोषजनित आँसू बहाता हुआ बड़े दर्षके साथ आया और युद्धकी इच्छासे डट गया, उस समय उसके दाँत, ओठ और मुख क्रोधसे फड़क रहे थे त्वष्टा नामक बलशाली दानव अठारह घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार होकर आया और व्यूहमें खड़े हुए दानवोंके साथ स्वयं भी व्यूहका एक अड्भ बनकर सब ओर घूमने लगा॥ १७॥ विप्रचित्तिका पुत्र श्रेत सफेद कुण्डलोंसे

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 14

आवयोर् भगवन् युद्धे विजेता को भविष्यति ब्रूहि नः सर्वभूतेश श्रोतुम् इच्छामहे वचः

āvayor bhagavan yuddhe vijetā ko bhaviṣyati brūhi naḥ sarvabhūteśa śrotum icchāmahe vacaḥ

हिन्दी अर्थ

विभूषित हो युद्धके लिये सामने आकर डट गया, वह श्वेतपर्वतके समान दिखायी देता था॥१८॥ बलिका ज्येष्ठ पुत्र अरिष्ट पर्वतीय शिलाखण्डोंको आयुधके रूपमें धारण किये शत्रुओंका सामना करनेके लिये खड़ा हुआ, उसने युद्धकी कलामें विशेष परिश्रम किया था। वह दूसरे पर्वतके समान प्रतीत होता था॥ १९॥ किशोर नामक हैत्य चाबुकसे हाँके गये बछेड़ेके समान बड़े हर्ष और उत्साहके साथ आकर हैत्यसेनाके मध्यभागमें खड़ा हो गया। वह नवोदित सूर्यके समान शोभा पा रहा था॥ २० ॥ लम्ब नामक दानव बरसनेके लिये झुके हुए मेघोंकी काली घटाके समान काला दिखायी देता था, उसके वस्त्र और आभूषण बड़े-बड़े थे। हैत्य-सेनाके व्यूहमें खड़ा होकर वह कुहासेसे ढँके हुए सूर्यके समान सुशोभित होता था॥२१॥ मुखसे युद्ध करनेवाला राहु नामक महान् ग्रह हँसता हुआ आकर हैत्य-सेनाके मुहानेपर डट गया। वह अपने दाँतों

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 15

येषाम् अर्थाय संग्रामे रजिर् आत्तायुधः प्रभुः योत्स्यते ते विजेष्यन्ति त्रींल् लोकान् नात्र संशयः

yeṣām arthāya saṃgrāme rajir āttāyudhaḥ prabhuḥ yotsyate te vijeṣyanti trīṃl lokān nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

नेत्रों और ओठोंसे भी आयुधका काम लेता था सिंहव्याप्रगताश्चान्ये वराहर्श्षगता:ः परे॥ २३ कुछ गजराजोंकी पीठपर। दूसरे बहुत-से हैत्य सिंह, केचित् खरोष्ट्यातार: केचित् तोयदवाहना: । नानापक्षिगताश्चान्ये केचित् पवनवाहना: पत्तयश्चापरे हैत्या भीषणा विकृतानना:। एकपादा द्विपादाश्च नर्दन्तो युद्धकाडशक्षिण:

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 16

यतो रजिर् धृतिस् तत्र श्रीश् च तत्र यतो धृतिः यतो धृतिश् च श्रीश् चैव धर्मस् तत्र जयस् तथा

yato rajir dhṛtis tatra śrīś ca tatra yato dhṛtiḥ yato dhṛtiś ca śrīś caiva dharmas tatra jayas tathā

हिन्दी अर्थ

प्रश्केडमाना बहवः स्फोटयन्तश्व ते भुजान्। हप्तशार्टूलनिघोषा . नेदुर्दानवपुड्डवा: बाहुभिः परिघाकारैस्तर्जयन्ति सम देवता: प्रासे: पाशैश्व खड्गैश्व तोमरांकुशपद्टिशै: । चिक्रीडुस्ते शतप्लीभि: शतधारैश्न मुदूरैः अक्रेश्व हैत्यप्रवराश्चक्कुरानन्दित बलम्

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 17

ते देवा दानवाः प्रीता देवेनोक्ता रजेर् जये अभ्ययुर् जयम् इच्छन्तो वृण्वाना भरतर्षभ

te devā dānavāḥ prītā devenoktā rajer jaye abhyayur jayam icchanto vṛṇvānā bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

रणौघाभ्युदयावकीर्ण युयुत्सयोन्मत्तमिवावभासे व्याप्र, सूअर और रीछोंपर चढ़े हुए थे कोई गधों और ऊँटोंपर चढ़कर जा रहे थे, तो कोई बादलोंको ही अपना वाहन बनाये हुए थे। दूसरे हैत्य नाना प्रकारके पक्षियोंपर बैठे थे और कितने ही दानव वायुके सहारे ही उड़ रहे थे॥२४॥ दूसरे विकराल मुखवाले भीषण हैत्य पैदल ही चल रहे थे। किन्हींके एक पैर थे तो किन्हींके दो पैर, वे सभी युद्धकी अभिलाषासे गरज रहे थे॥२५॥ बहुत-से दानवराज उछलते-कूदते और ताल ठोंकते हुए बलोन्मत्त सिंहोंके

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 18

स हि स्वर्भानुदौहित्रः प्रभायां समपद्यत राजा परमतेजस्वी सोमवंशविवर्धनः

sa hi svarbhānudauhitraḥ prabhāyāṃ samapadyata rājā paramatejasvī somavaṃśavivardhanaḥ

हिन्दी अर्थ

समान दहाड़ रहे थे॥२६॥ धनुष खींचनेके परिश्रमसे सुशोभित होनेवाले वे हैत्य अपनी गदाओं, भयंकर धारवाले मुदूरोंसे खेल रहे थे॥ २८॥ वे श्रेष्ठ हैत्यवीर पहाड़ोंसे टूटकर गिरी हुई बड़ी-बड़ी चट्टानों, शैल- शिखरों, परिघों, चक्रों तथा अन्य उत्तमोत्तम आयुधोंसे अपनी सेनाको आनन्दित कर रहे थे॥ २९॥ इस प्रकार युद्धेके लिये बलाभिमानसे उन्मत्त हुई वह दानवोंकी सम्पूर्ण सेना मेघोंकी घिरी हुई घटाके समान देवताओंके सम्मुख डटकर खड़ी थी॥३०॥ वह अद्भुत हैत्य-सेना सहस्ीरों हैत्यवीरोंसे ठसाठस भरी थी। वायु, अग्नि, जल, मेघ एवं पर्वतमालाओंके समान दिखायी देती थी। युद्धके प्रवाहको बढ़ानेके लिये सब ओर फैली हुई थी और लड़नेकी इच्छासे उन्मत्त हुई-सी प्रतीत होती थी

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 19

ते हृष्टमनसः सर्वे रजिं दैतेयदानवाः ऊचुर् अस्मज्जयाय त्वं गृहाण वरकार्मुकम्

te hṛṣṭamanasaḥ sarve rajiṃ daiteyadānavāḥ ūcur asmajjayāya tvaṃ gṛhāṇa varakārmukam

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि त्रिचत्वारिंशो 5ध्याय: इस प्रकार श्रीयहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिव॑शपर्वमें तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ आश्चर्यतारकामय संग्राममें देव-सेनाकी युद्धके लिये तैयारी श्रुतस्ते हैत्यसैन्यस्थ विस्तरस्तात विग्रहे। सुराणां सर्वसैन्यस्य विस्तरं वैष्णव श्रुणु

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 20

अथोवाच रजिस् तत्र तयोर् वैदेवदैत्ययोः ।स्वार्थज्ञः स्वार्थम् उद्दिश्य यशः स्वं च प्रकाशयन् ।यदि देवगणान् सर्वाञ् जित्वा शक्रपुरोगमान् इन्द्रो भवामि धर्मेण ततो योत्स्यामि संयुगे

athovāca rajis tatra tayor vaidevadaityayoḥ | svārthajñaḥ svārtham uddiśya yaśaḥ svaṃ ca prakāśayan | yadi devagaṇān sarvāñ jitvā śakrapurogamān indro bhavāmi dharmeṇa tato yotsyāmi saṃyuge

हिन्दी अर्थ

पुरुहृतस्तु पुरतो लोकपाल: सहस्रदूक्। ग्रामणी: सर्वदेवानामारुरोह सुरद्विपम् देवगन्धर्वयक्षौघैरनुयातः सहस्रशः । दीम्तिमद्धिः सदस्यैश्न ब्रह्मर्षिभिरभिष्टुत: गुप्तो बलाहकगणै: कामगैरिव पर्वतैः समारूढ: स भगवान् पर्येति मघवा गजम्। हविधनिषु गायन्ति विप्रा: सोममखे स्थिता:

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 21

देवाः प्रथमतोभूयः प्रतीयुर् हृष्टमानसाः ।एवं यथेष्टं नृपते कामः संपद्यतां तव ॥ श्रुत्वा सुरगणानां तु वाक्यं राजा रजिस् तदा ।पप्रच्छासुरमुख्यांस् तु यथा देवान् अपृच्छत ॥ दानवा दर्पपूर्णास् तु स्वार्थम् एवानुगम्य ह ।प्रत्यूचुस् तं नृपवरं साभिमानम् इदं वचः ।अस्माकम् इन्द्रः प्रह्रादो यस्यार्थे विजयामहे

devāḥ prathamatobhūyaḥ pratīyur hṛṣṭamānasāḥ | evaṃ yatheṣṭaṃ nṛpate kāmaḥ saṃpadyatāṃ tava || śrutvā suragaṇānāṃ tu vākyaṃ rājā rajis tadā | papracchāsuramukhyāṃs tu yathā devān apṛcchata || dānavā darpapūrṇās tu svārtham evānugamya ha | pratyūcus taṃ nṛpavaraṃ sābhimānam idaṃ vacaḥ | asmākam indraḥ prahrādo yasyārthe vijayāmahe

हिन्दी अर्थ

स्वर्गे शक्रानुयानेषु देवतूर्यनिनादिषु। इन्द्र समुपनृत्यन्ति शतशो हाप्सरोगणा: केतुना वंशजातेन राजमानो यथा रविः। युक्तो हरिसहस्रेण मनोमारुतरंहसा कृत्स्न: परिवृतो मेरुर्भास्करस्थेव तेजसा यमस्तु दण्डमुद्यम्य कालयुक्त च मुद्रम्। तस्थौ सुरगणानीके हैत्यान् नादेन भीषयनू

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 22

अस्मिंस् तु समये राजंस् तिष्ठेथा देवचोदितः स तथेति ब्रुवन्न् एव देवैर् अप्य् अभिचोदितः ।भविष्यसीन्द्रो जित्वैव देवैर् उक्तस् स पार्थिवः जघान दानवान् सर्वान् ये वध्या वज्रपाणिना

asmiṃs tu samaye rājaṃs tiṣṭhethā devacoditaḥ sa tatheti bruvann eva devair apy abhicoditaḥ | bhaviṣyasīndro jitvaiva devair uktas sa pārthivaḥ jaghāna dānavān sarvān ye vadhyā vajrapāṇinā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--तात ! उस युद्धके समय हैत्य-सेनाका जो विस्तार था, वह तुमने सुन लिया। अब अश्रित है, सुनो ॥ १॥ आदित्य, वसु, रुद्र और महाबली अश्विनीकुमार-ये अपने दल-बल और अनुयायियोंको साथ ले यथाशक्ति युद्ध करनेके लिये कवच आदिसे सुसज्जित हो गये॥ २॥ सबसे पहले समस्त देवताओंके नेता सहस्र नेत्रधारी इन्द्र देवताओंके हाथी ऐरावतपर आरूढ़ हुए॥३॥ उनकी बायीं ओर बहुत ही सुन्दर चक्ररूपी चरणोंसे गरुड़के समान वेगपूर्वक चलनेवाला सुवर्ण और हीरोंसे जड़ा हुआ उनका रथ चल रहा था॥ ४॥ उनके पीछे देवता, गन्धर्व और यक्षोंकी मण्डलियाँ चल रही थीं तथा यज्ञमें सहायता करनेवाले सहस्तरों दीमिमान् ब्रह्मर्षि स्तुति करते हुए चल रहे थे॥ ५॥ वज्र (गाज)-की गड़गड़ाहटसे फटते हुए तथा बिजली एवं

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 23

स विप्रनष्टां देवानां परमश्रीः श्रियं वशी निहत्य दानवान् सर्वान् आजहार रजिः प्रभुः

sa vipranaṣṭāṃ devānāṃ paramaśrīḥ śriyaṃ vaśī nihatya dānavān sarvān ājahāra rajiḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रधनुषसे युक्त मेघसमूह देवराजके साथ चल रहे थे। वे ऐसे लगते थे मानो इच्छानुसार चलनेवाले पर्वत हों। इन्द्रका वह रथ उन मेघोंद्वारा सुरक्षित था॥ ६ ॥ सोमयागमें भाग लेनेवाले ब्राह्मण हविष्य रखनेके स्थानोंमें हविष्य रखते समय जिनकी स्तुति करते हैं, स्वर्गमें जिनकी सवारियोंके अवसरपर देवताओंकी तुरहियाँ बजती हैं और जिनके साथ अप्सराओंकी सैकड़ों मण्डलियाँ नाचती हुई चलती हैं, वे ही भगवान् इन्द्र हाथीपर सवार होकर चल रहे थे॥ ७-८ ॥ बाँसकी ध्वजासे सुशोभित तथा मन और वायुके समान वेगवाले हजार घोड़ोंसे खींचा जानेवाला इन्द्रका रथ सूर्यकी तरह दमक रहा था॥९॥ (इन्द्रके सारथि) मातलिसे युक्त वह रथ सूर्यके तेजसे घिरा हुआ अपने सिंहनादसे हैत्योंको भयभीत करते हुए देवताओंकी सेनाके मुहानेपर डट गये

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 24

ततो रजिं महावीर्यं देवैः सह शतक्रतुः रजिपुत्रो ऽहम् इत्य् उक्त्वा पुनर् एवाब्रवीद् वचः

tato rajiṃ mahāvīryaṃ devaiḥ saha śatakratuḥ rajiputro 'ham ity uktvā punar evābravīd vacaḥ

हिन्दी अर्थ

कालपाशं समाविध्य हयै: शशिकरोपमै: । वाय्वीरितजलोदि्ारैः कुर्वल्लीला: सहस्रश: वरुण: पाशभृन्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान्। युद्धवेलामभिलषन् भिन्नवेल इवार्णव: यक्षराक्षससैन्येन गुहाकानां गणैरपि। मणिश्यामोत्तमवपु: कुबेरों नरवाहनः विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थित: ।

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 25

इन्द्रो ऽसि तात भूतानां सर्वेषां नात्र संशयः यस्याहम् इन्द्रः पुत्रस् ते ख्यातिं यास्यामि कर्मभिः

indro 'si tāta bhūtānāṃ sarveṣāṃ nātra saṃśayaḥ yasyāham indraḥ putras te khyātiṃ yāsyāmi karmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रेकष्ययाण: शिवसख: साक्षादिव शिव: स्वयम् चतुर्षु युक्ताश्चवत्वारो लोकपाला बलोत्कटा:। स्वासु दिक्ष्वभ्यरक्षन् वै तस्य देवबलस्य ह त्रिदिवद्वारचक्रेण तपता लोकमव्ययम् युद्ध अवसर चाहते हुए पाशधारी वरुण किनारेको तोड़कर आगे बढ़नेवाले समुद्रकी भाँति

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 26

स तु शक्रवचः श्रुत्वा वञ्चितस् तेन मायया तथेत्य् एवाब्रवीद् राजा प्रीयमाणः शतक्रतुम्

sa tu śakravacaḥ śrutvā vañcitas tena māyayā tathety evābravīd rājā prīyamāṇaḥ śatakratum

हिन्दी अर्थ

समुद्रों और जीभ लपलपाते हुए सर्पोंसे सुरक्षित थे। उन्होंने शड्डु और मोतियोंके बाजूबन्द धारण कर रखे थे। उनका शरीर जलमय था। वे कालपाशको घुमाते हुए चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्रेत रंगके घोड़ोंसे और वायुके द्वारा उछाले जानेवाले जलके उद्दारोंसे सहस्रों प्रकारकी क्रीडाएँ कर रहे थे। उनका श्वेत वस्त्र फहरा रहा था। उनके सुन्दर ओठ मूँगे एवं नूतन पल्‍लवोंके समान लाल-लाल थे। मणिमय आशभूषणोंसे विभूषित हुए उनके श्याम अड्जोंकी बड़ी उत्तम शोभा हो रही थी तथा हारोंका भार उनके उदरपर पड़ रहा था॥ १२--१५ ॥ नवों निधियोंके स्वामी, महान् शक्तिशाली, राजराजेश्वर श्रीमान् कुबेर, जिनका उत्तम शरीर नीलमणिके समान श्याम कान्तिसे सुशोभित था और जो मनुष्योंके द्वारा ढोयी जानेवाली पालकीमें सवार होते हैं, मूर्तिमान् श्र और पद्म नामकी निधियोंको साथ लेकर हाथमें गदा धारण किये दिखायी दिये। उनके साथ यक्ष और

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 27

तस्मिंस् तु देवैः सदृशो दिवं प्राप्ते महीपतौ दायाद्यम् इन्द्राद् आजह्रुर् आचारात् तनया रजेः

tasmiṃs tu devaiḥ sadṛśo divaṃ prāpte mahīpatau dāyādyam indrād ājahrur ācārāt tanayā rajeḥ

हिन्दी अर्थ

राक्षसोंकी सेना तथा गुह्मयकोंके गण विद्यमान थे॥ १६- १७॥ विमानमें बैठकर युद्ध करनेवाले, शिवजीके मित्र, राजाधिराज नरवाहन कुबेर युद्धके लिये पुष्पक विमानमें भगवान् शिवके समान दृष्टरिगोचर होते थे॥१८॥ उस देवसेनाके पूर्व-पक्षकी देखभाल सहख्नलोचन देवराज इन्द्र कर रहे थे। दक्षिण-पक्षकी देखभालका भार पितूराज यमने सम्हाला। पश्चिम-पक्षकी देख-रेख वरुणदेवने की और उत्तर-पक्षका निरीक्षण नरवाहन कुबेरने किया। इस प्रकार चारों दिशाओंमें सावधानीके साथ खड़े हुए चारों उत्कट बलशाली लोकपाल अपनी-अपनी दिशाकी ओरसे उस सेनाकी रक्षा कर रहे थे॥ १९-२० ॥सूर्यदेव सात घोड़ोंसे युक्त आकाशगामी रथके द्वारा युद्धभूमिमें आये थे। उनका वह रथ उत्तम शोभा तथा दीप्िमानू किरणोंसे जगमगा रहा था। वह मेरु पर्वतके चारों ओर चक्कर लगानेवाला, स्वर्गके

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 28

तानि पुत्रशतान्य् अस्य तद् वै स्थानं शतक्रतोः समाक्रामन्त बहुधा स्वर्गलोकं त्रिविष्टपम्

tāni putraśatāny asya tad vai sthānaṃ śatakratoḥ samākrāmanta bahudhā svargalokaṃ triviṣṭapam

हिन्दी अर्थ

द्वारपर चक्रकी भाँति घूमनेवाला और जो प्रवाहरूपसे अक्षय बने रहते हैं, उन समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेवाला था। उसीके द्वारा सूर्यदेव संसारमें उदय और अस्तकी झाँकी कराते हैं सहस्रों किरणोंसे सम्पन्न अपने ही तेजसे प्रकाशित चचार मध्ये देवानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः॥ २३ होनेवाले, द्वादश रूपधारी भगवान् दिनेश (सूर्य) पूर्वोक्त हिमतोयप्रपूर्णाभिर्भाभिराहदयज्ञगतू

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 29

ततो बहुतिथे काले समतीते महाबलः हृतराज्यो ऽब्रवीच् छक्रो हृतभागो बृहस्पतिम्

tato bahutithe kāle samatīte mahābalaḥ hṛtarājyo 'bravīc chakro hṛtabhāgo bṛhaspatim

हिन्दी अर्थ

सप्तस्कन्धगतो लोकांस्त्रीन् दधार चराचरान् यमाहुराकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोनिजम् वबवो प्रव्यथयन् हैत्यान् प्रतिलोम: सतोयद: मरुतो देवगन्धर्वा विद्याधरगणैः: सह। चिक्रीडुरसिभि: शुभ्रर्निर्मुक्तिरिव पन्नगैः

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 30

बदरीफलमात्रं वै पुरोडाशं विधत्स्व मे ब्रह्मर्षे येन तिष्ठेयं तेजसाप्यायितः सदा

badarīphalamātraṃ vai puroḍāśaṃ vidhatsva me brahmarṣe yena tiṣṭheyaṃ tejasāpyāyitaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

रथके द्वारा आकर देव-सेनाके बीचमें विचरने लगे शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा श्वेत घोड़ोंसे युक्त रथमें बैठे हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। वे हिम और जलसे भरी हुई अपनी प्रभाओंद्वारा सम्पूर्ण जगत्को आह्वाद प्रदान करते थे॥ २४॥ नक्षत्र और योग जिनका अनुसरण करते हैं, जो शीतल किरणोंसे सुशोभित हैं, ब्राह्मणोंके राजा हैं, जिनका शरीर नीले धब्बेके रूपमें पृथ्वीकी छायासे अड्धित रहता है, जो रात्रिके अन्धकारका नाश करनेवाले हैं, आकाशमें स्थित ज्योतिर्मयी तारिकाओंके अधीश्वर हैं, रसोंके आश्रय एवं प्रभु हैं, ओषधियोंके रक्षक तथा अमृतकी निधि हैं, (अग्नीषोमात्मक) जगतके प्रथम (मुख्य) भाग हैं और सौम्य तथा शीतल रस हैं, उन्हीं चन्द्रमाको हैत्योंने हिमका आयुध ग्रहण

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 31

ब्रह्मन् कृशो ऽहं विमना हृतराज्यो हृताशनः हतौजा दुर्बलो मूढो रजिपुत्रैः कृतो विभो

brahman kṛśo 'haṃ vimanā hṛtarājyo hṛtāśanaḥ hataujā durbalo mūḍho rajiputraiḥ kṛto vibho

हिन्दी अर्थ

करके खड़ा हुआ देखा॥ २५--२७॥ जो समस्त भूतोंके प्राण हैं, मनुष्य आदि जीवोंके भीतर प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान-इन पाँचों रूपोंमें विभक्त होकर निवास करते हैं, आवह, प्रवह आदि सात स्कन्धोंमें स्थित हो त्रिलोकीके चराचर जीवोंको धारण करते हैं, जिन्हें अग्रिका सारथि कहा जाता है, जो सबके उत्पत्तिस्थान और ईश्वर हैं, जिनके कारणभूत आकाशकी शब्दतन्मात्रा निषाद, ऋषभ आदि स्वरोंमें उतर आनेपर गीति कहलाती है, जिन्हें पाँच महाभूतोंमें उत्तम तथा शरीररहित बताते हैं, जिनको आकाशचारी और शीघ्रगामी भी कहते हैं तथा शब्दयोनि (आकाश)-से जिनकी उत्पत्ति बतायी गयी है, वे समस्त प्राणियोंके जीवनरूप वायुदेव अपने तेजसे हैत्योंको व्यथित करते हुए वहाँ मेघोंके साथ प्रतिकूल एवं प्रचण्ड गतिसे प्रवाहित होने लगे॥ २८--३१॥ उनचास मरुत, देवता और गन्धर्व, विद्याधरगणोंके साथ आकर केंचुलसे निकले हुए सर्पोके

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 32

यद्य् एवं चोदितः शक्र त्वया स्यां पूर्वम् एव हि नाभविष्यत् त्वत्प्रियार्थम् अकर्तव्यं मयानघ

yady evaṃ coditaḥ śakra tvayā syāṃ pūrvam eva hi nābhaviṣyat tvatpriyārtham akartavyaṃ mayānagha

हिन्दी अर्थ

समान, म्यानसे बाहर निकाली हुई चमचमाती तलवारोंसे खेलने लगे॥ ३२॥ देवेश्वरोंक बाण बने हुए बहुसंख्यक नागराज अपने मुखको फैलाकर तीत्र रोषमय विष उगलते हुए आकाशमें घूमने लगे॥ ३३ ॥ -पर्वतोंके अधिष्ठाता डालियोंवाले वृक्षोंद्रारा दानवदलपर प्रहार करनेके लिये देवगणोंकी सेवामें उपस्थित थे यः स देवो हषीकेश: पद्ानाभस्त्रिविक्रम: । कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो विश्वस्थ जगत: प्रभु: भूरापोव्योमभूतात्मा सम: शान्तिकरो5रिहा

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 33

प्रयतिष्यामि देवेन्द्र त्वत्प्रियार्थं न संशयः यथा भागं च राज्यं च न चिरात् प्रतिलप्स्यसे तथा तात करिष्यामि मा ते भूद् विक्लवं मनः

prayatiṣyāmi devendra tvatpriyārthaṃ na saṃśayaḥ yathā bhāgaṃ ca rājyaṃ ca na cirāt pratilapsyase tathā tāta kariṣyāmi mā te bhūd viklavaṃ manaḥ

हिन्दी अर्थ

अरिघ्तममरानीके चक्र. चक्रगदाधर: । सपरीवेषमुद्यन्त॑ सवितुर्मण्डलं॑ यथा करेण कालीं वपुषा शत्रुकालप्रदां गदाम् देवासुरविमर्देषु शतशो दृष्टविक्रमम् जो हषीकेशके नामसे प्रसिद्ध हैं, सबके आराध्यदेव हैं, सृष्टिक आरम्भमें जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ था, जो अपने तीन डगोंसे सम्पूर्ण त्रिलोकीको नाप चुके हैं, प्रलयकालमें प्रकाशित होनेवाले अग्निदेवके समान

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 34

ततः कर्म चकारास्य तेजसो वर्धनं तदा तेषां च बुद्धिसंमोहम् अकरोद् ऋषिसत्तमः

tataḥ karma cakārāsya tejaso vardhanaṃ tadā teṣāṃ ca buddhisaṃmoham akarod ṛṣisattamaḥ

हिन्दी अर्थ

जिनका सहज तेज है, जो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं, नारायणरूपसे समुद्रमें शयन करते हैं, इसलिये समुद्र जिनकी शयनस्थली है, जिन्होंने मधु नामक हैत्यका नाश किया है, जो हविष्यके भोक्ता और यज्ञोंमें पूजित एवं सम्मानित होनेवाले हैं, पृथ्वी, जल, आकाश तथा अन्यान्य भूत जिन विराट्-रूपधारी प्रभुके अड् हैं, जो सर्वत्र समभावसे रहते और समता रखते हैं, जो शान्तिका विस्तार करनेवाले और शत्रुनाशक हैं, जगत्की योनि (उत्पत्तिस्थान), जगतूके बीज (आदि कारण) तथा जगत्के गुरु हैं, जिनकी बुद्धिमें सदा उदारता भरी रहती है, वे चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु अग्नि तथा उगते हुए सूर्यके समान उत्तम तेजसे सम्पन्न शत्रुनाशक चक्र उठाये हुए देव-सेनाके मध्यभागमें विराजमान थे। उन्हें देखकर ऐसा लगता था, मानो वे परिधिसहित उगते हुए सूर्यमण्डलको ही पकड़कर ले आये हों॥ ३५--३८ ॥ सर्पोके शत्रु गरुड़ जिनके ध्वज हैं, उन महायशस्वी भगवान् श्रीहरिने अपने

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 35

नास्तिवादार्थशास्त्रंहि धर्मविद्वेषणं परम् ।परमं तर्कशास्त्राणाम् असतां तन् मनोनुगम् ।न हि धर्मप्रधानानां रोचते वै कथान्तरे ॥ ते तद् बृहस्पतिकृतं शास्त्रं श्रुत्वाल्पचेतसः ।पूर्वोक्तधर्मशास्त्राणाम् अभवन् द्वेषिणः सदा ॥ प्रचक्रुर् न्यायरहितं तन्मतं बहु मेनिरे ।तेनाधर्मेण ते पापाः सर्व एव क्षयं गताः ॥ त्रैलोक्यराज्यं शक्रस् तु प्राप्य दुष्प्रापम् एव च ।बृहस्पतिप्रसादाद् धि परां निर्वृतिम् अभ्यगात् ।ते यदा स्म सुसंमूढा रागोन्मत्ता विधर्मिणः ब्रह्मद्विषश् च संवृत्ता हतवीर्यपराक्रमाः

nāstivādārthaśāstraṃhi dharmavidveṣaṇaṃ param | paramaṃ tarkaśāstrāṇām asatāṃ tan manonugam | na hi dharmapradhānānāṃ rocate vai kathāntare || te tad bṛhaspatikṛtaṃ śāstraṃ śrutvālpacetasaḥ | pūrvoktadharmaśāstrāṇām abhavan dveṣiṇaḥ sadā || pracakrur nyāyarahitaṃ tanmataṃ bahu menire | tenādharmeṇa te pāpāḥ sarva eva kṣayaṃ gatāḥ || trailokyarājyaṃ śakras tu prāpya duṣprāpam eva ca | bṛhaspatiprasādād dhi parāṃ nirvṛtim abhyagāt | te yadā sma susaṃmūḍhā rāgonmattā vidharmiṇaḥ brahmadviṣaś ca saṃvṛttā hatavīryaparākramāḥ

हिन्दी अर्थ

बायें हाथमें समस्त असुरोंका विनाश करनेवाली तथा शत्रुओंको कालके गालमें भेजनेवाली काले रंगकी विशाल गदा ले रखी थी और शेष भुजाओंमें वे अत्यन्त दीप्तिमान् शार्ड़् आदि आयुध धारण किये हुए थे॥ ३९-४० ॥ सबके पाप और दुःखका अपहरण करनेवाले श्रीमान् भगवान् नारायण सर्पोंका भक्षण करनेवाले, कश्यपकुमार एवं अरुणके छोटे भाई पक्षिश्रेष्ठ गरुड़पर सवार होकर वहाँ आये थे। गरुड़जीके पंख बड़े सुन्दर थे तथा वे अपने सुन्दर शरीरसे सुवर्णके समान मनोरम कान्ति फैला रहे थे। आकाशमें विचरनेवाले पक्षिप्रवर गरुड़ वायुकी अपेक्षा भी अधिक वेगसे उड़ते थे, उनके वेगपूर्वक चलते समय आकाशमें खलबली मच जाती थी। वे अपने मुखमें एक नागराजको दबाये हुए थे, इससे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। अमृत निकालनेके लिये प्रारम्भमें ही क्षीरसागरमें छोड़े गये मन्दराचलके समान वे ऊँचे दिखायी देते थे। देवासुर-संग्रामके अवसरोंपर सैकड़ों बार उनका

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 36

ततो लेभे सुरैश्वर्यम् इन्द्रः स्थानं तथोत्तमम् हत्वा रजिसुतान् सर्वान् कामक्रोधपरायणान्

tato lebhe suraiśvaryam indraḥ sthānaṃ tathottamam hatvā rajisutān sarvān kāmakrodhaparāyaṇān

हिन्दी अर्थ

पराक्रम देखा जा चुका था युगान्ते सेन्रचापाभ्यां तोयदाभ्यामिवाम्बरम् नीललोहितपीताभि: पताकाभिरलड्-्कृतम्। केतुवेषप्रतिच्छन्न॑ महाकायनिकेतनम् तमन्वयुर्देवणणा मुनयश्च॒ तपोधना:। गीर्भि: परममन्त्राभिस्तुष्टवुश्न गदाधरम्

English

⁹³ An object of immolation.

अध्याय २१

श्लोक 37

य इदं च्यावनं स्थानात् प्रतिष्ठां च शतक्रतोः शृणुयाद् धारयेद् वापि न स दौरात्म्यम् आप्नुयात्

ya idaṃ cyāvanaṃ sthānāt pratiṣṭhāṃ ca śatakratoḥ śṛṇuyād dhārayed vāpi na sa daurātmyam āpnuyāt

हिन्दी अर्थ

तद् वैश्रवणसंश्लिष्ट॑ वैवस्वतपुरस्सरम्। वारिराजपरिक्षिप्त॑ देवराजविराजितम् स्वस्त्यस्तु देवेभ्य इति स्तुत्वा तत्राड्रिराउब्नवीतू। स्वस्त्यस्तु हैत्येभ्य इति उशना वाक्यमाददे जब वे स्वर्गमें अमृत लेने गये थे, उस समय इन्द्रने उस अमृतकी रक्षाके लिये उनपर वज़से प्रहार किया था, जिसकी चोटका चिह्न उस समय भी दीख रहा था, उनके सिरपर मोरकी-सी कलँगी और चोटी थी तथा वे तपे हुए सुवर्णके कुण्डलोंसे विभूषित थे। रंग-बिरंगे पंख ही उन्होंने वस्त्ररूपमें धारण कर रखे थे, जिनके कारण वे विविध धातुओंसे मण्डित पर्वतके समान प्रतीत होते थे। उनका वक्ष:स्थल चौड़ा था, उसपर (मुखमें

English

⁹³ An object of immolation.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 21
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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