Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
46
अध्याय 46 / 119

Adhyaya 46

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अध्याय ४६

श्लोक 1

॥* श्रीर् अस्तु *॥ ॥* श्रीवाजिवदनाय नमः *॥ ॥* अथ द्वितीयं विष्णुपर्व समारभ्यते *॥ वेदव्यासगुणावास विद्याधीश सतां वश ।मां निराशं गतक्लेशं कुर्वन् आशं हरे ऽनिशम् ।ज्ञात्वा विष्णुं क्षितिगतं भागांश् च त्रिदिवौकसाम् विनाशशंसी कंसस्य नारदो मथुरां ययौ

||* śrīr astu *|| ||* śrīvājivadanāya namaḥ *|| ||* atha dvitīyaṃ viṣṇuparva samārabhyate *|| vedavyāsaguṇāvāsa vidyādhīśa satāṃ vaśa | māṃ nirāśaṃ gatakleśaṃ kurvan āśaṃ hare 'niśam | jñātvā viṣṇuṃ kṣitigataṃ bhāgāṃś ca tridivaukasām vināśaśaṃsī kaṃsasya nārado mathurāṃ yayau

हिन्दी अर्थ

कृष्णो वा बलदेवो वा यो वासौ वा नराधिप:। हन्तारं प्रतियोत्स्यामि यथा ब्राह्मप्रचोदितः अतो5न्यथा नशक्तोउहं कर्तु परसमा भ्रयम् भवतां साधुवृत्तानामाबाधं न करोति सः। तेन दूतं प्रदास्यामि नृपाणां रक्षणाय वै व्योममार्गेण यातव्यं यथा कृष्णो न बाधते। गच्छन्तमनुचिन्त्यैवं प्रेषयध्व॑ नृपोत्तमा:

English

Beholding such eternal and divine prosperity in the serpents that giver of liberal presents was filled with surprise. And coming to the bank from the water he saw Rama and Krishna of wonderful forms seated on the car and looking towards each other (61-62). Seeing this Akrura, again out of curiosity, plunged into the lake and saw that the king of gods, Ananta, having a white face and clad in a blue raiment, was being worshipped as before; and that the powerful Krishna too was seated on the lap of that thousand-headed king of serpents and being worshipped as before (63–64). Then again coming out all on a sudden and reciting in his mind that _mantra_ he went to the car by the same way by which he had come (65). Thereupon Krishna delightedly said to Akrura who was before him:—"What did you see of the Nāga region situate in this Bhagavat lake? I think you have seen something wonderful for you waited for a long time in the lake and your mind too has been agitated

अध्याय ४६

श्लोक 2

त्रिविष्टपाद् आपतितो मथुरोपवने स्थितः प्रेषयाम् आस कंसस्य उग्रसेनसुतस्य वै

triviṣṭapād āpatito mathuropavane sthitaḥ preṣayām āsa kaṃsasya ugrasenasutasya vai

हिन्दी अर्थ

अयं सौभपतिः श्रीमाननलार्केन्दुविक्रमः । रथेनादित्यवर्णेन प्रयाति स्वपुरं बली वचन च तथास्माभिदत्ये नः कृष्णविग्रहे पुनरेवाब्रवीद् राजा सौभस्य पतिमूर्जितम्। गच्छ सर्वनरेन्द्राणां साहाय्यं कुरू मानद जरासंध बोला--आजसे पहले सब राजा दूसरे राजाओंके भयसे पीड़ित होनेपर मेरी शरणमें आते थे और भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित अपने खोये हुए राज्यको मेरे सहयोगसे पुन: प्राप्त कर लेते थे॥ ३४॥ इस समय यहाँ सब राजा मुझे दूसरेका आश्रय लेनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं। जैसे रतिलोलुप नारी अपने पतिके प्रति द्वेष होनेसे उसे छोड़कर दूसरे पुरुषका आश्रय लेती है, (उसी प्रकार मैं अपने बलका आश्रय न लेकर

English

Hearing the words of Krishna Akrura replied:—"O Krishna, what wonder is there in the entire world, mobile and immobile, which can be accomplished without thee (68)? The wonder which I saw there, although rare on earth, I am seeing here and enjoying delight. O Krishna, I am united with the wonder incarnate in the world and therefore do not like to see a greater wonder than this. O lord, let us go to the city of king Kansa before the sun sets (69–71)."

अध्याय ४६

श्लोक 3

स दूतः कथयाम् आस मुनेर् आगमनं नृपे ।द्वाःस्थं विदितविस्तारं द्वारि तिष्ठति नारदः ।इति श्रुत्वा स कंसस्य द्वारपालस् त्वरन्न् इव ॥ गत्वा तु त्वरितं राजन्न् उवाच मधुरेश्वरम् ।एष तिष्ठति राजेन्द्र नारदो लोकनारदः ।स नारदस्यागमनं श्रुत्वा त्वरितविक्रमः निर्गजामासुरः कंसः स्वपुर्याः पद्मलोचनः

sa dūtaḥ kathayām āsa muner āgamanaṃ nṛpe | dvāḥsthaṃ viditavistāraṃ dvāri tiṣṭhati nāradaḥ | iti śrutvā sa kaṃsasya dvārapālas tvarann iva || gatvā tu tvaritaṃ rājann uvāca madhureśvaram | eṣa tiṣṭhati rājendra nārado lokanāradaḥ | sa nāradasyāgamanaṃ śrutvā tvaritavikramaḥ nirgajāmāsuraḥ kaṃsaḥ svapuryāḥ padmalocanaḥ

हिन्दी अर्थ

दूसरेका सहारा लेनेको उद्यत हुआ हूँ)॥३५॥ अहो! देव बड़ा प्रबल है। उसे लौटाया नहीं जा सकता; क्योंकि आज मैं श्रीकृष्ससे डरकर दूसरे अधिक बलशाली राजाका आश्रय ग्रहण कर रहा हूँ॥ ३६॥ निश्चय ही मैं निरुपाय हो गया हूँ, अत: मुझे दूसरेका आश्रय लेना पड़ेगा; परंतु ऐसे जीवनसे तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। नरपतियो! मैं दूसरेकी शरण नहीं लूँगा श्रीकृष्ण हों, बलदेव हों अथवा जो कोई भी राजा क्‍यों न हो, जो मुझे मारेगा, उसका मैं डटकर सामना करूँगा। जैसा कि आकाशवाणीने कहा है कि मुझे कोई दूसरा मारनेवाला है॥ ३८ ॥ यही मेरी बुद्धिका निश्चय है, यही सत्पुरुषका व्रत है। इसके विपरीत मैं दूसरेका आश्रय लेनेमें असमर्थ हूँ॥ ३९ ॥ आप सदाचारी नरेशोंको श्रीकृष्ण बाधा न पहुँचायें, इस उद्देश्यसे राजाओंकी रक्षाके लिये मैं दूत दूँगा अर्थात् दूत भेजना स्वीकार करूँगा

English

²⁵⁹ A kind of mystical figure the inscription of which on any person or thing is generally considered to be lucky. The Sesha Naga was the couch of Vishnu on whose thousand hoods he lay asleep.

अध्याय ४६

श्लोक 4

स ददर्शातिथिं श्लाघ्यं देवर्षिं वीतकल्मषम् तेजसा ज्वलनाकारं वपुषा सूर्यवर्चसम्

sa dadarśātithiṃ ślāghyaṃ devarṣiṃ vītakalmaṣam tejasā jvalanākāraṃ vapuṣā sūryavarcasam

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ राजाओ! उस दूतको आकाशमार्गसे जाना चाहिए, जिससे यहाँसे जाते समय उसे श्रीकृष्ण बाधा न दे सकें। इसपर भलीभाँति विचार करके ही तुमलोग दूत भेजो ये श्रीमान् सौभपति बलवान् राजा शाल्व अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान पराक्रमी हैं। ये सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ (विमान) -द्वारा अपने नगरको जाते हैं ॥ ४२ ॥ ये दूतकर्म करते समय हमलोगोंकी ओरसे जैसी बात कहनी चाहिए, वैसी ही कहें, जिससे श्रीकृष्णके साथ हम लोगोंका युद्ध उपस्थित होनेपर वह यवनराज कालयवन हम नरेशोंकी मण्डलीसे आकर मिल जाय वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! फिर राजा जरासंधने सौभविमानके स्वामी बलवान् राजा शाल्वसे कहा--'मानद! जाओ, सम्पूर्ण नरेशोंकी सहायता करो ' एवं संदिश्य सर्वास्तान् भीष्मकं पूज्य धर्मतः । प्रययौ स्वपुरं राजा स्वेन सैन्येन संवृतः

English

²⁶⁰ The Vaishnava writers have variously interpreted this incident. According to them the anecdote is that when Vasudeva was carrying Krishna he slipped off his hand and fell into the water. He however at once picked up the boy. But this time Krishna did not come but Vishnu in Krishna form. When Akrura went to bathe in the Yamuna Krishna came out and went to Mathura while Vishnu lived in

अध्याय ४६

श्लोक 5

सो ऽभिवाद्यर्षये तस्मै पूजां चक्रे यथाविधि आसनं चाग्निवर्णाभं विसृज्योपजहार वै

so 'bhivādyarṣaye tasmai pūjāṃ cakre yathāvidhi āsanaṃ cāgnivarṇābhaṃ visṛjyopajahāra vai

हिन्दी अर्थ

शाल्वो5पि नृपतिकश्रेष्ठस्तांश्व॒ सम्पूज्य धर्मतः । जगामाकाशमार्गेण.. रथेनानिलरंहसा स्वेगृहे न्यवसद दीन: कृष्णमेवानुचिन्तयन् कृष्णस्यागमनाद्धेतोन॑पाणां दोषदर्शनम् कृष्णात् कमलपत्राक्षात् सत्यमेतद् बचो मम।

English

Vaishampayana said:—Thereupon yoking (the horses to the) car and ascending thereon the liberal giver Akrura set out with Krishna and Sangkarshana and reached the charming city of Mathurā protected by Kansa. And before evening when the sun was in its crimson colour he entered that beautiful city (1-2).

अध्याय ४६

श्लोक 6

निषसादासने तस्मिन् स वै शक्रसखो मुनिः उवाच चोग्रसेनस्य सुतं परमकोपनम्

niṣasādāsane tasmin sa vai śakrasakho muniḥ uvāca cograsenasya sutaṃ paramakopanam

हिन्दी अर्थ

“तुम ऐसी नीतिका प्रयोग करो, जिससे यवनराज चढ़ाई करे, श्रीकृष्णणो जीते और हमलोगोंको संतोष हो'॥ ४५ ॥ इस प्रकार सबको संदेश देकर और धर्मानुसार भीष्मकका भी सम्मान करके राजा जरासंध अपनी सेनाके साथ अपने नगरकों चला गया॥ ४६॥ राजाओंमें श्रेष्ठ शाल्व भी उन सबका धर्मपूर्वक आदर करके वायुके समान वेगशाली विमानद्वारा आकाशमार्गसे चला गया॥ ४७ ॥ दक्षिण भारतके रहनेवाले जो समस्त भूमिपाल वहाँ उपस्थित थे, वे भी कुछ दूरतक जरासंधके पीछे जाकर फिर अपने नगरको चले गये ॥ ४८ ॥ राजा भीष्यक अपने पुत्र रुक्मीके साथ ही उन दोनों शाल्व और जरासंधका तथा उन सबकी दुर्नीतिका विचार करके श्रीकृष्णका ही चिन्तन करते हुए दीनभावसे अपने घरमें रहने लगे ॥ ४९॥ सती साध्वी रुक्मिणीको जब यह पता लग गया कि श्रीकृष्णका आगमन होनेसे स्वयंवर स्थगित हो गया तथा राजाओंकी जो दोषदृष्टि थी उसका भी ज्ञान हो गया, तब वे अपनी सखियोंके बीचमें जाकर लज्जासे सिर झुकाये हुए बोलीं--'सखियो! मैं कमल- नयन श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरे नरेशोंकी पत्नी नहीं हो सकती-यह मेरी सच्ची बात है

English

Taking the heroic Krishna and Sangkarshana of beautiful colour first to his own house the intelligent giver of liberal presents, effulgent like the sun, said to them:—

अध्याय ४६

श्लोक 7

पूजितो ऽहं त्वया वीर विधिदृष्टेन कर्मणा गते त्व् एवं मम वचः श्रूयतां गृह्यतां च वै

pūjito 'haṃ tvayā vīra vidhidṛṣṭena karmaṇā gate tv evaṃ mama vacaḥ śrūyatāṃ gṛhyatāṃ ca vai

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वीण रुक्मिणीस्वयंवरे द्विपश्लाशत्तमो5ध्याय: इस ग्रकार श्रीयहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीका स्वयंवरविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ कालयवनकी विशेषता, राजा शाल्वका उसके यहाँ दूत बनकर आना और उसे जरासंधका संदेश सुनाना यवनानां बलोदग्र: स कालयवनो नृपः। बभूव राजा धर्मेण रक्षिता पुरवासिनाम्

English

"O sire, for the present you are to relinquish the desire of going to Vasudeva's house (3-4). For you, your old father is being day and night chiden by Kansa. So you should not wait here long (5). You should do such a good and pleasant work on his behalf that your father may attain to happiness (6)."

अध्याय ४६

श्लोक 8

एवं गते महाराज श्रूयतां वचनं मम ।अनुसृत्य दिवो लोकान् अहं ब्रह्मपुरोगमान् गतः सूर्यसखं तात विपुलं मेरुपर्वतम्

evaṃ gate mahārāja śrūyatāṃ vacanaṃ mama | anusṛtya divo lokān ahaṃ brahmapurogamān gataḥ sūryasakhaṃ tāta vipulaṃ meruparvatam

हिन्दी अर्थ

श्रुतिमान् धर्मशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रिय: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! सबसे अधिक बलशाली कालयवन यवनोंका राजा था, जो धर्मके अनुसार पुरवासियोंकी रक्षा करता था॥ १॥ बह त्रिवर्ग (पद, स्थान एवं वृद्धि अथवा धर्म, अर्थ और काम)- का ज्ञाता, बुद्धिमान, राजनीतिके छ: गुणों (संधि-विग्रह आदि)-का आश्रय लेनेवाला, सात प्रकारके व्यसनोंसे अनभिज्ञ और सदा गुणोंमें तत्पर रहनेवाला था विद्यावानू, धर्मशील, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, युद्धविधिका सांग्रामिकविधिज्ञश्च॒दुर्गलाभानुसारण: ॥ ३ ज्ञाता तथा दुर्लभ लाभका अनुसरण करनेवाला था

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय ४६

श्लोक 9

सनन्दनवनं चैव दृष्ट्वा चैत्ररथं वनम् आप्लुतं मे सुतीर्थासु सरित्सु सह दैवतैः

sanandanavanaṃ caiva dṛṣṭvā caitrarathaṃ vanam āplutaṃ me sutīrthāsu saritsu saha daivataiḥ

हिन्दी अर्थ

स्रात व्यसन इस प्रकार हैं--मृगया, जुआ, दिनमें सोना, परायी निन्दा, स्त्रीविषयक आसक्ति, मद्यपान और व्यर्थ भाषण। शूरो5प्रतिबलश्चैव. मन्त्रिप्रवरसेवक: । सुखासीन: सभां रम्यां सचिवै: परिवारित: एतस्मिन्नेव काले तु दिव्यगन्धवहो 5निल: । प्रववी. मदनाबोधं॑ चकार सुखशीतल: उत्फुलनयना: सर्वे राजा चैवावलोक्य सः

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय ४६

श्लोक 10

दिव्या त्रिधारा दृष्टा मे पुण्या त्रिपथगा नदी दिव्यां त्रिपथगां दृष्ट्वा पुण्यां भागिरथीं नदीम् ।दिव्या त्रिपथगा दृष्टा पुण्या भागीरथी नदी ।स्मरणाद् एव सर्वेषाम् अंहसां या विभेदिनी ।उपस्पृष्टं च तीर्थेषु दिव्येषु च यथाक्रमम्

divyā tridhārā dṛṣṭā me puṇyā tripathagā nadī divyāṃ tripathagāṃ dṛṣṭvā puṇyāṃ bhāgirathīṃ nadīm | divyā tripathagā dṛṣṭā puṇyā bhāgīrathī nadī | smaraṇād eva sarveṣām aṃhasāṃ yā vibhedinī | upaspṛṣṭaṃ ca tīrtheṣu divyeṣu ca yathākramam

हिन्दी अर्थ

अपषयन्त रथं दिव्यमायान्तं भास्करोपमम्। शातकुम्भमयै: शुभ्र॑ रथाड्रैरुपशोभितम् दिव्यरत्नप्रभाकीर्ण दिव्यध्वजपताकिनम्। वाहितं दिव्यतुरगैर्मनोमारुतरंहसैः: अन्द्रभास्करबिम्बानि कृत्वा जाम्बूनदेन तम्। रचितं वे विश्वकृता वैयाप्रवरभूषितम् उसके समान बलवान् दूसरा कोई नहीं था। वह शूरवीर और श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाला था। एक दिन जब वह ममन्त्रियोंसे घि। हुआ अपनी रमणीय सभामें सुखपूर्वक बैठा था, आत्मज्ञ एवं विद्वानू यवन उसकी सेवामें उपस्थित थे और उनमें परस्पर नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ हो रही थीं। इसी समय दिव्य सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द वायु बहने लगी। वह सुखद एवं शीतल वायु उन सबके कामभावको जाग्रत् करने

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय ४६

श्लोक 11

दृष्टं मे ब्रह्मसदनं ब्रह्मर्षिगणसेवितम् देवगन्धर्वनिर्घोषैर् अप्सरोभिश् च नादितम्

dṛṣṭaṃ me brahmasadanaṃ brahmarṣigaṇasevitam devagandharvanirghoṣair apsarobhiś ca nāditam

हिन्दी अर्थ

लगी॥ ४--६॥ उस समय सभामें जो लोग आये थे, वे सभी एकचित्त होकर यह जिज्ञासा करने लगे कि “यह क्या है?' सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। राजा कालयवन भी यह अद्भुत बात देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका॥७॥ उन सबने आकाशसे एक सूर्यके समान तेजस्वी दिव्य विमानको उतरते देखा, जो सुवर्णमय चमकीले पहियोंसे शोभा पाता था, वह रथ या विमान दिव्य रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त था। उसमें दिव्य ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं तथा मन एवं वायुके समान वेगशाली दिव्य अश्व उस रथको खींच रहे थे॥८-९॥ विश्वकर्माने चन्द्रमा और सूर्यके बिम्ब बनाकर जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उस रथका निर्माण किया था। वह चारों ओरसे उत्तम व्याप्रचर्मद्वारा मढ़ा हुआ था॥ १०॥ वह रथ शत्रुओंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला और मित्रोंका हर्ष बढ़ानेवाला था। वह दक्षिण दिशाकी ओरसे आ रहा था और शत्रुओंके रथको तोड़

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय ४६

श्लोक 12

सो ऽहं कदाचिद् देवानां समाजं मेरुमूर्धनि संगृह्य वीणां संसक्ताम् अगच्छं ब्रह्मणः सभाम्

so 'haṃ kadācid devānāṃ samājaṃ merumūrdhani saṃgṛhya vīṇāṃ saṃsaktām agacchaṃ brahmaṇaḥ sabhām

हिन्दी अर्थ

डालनेमें समर्थ था॥११॥ उसमें बैठे हुए सौभपति तेजस्वी राजा श्रीमान् शाल्वको देखकर मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ यवनराजका मन्त्री बहुत प्रसन्न हुआ और बारम्बार महाबाहु राजा कालयवन स्वयं ही राजसिंहासनसे उठा शाल्वो5पि च महातेजा दूष्ठा राजानमागतम् दृष्टार्धमुद्यरं राजा शाल्वो राजर्पिसत्तम: दूतो5हं मनुजेद्धाणां सकाशाद् भवतो5न्तिकम्

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय ४६

श्लोक 13

सो ऽहं तत्र सितोष्णीषान् नानारत्नविभूषितान् दिव्यासनगतान् देवान् अपश्यं सपितामहान्

so 'haṃ tatra sitoṣṇīṣān nānāratnavibhūṣitān divyāsanagatān devān apaśyaṃ sapitāmahān

हिन्दी अर्थ

जानाम्यहं महाबाहो दौत्येन त्वामिहागतम्। साहित्ये नरदेवानां प्रेषितो मागधेन वै अर्ध्यपाद्यादिसत्कारगासनेन यथाविधि बसामो विगतोद्विग्ा देवा इव शचीपतिम् करिष्ये वचन तस्य अपि कर्म सुदुष्करम्

English

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अध्याय ४६

श्लोक 14

तत्र मनत्रयताम् एवं देवतानां मया श्रुतः भवतः सानुगस्येह वधोपायः सुदारुणः

tatra manatrayatām evaṃ devatānāṃ mayā śrutaḥ bhavataḥ sānugasyeha vadhopāyaḥ sudāruṇaḥ

हिन्दी अर्थ

और अर्घ्य लिये आगे बढ़कर विमानसे उतरनेकी सीढ़ीके पास खड़ा हो गया। महातेजस्वी राजा शाल्व भी इन्द्रके समान तेजस्वी राजा कालयवनको बड़ी प्रसन्‍नताके साथ आया देख निर्भय हो अकेला ही उस उत्तम रथसे उतर पड़ा और मित्रके दर्शनकी लालसा मनमें रखकर अत्यन्त संतुष्ट हो उसके भवनमें प्रविष्ट हुआ। अपने लिये अर्घ्य उपस्थित देख राजर्षियोंमें श्रेष्ठ राजा शाल्वर मधुर वाणीमें बोला--'महाद्युते! मैं अर्घ्य ग्रहण करनेके योग्य नहीं हूँ। मैं नरेशोंका दूत बनकर उनकी ओरसे आपके पास आया हूँ। बुद्धिमान् जरासंध तथा बहुत-से नरेशोंने एक साथ मिलकर मुझे आपके पास भेजा है। महाराज! इसीलिये मैं समझता हूँ कि इस समय मैं राजाओंका अर्घ्य लेने योग्य नहीं हूँ!॥ १२--१८॥ कालयवन बोला---महाबाहो ! मैं जानता हूँ कि तुम दूत बनकर यहाँ आये हो और नरपतियोंके साथ मगधराज जरासंधने तुम्हें यहाँ भेजा है॥१९॥ राजन्! महामते! इसीलिये मैं तुम्हारी विशेषरूपसे पूजा करना चाहता हूँ।

English

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अध्याय ४६

श्लोक 15

तत्रैषा देवकी या ते मथुरायां पितृष्वसा अस्या गर्भो ऽष्टमः कंस स ते मृत्युर् भविष्यति

tatraiṣā devakī yā te mathurāyāṃ pitṛṣvasā asyā garbho 'ṣṭamaḥ kaṃsa sa te mṛtyur bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

अर्ध्य, पाद्य आदि सत्कारोंसे तथा विधिपूर्वक आसन देनेसे यदि आपकी पूजा हो जायगी तो इसके द्वारा समस्त राजाओंका पूजन सम्पन्न हो जायगा। अत: जनेश्वर! अब मेरे साथ उज्जल सिंहासनपर विराजमान होइये वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! कालयवनने शाल्वसे हाथ मिलाकर उसका कुशलमड्रल पूछा। फिर उस समय कालयवनने कहा--राजन्! जिनके बाहुबलका सहारा लेकर हम सब नरेश उसी प्रकार निर्भय रहते हैं, जैसे देवता शचीपति इन्द्रका सहारा लेकर भयसे मुक्त हो जाते हैं; उन्हीं महाराज जरासंधके लिये कौन-सा कार्य असाध्य हो गया है, जिससे उन्होंने मेरे पास आपको भेजा है? उन्होंने क्या कहा है, यह सच-सच बताइये। वे प्रभु मेरे लिये क्या आज्ञा देते हैं ? मैं उनकी आज्ञाका पालन करूँगा। उनके कहनेसे अत्यन्त

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय ४६

श्लोक 16

देवानां स तु सर्वस्वं त्रिदिवस्य गतिश् च सः परं रहस्यं देवानां स ते मृत्युर् भविष्यति

devānāṃ sa tu sarvasvaṃ tridivasya gatiś ca saḥ paraṃ rahasyaṃ devānāṃ sa te mṛtyur bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

दुष्कर कर्म भी कर सकता हूँ जरासंधने आपसे जैसी बात कहनेको कहा है, वैसी ही बता रहा हूँ, सुनिये जातो5यं जगतां बाधी कृष्ण: परमदुर्जय:। विदित्वा तस्य दुर्वृत्तमहं हन्तुं समुद्यतः विनिष्पत्य महासेनां मध्ये सागरसंनिभाम्। आजघान दुराधर्षो नराश्वरथदन्तिनाम् विचरन् विविधान् मार्गान् निदाघे भास्करो यथा

English

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अध्याय ४६

श्लोक 17

परतो ऽपि परस् त्व् एषां स्वयंभूश् च सवयंभुवाम् ततस् ते तन् महद् भूतं दिव्यं न कथयाम्य् अहम्

parato 'pi paras tv eṣāṃ svayaṃbhūś ca savayaṃbhuvām tatas te tan mahad bhūtaṃ divyaṃ na kathayāmy aham

हिन्दी अर्थ

रामादनन्तरं कृष्ण: प्रगृह्मार्कसमप्रभम्। अक्रं चक्र भूतां श्रेष्ठ: सिंहः क्षुद्रमृगं यथा जरासंधका कथन है कि--ये जो परम दुर्जय श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, सम्पूर्ण जगत्को बड़ा कष्ट दे रहे हैं। उनके दुराचारको जानकर मैं उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हुआ था॥ २६ ॥ बहुत-से राजा अपनी समूची सेना और सवारियाँ लेकर मेरे साथ हो गये थे। उन सबकी विशाल सेनाओंद्वारा मैंने गोमन्‍न्त नामक उत्तम पर्वतपर घेरा डाला (क्योंकि उस समय श्रीकृष्ण और बलराम गोमन्तपर ही विद्यमान थे) घेरा डालनेके बाद मैंने चेदिराज दमघोषका वचन सुना, जो महान् अर्थसे भरा था। तब मैंने उन दोनोंके विनाशके लिये उस पर्वतपर आग लगा दी॥ २७-२८॥ वह आग सैकड़ों और हजारों लपटोंसे प्रज्जलित हो उठी, जो प्रलयकालकी

English

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अध्याय ४६

श्लोक 18

श्लाघ्यश् च स हि ते मृत्युर् भूतपूर्वश् च तं स्मर यत्नश् च क्रियतां कंस गर्भस्थे यदि शक्यते

ślāghyaś ca sa hi te mṛtyur bhūtapūrvaś ca taṃ smara yatnaś ca kriyatāṃ kaṃsa garbhasthe yadi śakyate

हिन्दी अर्थ

संवर्तक अग्निके समान प्रकाशित हो रही थी। उस आगको देखकर सुवर्णमय तालध्वज धारण करनेवाले बलराम पर्वतके शिखरसे कूद पड़े और समुद्र-जैसी प्रतीत होनेवाली उस विशाल सेनाके मध्यभागमें पहुँचकर हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंका संहार करने लगे। उस समय उन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन हो गया था॥ २९-३०॥ उन्होंने सर्पराजके समान सरकते हुए हलका आकर्षण और विकर्षण करके अर्थात् उस हलद्वारा शत्रुसैनिकोंको ढकेलते और खींचते हुए बहुत-से मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको मुसलसे मार डाला॥३१॥ वे हाथीसे हाथीको, रथसे रथी योद्धाको, घोड़ेसे घुड़सवारको तथा पैदलसे पैदल सिपाहीको मौतके घाट उतार देते थे॥ ३२॥ जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यदेव प्रचण्ड तेजसे सम्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों राजारूपी सूर्यसे व्याप्त समराड्रणमें वे महातेजस्वी बलराम भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए विचरने लगे॥ ३३ ॥ बलसमसे छोटे हैं श्रीकृष्ण, जो चक्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे सूर्यके समान तेजस्वी चक्र हाथमें लेकर उसी तरह शत्रुसैनिकोंपर टूट पड़े, जैसे सिंह क्षुद्र मृगोंपर आक्रमण करता है॥ ३४ ॥ महापराक्रमी प्रतापी यदुवीर श्रीकृष्ण अपने पैरोंके वेगसे उस पर्वतको

English

Hearing this Krishna said:—"If you like O pious (Akrura) we, while visiting Mathura and her highways, will enter unperceived into Kansa's

अध्याय ४६

श्लोक 19

एषा मे त्वद्गता प्रीतिर् इत्यर्थं चाहम् आगतः भुज्यन्तां सर्वकामार्थाः स्वस्ति ते ऽस्तु व्रजाम्य् अहम्

eṣā me tvadgatā prītir ityarthaṃ cāham āgataḥ bhujyantāṃ sarvakāmārthāḥ svasti te 'stu vrajāmy aham

हिन्दी अर्थ

हिलाकर जब ऊँचे शिखरसे शत्रुओंकी सेनामें कूदे थे, उस समय वह शैलराज नाचता-सा प्रतीत होता था। वह अपने ही अवयवोंसे निकली हुई जलधारासे नहा उठा और सारी आगको बुझाकर चक्कर काटता-सा कुछ दूरतक पृथ्वीमें घुस गया॥ ३५-३६॥ राजन्! पर्वतके जलते हुए शिखरसे नीचे कूदकर श्रीकृष्णने चक्रयुक्त हाथसे राजाओंकी सेनाका संहार आरम्भ किया क्रोधानिलसमुद्धूतचक्रलाड्गलवह्िना । निर्दग्धा महती सेना नरेन्द्राकभिपालिता सेनां प्रभग्रामालोक्य चक्रानलभयार्दिताम्। महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः

English

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अध्याय ४६

श्लोक 20

दास्यन्तां दानविस्तराः ।भुज्यन्तां कंस कामाश् च ।इत्य् उक्त्वा नारदे याते तस्य वाक्यं विचिन्तयन् जहासोच्चैस् ततः कंसः पकाशदशनश् चिरम्

dāsyantāṃ dānavistarāḥ |bhujyantāṃ kaṃsa kāmāś ca | ity uktvā nārade yāte tasya vākyaṃ vicintayan jahāsoccais tataḥ kaṃsaḥ pakāśadaśanaś ciram

हिन्दी अर्थ

द्वादशाक्षौहिणीहत्वा प्रभिन्न इव केसरी। हल॑ सौनन्दमुत्सूज्य गदया मामताडयत् भूयः प्रहर्तुकामो मां वैशाखेनास्थितो महीम् तादूग्रूपं॑ समालोक्य बलदेवं रणाजिरे। जीवितार्थी नूलोके5स्मिन् कः पुमान् स्थातुमहति गृहीत्वा स गदां भीमां कालदण्डमिवोद्यताम्। कालाड्लुशेन निर्धूतां स्थित एवाग्रतो मम वागुवाचाशरीरेण स्वयं लोकपितामह:

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अध्याय ४६

श्लोक 21

सस्मितं चेव प्रोवाच भृत्यानाम् अग्रतः स्थितः हास्यः खलु स सत्त्वेषु नारदो न विशारदः

sasmitaṃ ceva provāca bhṛtyānām agrataḥ sthitaḥ hāsyaḥ khalu sa sattveṣu nārado na viśāradaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रहर्तत्यो न राजायमवध्यो5यं तवानघ। कल्पितो5स्थ वधोःन्यस्माद् विरमस्व हलायुध सर्वप्राणहर॑ घोरं ब्रह्मणा स्वयमीरितम् विशाल चक्र फेंककर फिर गदाद्वारा आघात करते थे। तदनन्तर बलराम मुसलसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके समूहोंका कचूमर निकाल देते थे॥३८॥ क्रोधरूपी वायुसे प्रजजलित चक्र और हलरूपी आगसे नरेशरूपी सूर्यद्रारा पालित वह विशाल सेना जलकर भस्म हो

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अध्याय ४६

श्लोक 22

नाहं भीषयितुं शक्यो देवैर् अपि सवासवैः आहवस्थः शयानो वा प्रमतो मत्त एव वा

nāhaṃ bhīṣayituṃ śakyo devair api savāsavaiḥ āhavasthaḥ śayāno vā pramato matta eva vā

हिन्दी अर्थ

मनुष्योंसे परिपूर्ण एवं पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त रथसमूहका क्षणभरमें ही संहार कर डाला॥ ४० ॥ चक्राग्रिके भयसे पीड़ित हुई अपनी सेनाको पलायन करती देख मैं विशाल रथसमूहके द्वारा उन दोनोंको सब ओरसे घेरकर युद्ध करने लगा। उस समय श्रीकृष्णके बलवान भ्राता शूरवीर बलराम हाथमें गदा और हल लिये मेरे सामने खड़े हो गये॥ ४१-४२ ॥ उन्होंने चोट खाये हुए सिंहके समान कुपित हो मेरी बारह अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके हल और मुसलको तो छोड़ दिया और गदासे ही मुझपर आघात किया॥ ४३ ॥ उसका वेग वज्रपातके समान था। मेरे ऊपर उस गदाका प्रहार करके वे पुन: मुझपर चोट करनेकी इच्छासे वैशाखी (शक्ति) लेकर पृथ्वीपर खड़े हो गये॥ ४४ ॥ जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयने क्रौद्ध पर्वतको विदीर्ण किया था, उसी प्रकार वे मेरे मर्मस्थानको लक्ष्य करके शक्ति छोड़नेकी इच्छासे अपने बड़े-बड़े नेत्रोंद्रारा मेरी ओर इस तरह देखने लगे, मानो मुझे जलाकर भस्म कर डालेंगे॥ ४५ ॥ रणभूमिमें बलदेवके वैसे स्वरूपको देखकर अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला इस मनुष्यलोकका कौन पुरुष उनके सामने ठहर सकता है॥ ४६॥ फिर कालदण्डके समान उठी हुई भयानक

English

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अध्याय ४६

श्लोक 23

यो ऽहं दोर्भ्याम् उदाराभ्यां क्षोभये ऽहं धराम् इमाम् को ऽस्ति यो मानुषे लोके मां क्षोभयितुम् उत्सहेत्

yo 'haṃ dorbhyām udārābhyāṃ kṣobhaye 'haṃ dharām imām ko 'sti yo mānuṣe loke māṃ kṣobhayitum utsahet

हिन्दी अर्थ

गदाको हाथमें लेकर वे मेरे सामने खड़े हो गये। वह गदा कालकी प्रेरणासे घुमायी जा रही थी॥४७॥ इसी बीचमें साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माजी मेघके समान गम्भीर स्वर्से आकाशको पूर्ण करते हुए अदृश्यरूपसे बोले--' अनघ ! इस राजापर प्रहार न करना। यह तुम्हारे लिये अवध्य है। इसका वध दूसरेके हाथसे निश्चित किया गया है, अत: हलधारी बलराम! तुम प्रहारसे विरत हो जाओ'॥ ४८-४९ ॥ यह सुनकर उस आकाशवाणीके कारण मैं चिन्तामें निमग्न हो गया और युद्धसे लौट पड़ा; क्योंकि साक्षात् ब्रह्माजीनी वह ऐसा घोर वचन सुनाया था, जो मेरी सम्पूर्ण प्राणशक्तिको हर लेनेवाला था तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया। श्रुत्वा त्वमेव राजेन्द्र कर्तुमहसि तद् बच:

English

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अध्याय ४६

श्लोक 24

अद्यप्रभृति भूतानाम् एष देवानुवर्तिनाम् नृपक्षिपशुसंघानां करोमि कदनं महत्

adyaprabhṛti bhūtānām eṣa devānuvartinām nṛpakṣipaśusaṃghānāṃ karomi kadanaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

प्राप्तवान् देवदेव॑ त्वामवध्यं माथ्रैर्जनीः महामुनिश्चायसचूर्णमएन- स लब्धवानीप्सित कामसम्पदम् विलीयते भास्कररश्मिना यथा ब्रजस्वयात्रांविजयाय केशवम् । प्रविश्य राष्ट्र मथुरां च सेनया निहत्य कृष्णं प्रथयन् स्वक॑ यश:

English

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अध्याय ४६

श्लोक 25

आज्ञाप्यतां हयः केशी प्रलम्बो धेनुकस् तथा अरिष्टो वृषभश् चैव पूतना कालियस् तथा

ājñāpyatāṃ hayaḥ keśī pralambo dhenukas tathā ariṣṭo vṛṣabhaś caiva pūtanā kāliyas tathā

हिन्दी अर्थ

माथुरो वासुदेवो5यं बलदेव: सबान्धवः। तौ विजेष्यसि संग्रामे गत्वा तां मथुरां पुरीम् इत्येव नरपतिभास्करप्रगीतं राजेन्द्र इसलिये मैं तुमसे समस्त नरेशोंके हितकी कामनासे कुछ कहना चाहता हूँ, उसे सुनकर तुम्हीं उसे पूर्ण कर सकते हो॥५१॥ महामुनि गार्ग्य, जिनके चरणारविन्दोंकी स्तुति देवता और असुर भी करते हैं; बारह वर्षोतक ब्रह्मचर्यत्रतका पालन करनेके पश्चात् लोहचूर्ण खाकर तपस्या करने लगे। मनमें पुत्रकी कामना रखकर उस उग्र एवं महान् तपके द्वारा भगवान् शट्गूरको संतुष्ट करके उनसे उन्होंने अपनी अभीष्ट कामसम्पत्तिके

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अध्याय ४६

श्लोक 26

अटध्वं प्ठिवीं कृत्स्नां यथेष्टं कामरूपिणः प्रहरध्वं च सर्वेषु ये ऽस्माकं पक्षदूषकाः

aṭadhvaṃ pṭhivīṃ kṛtsnāṃ yatheṣṭaṃ kāmarūpiṇaḥ praharadhvaṃ ca sarveṣu ye 'smākaṃ pakṣadūṣakāḥ

हिन्दी अर्थ

रूपमें देवराजतुल्य तुमको प्राप्त किया। तुम मथुरामण्डलमें उत्पन्न होनेवाले लोगोंके लिये अवध्य हो महामुनि गार्ग्यके तपोबल और चन्द्रार्शशिखर भगवान् शिवके वरदानसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ है। तुमसे टक्कर लेनेपर श्रीकृष्ण उसी प्रकार नष्ट हो जायूँगे, जैसे बर्फ सूर्यकी किरणोंसे गल जाता है॥५४॥ राजन्! तुम राजाओंके वचनोंसे प्रेरित हो श्रीकृष्णको जीतनेका प्रयत्र करो। उनपर विजय पानेके लिये मथुरापर चढ़ाई कर दो। अपनी सेनाद्वारा मथुराके राज्य और नगरमें प्रवेश करके श्रीकृष्णको मारकर अपने यशका विस्तार करो वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण और बलदेव अपने बन्धु-बान्धवोंसहित माथुर ही हैं; तुम मथुरापुरीपर चढ़ाई करके उन दोनों भाइयोंको युद्धमें जीत लोगे शाल्व कहता है--नरेन्द्र ! राजाओंमें सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले जरासंधने इस प्रकार जो सम्पूर्ण नरेशोंके लिये हितकारक बात कही है, वह मैंने तुम्हें कह सुनायी। तुम अपने मन्त्रियोंके साथ बैठकर उन

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अध्याय ४६

श्लोक 27

गर्भस्थानाम् अपि गतिर् विज्ञेया भुवि देहिनाम् नारदेन हि गर्भेभ्यो भयं नः समुदाहृतम्

garbhasthānām api gatir vijñeyā bhuvi dehinām nāradena hi garbhebhyo bhayaṃ naḥ samudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

सारी बातोंपर बुद्धिपूर्वक विचार करके जो अपने लिये लाभदायक और उचित जान पड़े, वह करो इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वण शाल्ववाक्ये त्रिपञ्ञाशत्तमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीयहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शाल्वका वाक्यविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ कालयवनका राजाओंका अनुरोध स्वीकार करके श्रीकृष्णपर विजय पानेके लिये मथुराको प्रस्थान

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अध्याय ४६

श्लोक 28

भवन्तो हि यथाकामं मोदन्तां विगतज्वराः मां च वो नाथम् आश्रित्य नास्ति देवकृतं भयम्

bhavanto hi yathākāmaṃ modantāṃ vigatajvarāḥ māṃ ca vo nātham āśritya nāsti devakṛtaṃ bhayam

हिन्दी अर्थ

कृष्णनिग्रहहेतोर्यन्नियुक्तो बहुभिरन॑पैः ॥ दुर्जयस्त्रषु. लोकेषु सुरासुरगणैरपि। प्रहष्टू राजसिंहैस्तैरवधायों जयो मम। करिष्ये बचनं तेषां नृपसत्तमचोदितम्। अद्यैव तिथिनक्षत्रं मुहूर्त करणं शुभम्। यास्थामि मथुरां राजन् विजेतुं केशवं रणे॥ एवमाभाष्य राजानं सौभस्य पतिमूर्जितम्।

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अध्याय ४६

श्लोक 29

स तु केलिकिलो विप्रो भेदशीलश् च नारदः सुश्लिष्टान् अपि लोकेषु भेदयंल् लभते रतिम्

sa tu kelikilo vipro bhedaśīlaś ca nāradaḥ suśliṣṭān api lokeṣu bhedayaṃl labhate ratim

हिन्दी अर्थ

ह॒त्वागिन विधिवद् राजा कृतकौतुकमड़ल:। प्रस्थान कृतवान् सम्यग् जेतुकामो जनार्दनम्॥ वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! नरेशोंकी आज्ञाके अनुसार शाल्वराजने जब उपर्युक्त बात कही, तब यवनोंके अधिपति राजा कालयवनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा कालयवन बोला--बहुत-से राजाओंने मिलकर जो मुझे श्रीकृष्णके निग्रहके लिये नियुक्त किया है, इससे मैं धन्य हो गया। यह उन सबका मुझपर महान अनुग्रह है। आज मेरा जीवन सफल हो गया॥ २॥ जो तीनों लोकोंमें देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हैं, उन्हींके निग्रहके लिये मुझे भेजनेका निश्चय किया गया और मुझे विजयसूचक आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। हर्षमें भरे हुए उन राजसिंहोंने यदि मेरी विजयका निश्चय किया

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अध्याय ४६

श्लोक 30

कण्डूयमानः सततं लोकान् अटति चञ्चलः घटयानो नरेन्द्राणां तन्त्रीवैराणि चैव ह

kaṇḍūyamānaḥ satataṃ lokān aṭati cañcalaḥ ghaṭayāno narendrāṇāṃ tantrīvairāṇi caiva ha

हिन्दी अर्थ

है तो उनके वचनामृतकी वर्षासे मेरी जीत अवश्य होगी॥ ३-४ ॥ राजेन्द्र मैं नृपश्रेष्ठ जरासंधके कथनानुसार उन राजाओंके वचनका पालन अवश्य करूँगा। इस युद्धमें यदि मेरी पराजय भी हुई तो वह मेरे लिये विजयके ही समान होगी ॥ ५॥ राजन्! मैं आजकी तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और करणको शुभ मानकर श्रीकृष्णको युद्धमें जीतनेके लिये आज ही मथुराको प्रस्थान करूँगा वैशम्पायनजी कहते हैं-- जनमेजय ! सौभविमानके अधिपति बलवान् राजा शाल्वसे ऐसा कहकर कालयवनने बहुमूल्य मणिमय आशभूषणोंद्वारा उसका यथोचित सत्कार किया। राजेन्द्र तत्पश्चात् उस राजाने सिद्धिसूचक आशीर्वाद प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको धन दान दिया और पुरोहितको अग्निमें आहुति करके यात्राकालिक मड़लाचार सम्पन्न करनेके पश्चात् राजा कालयवनने जनार्दन श्रीकृष्णपर भलीभाँति विजय पानेके लिये वहाँसे प्रस्थान किया

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अध्याय ४६

श्लोक 31

एवं स विलपन्न् एव वाङ्मात्रेण तु केवलम् विवेश कंसो भवनं दह्यमानेन चेतसा

evaṃ sa vilapann eva vāṅmātreṇa tu kevalam viveśa kaṃso bhavanaṃ dahyamānena cetasā

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ ! इधर राजा शाल्व भी कृतार्थ एवं प्रसन्‍नचित्त हो यवनेन्द्र परिष्वज्य जगाम स्वपुरं नृपः॥ १० यवनराजको हृदयसे लगाकर अपने नगरको चला गया इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वण कालयवनवाक्ये चतुष्पञ्ञाशत्तमोउध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाय हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वनें कालयवनका वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 46
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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