Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
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अध्याय 4 / 90

Adhyaya 4

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पूर्ण अध्याय पाठ59 श्लोक

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अध्याय ४

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे विन्ध्यप्राप्तिर्नाम तृतीयो ऽध्यायः चतुर्थो ऽध्यायः मार्कण्डेय उवाच एवं ते द्रोणतनयाः पक्षिणो ज्ञानिनो ऽभवन् ।वसन्ति ह्यचले विन्ध्ये तानुपास्व च पृच्छ च

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe vindhyaprāptirnāma tṛtīyo 'dhyāyaḥ caturtho 'dhyāyaḥ mārkaṇḍeya uvāca evaṃ te droṇatanayāḥ pakṣiṇo jñānino 'bhavan / vasanti hyacale vindhye tānupāsva ca pṛccha ca

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--जैमिनि! इस प्रकार वे द्रोणके पुत्र चारों पक्षी ज्ञानी हैं और विन्ध्यगिरिपर निवास करते हैं। तुम उनकी सेवामें जाओ और उनसे ज्ञातव्य बातें पूछो।

English

ous birds. And when Jaimini reached that mountain, he heard their voices as they were reading, and having heard fc filled with surprise, he reflected. ‘ The brahmans are read- ing, observing the beauties of the various passages, regu- lating their breath, without any intermission, distinctly and ) without faults: wondrous is this, methinks, that Sarasvati does not forsake these Muni’s sons, although they are born in • the brute creation. One’s circle of relatives and a friend and whatever else is desired in one’s home — all that forsakes oue

अध्याय ४

श्लोक 2

इत्यृषेर्वचनं श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य जैमिनिः ।जगाम विन्ध्यशिखरं यत्र ते धर्मपक्षिणः

ityṛṣervacanaṃ śrutvā mārkaṇḍeyasya jaiminiḥ / jagāma vindhyaśikharaṃ yatra te dharmapakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेय मुनिकी यह बात सुनकर महर्षि जैमिनि, विन्ध्यपर्वतपर, जहाँ वे धर्मात्मा पक्षी रहते थे, गये। उस पर्वतके निकट पहुँचनेपर पाठ करते हुए उन पक्षियोंकी ध्वनि उनके कानोंमें पड़ी। उसे सुनकर जैमिनि बड़े विस्मयमें पड़े और इस प्रकार सोचने लगे--'अहो! ये श्रेष्ठ पक्षी बहुत ही स्पष्ट उच्चारण करते

English

Jaimini, having heard this speech of the Rishi Markandeya, went to the Vindhya mountain, where dwelt those righto-

अध्याय ४

श्लोक 3

तन्नगासन्नभूतश्च शुश्राठ पठतां ध्वनिम् ।श्रुत्वा च विस्मयाविष्टश्चिन्तयामास जैमिनिः

tannagāsannabhūtaśca śuśrāṭha paṭhatāṃ dhvanim / śrutvā ca vismayāviṣṭaścintayāmāsa jaiminiḥ

हिन्दी अर्थ

हुए पाठ कर रहे हैं; जिस अक्षरका कण्ठ-तालु आदि जो स्थान है, उसका वहींसे उच्चारण हो रहा है। बोलनेमें कितनी शुद्धता और सफाई है। ये अविराम पाठ करते जा रहे हैं, रूककर साँसतक नहीं लेते। श्वासकी गतिपर इन्होंने विजय प्राप्त कर ली है। किसी भी शब्दके उच्चारणमें कोई दोष नहीं दिखायी देता। ये

English

and departs; Sarasvati does not abandon one/ Thinking even thus, he entered the mountain cave; and entering saw those

अध्याय ४

श्लोक 4

स्थानसौष्ठवसम्पन्नं जितश्वासमविश्रमम् ।विस्पष्टमपदोषञ्च पठ्यते द्विजसत्तमैः

sthānasauṣṭhavasampannaṃ jitaśvāsamaviśramam / vispaṣṭamapadoṣañca paṭhyate dvijasattamaiḥ

हिन्दी अर्थ

यद्यपि निन्दित योनिको प्राप्त हुए हैं, तथापि सरस्वतीदेवी इनको नहीं त्याग रही हैं! यह मुझे बड़े आश्वर्यकी बात जान पड़ती है। बन्धु-बान्धवजन, मित्रगण तथा घरमें और जो प्रिय वस्तुएँ हैं, वे सभी साथ छोड़कर चली जाती हैं; परन्तु सरस्वती कभी त्याग नहीं करतीं।”-

English

dvijas standing on a ledge of the rock. Looking at them as they were reading, their faces free from blemish, he then addressed them all, with mingled sorrow and joy.

अध्याय ४

श्लोक 5

वियोनिमपि सम्प्राप्तानेतान् मुनिकुमारकान् ।चित्रमेतदहं मन्ये न जहाति सरस्वती

viyonimapi samprāptānetān munikumārakān / citrametadahaṃ manye na jahāti sarasvatī

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सोचते-विचारते हुए महर्षि जैमिनिने विन्ध्यपर्वतकी कन्दरामें प्रवेश किया। वहाँ जाकर उन्होंने देखा, वे पक्षी शिलाखण्डपर बैठे हुए पाठ कर रहे हैं। उनपर दृष्टि पड़ते ही महर्षि जैमिनि हर्षमें भरकर बोले--श्रेष्ठ पक्षियो! आपका कल्याण हो। मुझे व्यासजीका शिष्य जैमिनि समझिये। मैं आपलोगोंका

English

" Hail to you, 0 brahmans! Know that I am Jaimini, a disciple of Vyasa, who am come to you, being eager for leam-

अध्याय ४

श्लोक 6

बन्धुवर्गस्तथा मित्रं यच्चेष्टमपरं गृहे ।त्यक्त्वा गच्छति तत्सर्वं न जहाति सरस्वती

bandhuvargastathā mitraṃ yacceṣṭamaparaṃ gṛhe / tyaktvā gacchati tatsarvaṃ na jahāti sarasvatī

हिन्दी अर्थ

दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित होकर यहाँ आया हूँ। आपके पिताने अत्यन्त क्रोधमें आकर जो आपलोगोंको शाप दे दिया और आपको पक्षियोंकी योनिमें आना पड़ा, उसके लिये खेद नहीं करना चाहिए; क्योंकि वह सर्वथा हैवका ही विधान था। तपस्याका क्षय हो जानेपर मनुष्य दाता होकर भी याचक बन जाते

English

ing. Verily bo ye not angry; whereas ye, being cursed by your father, who was exceedingly wrathful, have been turned

अध्याय ४

श्लोक 7

इति सञ्चिन्तयन्नेव विवेश गिरिकन्दरम् ।प्रविश्य च ददर्शासौ शिलापट्टगातान् द्विजान्

iti sañcintayanneva viveśa girikandaram / praviśya ca dadarśāsau śilāpaṭṭagātān dvijān

हिन्दी अर्थ

हैं। स्वयं मारकर भी दूसरोंके हाथसे मारे जाते हैं तथा पहले दूसरोंको गिराकर भी स्वयं दूसरोंके द्वारा गिराये जाते हैं। इस प्रकार आनेवाली विपरीत दशाएँ मैंने अनेक बार देखी हैं। भावके बाद अभाव तथा अभावके बाद भाव, इस प्रकार भावाभावकी परम्परासे संसारके लोग निरन्तर व्याकुल रहते हैं। आपलोगोंको

English

and departs; Sarasvati does not abandon one/ Thinking even thus, he entered the mountain cave; and entering saw those

अध्याय ४

श्लोक 8

पठतस्तान् समालोक्य मुखदोषविवर्जितान् ।सो ऽथ शोकेन हर्षेण सर्वानेवाभ्यभाषत

paṭhatastān samālokya mukhadoṣavivarjitān / so 'tha śokena harṣeṇa sarvānevābhyabhāṣata

हिन्दी अर्थ

भी अपने मनमें ऐसा ही विचार करके कभी शोक नहीं करना चाहिए। शोक और हर्षके वशीभूत न होना ही ज्ञानका फल है।'

English

dvijas standing on a ledge of the rock. Looking at them as they were reading, their faces free from blemish, he then addressed them all, with mingled sorrow and joy.

अध्याय ४

श्लोक 9

स्वस्त्यस्तु वो द्विजश्रेष्ठा जैमिनिं मां निबोधत ।व्यासशिष्यमनुप्राप्तं भवतां दर्शनोत्सुकम्

svastyastu vo dvijaśreṣṭhā jaiminiṃ māṃ nibodhata / vyāsaśiṣyamanuprāptaṃ bhavatāṃ darśanotsukam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उन धर्मात्मा पक्षियोंने पाद्य और अर्घ्यके द्वारा महर्षि जैमिनिका पूजन किया और उन्हें प्रणाम करके उनकी कुशल पूछी। फिर अपने पंखोंसे हवा करके उनकी थकावट दूर की। जब वे सुखपूर्वक बैठकर विश्राम ले चुके, तब पक्षियोंने कहा--'ब्रह्मनम! आज हमारा जन्म सफल हो गया। यह जीवन भी

English

" Hail to you, 0 brahmans! Know that I am Jaimini, a disciple of Vyasa, who am come to you, being eager for leam-

अध्याय ४

श्लोक 10

मन्युर्न खलु कर्तव्यो यत् पित्रातीव मन्युना ।शप्ताः खगत्वमापन्नाः सर्वथा दिष्टमेव तत्

manyurna khalu kartavyo yat pitrātīva manyunā / śaptāḥ khagatvamāpannāḥ sarvathā diṣṭameva tat

हिन्दी अर्थ

उत्तम जीवन बन गया; क्योंकि आज हमें आपके दोनों चरण-कमलोंका दर्शन मिला, जो देवताओंके लिये भी वन्दनीय हैं। हमारे शरीरमें पिताजीके क्रोधसे प्रकट हुई जो अग्नि जल रही है, वह आज आपके दर्शनरूपी जलसे सिंचकर शान्त हो गयी। ब्रह्मन! आप कुशलसे तो हैं न? आपके आश्रममें रहनेवाले मृग,

English

ing. Verily bo ye not angry; whereas ye, being cursed by your father, who was exceedingly wrathful, have been turned

अध्याय ४

श्लोक 11

स्फीतद्रव्ये कुले केचिज्जाताः किल मनस्विनः ।द्रव्यनाशे द्विजेन्द्रास्ते शबरेण सुसान्त्विताः

sphītadravye kule kecijjātāḥ kila manasvinaḥ / dravyanāśe dvijendrāste śabareṇa susāntvitāḥ

हिन्दी अर्थ

पक्षी, वृक्ष, लता, गुल्म, बाँस और भाँतिं-भाँतिके, तृण--इन सबकी कुशल है न? इनपर कोई संकट तो नहीं है? अब हमपर कृपा कीजिये और यहाँ अपने आगमनका कारण बतलाइये। हमारा कोई बहुत बड़ा भाग्य था, जो आप इन नेत्रोंके अतिथि हुए।'

English

into birds, that was indeed altogether fate. In a family of immense wealth some intelligent members, it is said, wepe born; when their wealth was lost, they were well comforted,

अध्याय ४

श्लोक 12

दत्त्वा याचन्ति पुरुषा हत्वा वध्यन्ति चापरे ।पातयित्वा च पात्यन्ते त एव तपसः क्षयात्

dattvā yācanti puruṣā hatvā vadhyanti cāpare / pātayitvā ca pātyante ta eva tapasaḥ kṣayāt

हिन्दी अर्थ

जैमिनि बोले--'श्रेष्ठ पक्षीगण! मुझे महाभारत-शास्त्रमें कई सन्देह हैं। उन सबको पूछनेके लिये पहले मैं भृगुकुलश्रेष्ठ महात्मा मार्कण्डेय मुनिके पास गया था। मेरे पूछनेपर उन्होंने कहा--'विन्ध्यपर्वतपर द्रोणके पुत्र महात्मा पक्षी रहते हैं। वे तुम्हारे प्रश्नोंका विस्तारपूर्वक उत्तर देंगे।। उनकी आज्ञासे ही मैं इस महान्

English

brdhmans, by S'abara. Men after giving to others become beggars themselves; and others, after killing men^ have been killed themselves; and others^ after having overthrown men^ have been themselves overthrown; — those very men, through the decay

अध्याय ४

श्लोक 13

एतद्दृष्टं सुबहुशो विपरीतं तथा मया ।भावाभावसमुच्छेदैरजस्त्रं व्याकुलं जगत्

etaddṛṣṭaṃ subahuśo viparītaṃ tathā mayā / bhāvābhāvasamucchedairajastraṃ vyākulaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

पर्वतपर आया हूँ। आपलोग हमारे प्रश्नोंको पूर्णरूपसे सुनकर उनका विवेचन

English

of austerities. Thus I have very often seen opposites of this kind: the world is constantly distressed by the destruction of

अध्याय ४

श्लोक 14

इति सञ्चिन्त्य मनसा न शोकं कर्तुमर्हथ ।ज्ञानस्य फलमेतावच्छोकहर्षैरधृष्यता

iti sañcintya manasā na śokaṃ kartumarhatha / jñānasya phalametāvacchokaharṣairadhṛṣyatā

हिन्दी अर्थ

पक्षियोंने कहा--ब्रह्मन! आपका प्रश्न यदि हमारी बुद्धिके बाहर न होगा तो हम अवश्य उसका समाधान करेंगे। आप नि:शड्ूक होकर सुनें। विप्रवर! चारों वेद, धर्मशास्त्र, सम्पूर्ण वेदाड़ तथा और भी जो वेदोंके समान माननीय इतिहास-पुराणादि हैं, उन सबमें हमारी बुद्धिका प्रवेश है; तथापि हम कोई

English

existence and non-existence. At such thoughts as these in your minds, ye should not give way to sorrow: so much is invulnerability to sorrow and joy the fruit of knowledge."

अध्याय ४

श्लोक 15

ततस्ते जैमिनिं सर्वे पाद्यार्घ्याभ्यामपूजयन् ।अनामयञ्च पप्रच्छुः प्रणिपत्य महामुनिम्

tataste jaiminiṃ sarve pādyārghyābhyāmapūjayan / anāmayañca papracchuḥ praṇipatya mahāmunim

हिन्दी अर्थ

प्रतिज्ञा नहीं कर सकते। आपको महाभारतमें जो-जो सन्दिग्ध बात जान पड़े, उसे निर्भीक होकर पूछिये।

English

reeds, and grasses. Or perhaps we though respectful have not spoken this fittingly? Whence can evil befall those who

अध्याय ४

श्लोक 16

अथोचुः खगमाः सर्वे व्यासशिष्यं तपोनिधिम् ।सुखोपविष्टं विश्रान्तं पक्षानिलहतक्लमम्

athocuḥ khagamāḥ sarve vyāsaśiṣyaṃ taponidhim / sukhopaviṣṭaṃ viśrāntaṃ pakṣānilahataklamam

हिन्दी अर्थ

जैमिनि बोले--पक्षियो! आपलोगोंका अन्तःकरण निर्मल है। महाभारतमें मेरे लिये जो सन्दिग्ध बातें हैं, उन्हें बताता हूँ; सुनिये और सुनकर उनकी व्याख्या कीजिये। सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन सम्पूर्ण जगत्के आधार, समस्त कारणोंके भी कारण और निर्गुण होते हुए भी मनुष्य-शरीरको कैसे प्राप्त हुए?

English

questioned him with deep respect. Then all the birds address- ed him, the disciple of Vyasa, rich in austerities, as he sat at ease, resting himself, with his fatigue mitigated by the breeze from their wings.

अध्याय ४

श्लोक 17

पक्षिण ऊचुः अद्य नः सफलं जन्म जीवितञ्च सुजीवितम् ।यत् पश्यामः सुरैर्वन्द्यं तव पादाम्बुजद्वयम्

pakṣiṇa ūcuḥ adya naḥ saphalaṃ janma jīvitañca sujīvitam / yat paśyāmaḥ surairvandyaṃ tava pādāmbujadvayam

हिन्दी अर्थ

द्रपदकुमारी कृष्णा अकेली ही पाँच पाण्डवोंकी महारानी क्योंकर हुई? इस

English

" To-day has our birth become fruitful, and our lives have been well-lived, inasmuch as we see thy lotus-feet which are worthy

अध्याय ४

श्लोक 18

पितृकोपाग्निरुद्भूतो यो नो देहेषु वर्तते ।सो ऽद्य शान्तिं गतो विप्र युष्मद्दर्शनवारिणा

pitṛkopāgnirudbhūto yo no deheṣu vartate / so 'dya śāntiṃ gato vipra yuṣmaddarśanavāriṇā

हिन्दी अर्थ

अभी विवाहतक नहीं हुआ था, समस्त पाण्डव जिनके रक्षक थे तथा जो स्वयं भी बड़े बलवान् थे, अनाथकी भाँति कैसे मारे गये? महाभारतके विषयमें यह मेरा सन्देह है। आपलोग इसका निवारण करें।

English

to be praised by the gods. The blazing fire of our father’s anger, which continues in our bodies, has been quenched to-

अध्याय ४

श्लोक 19

कच्चित् ते कुशलं ब्रह्मन्नाश्रमे मृगपक्षिषु ।वृक्षेष्वथ लता-गुल्म-त्वक्सार-तृणजातिषु

kaccit te kuśalaṃ brahmannāśrame mṛgapakṣiṣu / vṛkṣeṣvatha latā-gulma-tvaksāra-tṛṇajātiṣu

हिन्दी अर्थ

पक्षियोंने कहा--जो सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, सर्वव्यापक, सबकी उत्पत्तिके कारण, अन्तर्यामी, प्रमाणोंके अविषय, सनातन, अविनाशी, चतुर्व्यूह- स्वरूप, त्रिगुणमय, निर्गुण, सबसे बड़े, अत्यन्त गौरवशाली, सर्वश्रेष्ठ तथा अमृतस्वरूप हैं, उन भगवान् विष्णुको हम सबसे पहले नमस्कार करते हैं।

English

day by the water of the sight of thee, 0 brahman. We trust that all is well in thy hermitage among the deer and birds, among the trees too, and the various kinds of creepers, shrubs,

अध्याय ४

श्लोक 20

अथवा नैतदुक्तं हि सम्यगस्माभिरादृतैः ।भवता सङ्गमो येषां तेषामकुशलं कुतः

athavā naitaduktaṃ hi samyagasmābhirādṛtaiḥ / bhavatā saṅgamo yeṣāṃ teṣāmakuśalaṃ kutaḥ

हिन्दी अर्थ

जिनसे बढ़कर सूक्ष्म तथा जिनसे अधिक बड़ा भी कोई नहीं है, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व व्यास है, जो इस जगत्के आदिकारण और अजन्मा हैं, जो उत्पत्ति, लय, प्रत्यक्ष और परोक्ष--सबसे विलक्षण हैं, इस सम्पूर्ण जगत्को जिनकी रचना बतलाते हैं तथा अन्तमें जिनके भीतर इसका संहार होता है, उन

English

reeds, and grasses. Or perhaps we though respectful have not spoken this fittingly? Whence can evil befall those who

अध्याय ४

श्लोक 21

प्रसादञ्च कुरुष्वात्र ब्रूह्यागमनकारणम् ।देवानामिव संसर्गो भवतो ऽभ्युदयो महान् ।केनास्मद्भाग्यगुरुण आनीतो दृष्टिगोचरम्

prasādañca kuruṣvātra brūhyāgamanakāraṇam / devānāmiva saṃsargo bhavato 'bhyudayo mahān / kenāsmadbhāgyaguruṇa ānīto dṛṣṭigocaram

हिन्दी अर्थ

परमेश्वरको हमारा नमस्कार है। तत्पश्चात् जो अपने चारों मुखोंसे ऋक्ु-साम आदि वेदोंका उच्चारण करते हुए तीनों लोकोंको पवित्र करते हैं, उन आदिदेव ब्रह्माजीको भी हम एकाग्रचित्तसे नमस्कार करते हैं। इसी प्रकार जिनके एक ही बाणसे पराजित होकर असुरगण कभी याज्ञिकोंके यज्ञोंका विनाश नहीं करते,

English

have met with thee? And here, shew us favour, tell us the cause of thy visit; union with thee, as with the gods, is great prosperity; by whom, powerful for our good fortune, hast thou been brought to our view? "

अध्याय ४

श्लोक 22

जैमिनिरुवाच श्रूयतां द्विजशार्दूलाः कारणं येन कन्दरम् ।विन्ध्यस्येहागतो रम्यं रेवावारिकणोक्षितम् ।सन्देहान् भारते शास्त्रे तान् प्रष्टुं गतवानहम्

jaiminiruvāca śrūyatāṃ dvijaśārdūlāḥ kāraṇaṃ yena kandaram / vindhyasyehāgato ramyaṃ revāvārikaṇokṣitam / sandehān bhārate śāstre tān praṣṭuṃ gatavānaham

हिन्दी अर्थ

उन भगवान् शड्करको भी मस्तक झुकाते हैं। इसके बाद हम अद्भुत कर्म करनेवाले व्यासजीके सम्पूर्ण मतोंकी व्याख्या करेंगे, जिन्होंने महाभारतके उद्देश्यसे धर्म आदिका रहस्य प्रकट किया है। तत्त्वदर्शी मुनियोंने जलको “नारा कहा है। वह नारा ही पूर्वकालमें भगवानका निवासस्थान रहा, इसलिये वे

English

" Let the reason be heard, 0 brahmans, why I have come here to the Vindhya mountain’s delightful cave, which is sprinkled

अध्याय ४

श्लोक 23

मार्कण्डेयं महात्मानं पूर्वं भृगुकुलोद्वहम् ।तमहं पृष्टवान् प्राप्य सन्देहान् भरतं प्रति

mārkaṇḍeyaṃ mahātmānaṃ pūrvaṃ bhṛgukulodvaham / tamahaṃ pṛṣṭavān prāpya sandehān bharataṃ prati

हिन्दी अर्थ

नारायण कहे गये हैं।- ब्रह्मन्! वे सर्वव्यापी भगवान् नारायणदेव सबको व्याप्त करके स्थित हैं। वे सगुण भी हैं और निर्गुण भी। उनका प्रथम स्वरूप ऐसा है कि जिसका शब्दोंद्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता। दिद्वान् पुरुष उसे शुक्ल (शुद्धस्वरूप) देखते हैं। भगवानका वह दिव्य विग्रह ज्योतिःपुञ्जसे

English

with drops of water from the river Narmada. At first I questioned the gi'eat Muni Markandeya, a scion of Bhpgu’s race; since I found difficulties in connexion with the Maha-

अध्याय ४

श्लोक 24

स च पृष्टो मया प्राह सन्ति विन्ध्ये महाचले ।द्रोणपुत्रा महात्मानस्ते वक्ष्मन्त्यर्थविस्तरम्

sa ca pṛṣṭo mayā prāha santi vindhye mahācale / droṇaputrā mahātmānaste vakṣmantyarthavistaram

हिन्दी अर्थ

परिपूर्ण है। वही योगी पुरुषोंकी परानिष्ठा (अन्तिम लक्ष्य) है। वह दिव्यस्वरूप दूर भी है और समीप भी। उसे सब गुणोंसे अतीत जानना चाहिए। उस दिव्यस्वरूपका ही नाम वासुदेव है। अहंता और ममताका त्याग करनेसे ही उसका साक्षात्कार होता है। रूप और वर्ण आदि काल्पनिक भाव उसमें नहीं हैं।

English

bharata. And he, when asked by me, replied, ‘ Drona’s high- souled sons are living on the mighty Vindhya mountain;

अध्याय ४

श्लोक 25

तद्वाक्ययोदितश्चेममागतो ऽहं महागिरिम् ।तच्छृणुध्वमशेषेण श्रुत्वा व्याख्यातुमर्हथ

tadvākyayoditaścemamāgato 'haṃ mahāgirim / tacchṛṇudhvamaśeṣeṇa śrutvā vyākhyātumarhatha

हिन्दी अर्थ

वह सदा परम शुद्ध एवं उत्तम अधिष्ठानस्वरूप है। भगवान्का दूसरा स्वरूप शेषके नामसे प्रसिद्ध है, जो पाताललोकमें रहकर पृथ्वीको अपने मस्तकपर धारण करता है। इसे तिर्यक्स्वरूपको प्राप्त हुई तामसी मूर्ति कहते हैं। श्रीहरिकी तीसरी मूर्ति समस्त प्रजाके पालन-पोषणमें तत्पर रहती है। वही इस

English

they will declare the fall meaning to thee.’ And I, impelled by his speech, have come to this great mountain: therefore hear me fully; having heard, deign to give an explanation."

अध्याय ४

श्लोक 26

पक्षिण ऊचुः विषये सति वक्ष्यामो निर्विशङ्कः शृणुष्व तत् ।कथं तन्न वदिष्यामो यदस्मद्बुद्धिगोचरम्

pakṣiṇa ūcuḥ viṣaye sati vakṣyāmo nirviśaṅkaḥ śṛṇuṣva tat / kathaṃ tanna vadiṣyāmo yadasmadbuddhigocaram

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीपर धर्मकी निश्चित व्यवस्था करती है। धर्मका नाश करनेवाले उद्ण्ड असुरोंको मारती तथा धर्मकी रक्षामें संलग्न रहनेवाले देवताओं और साधु- संतोंकी रक्षा करती है। जैमिनिजी! संसारमें जब-जब धर्मका हास और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब वह अपनेको यहाँ प्रकट करती है।

English

" The matter being one specially known to us, we will declare it; listen then, free from distrust; why should we not tell

अध्याय ४

श्लोक 27

चतुर्ष्वपि हि वेदेषु धर्मशास्त्रेषु चैव हि ।समस्तेषु तथाङ्गेषु यच्चान्यद्वेदसंमितम्

caturṣvapi hi vedeṣu dharmaśāstreṣu caiva hi / samasteṣu tathāṅgeṣu yaccānyadvedasaṃmitam

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें वही वाराहरूप धारण करके अपने थूथुनसे जलको हटाकर इस पृथ्वीको एक ही दाँतसे जलके ऊपर ऐसे उठा लायी मानो वह कोई कमलका फूल हो। उन्हीं भगवानने नृसिंहरूप धारण करके हिरण्यकशिपुका वध किया और विप्रचित्ति आदि अन्य दानवोंको मार गिराया। इसी प्रकार भगवान्के वामन

English

thee that of which our intellects are cognizant? For even in

अध्याय ४

श्लोक 28

एतेषु गोचरो ऽस्माकं बुद्धेर्ब्राह्मणसत्तम ।प्रतिज्ञान्तु समारोढुं तथापि नहि शक्नुमः

eteṣu gocaro 'smākaṃ buddherbrāhmaṇasattama / pratijñāntu samāroḍhuṃ tathāpi nahi śaknumaḥ

हिन्दी अर्थ

आदि और भी बहुत-से अवतार हैं, जिनकी गणना करनेमें हम असमर्थ हैं। इस समय भगवानने मथुरामें श्रीकृष्णरूपमें अवतार लिया है। इस तरह भगवान्की वह सात््विकी मूर्ति ही भिन्न-भिन्न अवतार धारण करती है। यह आपके पहले प्रश्नका उत्तर बतलाया गया कि भगवान् पूर्णकाम होते हुए भी धर्म आदिकी

English

in these does our intellect range, 0 best of brahmans; but

अध्याय ४

श्लोक 29

तस्माद्वदस्व विश्रब्धं सन्दिग्धं यद्वि भारते ।वक्ष्यामस्तव धर्मज्ञ न चेन्मोहो भविष्यति

tasmādvadasva viśrabdhaṃ sandigdhaṃ yadvi bhārate / vakṣyāmastava dharmajña na cenmoho bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

रक्षाके लिये सदा स्वेच्छासे ही अवतीर्ण होते हैं।

English

nevertheless we are not able to give a promise. Therefore declare fearlessly what is doubtful in the Mahabhdrata; we will declare it to thee, 0 thou who art wise in the law; if not there will be bewilderment."

अध्याय ४

श्लोक 30

जैमिनिरुवाच सन्दिग्धानीह वस्तूनि भारतं प्रति यानि मे ।शृणुध्वममलास्तानि श्रुत्वा व्याख्यातुमर्हथ

jaiminiruvāca sandigdhānīha vastūni bhārataṃ prati yāni me / śṛṇudhvamamalāstāni śrutvā vyākhyātumarhatha

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन! पूर्वकालमें त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वरूप इन्द्रके हाथसे मारे गये थे, इसलिये ब्रह्महत्याने इन्द्रको धर दबाया। इससे उनके तेजकी बड़ी क्षति हुई। इस अन्यायके कारण इन्द्रका तेज धर्मराजके शरीरमें प्रवेश कर गया, अतः इन्द्र निस्तेज हो गये। तदनन्तर अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुनकर त्वष्टा

English

" Hear, 0 ye pure ones! the matters in connexion with the Mahabhdrata, which are doubtful to me here; having heard,

अध्याय ४

श्लोक 31

कस्मान्मानुषतां प्राप्तो निर्गुणो ऽपि जनार्दनः ।वासुदेवो ऽखिलाधारः सर्वकारणकारणम्

kasmānmānuṣatāṃ prāpto nirguṇo 'pi janārdanaḥ / vāsudevo 'khilādhāraḥ sarvakāraṇakāraṇam

हिन्दी अर्थ

प्रजापतिको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने मस्तकसे एक जटा उखाड़कर सबको सुनाते हुए यह बात कही--“आज देवताओंसहित तीनों लोक मेरे पराक्रमको देखें। वह खोटी बुद्धिवाला ब्रह्मघाती इन्द्र भी मेरी शक्तिका साक्षात्कार कर ले; क्योंकि उस दुष्टने अपने ब्राह्मणोचित कर्ममें लगे हुए मेरे

English

deign to explain them. Why is Jandrdana Vdsudeva, who is

अध्याय ४

श्लोक 32

कस्माच्च पाण्डुपुत्राणामेका सा द्रुपदात्मजा ।पञ्चानां महिषी कृष्णा सुमाहनत्र संशयः

kasmācca pāṇḍuputrāṇāmekā sā drupadātmajā / pañcānāṃ mahiṣī kṛṣṇā sumāhanatra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रका वध किया है।” यों कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये प्रजापतिने वह जटा अग्निमें होम दी। फिर तो उस होमकुण्डसे वृत्र नामक महान् असुर प्रकट हुआ, जिसके शरीरसे सब ओर आगकी लपटें निकल रही थीं। विशाल देह, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और कटे-छँटे कोयलेके ढेरकी भाँति शरीरका रंग था। उस महान् असुर

English

though devoid of qualities, endued with humanity? And why was Drupada’s daughter Krishna the common wife of- the five sons of Pandu? On this point there is very great perplexity.

अध्याय ४

श्लोक 33

भेषजं ब्रह्महत्याया बलदेवो महाबलः ।तीर्थयात्राप्रसङ्गेन कस्माच्चक्रे हलायुधः

bheṣajaṃ brahmahatyāyā baladevo mahābalaḥ / tīrthayātrāprasaṅgena kasmāccakre halāyudhaḥ

हिन्दी अर्थ

वृत्रासुरको अपने वधके लिये उत्पन्न देख इन्द्र भयसे व्याकुल हो उठे। उन्होंने सन्धिकी इच्छासे सप्तर्षियोंको उसके पास भेजा। सम्पूर्ण भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहनेवाले वे महर्षि बड़ी प्रसन्नताके साथ गये और उन्होंने कुछ शर्तोंके साथ इन्द्र और वृत्रासुरमें मित्रता करा दी। इन्द्रने सन्धिकी शर्तोंका उल्लड्घन

English

Why did the mighty Baladeva Haldyudha expiate his brah-

अध्याय ४

श्लोक 34

कथं च द्रौपदेयास्ते ऽकृतदारा महारथाः ।पाण्डुनाथा महात्मानो वधमापुरनाथवत्

kathaṃ ca draupadeyāste 'kṛtadārā mahārathāḥ / pāṇḍunāthā mahātmāno vadhamāpuranāthavat

हिन्दी अर्थ

करके जब वृत्रासुरको मार डाला, तब पुनः उनपर ब्रह्महत्याका आक्रमण हुआ। उस समय उनका सारा बल नष्ट हो गया। इन्द्रके शरीरसे निकला हुआ बल वायुदेवतामें समा गया। तदनन्तर जब इन्द्रने गौतमका रूप धारण करके उनकी पत्नी अहल्याके सतीत्वका नाश किया, उस समय उनका रूप भी नष्ट हो गया।

English

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अध्याय ४

श्लोक 35

एतत् सर्वं कथ्यतां मे सन्दिग्धं भारतं प्रति ।कृतार्थोहं सुखं येन गच्छेयं निजमाश्रमम्

etat sarvaṃ kathyatāṃ me sandigdhaṃ bhārataṃ prati / kṛtārthohaṃ sukhaṃ yena gaccheyaṃ nijamāśramam

हिन्दी अर्थ

उनके अड्ज-प्रत्यड्रका लावण्य, जो बड़ा ही मनोरम था, व्यभिचार-दोषसे दूषित देवराज इन्द्रको छोड़कर दोनों अश्विनीकुमारोंके पास चला गया। इस प्रकार इन्द्र अपने धर्म, तेज, बल और रूपसे वज्चित हो गये। यह जानकर हैत्योंने उन्हें जीतनेका उद्योग आरम्भ किया।

English

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अध्याय ४

श्लोक 36

पक्षिण ऊचुः नमस्कृत्य सुरेशाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।पुरुषायाप्रमेयाय शाश्वतायाव्ययाय च

pakṣiṇa ūcuḥ namaskṛtya sureśāya viṣṇave prabhaviṣṇave / puruṣāyāprameyāya śāśvatāyāvyayāya ca

हिन्दी अर्थ

महामुने! उन दिनों पृथ्वीपर जो अधिक पराक्रमी राजा थे, उन्हींके कुलोंमें देवराजको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले अत्यन्त बलशाली हैत्य उत्पन्न हुए। कुछ कालके अनन्तर यह पृथ्वी पापके भारी भारसे पीड़ित हो मेरुपर्वतके शिखरपर, जहाँ देवताओंकी दिव्य सभा है, गयी। वहाँ पहुँचकर उसने दानवों और हैत्योंसे

English

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अध्याय ४

श्लोक 37

चतुर्व्यूहात्मने तस्मै त्रिगुणायागुणाय च ।वरिष्ठाय गरिष्ठाय वरेष्यायामृताय च

caturvyūhātmane tasmai triguṇāyāguṇāya ca / variṣṭhāya gariṣṭhāya vareṣyāyāmṛtāya ca

हिन्दी अर्थ

होनेवाले अपने खेदका कारण बतलाया। वह बोली--'देवताओ! आपने पूर्वकालमें जिन महापराक्रमी असुरोंका वध किया है, वे सब इस समय मनुष्यलोकमें जाकर राजाओंके घरमें उत्पन्न हुए हैं। ऐसे हैत्योंकी अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ हैं। मैं उनके भारसे पीड़ित होकर नीचेकी ओर धँसी जाती हूँ।

English

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अध्याय ४

श्लोक 38

यस्मादणुतरं नास्ति यस्मान्नास्ति बृहत्तरम् ।येन विश्वमिदं व्याप्तमजेन जगदादिना

yasmādaṇutaraṃ nāsti yasmānnāsti bṛhattaram / yena viśvamidaṃ vyāptamajena jagadādinā

हिन्दी अर्थ

आपलोग ऐसा कोई उपाय करें, जिससे मुझे शान्ति मिले।'

English

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अध्याय ४

श्लोक 39

आविर्भाव-तिरोभाव-दृष्टादृष्ट-विलक्षणम् ।वदन्ति यद् सृष्टमिदं तथैवान्ते च संहृतम्

āvirbhāva-tirobhāva-dṛṣṭādṛṣṭa-vilakṣaṇam / vadanti yad sṛṣṭamidaṃ tathaivānte ca saṃhṛtam

हिन्दी अर्थ

पक्षी कहते हैं--पृथ्वीके यों कहनेपर सम्पूर्ण देवता अपने-अपने तेजके अंशसे पृथ्वीपर अवतार लेने लगे। उनके अवतारके दो ही उद्देश्य थे-- प्रजाजनोंका उपकार और पृथ्वीके भारका अपहरण। इन्द्रके शरीरसे जो तेज प्राप्त हुआ था, उसे स्वयं धर्मराजने कुन्तीके गर्भमें स्थापित किया। उसीसे

English

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अध्याय ४

श्लोक 40

ब्रह्मणे चादिदेवाय नमस्कृत्य समाधिना ।ऋक्सामान्युद्गिरन् वक्त्रैर्यः पुनाति जगत्त्रयम्

brahmaṇe cādidevāya namaskṛtya samādhinā / ṛksāmānyudgiran vaktrairyaḥ punāti jagattrayam

हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरका जन्म हुआ। फिर वायु देवताने इन्द्रके ही बलको कुन्तीके उदरमें स्थापित किया। उससे भीम उत्पन्न हुए। इन्द्रके आधे अंशसे

English

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अध्याय ४

श्लोक 41

प्रणिपत्य तथेशानमेकबाणविनिर्जितैः ।यस्यासुरगणैर्यज्ञा विलुप्यन्ते न यज्विनाम्

praṇipatya tatheśānamekabāṇavinirjitaiḥ / yasyāsuragaṇairyajñā vilupyante na yajvinām

हिन्दी अर्थ

अर्जुनका जन्म हुआ। इसी प्रकार इन्द्रका ही सुन्दर रूप अभश्विनीकुमारोंद्वारा माद्रीके गर्भमें स्थापित किया गया था, जिससे अत्यन्त कान्तिमान् नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए। इस प्रकार देवराज इन्द्र पाँच रूपोंमें अवतीर्ण हुए। उनकी पत्नी शची ही महाभागा कृष्णाके रूपमें अग्निसे प्रकट हुईं। अतः कृष्णा

English

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अध्याय ४

श्लोक 42

प्रवक्ष्यामो मतं कृत्स्नं व्यासस्याद्भुतकर्मणः ।येन भारतमुद्दिश्य धर्माद्याः प्रकटीकृताः

pravakṣyāmo mataṃ kṛtsnaṃ vyāsasyādbhutakarmaṇaḥ / yena bhāratamuddiśya dharmādyāḥ prakaṭīkṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

एकमात्र इन्द्रकी ही पत्नी थी और किसीकी नहीं। योगीश्वर भी अनेक शरीर धारण कर लेते हैं। फिर इन्द्र तो देवता हैं, उनके पाँच शरीर धारण कर लेनेमें क्या सन्देह है। इस प्रकार पाँच पाण्डवोंकी जो एक पत्नी हुई, उसका रहस्य

English

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अध्याय ४

श्लोक 43

आपो नारा इति प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः

āpo nārā iti proktā munibhistattvadarśibhiḥ / ayanaṃ tasya tāḥ pūrvaṃ tena nārāyaṇaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

आपो नारा इति प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभि: अयनं तस्य ताः पूर्व तेन नारायण:

English

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अध्याय ४

श्लोक 44

स देवो भगवान् सर्वं व्याप्य नारायणो विभुः ।चतुर्धा संस्थितो ब्रह्मन् सगुणो निर्गुणस्तथा

sa devo bhagavān sarvaṃ vyāpya nārāyaṇo vibhuḥ / caturdhā saṃsthito brahman saguṇo nirguṇastathā

हिन्दी अर्थ

राजा हरिश्रुन्द्रका चरित्र

English

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अध्याय ४

श्लोक 45

एका मूर्तिरनिर्देश्या शुक्लां पश्यन्ति तां बुधाः ।ज्वालामालोपरुद्धाङ्गी निष्ठा सा योगिनां परा

ekā mūrtiranirdeśyā śuklāṃ paśyanti tāṃ budhāḥ / jvālāmāloparuddhāṅgī niṣṭhā sā yogināṃ parā

हिन्दी अर्थ

पक्षी कहते हैं--पहलेकी बात है, त्रेतायुगमें हरिश्वन्द्र नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा, भूमण्डलके पालक, सुन्दर कीर्तिसे युक्त और सब प्रकारसे श्रेष्ठ थे। उनके राज्यकालमें कभी अकाल नहीं पड़ा, किसीको रोग नहीं हुआ, मनुष्योंकी अकालमृत्यु नहीं हुई और पुरवासियोंकी कभी अधर्ममें

English

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अध्याय ४

श्लोक 46

दूरस्था चान्तिकस्था च विज्ञेया सा गुणातिगा ।वासुदेवाभिधानासौ निर्ममत्वेन दृश्यते

dūrasthā cāntikasthā ca vijñeyā sā guṇātigā / vāsudevābhidhānāsau nirmamatvena dṛśyate

हिन्दी अर्थ

रुचि नहीं हुई। उस समय प्रजावर्गके लोग धन, वीर्य और तपस्याके मदसे उन्मत्त नहीं होते थे। कोई भी स्त्री ऐसी नहीं देखी जाती थी, जो पूर्ण यौवनावस्थाको प्राप्त किये बिना ही सन्‍्तानको जन्म देती रही हो। एक दिन महाबाहु राजा हरिश्वन्द्र जंगलमें शिकार खेलने गये थे। वहाँ शिकारके पीछे दौड़ते हुए उन्होंने

English

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अध्याय ४

श्लोक 47

रूपवर्णादयस्तस्या न भावाः कल्पनामयाः ।अस्त्येव सा सदा शुद्धा सुप्रतिष्ठैकरूपिणी

rūpavarṇādayastasyā na bhāvāḥ kalpanāmayāḥ / astyeva sā sadā śuddhā supratiṣṭhaikarūpiṇī

हिन्दी अर्थ

बारंबार कुछ स्त्रियोंकी कातरवाणी सुनी। वे कह रही थीं, “हमें बचाओ, बचाओ।' राजाने शिकारका पीछा छोड़ दिया और उन स्ट्रियोंको लक्ष्य करके कहा--'डरो मत, डरो मत। कौन ऐसा दुष्टबुद्धिवाला पुरुष है जो मेरे शासनकालमें भी ऐसा अन्याय करता है?” यों कहकर स्त्रियोंके रोनेके शब्दका

English

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अध्याय ४

श्लोक 48

द्वितीया पृथिवीं मूद्र्घ्ना शेषाख्या धारयत्यधः ।तामसी सा समाख्याता तिर्यक्त्वं समुपाश्रिता

dvitīyā pṛthivīṃ mūdrghnā śeṣākhyā dhārayatyadhaḥ / tāmasī sā samākhyātā tiryaktvaṃ samupāśritā

हिन्दी अर्थ

अनुसरण करते हुए राजा उसी ओर चल दिये। इसी बीचमें प्रत्येक कार्यके आरम्भमें बाधा उपस्थित करनेवाला रुद्रकुमार विध्नराज इस प्रकार सोचने लगा --'ये महर्षि विश्वामित्र बड़े पराक्रमी हैं और अनृपम तपस्याका आश्रय लेकर उत्तम व्रतका पालन करते हुए उन भवादि विद्याओंका साधन करते हैं, जो पहले

English

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अध्याय ४

श्लोक 49

तृतीया कर्म कुरुते प्रजापालनतत्परा ।सत्त्वोद्रिक्ता तु सा ज्ञेया धर्मसंस्थानकारिणी

tṛtīyā karma kurute prajāpālanatatparā / sattvodriktā tu sā jñeyā dharmasaṃsthānakāriṇī

हिन्दी अर्थ

इन्हें सिद्ध नहीं हो सकी हैं। ये महर्षि क्षमा, मौन तथा आत्मसंयमपूर्वक जिन विद्याओंका साधन करते है, वे उनके भयसे पीड़ित होकर यहाँ विलाप कर रही हैं। इनके उद्धारका कार्य मुझे किस प्रकार करना चाहिए?” इस प्रकार विचार करते हुए रुद्रकुमार विघ्नराजने राजाके शरीरमें प्रवेश किया। उनके आवेशसे

English

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अध्याय ४

श्लोक 50

चतुर्थो जलमध्यस्था शेते पन्नगतल्पगा ।रजस्तस्या गुणः सर्गं सा करोति सदैव हि

caturtho jalamadhyasthā śete pannagatalpagā / rajastasyā guṇaḥ sargaṃ sā karoti sadaiva hi

हिन्दी अर्थ

युक्त होनेपर राजाने क्रोधपूर्वक ये बात कही--“यह कौन पापाचारी मनुष्य है, जो कपड़ेकी गठरीमें अग्निको बाँध रहा है? बल और प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त मुझ राजाके उपस्थित रहते हुए आज कौन ऐसा पापी है, जो मेरे धनुषसे छूटकर सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करनेवाले बाणोंसे सर्वाड़में छिन्न-भिन्न होकर

English

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अध्याय ४

श्लोक 51

या तृतीया हरेर्मूर्तिः प्रजापालनतत्परा ।सा तु धर्मव्यवस्थानं करोति नियतं भुवि

yā tṛtīyā harermūrtiḥ prajāpālanatatparā / sā tu dharmavyavasthānaṃ karoti niyataṃ bhuvi

हिन्दी अर्थ

कभी न टूटनेवाली निद्रामें प्रवेश करना चाहता है?!

English

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अध्याय ४

श्लोक 52

प्रोद्धूतानसुरान् हन्ति धर्मविच्छित्तिकारिणः ।पाति देवान् सतश्चान्यान् धर्मरक्षापरायणान्

proddhūtānasurān hanti dharmavicchittikāriṇaḥ / pāti devān sataścānyān dharmarakṣāparāyaṇān

हिन्दी अर्थ

राजाकी यह बात सुनकर तपस्वी विश्वामित्र कुपित हो उठे। उनके मनमें क्रोधका उदय होते ही वे सम्पूर्ण विद्याएँ, जो स्त्रियोंके रूपमें रो रही थीं, क्षणभरमें अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर राजाने उन तपस्याके भण्डार महर्षि विश्वामित्रकी ओर दृष्टिपात किया तो वे बड़े भयभीत हुए और सहसा पीपलके

English

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अध्याय ४

श्लोक 53

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति जैमिने ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजत्यसौ

yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati jaimine / abhyutthānamadharmasya tadātmānaṃ sṛjatyasau

हिन्दी अर्थ

पत्तेकी भाँति थरथर काँपने लगे। इतनेमें विश्वामित्र बोल उठे--“ओ दुरात्मा! खड़ा तो रह।” तब राजाने विनयपूर्वक मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा

English

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अध्याय ४

श्लोक 54

भूत्वा पुरा वराहेण तुण्डेनापो निरस्य च ।एकया दंष्ट्रयोत्खाता नलिनीव वसुन्धरा

bhūtvā purā varāheṇa tuṇḍenāpo nirasya ca / ekayā daṃṣṭrayotkhātā nalinīva vasundharā

हिन्दी अर्थ

--“भगवन्! यह मेरा धर्म था। प्रभो! इसे आप मेरा अपराध न मानें। मुने! अपने धर्मकी रक्षामें लगे हुए मुझ राजापर आपको क्रोध नहीं करना चाहिए। धर्मज्ञ राजाको तो यह उचित ही है कि वह धर्मशास्त्रके अनुसार दान दे, रक्षा करे और धनुष उठाकर युद्ध करे।'

English

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अध्याय ४

श्लोक 55

कृत्वा नृसिंहरूपञ्च हिरण्यकशिपुर्हतः ।विप्रचित्तिमुखाश्चान्ये दानवा विनिपातिताः

kṛtvā nṛsiṃharūpañca hiraṇyakaśipurhataḥ / vipracittimukhāścānye dānavā vinipātitāḥ

हिन्दी अर्थ

विश्वामित्र बोले--'राजन! यदि तुम्हें अधर्मका डर है, तो शीघ्र बताओ-- किसको दान देना चाहिए? किनकी रक्षा करनी चाहिए और किनके साथ युद्ध

English

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अध्याय ४

श्लोक 56

वामनादींस्तथैवान्यान् न संख्यातुमिहोत्सहे ।अवताराश्च तस्येह माथुरः साम्प्रतं त्वयम्

vāmanādīṃstathaivānyān na saṃkhyātumihotsahe / avatārāśca tasyeha māthuraḥ sāmprataṃ tvayam

हिन्दी अर्थ

हरिश्रन्द्रने कहा--श्रेष्ठ ब्राह्मगोंको तथा जिनकी जीविका नष्ट हो गयी हो, ऐसा अन्य मनुष्योंको भी दान देना चाहिए। भयभीत प्राणियोंकी रक्षा करनी चाहिए और शत्रुओंके साथ सदा युद्ध करना चाहिए।

English

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अध्याय ४

श्लोक 57

इति सा सात्त्विकी मूर्तिरवतारान् करोति वै ।प्रद्युम्नेति च सा ख्याता रक्षाकर्मण्यवस्थिता

iti sā sāttvikī mūrtiravatārān karoti vai / pradyumneti ca sā khyātā rakṣākarmaṇyavasthitā

हिन्दी अर्थ

विश्वामित्र बोले--यदि तुम राजा हो और राज-धर्मको भलीभाँति जानते हो तो मैं प्रतिग्रहकी इच्छा रखनेवाला ब्राह्मण हूँ, मुझे इच्छानुसार दक्षिणा दो।

English

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अध्याय ४

श्लोक 58

देवत्वे ऽथ मनुष्यत्वे तिर्यग्योनौ च संस्थिता ।गृह्णाति तत्स्वभावं च वासुदेवेच्छया सदा

devatve 'tha manuṣyatve tiryagyonau ca saṃsthitā / gṛhṇāti tatsvabhāvaṃ ca vāsudevecchayā sadā

हिन्दी अर्थ

पक्षीगण कहते हैं--महर्षिकी यह बात सुनकर राजाने अपना नया जन्म हुआ माना और प्रसन्नचित्तसे कहा।

English

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अध्याय ४

श्लोक 59

इत्येतत् ते समाख्यातं कृतकृत्यो ऽपि यत्प्रभुः ।मानुषत्वं गतो विष्णुः शृणुष्वास्योत्तरं पुनः

ityetat te samākhyātaṃ kṛtakṛtyo 'pi yatprabhuḥ / mānuṣatvaṃ gato viṣṇuḥ śṛṇuṣvāsyottaraṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

हरिश्रन्द्र बोले--भगवन्! आपको मैं क्या दूँ, आप निःशड़क होकर कहिये। यदि कोई दुर्लभ-से-दुर्लभ वस्तु हो तो उसे भी दी हुई ही समझें।

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 4
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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