अध्याय ५
श्लोक 1
इति श्रीवामनपुराणे चतुर्थो ऽध्यायः ________________________________________________________________________ पुलस्त्य उवाच ।जटाधरं हरिर्द्दष्ट्वा क्रोधादारक्तलोचनम् ।तस्मात् स्थानादपाक्रम्य कुब्जाम्रे ऽन्तर्हितः स्थितः
iti śrīvāmanapurāṇe caturtho 'dhyāyaḥ ________________________________________________________________________ pulastya uvāca / jaṭādharaṃ harirddaṣṭvā krodhādāraktalocanam / tasmāt sthānādapākramya kubjāmre 'ntarhitaḥ sthitaḥ
हिन्दी अर्थ
फिर कया था? सभी दसों सूर्य इन्द्रको आगे कर मरुद्गणों तथा अग्नियोंके साथ भयसे दसों दिशाओंमें भाग गये। मुने! देवताओंके चले जानेपर प्रह्मद आदि हैत्य महेश्वरको प्रणामकर अज्ञलि बाँधकर खड़े हो गये। इसके बाद शंकर उस यज्ञमण्डपको तथा सभी देवासुरोंको दग्ध करनेके लिये क्रोधपूर्ण घोर दृष्टिसे देखने लगे। इधर दूसरे बीर महादेवको देखकर भयसे जहाँ-तहाँ छिप गये। कुछ लोग प्रणाम करने लगे, कुछ भाग गये और
English
Vlrabhadra when liberated by Hrslkesa went to Lord Sankara and reported his defeat through Vasudeva.