Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
101
अध्याय 101 / 232

Adhyaya 101

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अध्याय १०१

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे मार्कण्डेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम शततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १०१ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम् ।उत्तरे नर्मदाकूले यज्ञवाटस्य मध्यतः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe mārkaṇḍeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma śatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 101 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra tīrthaṃ paramaśobhanam / uttare narmadākūle yajñavāṭasya madhyataḥ

हिन्दी अर्थ

ततः स जनयामास भृतग्रामं प्रजापतिः। तस्यावक्तिजसस्तस्य यज्ञे लोकेषु तेजअसम् ॥

English

Chaste goddess Vak (Bd. P.).

अध्याय १०१

श्लोक 2

संकर्षणमिति ख्यातं पृथिव्यां पापनाशनम् ।तपश्चीर्णं पुरा राजन्बलभद्रेण तत्र वै

saṃkarṣaṇamiti khyātaṃ pṛthivyāṃ pāpanāśanam / tapaścīrṇaṃ purā rājanbalabhadreṇa tatra vai

हिन्दी अर्थ

सगुणात्तेजसो नित्यं आकाशे तमसि स्थितम् । तमसस्तेजसत्वाच्च सर्वभुतानि जज्षिरे यदा तस्मिन्नजायन्त काले पुत्रास्तु कमंजा:। आज्यस्थाल्यामुपादाय स्वशुक्र हुतवांश्व ह ३५

English

Bd. P. (ibid. v. 120) reads Prabhuh for Prajah hereof. It means 'When the holy Lord got enraged at the over-bearing speech for his daughters'.

अध्याय १०१

श्लोक 3

गीर्वाणा अपि तत्रैव संनिधौ नृपनन्दन ।उमया सहितः शम्भुः स्थितस्तत्रैव केशवः

gīrvāṇā api tatraiva saṃnidhau nṛpanandana / umayā sahitaḥ śambhuḥ sthitastatraiva keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

हुते चाग्नो सकृच्छुक्के ज्वालाया निःसृुतः कवि: । हिरण्यगर्भस्तं दृष्ट्वा ज्वालां भित्त्वा विनिःसृतम् भृगुस्त्वमिति होवाच यस्मात्तस्मात्स वे भृगुः

English

HaScekasa is obscure. Bd. P. reads hasye kaSir hi vijiieyo 'The word KaSi should be understood in the sense of humour'.

अध्याय १०१

श्लोक 4

बलभद्रेण राजेन्द्र प्राणिनाम् उपकारतः ।स्थापितः परया भक्त्या शङ्करः पापनाशनः

balabhadreṇa rājendra prāṇinām upakārataḥ / sthāpitaḥ parayā bhaktyā śaṅkaraḥ pāpanāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

महादेवस्तथोद्भतं दृष्ट्वा ब्रह्माणमब्रवीत् । मसैष पुत्रकामस्य दीक्षितस्य त्वयं प्रभो: ॥ विजज्ञे5थ भ्ृृगुर्देवो मम पुत्रों भवत्वयम् ३८

English

A funny derivation. The sage Kasyapa is so designated as he was a

अध्याय १०१

श्लोक 5

यस्तत्र स्नाति वै भक्त्या जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।एकादश्यां सिते पक्षे मधुना स्नापयेच्छिवम्

yastatra snāti vai bhaktyā jitakrodho jitendriyaḥ / ekādaśyāṃ site pakṣe madhunā snāpayecchivam

हिन्दी अर्थ

सब स्त्रियों को देख कर स्वयम्भू ब्रह्मा जी का वी पृथ्वी पर स्खलित हो गया । ब्रह्मषि के भाव से प्रभावित निद्चिचत विधान के कारण पितामह ने प्रथ्वी पर स्खलित अपने बीये को घृत की भाँति ख्ुवा पर रख कर भन्‍्त्रों का विधिवत् उच्चारण कर हवन कर दिया। प्रजापति ते इस प्रकार अनेक जीव-समूहों की सृष्टि की । लोक में परम तेजोमय, किस्तु पृथ्वी पर गिर पड़ने के कारण कुछ क्षीण तेज वाले उस वीर्य से सत्तव गुण,

English

He who knows this holy creation of Rsis through Varuna becomes long-lived and meritorious. He becomes Puri¬ fied and attains excellent happiness. By listening to this and retaining this (in memory) he becomes free from all sins.

अध्याय १०१

श्लोक 6

श्राद्धं तत्रैव यो भक्त्या पित्ःणामथ दापयेत् ।स याति परमं स्थानं बलभद्रवचो यथा

śrāddhaṃ tatraiva yo bhaktyā pitḥṇāmatha dāpayet / sa yāti paramaṃ sthānaṃ balabhadravaco yathā

हिन्दी अर्थ

रजोगुण एवं तमोगुणमय सृष्टि डत्पन्न हुई। इन उपयुक्त तीनों गुणों से सम्पन्न वह तेज आकाश-मण्डल में देदीप्यमान हुआ । तमोगुणमय तेजस्विता के कारण सभी जीवसमूह उत्पन्न हुए ।३१०१४॥ जिस समय ब्रह्मा ने घत के पात्र में अपने वीये को लेकर अग्ति में हवन किया उस समय उनके कर्मज पुत्रों की उत्पत्ति हुई । अग्नि में वीयें के हवन कर देने पर महृषियों का प्रादुर्भाव हुआ, सातों ऋषियों के शरीर उज्ज्वल एवं देदीप्यमान थे, तथा बालकों के सभी गुण उनमें पाये जाते थे पहली बार अग्नि में बीये के हवन करते पर लपटों से कवि (भूगु) निकले । इस प्रकार ज्वाला का भेदन कर निकलते हुये कवि को देखकर हिरण्यगर्भ बक्ला ने कहा, यतः अग्नि ज्वाला से प्रकट होते समय तुमने 'भूगु' इस प्रकार का उच्चारण किया है, अतः तुम्हारा नाम भी भूगु हुआ ।३५-३७। इस प्रकार अग्नि ज्वाला का भेदत कर प्रादुभूत होने वाले उस ब्रह्मरषि

English

Then all the sages spoke to Romaharsaria: "When the sixth Prajasarga (creation of the subjects) of Caksusa Manu had been dissolved, the creation of Vaivasvata Manu began to function (How did it take place?)."

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 101
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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