Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
138
अध्याय 138 / 232

Adhyaya 138

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अध्याय १३८

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कर्कटेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तत्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १३८ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत् पाण्डुपुत्र शक्रतीर्थम् अनुत्तमम् ।यत्र सिद्धो महाभागो देवराजः शतक्रतुः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe karkaṭeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptatriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 138 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchet pāṇḍuputra śakratīrtham anuttamam / yatra siddho mahābhāgo devarājaḥ śatakratuḥ

हिन्दी अर्थ

(जैसा कि-ऊपर भी कई बार कहू; चुके हैं). चार-मूतिधारी-है, और तीन ,अमुर्त हैं। देवगृण् प्रत्येक यत्न से सत्कारपुवंक उन सब का श्राद्ध करते हैं ।(४-६०। इच्द्रः समेत वे समस्त देवंगण,इन -पितरों में मन्-लगाकर।॥ हाथ जोड़कर् - उनके श्राद्धांदि कार्य सम्पन्न करते हैं। इनके साथ समस्त विश्वेदेवगण, सिकता, पृश्निज़, श्द्धिन, कृष्ण, ब्वेत, अज आदि .भी इन. पितरों को- विधिवतु,पूज़ा . करते हैं.। :वातरशक, -दिवाकीत्य नामक

English

After bowing to all the Pitrs who bestow welfare on Manu and other lords of Suras and on the sun and the moon, I bow down with palms joined in reverence to Pitamahas, the progenitors of the constellations, the mobile (and the immobile beings) and of the heaven and the earth.

अध्याय १३८

श्लोक 2

गौतमेन पुरा शप्तं ज्ञात्वा देवाः सुरेश्वरम् ।ब्रह्माद्या देवताः सर्व ऋषयश्च तपोधनाः

gautamena purā śaptaṃ jñātvā devāḥ sureśvaram / brahmādyā devatāḥ sarva ṛṣayaśca tapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजायें; लेख, मरुत,, ब्रह्मा आदि देवगण, अन्रि भृगु अंगिरा आदि सम्रस्त ऋषिगण, यक्ष, नाम सुपर, किन्नर.एवं दाक्षस, ये सभी शुभ फल प्राप्ति: के इच्छुक होकर नित्य ही इन पितरों क़ी पूजा.करते हैं।६१:६७। श्राद्धाद्वि में एवमेते महात्मानः श्राद्धे सत्कृत्य पुजिताः । सर्वान्कासान्प्रयच्छन्ति शतशो5थ सहत्नशः ७४६५ हित्वा त्रेलोक्यसंसारं जरामृत्युभयं तथा। मोक्ष योगमर्थेश्च्य प्रयचछन्ति पितामहाः १६६ मोक्षोपायमर्थश्वर्य सुक्ष्मदेहाश्व॒ देवता: । कृत्स्नं वेराग्यमानन्त्यं प्रथच्छच्ति पितामहा: १६७ ऐश्वर्य विहित॑ं योगमैश्वर्य वित्तमुत्तमम् । यौगेश्वर्यादृते मोक्षः कर्थ विच्नोपपद्यते

English

With palms joined in reverence I bow down to those who bestow fearlessness, to those who are revered by all the worlds and to the progenitors of the divine sages.

अध्याय १३८

श्लोक 3

गौतमं प्रार्थयामासुर् वाक्यैः सानुनयैः शुभैः ।गतराज्यं गतश्रीकं शक्रं प्रति मुनीश्वर

gautamaṃ prārthayāmāsur vākyaiḥ sānunayaiḥ śubhaiḥ / gatarājyaṃ gataśrīkaṃ śakraṃ prati munīśvara

हिन्दी अर्थ

अपक्षस्थेव गमन गमने पक्षिणो यथा । वरिष्ठः सर्वधर्माणां मोक्षधर्मं: सनातनः ६६ विमानायां सहल्लाणि युक्तान्यप्सरसां गणेः। सर्वकामप्रसिद्धानि प्रथच्छन्ति पितामहाः १७० प्रज्ञा पुष्टि: स्कृतिमेंधा राज्यमारोग्यमेव च । पितृणां हि प्रसादेन आ्रप्यते धुमहात्मनाम्

English

With palms joined in reverence, I bow down to Praja- pati, Kasyapa, Soma, Varuna and to the lords of all Yoga.

अध्याय १३८

श्लोक 4

इन्द्रेन रहितं राज्यं न कश्चित् कामयेद् द्विज ।देवो वा मानवो वापि एतत्ते विदितं प्रभो

indrena rahitaṃ rājyaṃ na kaścit kāmayed dvija / devo vā mānavo vāpi etatte viditaṃ prabho

हिन्दी अर्थ

मुक्तावेदूयबासांसि वाजिनागायुतानि च । कोटिशश्रवापि रत्नानि प्रयच्छन्ति पितामहाः इति श्री महापुराणे वायुप्रोक्ते उपोद्धातपादे श्राद्धकल्पो नाम त्रिसप्ततितमोथ्ध्याय:

English

Obeisance to the seven groups of Pitrs in the seven worlds. Obeisance to the self-born Brahma of Yogic vision."

अध्याय १३८

श्लोक 5

तस्य त्वं भगयुक्तस्य दयां कुरु द्विजोत्तम ।गतश्चादर्शनं शक्रो दूषितः स्वेन पाप्मना

tasya tvaṃ bhagayuktasya dayāṃ kuru dvijottama / gataścādarśanaṃ śakro dūṣitaḥ svena pāpmanā

हिन्दी अर्थ

3.33... नरननिनननिना---निनानडिया-+- “० नितत। भा का (पक लीतण।णखणज /४४/+४४४+///४////"अअ्एऑआऑलक्‍ए

English

Thus the Mantra honoured by the groups of Brahmar-?is along with the Seven Sages has been mentioned. It is highly holy and sanctified. It is conducive to prosperity and destruc¬ tive of Raksasas.

अध्याय १३८

श्लोक 6

देवानां वचनं श्रुत्वा गौतमो वेदवित्तमः ।तथेति कृत्वा शक्रस्य वरं दातुं प्रचक्रमे

devānāṃ vacanaṃ śrutvā gautamo vedavittamaḥ / tatheti kṛtvā śakrasya varaṃ dātuṃ pracakrame

हिन्दी अर्थ

सत्कारपूर्वक पूजित ये महात्मा पितर गण सेकड़ों सहस्नों की संख्या में मनुष्य के समस्त मनोरथों को पूर्ण करते हैं । तीनों लोक, संसार, वृद्धावस्था एवं पृत्यु के भय को छोड़कर पतामह-गण मोक्ष, योग-प्राप्ति एवं प्रचुर ऐदवर्य--इन सब को प्रदान करते हैं। सूक्ष्म शरीरधारी ये पितामहनामक देवगण (पितरगण) मोक्ष को प्राप्त करने योग्य ऐद्वर्य, समस्त जागतिक बस्तुओं से उत्पन्न होनेवाल अनन्त वराग्य को प्रदान करते हैं । अनुष्ठित (किया हुआ) योग ही ऐश्वर्य है, सर्वश्रेष्ठ सम्पत्ति भी एश्वय है । योग एवं ऐश्वयं के विना मोक्ष की प्राप्ति किसी प्रकार भी सम्भव नहीं ।६५-६८। जिस प्रकार विनाप॑ खे के आकाश में पक्षियों का उड़ना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार योग एव ऐश्वर्य के बिना मोक्ष की प्राप्ति भी सम्भव नहीं है । सभी धर्मों में मोक्ष का साधनभूत धर्म ही सर्वश्रेष्ठ और सबंदा विद्यमान रहने बाला है। ये पितामहगण अप्सराओं के समूहों से

English

The man who (performs Sraddha) according to these injunctions attains three boons. Pitrs grant food, longevity and childern (to the people) on the earth.

अध्याय १३८

श्लोक 7

एतद्भगसहस्रं तु पुरा जातं शतक्रतो ।तल्लोचनसहस्रं तु मत्प्रसादाद् भविष्यति

etadbhagasahasraṃ tu purā jātaṃ śatakrato / tallocanasahasraṃ tu matprasādād bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

घिरे हुये ऐसे सहस्रों विमानों को प्रदान करते हैं, जो समस्त मनोरथों को पूर्ण करते हैं। महात्मामण, बुद्धि, पुष्टि, स्मरण शक्ति, मेधा (घारणाशक्ति) राज्य, आरोग्य इन सब को पितरों के आशोर्वाद से प्राप्त करते हैं। पितामहगण मुक्ता, वबैदूये, विविध वस्त्र सहस्रों अश्व. नाग, करोड़ों रत्न, आदि भी प्रदान करते हैं। ये पितामह (पितर) गण हंस और वहियों से युक्त, मुक्ता और बेदूयं से समन्वित, किकिणी क्रे जालों से गुथे हुये

English

He who is endowed with great devotion, who has faith, who has controlled his senses and who always repeals this Sap¬ tarcis Mantra with purity, becomes the sole Emperor on the earth consisting of seven continents and oceans.

अध्याय १३८

श्लोक 8

एवमुक्तः सहस्राक्षः प्रणम्य मुनिसत्तमम् ।ब्राह्मणांस् तान् महाभागान् नर्मदां प्रत्यगात् ततः

evamuktaḥ sahasrākṣaḥ praṇamya munisattamam / brāhmaṇāṃs tān mahābhāgān narmadāṃ pratyagāt tataḥ

हिन्दी अर्थ

सबंदा पृष्प और फलों से संयुक्त, (रथ को) प्रसन्न होकर नित्य प्रदान करते हैं श्रीबायुमहापुराथ में उपोद्धात में श्राद्धकल्पनामक तिहृत्तरवाँ अध्याय समाप्त

English

If any thing is cooked in the house, whether a dainty or ordinary eatable, it should never be eaten in that house with¬ out first offering it (to deities).

अध्याय १३८

श्लोक 9

स्नात्वा स विमले तोये संस्थाप्य त्रिपुरान्तकम् ।जगाम त्रिदशावासं पूज्यमानो ऽप्सरोगणैः

snātvā sa vimale toye saṃsthāpya tripurāntakam / jagāma tridaśāvāsaṃ pūjyamāno 'psarogaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

९७४ --तायुपुराणम्

English

Henceforth, I shall describe in the proper order, the vessels intended for oblations to Pitrs. Even as I mention listen These seven verses 21-27 are called 'Saptarcis Mantra Gf. Bd. 3.11

अध्याय १३८

श्लोक 10

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम् ।परदाराभिगमनान् मुच्यते पातकान् नरः

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram / paradārābhigamanān mucyate pātakān naraḥ

हिन्दी अर्थ

काच्चनं राजतं ताम्नं दौहित्रं कुतपस्तिला: । घस्रं च पावनीयानि त्रिदण्डी योग एव च ग्रहस्पति ने कहाः-- सुवर्ण, चाँदी, ओर तांबे के निर्मित पात्न पितरों के लिये कहे गये हैं, चाँदी अथवा चाँदी से मढ़ा हुआ पात्र भौ पितरों के लिये कहा गया है। चाँदी का दान, अभाव में उसका देन अथवा उसका नाम ले लेना भी पितरों को अनन्त अक्षय एवं स्वर्ग देनेवाला दान कहा जाता है। योग्य पुत्रगण इस चांदी के दान से अपने पितरों को तारते हैं ।१-२। है तात ! प्राचीनकाल में स्वधा देनेवाले फ्तिरो ने

English

As against Hemadri our text calls this 'saptarcis' Mantra.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 138
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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