Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
48
अध्याय 48 / 232

Adhyaya 48

90 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ90 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ४८

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे गीर्वाणस्वर्गमनवर्णनं नाम सप्तचत्वारिंशो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ४८ उत्तानपाद उवाच: कस्मिन्स्थाने ऽवसद् देव सो ऽन्धको दैत्यपुंगवः ।सर्वान्देवांश्च निर्जित्य कस्मिन्स्थाने समास्थितः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe gīrvāṇasvargamanavarṇanaṃ nāma saptacatvāriṃśo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 48 uttānapāda uvāca: kasminsthāne 'vasad deva so 'ndhako daityapuṃgavaḥ / sarvāndevāṃśca nirjitya kasminsthāne samāsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

असौ देव: सुरश्रेष्ठो ब्रह्म ववस्‍्वतों मुखः

English

In the many long and wide caves, and crevasses of that mountain there are many prosperous jolly men and women of various shapes and features. In the many spacious and long and wide cavities (valleys?) are established hundreds and thousands of cities built into the mountain. These houses are joined to one another and have only a door each.

अध्याय ४८

श्लोक 2

श्रीमहेश उवाच: प्रविष्टो दानवो यत्र कथयामि नराधिप ।पाताललोकमाश्रित्य कन्या विध्वंसते तु सः

śrīmaheśa uvāca: praviṣṭo dānavo yatra kathayāmi narādhipa / pātālalokamāśritya kanyā vidhvaṃsate tu saḥ

हिन्दी अर्थ

से फिर दूसरे भी उत्पन्न हुए देवों के बीच जो चौदह महात्मा देवता हैं, उनके भी मध्य जो सबको पाने वाले, सभी जगह जाने वाले और सब योगों को जानने वाले हैं, वे ही लोकोंपर अनुग्रह करने के लिये ओंकार के आदि, मध्य और अन्त कहे जाते हैं ।३-४। सप्तषि गण, इन्द्र और पितरों के साथ देव गण आदि कअक्षर- स्वरूप देव-देव महादेव से उत्पन्न हुए हैं। इस लोक ओर परलोक में कल्याण के लिये ओंकार परम पद कहा गया है। मैंने पहले ही कहा है कि, काल का नाम युग भी है ।५-६। कृत, त्रेता, द्वापर और क्जियुग के साथ युग आदि चक्रकी तरह नोचे-ऊपर घूमते रहते है। देव गण तब काल के वशीभूत होकर व्यग्न हो गये और स्वयं उसकी इयतता (सीमा) परिमाण को निर्धारित करने में असमर्थ हो गये ७-७। आदि मन्वन्तर में वे ऋषि, देवता और इन्द्र आदि मोनावलम्बन क्र हजारों वर्ष पयनत चंचल मन को एक्राग्र करके कठित

English

The subjects thereof have long beards and moustache. They are black and shining like clouds. They have the maximum life span of eighty years.

अध्याय ४८

श्लोक 3

तत्र स्थितं तं विज्ञाय चापमादाय केशवः ।व्यसृजद्बाणमाग्नेयं दह्यतामिति चिन्तयन्

tatra sthitaṃ taṃ vijñāya cāpamādāya keśavaḥ / vyasṛjadbāṇamāgneyaṃ dahyatāmiti cintayan

हिन्दी अर्थ

तपस्या करने लगे। तब काल से डरे हुए वे देवादि महादेव की शरण में महुंचे ।६-१०। वे बोले--महेश्वर ! महादेव ! इस चार मुँह और मूर्ति धारण करने वाले देवेश अग्राध काल का पार कौन पा सकता है ? महादेव जी ने उस नतुर्मंख काल को देखा और कहा--डर्ते की कोई बात नहीं है। कहिये आपकी क्रिस अभिलाषा को पूर्ण कहूँ ? ।११-१२। आप के सब काये हो जायेगें, आप का यह परिश्रम व्यथे है । फिर स्वयं काल

English

They cat fruits and roots and live like monkeys. Like cattle, they follow promiscuous, unconcealed sexual habits. They are devoid of bodily and mental purity and they have no fixed rules or conventions.

अध्याय ४८

श्लोक 4

दह्यमानो ऽग्निना सो ऽपि वारुणास्त्रं स संदधे ।वारुणास्त्रेण महता आग्नेयं शमितं तदा

dahyamāno 'gninā so 'pi vāruṇāstraṃ sa saṃdadhe / vāruṇāstreṇa mahatā āgneyaṃ śamitaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

स्वरूप अजेय महादेव जी बोले--काल का जो यह चार जिद्ऑावाला रवेत मुख दीख पड़ता है, वह काल का कृतयुग नामक मुख है और यही मुख देवश्रेष्ठ ब्रह्मा और वेवस्वत भी कहलाता है १३-१४ ब्राह्मणो । यह अत्र यज्ञप्रवत्तिस्तु जायते हि महेश्वरात् । ततोत्र इज्यते यज्ञस्तिस्रो जिह्दास्त्रयो5्नयः ॥

English

That continent is full of worthless men. Similarly other countries and islets shall be known in due order.

अध्याय ४८

श्लोक 5

ततो ऽसौ चिन्तयामास केन बाणो विसर्जितः ।कस्यैषा पौरुषी शक्तिः को यास्यति यमालयम्

tato 'sau cintayāmāsa kena bāṇo visarjitaḥ / kasyaiṣā pauruṣī śaktiḥ ko yāsyati yamālayam

हिन्दी अर्थ

दृष्टवा चैआग्नयों विप्रा: कालजिद्धा प्रवर्तते क्‍

English

The groups of islands known as Peacock islands are extending to twenty, thirty, fifty, sixty, eighty and hundred Yojanas. Theie are a few, extending to a thousand Yojanas. They are long, wide and full of various living beings. Besides Jambu-dvipa there are six islands. These islands are amous over the earth for their mines of gems and precious stones T y are known as Ahga, Yama, Malaya, Sankha.Kusa and \ araha

अध्याय ४८

श्लोक 6

ततो ऽन्धको मृधे क्रुद्धो बाणमार्गेण निर्गतः ।स दृष्ट्वा बाणमार्गेण चापहस्तं जनार्दनम्

tato 'ndhako mṛdhe kruddho bāṇamārgeṇa nirgataḥ / sa dṛṣṭvā bāṇamārgeṇa cāpahastaṃ janārdanam

हिन्दी अर्थ

ततः कलियुग घोर स्वंजोकभयंकरम् । कल्पस्य तु मुख हां तच्चतुर्थ नाम भीषणम् ११६ न सुख नापि निर्वाणं तस्मिन्भवति वे युगे। कालग्रस्ता प्रजा चापि युगे तस्मिन्भविष्यति ब्रह्मा कृतयुगे पुज्यस्त्रेतायां यज्ञ उच्यते । द्वापरे पूज्यते विष्णुरहं पूज्यश्चतुष्बंषि २१ ब्रह्म विष्णभश्व यज्ञश्न कालस्येव कलास्त्रयः । सर्वेष्वेव हि कालेषु चतुर्म तिमहेश्वरः २२ अडु जनो जनयथिता वः कालः कालप्रवर्तकः । युगकर्ता तथा चेब पर परपरायण:

English

The Vidyutvan mountain is obviously the Arakan Yom ® ofBu p The islands dotting the Arakan coast are ment.oned m vv. 11-12-AGr

अध्याय ४८

श्लोक 7

अन्धक उवाच: न शर्म लप्स्यसे ह्यद्य मया दृष्ट्याभिवीक्षितः ।न शक्नोषि तथा गन्तुं नागः शार्दूलदर्शनात्

andhaka uvāca: na śarma lapsyase hyadya mayā dṛṣṭyābhivīkṣitaḥ / na śaknoṣi tathā gantuṃ nāgaḥ śārdūladarśanāt

हिन्दी अर्थ

तस्मात्कलियुएं प्राप्य लोकानां हितकारणात् । अभयार्थ च देवानामुभयोलोॉकियो रपि ३२४ तदा भवश्च पज्यश्च भविष्यामि सुरोत्तमाः । तस्माजूय॑ न कार्य च कॉलि प्राप्प महोजसः १२५ एवमुक्तास्ततः सर्वा देवता ऋषिभिः सह । प्रणम्य शिरसा देख पुनरूचज गत्पतिम् ७२६

English

These are the lands around India.

अध्याय ४८

श्लोक 8

आगच्छति यथा भक्ष्यं मार्जारस्य च मूषिकः ।न शक्नोषि तथा यातुं संस्थितस् त्वं ममाग्रतः

āgacchati yathā bhakṣyaṃ mārjārasya ca mūṣikaḥ / na śaknoṣi tathā yātuṃ saṃsthitas tvaṃ mamāgrataḥ

हिन्दी अर्थ

जो लाल रंग का, लपलपाती तीन जिह्ना वाला दूसरा मुख कहा गया है, वह त्रेता युग है। इस युग में महादेव के द्वारा ही यज्ञ करने में लोगों की प्रवृत्ति होती है। इनसे ही यज्ञ का प्रारम्भ होता है। इस्हें तीन जिल्वाएँ हैं और तीन अग्नि ये ही अग्नि काल की जिह्वाएँ हैं ।१५-१६।! यह जो दो जिल्ा! वाला भयडूर लाल और पिज्रल वर्ण का मुख है, वह द्वापर नाम का युग है। इस युग में हम दो पर वाले होंगे। यह जो चौथा कले रज़ का एवं लाल आँखों वाला मुँह है, जिसमें काले रंग की एक मोटी जिह्ना बार-बार लपलपा रही है, वह सम्पूर्ण लोकों को भयत्रस्त करने वाला घोर कलियुग है। यह कल्पों का भीषण चोथा मुख है

English

Know ye that the Ahga Dvlpa 1 comprises islands, and many people of the Mleccha tribes live there. That continent is very large.

अध्याय ४८

श्लोक 9

अहं त्वां प्रेषयिष्यामि यममार्गे सुदारुणे ।अहमन्वेषयिष्यामि किल यास्यामि ते गृहम्

ahaṃ tvāṃ preṣayiṣyāmi yamamārge sudāruṇe / ahamanveṣayiṣyāmi kila yāsyāmi te gṛham

हिन्दी अर्थ

इस युग में न सुख है और न मुक्ति एवं प्रजाजन भी इस युग में काल से ग्रस्त होकर रहेंगे। कृतयुग में ब्रह्मा पूजित होते हैं, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में विष्णु और मैं चारों युगों में पूर्जित रहता हूँ । ब्रह्मा, विष्णु और यज्ञ ये काल की तीन कलाएँ या अंश हैं; किन्‍्तु चार मूरति वाले महेश्वर सभी कालों में हैं ।२०-२२। मैं ही जन हूँ और आप लोगों का उत्पादक भी मैं हूँ । मैं ही काल हूँ और काल का प्रवतंक भी । मैं ही युगों का

English

There are mines of gems, corals and gold in that land here. It is variegated with rivers, mountains and forests. It resembles ill'* vast expanse of the briny sea.

अध्याय ४८

श्लोक 10

उपनीतो ऽसि कालेन सङ्ग्रामे मम केशव ।ये त्वया निर्जिताः पूर्वं दानवा अप्यनेकशः

upanīto 'si kālena saṅgrāme mama keśava / ye tvayā nirjitāḥ pūrvaṃ dānavā apyanekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

करने वाला, परम एवं श्रेष्ठ हैँ ।२३॥ इसलिये कलि युग के आने पर सांसारिकों के कल्याण के लिये और देवों को अभय देने के लिये मैं दोनों लोकों में मंगलकारक और पुजनीय रहेगा । है महाबली देवगण ! आप लोग कलियुग को देखकर मत डरें । ऋषियों के साथ उन देवगणों से जब महादेव ने इस प्रकार कहा, तब उन लोगों ने सिर नवाकर महादेव को प्रणाम किया और कहा महातेजा महाकायो महावीरयों महाद्युतिः। भीषणः सबंभुतानां कथं कालश्रतु्म् खः २७

English

What is called Yamadvlpa 2 is also full of mines of gems. There is a mountain called Dyutiman, embellished with minerals and is the source of many rivers and gold (mines).

अध्याय ४८

श्लोक 11

न भवन्ति पुमांसस्ते स्त्रियस्ताश् चैव केशव ।परं न शस्त्रसङ्ग्रामं करिष्यामि त्वया सह

na bhavanti pumāṃsaste striyastāś caiva keśava / paraṃ na śastrasaṅgrāmaṃ kariṣyāmi tvayā saha

हिन्दी अर्थ

एष कालश्चतुमूं तिश्चतुर्द॒ष्ट्श्चतुमुंखः । लोकसंरक्षणार्थाय अतिक्रामति सबंशः २८ नासाध्यं विद्यते चास्प सर्वस्मिन्सचराचरे काल: सृजति भृतानि पुनः संहरति क्रमात् ॥

English

' Similarly, the Malaya Dvlpa 3 is also surrounded by the ocean. It is the source of gems, jewels and gold. It is very prosperous. It is the place of origin of sandalwood and is surrounded by gulfs (lit. seas). Many kinds of Mleccha tribes live there. There are many rivers and mountains.

अध्याय ४८

श्लोक 12

वदतो दानवेन्द्रस्य न चुकोप स केशवः ।अयुध्यमानं तं दृष्ट्वा चिन्तयामास दानवः

vadato dānavendrasya na cukopa sa keśavaḥ / ayudhyamānaṃ taṃ dṛṣṭvā cintayāmāsa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद्वशे। तस्मात्तु सर्वभुतानि कालः कलयते सदा ३० एक पद परिक्रम्य पदानामेकसप्तति: । यदा कालः प्रक़मते तदा मन्वन्लरक्षयः ३२ एवमुक्‍त्वा तु भगवान्देवषिपितृदानवान् । नमस्कृतश्च तेः सर्वेस्तत्रवान्लरभधीयत ॥३ रे एवं स कालो भगवान्देवधिपितृदानवान् । पुनः पुनः संहरते सृजते च पुनः पुनः ३३४ अतो मन्वन्तरे चेव देवषिपितृदानबे: । पृज्यते भगवानीशों भयात्कालस्य तस्य वे

English

The glorious mountain Malaya is the source of origin of silver. This excellent moutain is famous as Mahamalaya.

अध्याय ४८

श्लोक 13

द्वन्द्वयुद्धं करिष्यामि निश्चित्य युयुधे नृप ।स कृष्णेन पदाक्षिप्तः पतितः पृथिवीतले

dvandvayuddhaṃ kariṣyāmi niścitya yuyudhe nṛpa / sa kṛṣṇena padākṣiptaḥ patitaḥ pṛthivītale

हिन्दी अर्थ

तस्मात्सवंप्रयत्नेन कलो कुर्यात्तपो द्विजा: । प्रपन्नस्य महादेव तस्य पुण्यफल महत् ॥

English

It is known as the second Mandara mountain. The abode of Agastya, bowed to by Devas and Asuras, is also there.

अध्याय ४८

श्लोक 14

मुहूर्तात्स समाश्वस्य उत्थायेदं व्यचिन्तयत् ।अशक्तो द्वन्द्वयुद्धाय ततः साम प्रयुक्तवान् ।पाणिभ्यां सम्पुटं कृत्वा साष्टाङ्गं प्रणतः शुचिः

muhūrtātsa samāśvasya utthāyedaṃ vyacintayat / aśakto dvandvayuddhāya tataḥ sāma prayuktavān / pāṇibhyāṃ sampuṭaṃ kṛtvā sāṣṭāṅgaṃ praṇataḥ śuciḥ

हिन्दी अर्थ

और सब जीवों के लिये भयंकर काल चार मुख वाले कंसे हुए महादेव जी बोलें--ये काल चार मुँह वाले, चार दाँत वाले और चार मूर्ति वाले हैं। संसार की रक्षा के लिये ये सब का अतिक्रमण कर जाते हैं अर्थात् किसी की अपेक्षा नहीं करते हैं ।२८। इस चराचरमय संसार में इनके लिये असाध्य कुछ नहीं हैं! काल की सृष्टि करते है और फिर क्रम सै उनका संहार भी कर डालते हैं।२६। सभी काल के वह्ष में हैं; किन्तु काल किसी के भी वश में नहीं हैं । इसलिये काल ही

English

There is another mountain Kancanapada which is a second Malaya. There are many hermitages there, resorted to by pious persons and full of hedges of grass and Soma plants. It abounds in flowers and fruits of all kinds. It excels even the heaven. On festive occasions, on all Parvan days, heaven descends to that place.

अध्याय ४८

श्लोक 15

अन्धक उवाच: जय कृष्णाय हरये विष्णवे जिष्णवे नमः ।हृषीकेश जगद्धात्रे अच्युताय महात्मने

andhaka uvāca: jaya kṛṣṇāya haraye viṣṇave jiṣṇave namaḥ / hṛṣīkeśa jagaddhātre acyutāya mahātmane

हिन्दी अर्थ

सभी जीवों का संकलन (शासन) करते हैं। पहले कहे गये इक्करीस युग काल का एक डम हैं। घूमने वाले युगों के क्रम से वे ही मन्वन्तर कहलाते हैं। एक-एक पर चलकर जब काल इक्कौस डग रखते हैं, तब मन्वम्तर का क्षय होता है ।३०-३२। शंकर ने इस प्रकार देवता, ऋषि, पितर और दानवों से कहा यह सुनकर प्रसन्न हो श्रोताओं ने भगवान् को नमस्कार किया तब भगवान् वहीं अन्तहित हो गये ।३३। भगवान् काल

English

There is a great city Lanka on the beautiful ridge and peak of the mountain Trikuta decorated with different

अध्याय ४८

श्लोक 16

नमः पङ्कजनाभाय नमः पङ्कजमालिने ।जनार्दनाय श्रीशाय श्रीपते पीतवाससे

namaḥ paṅkajanābhāya namaḥ paṅkajamāline / janārdanāya śrīśāya śrīpate pītavāsase

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार देवता ऋषि, पितर और दानवों का बार-बार सृजन और संहार करते हैं। इसीलिये भगवान् ईश प्रति मन्वन्तर में काल के भय से डरे हुये देवता, ऋषि, पितर और दानवों से पूजित होते हैं ।३४-३५॥। ब्राह्मणो ! इसलिये कलियुग में खूब यत्नपूर्वक तपस्या करनी चाहिए। जो तपस्या द्वारा महादेव को प्राप्त ऋषधश्चेव देवाश्च कॉलि प्राप्य सुदारणम् । तप इच्छन्ति भूयिष्ठं कतु धर्मपरायणाः ॥

English

Verses 16-18 describe Anga-dvipa. Ali identifies it with the Malaya Peninsula due to pointers such as Mleccha population, gold, corals (AGP

अध्याय ४८

श्लोक 17

गोविन्दाय नमो नित्यं नमो जलधिशायिने ।नमः करालवक्त्राय नरसिंहाय नादिने

govindāya namo nityaṃ namo jaladhiśāyine / namaḥ karālavaktrāya narasiṃhāya nādine

हिन्दी अर्थ

अवतारान्कलि प्राप्य करोति च पुनः पुनः १३३७ एवं कालान्तरे सर्वे येइतीता वे सहल्नशः । वेबस्व॒तेउन्तरे तस्मिन्देवराजबेयस्तथा ॥रे८ देवापिः पौरवो राजा मनुश्चेक्वाकुवंशजाः । महायोगबलोपेताः कालान्तरमुपासते

English

M. Ali identifies it with the southernmost peninsular India—AGP 179-180.

अध्याय ४८

श्लोक 18

शार्ङ्गिणे सितवर्णाय शङ्खचक्रगदाभृते ।नमो वामनरूपाय यज्ञरूपाय ते नमः

śārṅgiṇe sitavarṇāya śaṅkhacakragadābhṛte / namo vāmanarūpāya yajñarūpāya te namaḥ

हिन्दी अर्थ

गोत्राणां क्षत्रियाणां च भविष्यास्ते प्रकीतिताः द द्ापरान्ते प्रतिष्ठन्ते क्षत्रिया ऋषिभिः सह । इते त्रेतायुगे चेब तथा क्षीणे च॒ द्वापरे ॥॥४ १ ब्रह्मक्षत्रस्य चोच्छेदा द्विजार्थाय कलो स्मृताः । एवमेतेषु सर्वेबु युगेषु क्रमशस्तथा ४२

English

It is the abode of noble Raksasas who can assume various forms as they please. Know that to be the habitation of the enemies of Devas, proud of their strength. Free from all harassments, this city is inaccessible to human beings.

अध्याय ४८

श्लोक 19

नमो वराहरूपाय क्रान्तलोकत्रयाय च ।व्याप्ताशेषदिगन्ताय केशवाय नमोनमः

namo varāharūpāya krāntalokatrayāya ca / vyāptāśeṣadigantāya keśavāya namonamaḥ

हिन्दी अर्थ

करता है, उसे महान् पुण्य प्राप्त होता है। इसलिये देव गण भी स्वर्ग जाकर प्रृथ्वी तल पर उतर आते हैं और कठोर कलिकाल को पाकर वे देव-ऋषि गण धर्मरत होकर अधिक तप करने की इच्छा करते हैं । कलियुम का जब-जब अवतार होता हैं, तब-तब वे ऐसा ही करते हैं ।३६-३७। इस प्रकार कालास्तर में अर्थात् वैवस्वत मन्त्रन्तर में जो सब हजारों की संख्या में देव राजधि आदि व्यतीत हो गये थे, वे सब तथा देवापि,

English

In that island, on the eastern shore of the sea there is Gokarna, the great shrine of Sankara.

अध्याय ४८

श्लोक 20

वासुदेव नमस्तुभ्यं नमः कैटभनाशिने ।लक्ष्म्यालय सुरश्रेष्ठ नमस्ते सुरनायक

vāsudeva namastubhyaṃ namaḥ kaiṭabhanāśine / lakṣmyālaya suraśreṣṭha namaste suranāyaka

हिन्दी अर्थ

पुरुवंशीय राजा, मनु और इक्ष्वाकु के कुल में उत्पन्न होने वाले महा योगबल से युक्त होकर दूसरे काल में जन्म ग्रहण करते हैं ।३८-३६। सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि के ( आगामी ) क्षीण हो जाने पर सप्तर्षियों के साथ फिर होने वाले त्रेता युग में वे ही होने वाले क्षत्रियों के वंशों के कारण कहे जाते हैं ।४०। क्ृत, त्रेता और द्वापर युग के क्षीण हो जाने पर अर्थात् द्वापर के अन्त में क्षत्रिय गण ऋषियों के साथ रहते हैं। ब्राह्मण- क्षत्रियों का जो विनाश होता है, वह कलियुग में द्विजादि के लाभ के लिये ही। इस प्रकार भी क्रमशः सभी युगों में सप्तषियों के साथ भावी सन्तान के लिये वे समय-समय पर उत्पन्न होते हैं। इस तरह द्विजों के लिये क्षत्रियों का विनाश होता है, जो पातकी मनुष्य हैंवे कलि युग में रहते हैं ।४१-४३। सप्त मन्वन्तरों की सन्‍्तानों के लिये श्रुति और स्मृति का निर्माण हुआ है। इसी प्रकार इन सब में युगों का विनाश होता रहता

English

Sankhadvlpa 1 is ruled as a single kingdom extending to a hundred Yojanas. It is the abode of many Mleccha tribes.

अध्याय ४८

श्लोक 21

विष्णोर्देवाधिदेवस्य प्रमाणं ये ऽपि कुर्वते ।प्रजापतेर्जगद्धातुस् तेषाम् अपि नमाम्यहम्

viṣṇordevādhidevasya pramāṇaṃ ye 'pi kurvate / prajāpaterjagaddhātus teṣām api namāmyaham

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिह्वान्तगंतग्रन्थः क. पुस्तके नास्ति। न इदमर्ध ख. ग. घ. ड. पुस्तकेषु नास्ति ।

English

The mountain Sankhagiri has the lustre of white conch- shell. It is sacred and is the source of many gems. It is resorted to by pious persons.

अध्याय ४८

श्लोक 22

समस्तभूतदेवस्य वासुदेवस्य धीमतः ।प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमाम्यहम्

samastabhūtadevasya vāsudevasya dhīmataḥ / praṇāmaṃ ye prakurvanti teṣāmapi namāmyaham

हिन्दी अर्थ

परस्पर युगानां च ब्रह्माक्षत्रस्य चोजू व: । यथा वे प्रकृतिस्तेभ्य: प्रवृत्तानां यथाक्षयम् । दिवंगतानहं तुम्यं कीर्तेथिष्ये निबोधत

English

From this mountain rises the holy river Sankhanaga. Sankhamukha, king of Nagas, has his abode there.

अध्याय ४८

श्लोक 23

तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः ।प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमाम्यहम्

tasya yajñavarāhasya viṣṇoramitatejasaḥ / praṇāmaṃ ye prakurvanti teṣāmapi namāmyaham

हिन्दी अर्थ

ऐडमिक्ष्वाकुबं शस्य प्रकृति परिचक्षते । राजानः श्रोणिबन्धास्तु तथाब्न्ये क्षत्रिया भुवि ४७

English

Similarly, the Kumudadvlpa 2 is brightened by varie¬ gated flowers. Full of many villages, it is the source of many gems and jewels.

अध्याय ४८

श्लोक 24

गुणानां हि निधानाय नमस्ते ऽस्तु पुनःपुनः ।कारुण्याम्बुनिधे देव सर्वभक्तिप्रियाय च

guṇānāṃ hi nidhānāya namaste 'stu punaḥpunaḥ / kāruṇyāmbunidhe deva sarvabhaktipriyāya ca

हिन्दी अर्थ

तावदेव तु भोजानां विस्तरो द्विगुणः स्मृतः । भोज तु त्रिशतं क्षत्र चतुर्धा तद्यथादिशम् तेष्वतीतास्तु राजानो ब्रुवतस्तान्निबोधत । शतं व प्रतिविन्ध्यानां हैहयानां तथा शतम् ३५० धातंराष्ट्रास्व्वेकशतमशीतिजंनमेजया: । श्ं वे ब्रह्मदत्तानां कुलानां वीथिणां शतम् .

English

There the blessed sister of Mahadeva, named Kumuda, the destroyer of evil persons, is worshipped by the people.

अध्याय ४८

श्लोक 25

श्रीभगवान् उवाच: तुष्टस्ते दानवेन्द्राहं वरं वृणु यथेप्सितम् ।ददामि ते वरं नूनमपि त्रैलोक्यदुर्लभम्

śrībhagavān uvāca: tuṣṭaste dānavendrāhaṃ varaṃ vṛṇu yathepsitam / dadāmi te varaṃ nūnamapi trailokyadurlabham

हिन्दी अर्थ

ततः शत तु पौलानां शतं काशिकुशादयः । तथा5पर॑ं सहद्न तु येइ्तीताः शशबिन्दवः ।

English

Similarly in the island called Varaha 3 *, there is a beautiful mountain known as Varaha containing many caves, crevasses and rivulets. The island is densely populated by different Mleccha tribes and people of different castes. There • are many habitations and cities flourishing and prosperous with wealth and foodgrains. It is full of righteous people. The rivers, mountains and forests thereof contain various kinds of fruits and flowers of various colours.

अध्याय ४८

श्लोक 26

अन्धक उवाच: यदि तुष्टो ऽसि मे देव वरं दास्यसि चेप्सितम् ।तदा ददस्व मे देव युद्धं परमशोभनम् ।अवद्धस्तपूतो येनाहं लोकान्गन्तास्मि शोभनान्

andhaka uvāca: yadi tuṣṭo 'si me deva varaṃ dāsyasi cepsitam / tadā dadasva me deva yuddhaṃ paramaśobhanam / avaddhastapūto yenāhaṃ lokāngantāsmi śobhanān

हिन्दी अर्थ

है। जमदग्नि सुत परशुराम ने क्षत्रियों को मार डाला; क्योंकि वे क्षत्रिय राजा कुलटाओं की संरुया बढ़ा रहे ये। अब हम उन स्वर्गगत राजाओं का विवरण कहते हैं, सुनिये ।४४-४६। इक्ष्त्राकु वंश का मूल ऐड़ वंश है । श्रोणिबन्ध राजागण इक्ष्वाकु वंशीय नृपगण तथा और-और क्षत्रियों ने इस पृथ्वी पर ऐड़ वश में जन्म ग्रहण किया था। उन्हीं नपतियों से पूर्ण सो कुलों का अभिषेक अर्थात् विस्तार हुआ था ।४७ ४5५। तभी उनके कुलों से भोज कुल का वंश विस्तार में दूना था। जंसा कि कहा है. भोजकुल में प्राय तीन सौ क्षत्रिय थे

English

Thus the six southern islands of the Bharata country have been described in detail.

अध्याय ४८

श्लोक 27

श्रीभगवानुवाच: कथं ददामि ते युद्धं तोषितो ऽहं त्वया पुनः ।न त्वां तु प्रभवेत्कोपः कथं युध्यामि ते ऽन्धक

śrībhagavānuvāca: kathaṃ dadāmi te yuddhaṃ toṣito 'haṃ tvayā punaḥ / na tvāṃ tu prabhavetkopaḥ kathaṃ yudhyāmi te 'ndhaka

हिन्दी अर्थ

जो चार भागों में विभक्त थे। उनमें जो राजा बीत चके हैं, उनके बारे में कहते है, सुनिये

English

In this single Bharata there are many islands separated by the ocean. They have been divided into various parts.

अध्याय ४८

श्लोक 28

यदि ते वर्तते बुद्धिर्युद्धं प्रति न संशयः ।ततो गच्छस्व युद्धाय देवं प्रति महेश्वरम्

yadi te vartate buddhiryuddhaṃ prati na saṃśayaḥ / tato gacchasva yuddhāya devaṃ prati maheśvaram

हिन्दी अर्थ

प्रतिविन्ध्य हैहय ओर धार्तराष्ट्र के सौ-सौ कुल अतीत हुये हैं, जनमेजय के अस्सी कुल, ब्रह्मदत्त, वीर्यी, पौल के सौ-सो कुल तथा काशिकुश के भी सो कुल और दशविन्दुओं के हजार कुल अतीत हुये हैं। इन सभी राजाओं ने बहुत दक्षिणा देकर अश्वमेध यज्ञों को किया हैं ।१०-५२। ववस्व॒त मनु के मंगल-जतक वतमान काल में जो सैकड़ों--जार राजर्षि व्यतीत हो चुके हैं, उनका आवृत्ति और अधिकता के भय से विस्तार के साथ वर्णन नहीं किया जा सकता है । इसलिये उनका वर्णन संक्षेप में किया गया हम विस्तार के साथ उनका

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 29

अन्धक उवाच: न तत्र सिध्यते कार्यं देवं प्रति महेश्वरम्

andhaka uvāca: na tatra sidhyate kāryaṃ devaṃ prati maheśvaram

हिन्दी अर्थ

घनुश्चिह्नान्तगंतग्रन्थः क. पुस्तके नास्ति। + इदमर्धनास्ति क ग. घ॒ छ. पुस्तकेषु ।

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 30

श्रीभगवान् उवाच: पुत्र त्वं शिखरं गत्वा धूनयस्व बलेन च

śrībhagavān uvāca: putra tvaṃ śikharaṃ gatvā dhūnayasva balena ca

हिन्दी अर्थ

एते ययातिबंशस्य बभूवुर्जशवर्धना: । कीतिता द्युतिमन्तस्ते ये लोकान्धारयन्ति वे ५५ लभन्ते च वरान्यच दुल॑भान्ब्रहालौ किकान् । आयुः पुत्रा धन कीतिरेश्वयं भूतिरेव च धारणाच्छबणाच्चेव पतचवर्गस्य धीमताम् । यथोक्ता लोकिकाश्चव ब्रह्मलोक ब्नजन्ति वे (३५७ चत्वार्याहुः सहस्नाणि वर्षाणां च कृतं युगम् । तस्य तावच्छतोी संध्या संध्यांशश्व तथाबिध:.

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 31

विधूते तत्र देवेशः कोपं कर्ता सुदारुणम् ।कोपितः शङ्करो रौद्रं युद्धं दास्यति दानव

vidhūte tatra deveśaḥ kopaṃ kartā sudāruṇam / kopitaḥ śaṅkaro raudraṃ yuddhaṃ dāsyati dānava

हिन्दी अर्थ

अनुबड्भपादस्त्रेतायास्त्रिसाहस्नस्तु संख्यया । द्वापरे है सहस्न तु वर्षाणां संप्रकीतितभ् ६१ तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशो द्विशतस्तथा । उपोद्घातस्तृती यस्तु द्वापरे पाद उच्यते

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 32

विष्णुवाक्यादसौ पापो गतो यत्र महेश्वरः ।कैलासशिखरं प्राप्य धुनोति स्म मुहुर्मुहुः

viṣṇuvākyādasau pāpo gato yatra maheśvaraḥ / kailāsaśikharaṃ prāpya dhunoti sma muhurmuhuḥ

हिन्दी अर्थ

कलि वर्षसहस्र' तु प्राउडुः संख्याविदों जना: तस्यापि शतिका संध्या संध्यांशः शतमेव च एतद्द्वादशसाहस्न' चतुर्युगमिति स्मृतम् । एवं पाद: सह्राणि श्लोकानां पच्च पच्च च ३६५

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 33

धूनिते तत्र शिखरे कम्पितं भुवनत्रयम् ।निपेतुः शिखराग्राणि कम्पमानान्यनेकशः

dhūnite tatra śikhare kampitaṃ bhuvanatrayam / nipetuḥ śikharāgrāṇi kampamānānyanekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन नहीं कर सकते, जो सब राजर्षि उन युगों के साथ व्यतीत हो चुके हैं ।५२-५४। ये सब ययाति बंश के बंश को बढ़ाने वाले कान्तिमान् संसार का पालन करने वाले कहे गये हैं! इन्होंने दुलेभ ब्रह्म, लौकिक आयु, पुत्र, धन, कीति और ऐश्वर्य विभूति नामक पाँच वरों को प्राप्त किया था। वे अपनी प्रजा के पाँचों वर्गों की बातों को ( अभियोमों को ) सुना करते थे और अपनी विद्वान् प्रजा का पालन किया करते थे, इससे वे

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 34

चत्वारः सागराः क्षिप्रमेकीभूता महीपते ।निपेतुरुल्कापाताश्च पादपा अप्यनेकशः

catvāraḥ sāgarāḥ kṣipramekībhūtā mahīpate / nipeturulkāpātāśca pādapā apyanekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

सभी राजागण ब्रह्मलोक को गये .५५-५७। चार हजार वर्षों का कृतयुग होता है, जिसमें उतनी ही संध्या और उतने ही संध्यांश होते हैं। कृतयुग का प्रक्रियापाद चार हजार वर्षों का कहा गया है। इसलिये चार सौ संध्यायें और उतने ही संध्यांश होते हैं । त्रेता युग संख्या में तीन हजार वर्षों का होता है। मुनियों ने कहा कि, इसमें तीन सौ वर्ष की संध्याएँ और तीत सौ वर्ष के ही संध्यांश होते हैं।५८-६०। त्रेता का अनुषज्भपाद संख्या में तीन हजार का है। दापर के दो हजार वर्ष कहे गये हैं। इसमें भी दो सौ वर्ष की संध्याएँ और उतमे वर्षों के संध्यांशा होते हैं। इस तरह तीसरा उपोद्घातपाद द्वापर का कहा गया है ।६१-६२। संख्या जानने वाले विद्वानों ने कलियुग को एक हजार वर्षों का कहा है। इसमें भी सौ वर्ष की संध्याएँ और सौ वर्ष के संध्यांशा होते हैं। कलियुग में चौथा संहार पाद होता हैं। संध्या और संध्यांशों के साथ चारों युग

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 35

उमया सहितो देवो विस्मयं परमं गतः ।गाढमालिङ्ग्य गिरिजा देवं वचनम् अब्रवीत्

umayā sahito devo vismayaṃ paramaṃ gataḥ / gāḍhamāliṅgya girijā devaṃ vacanam abravīt

हिन्दी अर्थ

बारह हजार वर्षों के कहे गये हैं।६३-६४४३। इस तरह युग पादों का परिमाण दस हजार वर्षों का है और

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 36

किमर्थं कम्पते शैलः किमर्थं कम्पते धरा ।किमर्थं कम्पते नागो मर्त्यः पातालमेव च ।किं वा युगक्षयो देव तन्ममाख्यातुम् अर्हसि

kimarthaṃ kampate śailaḥ kimarthaṃ kampate dharā / kimarthaṃ kampate nāgo martyaḥ pātālameva ca / kiṃ vā yugakṣayo deva tanmamākhyātum arhasi

हिन्दी अर्थ

संध्यासध्यांशकरेव दे सहर्न तथा5परे । एवं द्वादशसाहर्न पुराणं कवयो विदृः ६६ चतुष्पाद पुराण तु ब्रह्मणा विहित॑ पुरा ६७

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 37

ईश्वर उवाच: कस्यैषा दुर्मतिर्जाता क्षिप्तः सर्पमुखे करः ।ललाटे च कृतं वर्म स यास्यति यमालयम्

īśvara uvāca: kasyaiṣā durmatirjātā kṣiptaḥ sarpamukhe karaḥ / lalāṭe ca kṛtaṃ varma sa yāsyati yamālayam

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोकते युगधम॑निरूपणं नाम द्वात्रिशोड्ष्याय:

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 38

कैलासमाश्रितो येन सुप्तो ऽहं येन बोधितः ।तं वधिष्ये न सन्देहः सम्मुखो वा भवेद् यदि

kailāsamāśrito yena supto 'haṃ yena bodhitaḥ / taṃ vadhiṣye na sandehaḥ sammukho vā bhaved yadi

हिन्दी अर्थ

देवाश्व विविधा ये च तस्मिन्मन्वन्तरेषधिपा: । ऋषयो मनवश्चव सर्वे तुल्यासिमानिन: २ संध्या तथा संध्यांश दो हजार वर्षों के । इस प्रकार युग पादों का परिमाण कवियों ने बारह हजार वर्षों का कहा है ।६५-६६। जसे वेद चार पादों के हैं, उसी प्रकार युग भी चार पादों के होते हैं। विधाता ने जैसे युग का स्वयं चतुष्पाद विधान किया है वंसे ही ब्रह्मा ने भी पहले युग को चतुष्पाद बनाया है

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 39

चिन्तयामास देवेशो ह्यन्धको ऽयं न संशयः ।उपायं चिन्तयामास येनासौ वध्यते क्षणात्

cintayāmāsa deveśo hyandhako 'yaṃ na saṃśayaḥ / upāyaṃ cintayāmāsa yenāsau vadhyate kṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले--बीते हुये और आने वाले सभी मख्बन्तरों में नाम और रूप के अनुसार समान भाव से कुछ अभिमानी देवता हुआ करते हैं ।१। उस मन्वन्तर में अनेकानेक देवता, मन्वन्तर के स्वामी, ऋषि, मनु

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 40

आगताश्च सुराः सर्वे ब्रह्माद्या वसुभिः सह ।रथं देवमयं कृत्वा सर्वलक्षणसंयुतम्

āgatāśca surāḥ sarve brahmādyā vasubhiḥ saha / rathaṃ devamayaṃ kṛtvā sarvalakṣaṇasaṃyutam

हिन्दी अर्थ

महर्षिसर्ग: प्रोक्तो वे वंशं स्वायंभुवस्थ तु । विस्तरेणानृपूर्व्या च कीत्यंमानं निबोधत ३ प्रियब्रतात्प्रजावन्तो वी रात्कन्या व्यजायत । कन्या सा तु महाभागा कर्दमस्य प्रजापतेः

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 41

केचिद्देवाः स्थिताश्चक्रे केचित् तुण्डाग्रपार्श्वयोः ।केचिन् नाभ्यां स्थिता देवाः केचिद्धुर्येषु संस्थिताः

keciddevāḥ sthitāścakre kecit tuṇḍāgrapārśvayoḥ / kecin nābhyāṃ sthitā devāḥ keciddhuryeṣu saṃsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

कन्ये है शतपुत्राश्च सम्राट्कुक्षिश्न ते उभे । तयोवें अआ्रातरः शूराः प्रजापतिसमा दश ८

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 42

धुरीषु निश्चलाः केचित्केचिद्यूपेषु संस्थिताः ।केचित्स्यन्दनसंस्तम्भाः केचित्स्यन्दनवेष्टकाः

dhurīṣu niścalāḥ kecitkecidyūpeṣu saṃsthitāḥ / kecitsyandanasaṃstambhāḥ kecitsyandanaveṣṭakāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रियव्नतो5भिषिच्यतान्सप्तसप्तसु पार्थिवान् । द्वीपेषु तेषु धर्मेण द्वीपांस्तांश्र निबोधत १० जम्बूद्वीपेश्वरं चक्के अग्नीध्र तु महाबलम्। प्लक्षद्वीपेश्वरश्चापि तेन मेधातिथिः कृतः ११ शाल्मलौ तु वपुष्मन्तं राजानमभिषिक्तवान् । ज्योतिष्मन्त कुशद्वीपेश्वरं राजानं कृतवान्प्रणभुः झतिमन्तं च राजान क्रोचद्वीपे समादिशत् । शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्े प्रियन्नतः १३ पुष्कराधिपति चापि सधिनं कृतवाश््रभुः । पुष्करे सवनस्यथापि महावीतः सुतो5भवत् ॥

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 43

आमलसारके ऽन्ये ऽपि अन्ये ऽपि कलशे स्थिताः ।रिपोर्भयंकरं दिव्यं ध्वजमालादिशोभितम्

āmalasārake 'nye 'pi anye 'pi kalaśe sthitāḥ / riporbhayaṃkaraṃ divyaṃ dhvajamālādiśobhitam

हिन्दी अर्थ

आदि सभी समान रूप से अभिमानी होते हैं ।२। महषियों की सृष्टि पहले कह्टी जा चुकी है अब स्वायम्भुव का वंश विस्तार हम क्रमशः कहते हैं, सुनिये ।३। स्वायम्भुव मनु के उन्हीं की तरह दस पोते थे। जिन्होंने उसी स्वायम्भव मन्वन्तर के आदि ज्रेता युग में पहले पहल सातों द्वीपों और समुद्रों के साथ समूची पृथ्वी का प्रतिवर्ष करन्संग्रह किया था। प्रियव्रत के पुत्रों और स्वायम्भुव के उन पौत्रों ने योग और तपस्यों के द्वारा

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 44

रथं देवमयं कृत्वा तमारूढो जगद्गुरुः ।निर्ययौ दानवो यत्र कोपाविष्टो महेश्वरः

rathaṃ devamayaṃ kṛtvā tamārūḍho jagadguruḥ / niryayau dānavo yatra kopāviṣṭo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजाओं की सृष्टि के अनुसार पृथ्वी का शासत किया। वीर प्रजापति प्रियत्रत को एक सौभाग्यशालिनी कन्या भी थी, जो कर्दंम प्रजापति से ब्याही गयी थी ।४-७। इसके अतिरिक्त उन्हें और दो पुत्रियाँ तथा सम्नाद कुक्षि आदि सौ पुत्र थे। इन दोनों के प्रजापति की ही तरह शूर-वीर दस भाई थे। जिनके नाम थे अग्नी ध्र, राजाओं का उन सात भागों में विभक्त सात द्वापों में धर्मानुसार अभिषेक किया। उत द्वीपों के विषय में सुनिये ।५-१०। जम्बू द्वीप में महाबली अग्नीभ्र को प्रभु बनाया और उस्री प्रकार प्लक्ष द्वीप में मेधा तिथि ईइवर बनाये गये। शाल्मलि द्वीप में वपुष्म/न्् राजा बनाकर राज्यासन पर बंठाये गये और कुशद्वीप के ज्योतिष्मान् राजा बनाये गये । क्रौच्चद्वीप राजा द्युतिमान् को दिया गया ह॒व्य को प्रियत्रत ने शाकद्वीप

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 45

तिष्ठ तिष्ठेत्युवाचाथ क्व प्रयास्यसि दुर्मते ।शरासनं करे गृह्य शरांश्चिक्षेप दानवे

tiṣṭha tiṣṭhetyuvācātha kva prayāsyasi durmate / śarāsanaṃ kare gṛhya śarāṃścikṣepa dānave

हिन्दी अर्थ

का स्वामी बनाया ११-१३॥ इसके अनस्तर प्रियन्नत ने सवन को पुष्कर द्वीप का अधिपति बनाया । पुष्कर

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 46

दानवे ऽधिष्ठिते युद्धे शरैश्चिछेद सायकान् ।शरासनेण तत्रैव अन्धकश्छादितस् तदा

dānave 'dhiṣṭhite yuddhe śaraiścicheda sāyakān / śarāsaneṇa tatraiva andhakaśchāditas tadā

हिन्दी अर्थ

महावोतं स्मृतं वर्ष तस्य नाम्ना महात्मन: । नास्‍्ना तु धातकेश्रापि धातकीखण्ड उच्यति जलदं जलदस्याथ वर्ष प्रथममुच्यते । कुमारस्य च कौमारं द्वितीयं परिकीतितम् १७ सुकुमारं तृतीय तु सुकुमारस्य कीतितम् । मणीचकस्य चतुर्थ मणीचकमिहोच्यते १८ वसुमोदस्य वे वर्ष पत्चमं वसुमोदक्् मोदकस्य तु सोदाक वर्ष षष्ठ प्रकीतितम् १६

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 47

न तत्र दृश्यते सूर्यो नाकाशं न च चन्द्रमाः ।आग्नेयमस्त्रं व्यसृजद्दानवो ऽपि शिवं प्रति

na tatra dṛśyate sūryo nākāśaṃ na ca candramāḥ / āgneyamastraṃ vyasṛjaddānavo 'pi śivaṃ prati

हिन्दी अर्थ

क्रौचद्वीपेश्व रस्यापि पुत्रा चुतिमतस्तु वे । कुशला मनुगश्चोष्ण: पीबरश्रान्धकारकः ॥।

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 48

दह्यमानाः शराङ्गारैस्तत्रसुः सर्वदेवताः ।रक्ष रक्ष महादेव दह्यमानांस्तु दानवात्

dahyamānāḥ śarāṅgāraistatrasuḥ sarvadevatāḥ / rakṣa rakṣa mahādeva dahyamānāṃstu dānavāt

हिन्दी अर्थ

मुनिश्च दुन्दुभिश्चेव सुता द्युतिमतस्तु वे अन्धफा रकदेशस्तु अंधकारश्च कीत्यंते । मुनेस्तु सुनिदेशों व दुन्दुभेदुन्दुनिः स्मृतः ॥

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 49

ततो देवाधिदेवो ऽसौ वारुणास्त्रमयो ऽजयत् ।वारुणास्त्रेण निमिषादाग्नेयं नाशितं तदा

tato devādhidevo 'sau vāruṇāstramayo 'jayat / vāruṇāstreṇa nimiṣādāgneyaṃ nāśitaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

बष्ठः प्रभाकरश्चेव सप्तमः कपिल: स्घृतः

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 50

दानवेन तदा मुक्तं वायव्यास्त्रं रणाजिरे ।वारुणं च गतं तात वायव्यास्त्रविनाशितम्

dānavena tadā muktaṃ vāyavyāstraṃ raṇājire / vāruṇaṃ ca gataṃ tāta vāyavyāstravināśitam

हिन्दी अर्थ

द्वीप में सबन को महाबीत और घातकि नामक दो श्रेष्ठ पुत्र हुये ।(४ उस महात्मा के नाम से महावीत नाम का वर्ष चलाया गया और धातकि के नाम से वह धातकि-खण्ड कहलाया हंव्यवाहन ने दाकद्वीप में सात पूत्रों को उत्पन्न किया, जो पीछे चलकर वहाँ के शासक हुये । उनके नाम ये हैं--जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक, वसुमोद, सुमोद और महाद्रुम । इनके नामों से वहाँ सात वर्ष प्रचलित हुये ।१ ५-१६। जलद के नाम पर पहला जलद वर्ष, कुमार के नाम का दूसरा कोमार वर्ष, सुकुमार के नाम का तीसरा सुकुमार वर्ष, मणीचक के नाम का चौथा मणीचक वर्ष, वसुमोद के नाम का पाँचवाँ वसुमोदक बषे, मोदक के नाम का छुठा मोदाक वर्ष और महाद्रुम के नाम का सातवाँ महाद्रुम वर्ष कहलाता है ।७-२०। क्रौचद्वीप के स्वामी द्तिमान् के भी कुशल, मनुग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि नामक पुत्र हुये। उन्हीं के नाम

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 51

देवो व्यसर्जयत्सार्पं क्रोधाविष्टेन चेतसा ।मारुतं नाशितं बाणैः सर्पैस् तत्र न संशयः

devo vyasarjayatsārpaṃ krodhāviṣṭena cetasā / mārutaṃ nāśitaṃ bāṇaiḥ sarpais tatra na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

से ऋंचद्वीप के देशों का नामकरण हुआ । उष्ण का देश उष्ण कहलाया, पीवर का पीवर, अन्धकारक का अन्धका र, मुनि का मुनि, और दुन्दुभि का दुन्दुभि । क्रौंचद्वीप में ये सात देश बड़े प्रसिद्ध हैं

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 52

दानवेन ततो मुक्तं गरुडास्त्रं च लीलया ।गारुडास्त्रं च तद् दृष्ट्वा सार्पं नैव व्यदृश्यत

dānavena tato muktaṃ garuḍāstraṃ ca līlayā / gāruḍāstraṃ ca tad dṛṣṭvā sārpaṃ naiva vyadṛśyata

हिन्दी अर्थ

ज्योतिष्मान् के कुशद्वीप में उद्धिदू, वेणुमान्, स्वेरथ, लवण, धृति, प्रभाकर और कपिल नामक सात बलवानू उद्धिदं प्रथम वर्ष द्वितीयं वेणुमण्डलम् । तृतीय स्वेरथाकारं चतुर्थ लवण स्मृतम् २५ पत्चमं धृतिमद्र्ष षष्ठं वर्ष प्रभाकरम् । सप्तमं कपिल नाम कपिलस्य प्रकीतितम्

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 53

ततो देवाधिदेवेन नारसिंहं विसर्जितम् ।नारसिंहास्त्रबाणेन गारुडास्त्रं प्रशामितम्

tato devādhidevena nārasiṃhaṃ visarjitam / nārasiṃhāstrabāṇena gāruḍāstraṃ praśāmitam

हिन्दी अर्थ

बेद्यतो बेचद्युतस्पापि सानसस्यापि मानस: सुप्रभः सुप्रभस्यापि सप्तेते देशपालकाः ३०

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 54

अस्त्रमस्त्रेण शम्येत न बाध्येत परस्परम् ।महद् युद्धम् अभूत् तातसुरासुरभयंकरम्

astramastreṇa śamyeta na bādhyeta parasparam / mahad yuddham abhūt tātasurāsurabhayaṃkaram

हिन्दी अर्थ

आनन्दश्च धश्रवश्चेव क्षेमकश्च शिवस्तथा प्लक्षद्रीपादिकेष्वेव शाकद्वीपान्तरेषु वे। ज्ञेयः पत्चसु धर्मो वे व्णअ्रमविभागशः

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 55

चक्रनालीकनाराचैस्तोमरैः खड्गमुद्गरैः ।वत्सदन्तैस्तथा भल्लैः कर्णिकारैश्च शोभनैः

cakranālīkanārācaistomaraiḥ khaḍgamudgaraiḥ / vatsadantaistathā bhallaiḥ karṇikāraiśca śobhanaiḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्र हुये ।२४। पहला उद्ध्रिद् वर्ष, दूसरा वेणुमण्डल, तीसरा स्वेरथाकार, चौथा लवण, पाँचर्वाँ घृतिमद्, छठा प्रभाकर और सातवाँ कपिलनाम का वर्ष वहाँ प्रसिद्ध है ।२५-२६। कुशद्वीप में इन पुत्रों के ही नाम पर द्ीपखण्ड हैं, जहाँ वर्णाश्रम धर्म के अनुरूप प्रजा रहती है । शाल्मलि द्वीप के अधिपति वपुष्मान् को रवेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ नामक सात पुत्र हुये ।२७-२८। श्वेत के नाम पर इवेत देश,

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 56

एवं न शक्यते हन्तुं दानवो विविधायुधैः ।तदा ज्वालाकरालाश्च खड्गनाराचतोमराः

evaṃ na śakyate hantuṃ dānavo vividhāyudhaiḥ / tadā jvālākarālāśca khaḍganārācatomarāḥ

हिन्दी अर्थ

रोहित के नाम पर रोहित, जीमृत के नाम पर जीमूत और हरित, वेद्यत, मानस और सुप्रभ के नाम पर हारित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ देश हुये और ये ही सात उन सातों देझ्यों के रक्षक भी हुये अब हम जम्बू द्वोप के परवर्ती अन्य सातों द्वीपों की कथा कहते हैं। मेधातिथि के सात पुत्र हुये, जो प्लक्ष द्वीप के अधीश्वर हुये । इनके बीच शान्तमय सबसे ज्येष्ठ थे। इन्हीं के तामानुसार वहाँ सात वर्ष भी हुये । शान्तमय के छोटे भाई थे--शिशिर, सुखोदय, आनन्द, पध्रव, क्षेमक और शिव ।३१-३२। ये सब स्त्रायम्भुव मन्वन्तर के भोग काल में वर्तमान थे और इन्होंने अपने-अपने नाम के अनुसार सातों वर्षों का विभाग कर

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 57

वृषाङ्केन विमुक्तास्तु समरे दानवं प्रति ।न संस्पृशन्ति शस्त्राणि गात्रं गौडवधूरिव

vṛṣāṅkena vimuktāstu samare dānavaṃ prati / na saṃspṛśanti śastrāṇi gātraṃ gauḍavadhūriva

हिन्दी अर्थ

उन्हें चलाया । मेघातिथि के उन पुत्रों ने जो सातों द्वीपों में निवास करते थे--प्लक्ष ढीप में प्रजाओं को धर्णा- श्रम के आचार से मुक्त कर दिया। प्लक्ष द्वीप से लेकर श्ाकद्वीप पयंन्‍्त पाँच द्वीपों में वर्णाश्रम विभाग के

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 58

आयुधानि ततस्त्यक्त्वा बाहुयुद्धम् उपस्थितौ ।करं करेण संगृह्य प्रहरन्तौ स्वमुष्टिभिः ।रणप्रयोगैर्युध्यन्तौ युयुधाते शिवान्धकौ

āyudhāni tatastyaktvā bāhuyuddham upasthitau / karaṃ kareṇa saṃgṛhya praharantau svamuṣṭibhiḥ / raṇaprayogairyudhyantau yuyudhāte śivāndhakau

हिन्दी अर्थ

सुखमायुश्च॒ रूपं च बल॑ धर्मश्च नित्यशः । पचस्वेतेषु द्वीपेषु सर्वे साधारण स्मृतम् कुरुस्तु सप्तमस्तेषां भद्गाश्वे ह्मष्ठमः स्मृत:। नवमः केतुमालस्तु तेषां देशान्निबोधत

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 59

श्रीमार्कण्डेय उवाच: अन्धकं प्रति देवेशश्चिन्तयामास निग्रहम् ।हनिष्यामि न सन्देहो दुष्टात्मानं न संशयः

śrīmārkaṇḍeya uvāca: andhakaṃ prati deveśaścintayāmāsa nigraham / haniṣyāmi na sandeho duṣṭātmānaṃ na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

गन्धमादनवर्ष तु केतुमाले न्यवेदयत् । इत्येतानि महान्तोह नव वर्षाणि भागशः अग्नी प्रस्तेषु सर्वेषु पुत्रांस्तानभ्यषिचत । यथाक्रमं स धर्मात्मा ततस्तु तपसि स्थित:

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 60

स शिवेन यदा क्षिप्तः पतितः पृथिवीतले ।ऊर्ध्वबाहुरधोवक्त्रो दानवो नृपसत्तम

sa śivena yadā kṣiptaḥ patitaḥ pṛthivītale / ūrdhvabāhuradhovaktro dānavo nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

अनुरूप धर्म चल रहा था।३३-३१। इन पाँचों द्वीपों में सुख, आयु, रूप, बल और धर्म साधारणतया सभी को प्राप्त थे। सातों द्वीपों से घिरे हुये जम्बुद्वीप की अब कथा सुनिये। प्रियत्नत ने महाबली ज्येष्ठ पुत्र अग्नीध्र को कन्या पुत्र के साथ जम्बूद्वीप का राजा बनाकर अभिषिक्त किया। अन्‍्नीध्र के पुत्र भी प्रजापति के सभान महान् बलबान् हुये । उनमें ज्येष्ठ नाभि था, जिससे छोटा किम्पुरष हुआ ।३६-३८। तीसरा हरि वर्ष, चौथा इलावृत, पाँचवाँ रम्य, छठा हरिण्मान्, सातवाँ कुरु, आठवाँ भद्राश्व और नस्वाँ केतुम।ल नाम का पुत्र हुआ। अब इनके देशों को सुनिये ।३६-४०। इनमें नाभि को पिता ने हिम नामक दक्षिण देश, किम्पुरुप को हेमकट नामक देश, हरि वर्ष को नेषध देश, इलावुत को सुमेर का मध्यप्रदेश, रम्य को नील नामक हरिण्मान् को उत्तर का दवेत देश, कुरु को भी उत्तर दिशा में शज्भवान् देश, भद्वाइव को माल्यवान् देश ओर

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 61

क्रोधाविष्टेन देवेशः सङ्ग्रामे देवशत्रुणा ।कक्षयोः कुहरे क्षिप्त्वा बन्धेनाक्रम्य पीडितः

krodhāviṣṭena deveśaḥ saṅgrāme devaśatruṇā / kakṣayoḥ kuhare kṣiptvā bandhenākramya pīḍitaḥ

हिन्दी अर्थ

केतुमाल को गन्धमादन देश दिया। देशों के ये ही बड़े-बड़े नौ विभाग हैं ।४१-४५। धर्मात्मा अस्तीधक्ष उन सभी देझों से यथाक्रम अपने पुत्रों को राजा बनाकर स्वयं तपस्या करने चले गये ।४६। स्वायम्भुव के पोत्र और प्रियव्रत के उन सातों पुत्रों ने इसे प्रकार संपूर्ण सातों द्वीप में राज्य स्थापित किया किपुरुष आदि जिन शुभदायक आठ देशों को हमने कहा है, वहाँ बिना यत्न किये ही सिद्धि अनायास आ जाती है। वहाँ न किसी

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 62

निस्पन्दश्चाभवद् देवो मूर्च्छायुक्तो महेश्वरः ।मूर्च्छापन्नं तु तं ज्ञात्वा चिन्तयामास दानवः

nispandaścābhavad devo mūrcchāyukto maheśvaraḥ / mūrcchāpannaṃ tu taṃ jñātvā cintayāmāsa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

विवर्ययों न तेष्वस्ति जरापृत्युभयं न च। धर्माधर्मों न तेव्वास्तां नोत्त ताथ म मध्यमा: ॥। नाभेहि सर्ग वक्ष्यामि हिमाह्ल तान्नबोधत । नाभिस्त्वजनयत्पुत्र मरुदेव्यां महाद्युति: ॥

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 63

हाहा कष्टं कृतं मे ऽद्य दुष्कृतं पापकर्मणा ।किं करोमि कथं कर्म कस्मिन्स्थाने तु मोचये

hāhā kaṣṭaṃ kṛtaṃ me 'dya duṣkṛtaṃ pāpakarmaṇā / kiṃ karomi kathaṃ karma kasminsthāne tu mocaye

हिन्दी अर्थ

पुत्रसंक्रामितश्षीकों बन राजा विवेश सः द

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 64

गृहीत्वा देवमुत्सङ्गे गतः कैलासपर्वतम् ।शय्यायां शङ्करं न्यस्य निर्ययौ दैत्यराट् ततः

gṛhītvā devamutsaṅge gataḥ kailāsaparvatam / śayyāyāṃ śaṅkaraṃ nyasya niryayau daityarāṭ tataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार का परिवतंन है और न बुढ़ापा या मृत्य का डर। वहाँ धर्म है, अधर्म नहीं । उत्तम, मध्यम और अधम का भेद नहीं है। उन सभी क्षेत्रों में कभी भी युगानुकूल अवस्था नहीं होती है ४७-४६। अब हम हिम- क्षेत्र के अधिपति नाभि के वंश-विस्तार को कहते हैं। नाभि ने मरुदेवी में ऋषभ नामक एक पूत्र उत्पन्न किया, जो अत्यन्त तेजस्वी, राजाओं में श्रेष्ठ और सभी क्षत्रियों का पु्वज था ।५०। ऋषभ से वीर भरत की उत्पत्ति हुईं, जो अपने सो अ्राताओं में ज्येष्ठ थे। ऋषभ ने अपने पृत्र भरत को राजगद्दी पर बैठा कर स्वयं संन्यास ले लिया । उन्होंने भरत को हिम नामक दक्षिण देश दिवा । इस कारण विद्वानू लोग उनके नाम से उस देश को भारतवर्ष कहते हैं ।(१-५२। भरत के पुत्र सुमति हुये, जो विद्वान् और धामिक थे। तब भरत ने सुमति : को राज्य दे दिया और बेटे को राज्य भार सौंपने के बाद स्वयं जंगल चले गये । सुमति को तेजस नामक्र पुत्र

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 65

शय्यायां पतितो देवः प्रपेदे वेदनां ततः ।तावद्ददर्श चात्मानं स्वकीयभवनस्थितम्

śayyāyāṃ patito devaḥ prapede vedanāṃ tataḥ / tāvaddadarśa cātmānaṃ svakīyabhavanasthitam

हिन्दी अर्थ

हुआ । इन्द्रयुल्न के मर जाने पर स्वयं परमात्मा उप्के वंश में प्रतिहार नाम से उत्पन्न हुये । प्रतिहार को प्रतिहर्ता नाम का बुद्धिमान और विख्यात पुत्र हुआ ।१३-५४५॥ अतिहर्ता को उच्चेता, उन्नेता को भुव, भुव को उद्गीथ, उद्गीथ को प्रतावि, प्रतावि को विभु, विभु को प्रृथु, पृथु को नक्त, नक्त को गय, गय को नर, नरकों

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 66

पराभवः कृतो मद्यं कथं तेन दुरात्मना ।क्रोधवेगसमाविष्टो निर्ययौ दानवं प्रति

parābhavaḥ kṛto madyaṃ kathaṃ tena durātmanā / krodhavegasamāviṣṭo niryayau dānavaṃ prati

हिन्दी अर्थ

अरिजस्य रजः पुत्र: शतजिद्रजसों मतः । तस्य पुत्रशतं त्वासीद्राजानः सर्व एव ते येइतीतास्तैयुंगें: साथ राजानस्ते तदन्‍्वय।: । स्वायंभुवेषन्तरे पूर्व) शतशो5थ सहस्नशः

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 67

आयसीं लगुडीं गृह्य प्रभुर् भारसहस्रजाम् ।दानवं च ततो दृष्ट्वा प्राक्षिपत्तस्य मूर्धनि

āyasīṃ laguḍīṃ gṛhya prabhur bhārasahasrajām / dānavaṃ ca tato dṛṣṭvā prākṣipattasya mūrdhani

हिन्दी अर्थ

एव स्वायंभुवः सर्गो येनेदं पुरितं जगत् । ऋषिभिर्देवतेश्चापि पितृगन्धवंराक्षस: यक्षमुतपिशाचेश्च मनुष्यमृगपक्षित्रिः । तेषां सृष्टिरियं लोके युगेः सह विवतंते

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 68

खड्गेन ताडयामास दानवः प्रहसन्रणे ।देवेनाथस्मृतं चास्त्रं कौच्छेराख्यं महाहवे

khaḍgena tāḍayāmāsa dānavaḥ prahasanraṇe / devenāthasmṛtaṃ cāstraṃ kauccherākhyaṃ mahāhave

हिन्दी अर्थ

इति महापुराणे वायुप्रोक्ते स्वायंभुववंशानुकीतंन नाम त्रयर््रिशोडण्याय: ॥३३।॥। विराट विराद को महावीयं, महावीयं को घधीमान्ू, धीमान् को महान, महान् को भौवन, भौवन को ल्वष्टा, त्वष्टा को अरिज, अरिज को रजस, रजस को शतजित और शतजित् को सौ राजा पुत्र हुये

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 69

दीप्यमानं समुत्सृज्य हृदये ताडितः क्षणात् ।ततः स ताडितस्तेन रुधिरोद्गारमुद्वमन्

dīpyamānaṃ samutsṛjya hṛdaye tāḍitaḥ kṣaṇāt / tataḥ sa tāḍitastena rudhirodgāramudvaman

हिन्दी अर्थ

संसार भर में अपनी कीति को फैलाते वाले उन राजाओं ने यहाँ की प्रजाओं को समृद्ध किया और उन्होंने ही भारतवर्ष को सात खण्डों में पहले विभक्त किया था। उन्हीं के वंशजों द्वारा यह भारत भूमि कृत, त्रेता आदि इकहत्तर चौयुगी में उपभक्त हुई है ।६१-६३। पहले स्व्रायम्भुव मन्वन्तर के काल में सहस्रों राजा गण जो उन युगों के साथ अतीत हो गये हैं, वे भी उन्हीं के वंशज थे । ऐसा स्वायम्भुव मनु का बंश-विस्तार

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 70

पतितो ऽधोमुखो भूत्वा ततः शूलेन भेदितः ।पुनश्च देवदेवेन शूलेन द्विदलीकृतः

patito 'dhomukho bhūtvā tataḥ śūlena bheditaḥ / punaśca devadevena śūlena dvidalīkṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

है। ऋषियों, देवों, पितरों, गन्धवों, राक्षसों, यज्ञों, भूतों, पिशाचों, मनुष्यों, मृगों और पक्षियों के साथ उन्हीं के बंशजों ने इस जगत् को पूर्ण किया है। संसार में उनकी यह सृष्टि थरुगों के साथ चलती रहेगी

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 71

शूलाग्रे ऽसौ स्थितः पापो भ्रान्तवांश् चक्रवत् तदा ।ये ये भूम्यां पतन्ति स्म तत्कायाद् रक्तबिन्दवः

śūlāgre 'sau sthitaḥ pāpo bhrāntavāṃś cakravat tadā / ye ye bhūmyāṃ patanti sma tatkāyād raktabindavaḥ

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिह्नान्तर्गतग्रन्थ: ड.. पुस्तके नास्ति ।

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 72

ते ते सर्वे समुत्तस्थुर् दानवाः शास्त्रपाणयः ।व्याकुलस्तु ततो देवो दानवेन तरस्विना

te te sarve samuttasthur dānavāḥ śāstrapāṇayaḥ / vyākulastu tato devo dānavena tarasvinā

हिन्दी अर्थ

एवं प्रजासंनिवेशं श्रुत्वा च ऋषिपुंगवः । पप्रच्छ निपुणः सूतं पृथिव्यायामविस्तरौ कति द्वीपए समुद्रा वा पर्व॑ताश्व कति प्रभो । कियन्ति चेव वर्षाणि तेषु नद्यश्च का स्मृता:

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 73

देवेनाथ स्मृता दुर्गा चामुण्डा भीषणानना ।आयाता भीषणाकारा नानायुधविराजिता

devenātha smṛtā durgā cāmuṇḍā bhīṣaṇānanā / āyātā bhīṣaṇākārā nānāyudhavirājitā

हिन्दी अर्थ

महाभूतप्रमाणं च लोकालोकों तथेत्र च् पर्यायपारिमाण्यं व गतिश्चन्द्राकंयोस्तथा ॥

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 74

महादंष्ट्रा महाकाया पिङ्गाक्षी लम्बकर्णिका ।आदेशो दीयतां देव को यास्यति यमालयम्

mahādaṃṣṭrā mahākāyā piṅgākṣī lambakarṇikā / ādeśo dīyatāṃ deva ko yāsyati yamālayam

हिन्दी अर्थ

यावन्ति चंव वर्षाणि तेषु नद्यश्च या: स्मृता: । महाभृतप्रमाणं च लोकालोकौ तथेव च ॥ हि289.:यक 334 ++++ने-+॥+य रे नम यान सन ५ ++ ++ पा पनमंाऊनानभ कमर... मनी मनन नम .-हम+-नननामनममनान-- ३“ -++ता++ 3. मना 3) क्‍आन पान नम न क५-७७७७७७म..०आम५७.......॥नआ नी ०००७० ५५५3५०+३०५ मनन «गन क नानी न न न भीनान-+-++43+-4434 2 3.33 8. त++नन-- कीनननन-न-मना नमन “मनन ३७७33७७७७+५५83 न ४-3७ ५५५+4५३८.ब...७५००००००००००७३५०००००००००--बी

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 75

ईश्वर उवाच: पिबास्य रुधिरं भद्रे यथेष्टं दानवस्य च ।निपतद्रुधिरं भूमौ दुर्गे गृह्णीष्व माचिरम्

īśvara uvāca: pibāsya rudhiraṃ bhadre yatheṣṭaṃ dānavasya ca / nipatadrudhiraṃ bhūmau durge gṛhṇīṣva māciram

हिन्दी अर्थ

जम्बूद्वीप का वर्णन

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 76

निहन्मि दानवं यावत्साहाय्यं कुरु सुन्दरि ।एवमुक्ता तु सा दुर्गा पपौ च रुधिरं ततः

nihanmi dānavaṃ yāvatsāhāyyaṃ kuru sundari / evamuktā tu sā durgā papau ca rudhiraṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषिगण बोले-- पंडित ऋषिश्रेष्ठयण जब इस प्रकार प्रजाओं की कथा सुन चुके, तब सूत॑ से पूछा कि, पृथिवी की परिधि और विस्तार क्‍या है? प्रभो! कितने द्वीप और समुद्र हैं? कितने पर्वत, कितने देश हैं ? उनमें कितनी नदियाँ हैं, और वे किन किन नामों से प्रसिद्ध हैं? लोकालोक का प्रमाण क्‍या है ! महाभूतों का प्रमाण क्‍या है ? चन्द्र सूय की गति तथा उनकी परिधि और विस्तार क्या है ? यह हम लोगों को विस्तार के साथ क्रमश: सुनाइये

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 77

निहता दानवाः सर्वे देवेशेन सहस्रशः ।अन्धको ऽपि च तान् दृष्ट्वा दानवानवनिं गतान् ।ततो वाग्भिः प्रतुष्टाव देवदेवं महेश्वरम्

nihatā dānavāḥ sarve deveśena sahasraśaḥ / andhako 'pi ca tān dṛṣṭvā dānavānavaniṃ gatān / tato vāgbhiḥ pratuṣṭāva devadevaṃ maheśvaram

हिन्दी अर्थ

सृतजी बोले--इसके आगे हम पृथ्वी की परिधि विस्तार, समुद्रों की संख्या, द्वीपों का विस्तार, देश और वहाँ की नदियों के नाम, महाभूतों का प्रमाण, लोकालोक तथा सूमं-चन्द्रों की गति और उनका परिमाण क्रमशः कहते हैं ।४-५। सातों द्वीपों के अन्तर्गत हजारों उपद्वीप हैं, जिनका प्रमाण के साथ प्रथक् पृथक

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 78

अन्धक उवाच: जयस्व देवदेवेश उमार्धार्धाशरीरधृक् ।नमस्ते देवदेवेश सर्वाय त्रिगुणात्मने

andhaka uvāca: jayasva devadeveśa umārdhārdhāśarīradhṛk / namaste devadeveśa sarvāya triguṇātmane

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिद्नान्तगंतग्रन्यो घ, पुस्तके नास्ति। सप्तद्वीपं तु बक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सह । येषां सनुष्यास्तकेण प्रमाणानि प्रचक्षते ७ अचिन्त्या: खलु ये भाषा न तांस्तकेंण भावयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यच्च तत्नित्यं च प्रचक्ष्य (क्ष) ते

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 79

वृषभासनमारूढ शशाङ्ककृतशेखर ।जय खट्वाङ्गहस्ताय गङ्गाधर नमो ऽस्तु ते

vṛṣabhāsanamārūḍha śaśāṅkakṛtaśekhara / jaya khaṭvāṅgahastāya gaṅgādhara namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

शतमेक॑ सहस्राणां योजनानां प्रमाणतः नानाजनपदाकीणें: पुरैश्च विविध: शुभ: १०

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 80

नमो डमरुहस्ताय नमः कपालमालिने ।स्मरदेहविनाशाय महेशाय नमो ऽस्तु ते

namo ḍamaruhastāya namaḥ kapālamāline / smaradehavināśāya maheśāya namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

जम्बृद्वीपस्य विस्तारात्समेन तु समन्ततः । प्रागायता: सुपर्वाण: षडिसे दर्षपर्बंता: ॥ छ् हिमप्रायश्च हिमवान्हेमक्टश्च हेमवान् । तरुणादित्यवर्णाभो हैरण्यो निषधः स्मृतः १४

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 81

पूष्णो दन्तनिपाताय गणनाथाय ते नमः ।जय स्वरूपदेहाय अरूपबहुरूपिणे

pūṣṇo dantanipātāya gaṇanāthāya te namaḥ / jaya svarūpadehāya arūpabahurūpiṇe

हिन्दी अर्थ

वर्णन सौ वर्षो में भी नहीं हो सकता है ।६। इस समय चन्द्र, सूर्य और ग्रहों के साथ केवल सातों द्वीपों का ही वर्णन करते हैं। मनुष्य गण तर्क द्वारा इनका प्रमाण कहा करते हैं किन्तु जो अचिन्तनीय विषय हैं, उनके सम्बन्ध में तक नहीं करना चाहिए.। जो प्रकृति से अतीत परम वस्तु है, वही नित्य कहलाता है ॥७-८। जो हो, हम नौ देशों वाले जम्बूद्वीप का यथारूप वर्णन करते हैं । वत्ताकार इस द्वीप का विस्तार जितने योजनों

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 82

उत्तमाङ्गविनाशाय विरिञ्चेरपि शङ्कर ।श्मशानवासिने नित्यं नित्यं भैरवरूपिणे

uttamāṅgavināśāya viriñcerapi śaṅkara / śmaśānavāsine nityaṃ nityaṃ bhairavarūpiṇe

हिन्दी अर्थ

का है, सो सुनिये ।९। इस द्वीप का परिमाण एक हजार एक सौ योजन का है इस द्वीप में कितने ही देश हैं ओर विविध भांति के सुन्दर पुरों से तथा सिद्ध, चारण, गन्धवं एवं पत्तों से सुशोभित हैं। यहाँ के पर्ब॑तों में नाना प्रकार की धातु भरी पड़ी हैं, शिलाखण्डों से और फ्वंतीय नदियों से सब पर्वत सुशोभित हो रहें हैं । इस प्रकार यह शोभा-सम्पन्न विद्ञाल अम्बूढीप नौ देशों में विभक्त और भूतभावन देवों द्वारा व्याप्त है तथा चारों ओर लवण सागर से घिरा हुआ है ।१०-१२। चारों भोर से जम्बूद्वीप के विस्तार के ही अनुसार पृ की ओर अधिक लम्बे, और सुन्दर शिखरों से युक्त छः वर्ष पवेत हैं। वे सब दोनों ओर फेलकर पूर्व-पद्चिम समुद्रों में डबे हुये हैं ।१२। इन छवों देश-विभाजक पव॑तों के नाम हैं--तुषारावत, हिमवान, हेममय, हेमकट, बाल-सूर्य के समान सूनहला निषध और चातुवर्णमय सुवर्णमण्डित मेरे । मेरु सवसे उच्चतम कहा गया है।

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 83

त्वं सर्वगो ऽसि त्वं कर्ता त्वं हर्ता नान्य एव च ।त्वं भूमिस्त्वं दिशश्चैव त्वं गुरुर्भार्गवस्तथा

tvaṃ sarvago 'si tvaṃ kartā tvaṃ hartā nānya eva ca / tvaṃ bhūmistvaṃ diśaścaiva tvaṃ gururbhārgavastathā

हिन्दी अर्थ

इसका प्रमाण प्लुताकृति / ऊबड़-खाबड़ ), चौकोर और बहुत ऊँचा है। इसके चारों ओर भिन्न-भिन्न वर्ण

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 84

सौरिस्त्वं देवदेवेश भूमिपुत्रस् तथैव च ।ऋक्षग्रहादिकं सर्वं यद्दृश्यं तत्त्वमेव च

sauristvaṃ devadeveśa bhūmiputras tathaiva ca / ṛkṣagrahādikaṃ sarvaṃ yaddṛśyaṃ tattvameva ca

हिन्दी अर्थ

नानावर्णस्तु पाश्वेषु प्रजापतिगुणान्वितः । नाभिबन्धनसंभूतो ब्रह्मणो5व्यक्तजन्मनः ३१६ पृबतः श्वेतवर्णोडसौ ब्राह्मण्यं तस्य तेन तत् । पीतश्च दक्षिणेनासौ तेन वेश्यत्वमिष्यते... भूड़पत्रनिभश्चासौ पश्चिमेन महाबल: । तेनास्य शुद्वता दृष्टा मेरोर्नानाथंकारणात् १८ पाश्व॑मृत्तरतस्तस्य रक्तवर्ण स्वभावतः । तेनास्य क्षत्रता च स्थादिति वर्णा: प्रकीतिताः ॥

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 85

एवं स्तुतिं तदा कृत्वा देवं प्रति स दानवः ।संहताभ्यां तु पाणिभ्यां प्रणनाम महेश्वरम्

evaṃ stutiṃ tadā kṛtvā devaṃ prati sa dānavaḥ / saṃhatābhyāṃ tu pāṇibhyāṃ praṇanāma maheśvaram

हिन्दी अर्थ

एते पर्वंतराजानः सिद्ध वारणसे विता: । तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्र उच्यते

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 86

ईश्वर उवाच: साधु साधु महासत्त्व वरं याचस्व दानव ।दाताहं याचकस्त्वं हि ददामीह यथेप्सितम्

īśvara uvāca: sādhu sādhu mahāsattva varaṃ yācasva dānava / dātāhaṃ yācakastvaṃ hi dadāmīha yathepsitam

हिन्दी अर्थ

मध्ये त्विलावृतं यस्तु महासेरोः समनन्‍्ततः । नवंब तु सह्नाणि विस्तीर्ण: पबंतस्तु सः ॥ हैं है सहस्न निस्तीर्णा योजनानि समुच्छ॒यात् २२ जस्बृद्वीयस्य विस्तारात्तेषामायाम उच्यते । योजनानां सहु्नाणि शते है मध्यमो गिरी २४

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 87

अन्धक उवाच: यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम ।तदात्मसदृशो ऽहं ते कर्तव्यो नापरो वरः

andhaka uvāca: yadi tuṣṭo'si deveśa yadi deyo varo mama / tadātmasadṛśo 'haṃ te kartavyo nāparo varaḥ

हिन्दी अर्थ

के भनुष्य निवास करते हैं; अतएव यह प्रजापति के गुणों से युक्त है। अव्यक्त जन्मा ब्रह्मा के नाभि बन्धन से यह उत्पन्न हुआ है।१४-१६। पूर्व में यह श्वेत वर्ण है; अतः उससे इसका ब्राह्मणत्व जाना जाता है । दक्षिण ओर से यह पीत है; अतः उससे इसका वेश्यत्व प्रकट होता है ।१७॥ यह महाबली मेरु पश्चिम की ओर भूृंगपत्र की तरह काला है; अतः उससे इसकी शूद्रता देखी जाती है ओर उत्तर की ओर यह स्वभाव से ही

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 88

भस्मी जटी त्रिनेत्री च त्रिशूली च चतुर्भुजः ।व्याघ्रचर्मोत्तरीयश्च नागयज्ञोपवीतकः

bhasmī jaṭī trinetrī ca triśūlī ca caturbhujaḥ / vyāghracarmottarīyaśca nāgayajñopavītakaḥ

हिन्दी अर्थ

लाल वर्ण का है, उससे इसका क्षत्रिय होना व्यक्त होता है। नाना वर्ण मय होने के कारण यह चातुर्व॑ण्यं कहा गया है स्वभाव, वर्ण और परिमाण के कारण यह व्यक्त कहा गया है ।१८-१६। नील गिरि बेढूये (मूंगा) और हिरण्यमय है । इसके शिखर उज्ज्वल हैं। मयूरपिच्छ की तरह यह सुन्दर है और इसके शिखर सुवर्णमय हैं। ये पबंतराज हैं, जो सिद्ध-गन्धवाँ से सेवित हैं। इनका अन्तर विष्कम्भ नौ हजार योजत का कहा जाता है। इन पर्वतों के बीच इलावुत नाम का देश हैं, जिसका वर्ष पर्वत नो हजार योजन का है और जो मेरु को चारों ओर से घेरे हुये हैं।२०-२१। मेर इनके बीच वैसा ही मालूम पड़ता है, जैसे बिना धुर्ये की अग्नि ।२२। मेरु के दक्षिणाद्ध और उत्तराद्ध के रूप में दक्षिण वेदी और उत्तर वेदी है। इनके बीच जो सात देश हैं, उनके वर्ष पर्वतों का विस्तार दो-दो हजार योजनों का है। उनका विश्तार जम्बूद्वीप के विस्तार के

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 89

एतदिच्छाम्यहं सर्वं यदि तुष्टो महेश्वर

etadicchāmyahaṃ sarvaṃ yadi tuṣṭo maheśvara

हिन्दी अर्थ

अनुसार कहा जाता है अथवा जम्बूद्वीप से वे अधिक बड़े हैं। उनके मध्य में स्थित नील और मध्य नामक पर्वेत दो हजार दो सौ योजनों के हैं ।२३-२४॥ इनकी अपेक्षा और जो इवेत, हेमक्ट, हिमवान्, झज्जवान्

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

अध्याय ४८

श्लोक 90

ईश्वर उवाच: ददामि ते वरं ह्यद्य यस्त्वया याचितो ऽनघ ।गणेषु मे स्थितः पुत्र भृङ्गीशस्त्वं भविष्यसि

īśvara uvāca: dadāmi te varaṃ hyadya yastvayā yācito 'nagha / gaṇeṣu me sthitaḥ putra bhṛṅgīśastvaṃ bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

इदं हैमबत वर्ष भारतं नाम विश्वुतम् । हेमकूर्ट परं तस्मान्नाम्ना किपुरुषं स्मृतम् २८ धनुःसंस्थे च विज्ञेये है वर्ष दक्षिणोत्तरे । दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यम तदिलावुतम् ३३१

English

Thus have been described in details the four great continents adorned with islands interspersed in between as well as Jambudvipa together with its adjacent islands.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 48
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.