Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
67
अध्याय 67 / 232

Adhyaya 67

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पूर्ण अध्याय पाठ109 श्लोक

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अध्याय ६७

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे मातृतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्षष्टितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ६७ श्रीमार्कण्डेय उवाच: तस्यैवानन्तरं तात जलमध्ये व्यवस्थितम् ।लुङ्केश्वरम् इति ख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe mātṛtīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭṣaṣṭitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 67 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tasyaivānantaraṃ tāta jalamadhye vyavasthitam / luṅkeśvaram iti khyātaṃ surāsuranamaskṛtam

हिन्दी अर्थ

योजन चला करते हैं। क्षीरोद समुद्र के उत्तर उदित होकर चलते हुये सूये जब दक्षिण दिल्ला से लौटकर विषुव रेखा पर स्थित होते हैं, उस काल में विषुब मण्डल के योजन-प्रमाण को धुनिये ।(२२-१२५२। इस विषुव का विस्तार तीन करोड़ एकासी लाख योजन है। छठ शाकद्वीप के उत्तर उदित होकर विचरण करते समय जब सूर्य श्रावण मास में उत्तर दिशा में चले जाते हैं, तब उत्तरीय दिशा के मण्डल-प्रमाण को

English

On hearing his words, the sages and ascetics of the Naimisa forest asked the most excellent one (i.e. Suta) in due course.

अध्याय ६७

श्लोक 2

इदं तीर्थं महापुण्यं नानाश्चर्यं महीतले ।अस्य तीर्थस्य माहात्म्यम् उत्पत्तिं शृणु भारत

idaṃ tīrthaṃ mahāpuṇyaṃ nānāścaryaṃ mahītale / asya tīrthasya māhātmyam utpattiṃ śṛṇu bhārata

हिन्दी अर्थ

विद्वानों ने एक करोड़, अस्सी नियुत अठावन योजन बताया है। सूर्यके गमनमार्ग के दो नाम हैं नागवीथों और अजवीधी । उत्तरवाली नागवीबी है और दक्षिणवाली अजवीथी मूल, पूर्वाषाढ और उत्तराषाढ़ नामक तीनों नक्षत्रों में जब सूर्य उदित होते हैं, तब उसका नाम अजबीथी होता है एवं अभिजित से लेकर तीन नक्षत्रों में जब उदय होता है, तब उसका नाम नागवीथी रहता है।१२६-१३०। इन दोनों दिशज्ञाओं में जो अन्तर है उसे हम योजनों में बताते हैं। यह दोनों दिशाओं का अन्तर एकतीस लाख तेंतीस सौ तैंतीस योजन का है, किस्तु इसकी संख्या एक योजन ऊपर से की गयी है । दक्षिण और उत्तर दिशाओं के रेखामध्यगत अम्तर की संख्या भी हम योजनों में बताते हैं, सुनिये ।!३१-१३३॥ इन दोगों रेखाओं में एक से दूसरे का अन्तर एकहृत्तर नियुत एक हजार पचहुत्तर योजन है। दोनों दिशाओं की बाहरी और

English

How were the Devas, the extremely powerful Adityas, the chief of whom were Indra and Visnu, born in the seven

अध्याय ६७

श्लोक 3

आसीत्पुरा महावीर्यो दानवो बलदर्पितः ।कालपृष्ठ इति ख्यातः सुतो ब्रह्मसुतस्य च

āsītpurā mahāvīryo dānavo baladarpitaḥ / kālapṛṣṭha iti khyātaḥ suto brahmasutasya ca

हिन्दी अर्थ

भीतरी रेखाओं का परिमाण एक सा ही कहा गया है सूं जब उत्तर की ओर रहते हैं, तब वे भीतरी

English

On being urged and requested by the expounders of the Brahman (Vedas) the modest Suta, the most excellent among eloquent ones spoke in accordance with the query of the great sages.

अध्याय ६७

श्लोक 4

गङ्गातटं समाश्रित्य चचार विपुलं तपः ।अधोमुखो ऽपि संस्थित्वापिबद्धूमम् अहर्निशम्

gaṅgātaṭaṃ samāśritya cacāra vipulaṃ tapaḥ / adhomukho 'pi saṃsthitvāpibaddhūmam aharniśam

हिन्दी अर्थ

चरते दक्षिण चापि तावदेव विभावसु: प्रमाणं मण्डलस्याथ योजनाग्रान्निबोधत एकॉविशद्योजनानां सहल्लाणि समासत:ः । शते हूं पुनरप्यन्ये योजनानां प्रकोतिते

English

All the Devas created from the mouth of Brahma with a desire for progeny in the Manvantaras had their bodies constituted of Mantras.

अध्याय ६७

श्लोक 5

ततश्चानन्तरं देवस्तिष्ठते ह्युमया सह ।दृष्ट्वा तं पार्वती सा तु तपस्युग्रे व्यवस्थितम्

tataścānantaraṃ devastiṣṭhate hyumayā saha / dṛṣṭvā taṃ pārvatī sā tu tapasyugre vyavasthitam

हिन्दी अर्थ

विष्कम्भो मण्डलस्थेव तिर्यंक्स तु विधीयते । प्रत्यहुं चरते तानि सूर्यो वे सण्डलक्रमम्

English

But they did not act in accordance with the instruc¬ tion of Paramesthin (Brahma). They found out defects even in those who abide by the mental, verbal and physical activities of a truthful nature; they saw the fruits of actions excessively reduced; they hated progeny and procreation. They were alei t but free from the sense of my-ness (possession); they aspired for permanence; they were detached (from worldly objects); they saw defects (in worldly activities); they abandon¬ ed wealth, love and virtue; they adhered to knowledge pertaining to the supreme being and remained with their splendour withdrawn.

अध्याय ६७

श्लोक 6

पश्य पश्य महादेव धूमाशी तिष्ठते नरः ।प्रसीद तं कुरुष्वाद्य देहि शीघ्रं वरं विभो

paśya paśya mahādeva dhūmāśī tiṣṭhate naraḥ / prasīda taṃ kuruṣvādya dehi śīghraṃ varaṃ vibho

हिन्दी अर्थ

कुलालचक्पयेन्तो यथा शीघ्र निवतंते । दक्षिणे प्रक्ृसे सुयेस्तथा शीघ्र निवतंते तस्मात्प्रकृष्टां भूमि च कालेनाल्‍पेन गच्छति । सूर्यो द्वादशभिः शीघ्र मुह॒र्तेदेक्षिणोत्तरे

English

On realising the trend of their thought, Brahma became angry. Brahma spoke to those gods in despair.

अध्याय ६७

श्लोक 7

ईश्वर उवाच: यदुक्तं वचनं देवि न तन्मे रोचते प्रिये ।स्वकार्यं च सदा चिन्त्यं परकार्यं विसर्जयेत्

īśvara uvāca: yaduktaṃ vacanaṃ devi na tanme rocate priye / svakāryaṃ ca sadā cintyaṃ parakāryaṃ visarjayet

हिन्दी अर्थ

त्रयोदशार्धमर्घेन ऋक्षाणां चरते रविः ॥ तस्माद्दीघेंण कालेन भुमिमल्‍पां निगच्छति (३१४४५ अष्टादशमुहततेंस्तु उत्तरापणपश्चिमम् । अहरभेंवति तच्चापि चरते मन्दविक्वम:ः

English

"You have been created by me for the sake of further procieation and not otherwise. X have already told you to pro¬ create and be victorious.

अध्याय ६७

श्लोक 8

मूर्खस्त्रीबालशत्रूणां यश्छन्देनानुवर्तते ।व्यसने पतते घोरे सत्यमेतदुदीरितम्

mūrkhastrībālaśatrūṇāṃ yaśchandenānuvartate / vyasane patate ghore satyametadudīritam

हिन्दी अर्थ

मण्डल में परिभ्रमण करते हैं ओर जब दक्षिण में रहते हैं तब बाहरी मण्डल की परिक्रमा करते हैं। इसी क्रम से वे सदा एक सौ अस्सी मण्डलों के भीतर-बाहर घूमा करते हैं । दक्षिण दिश्या में भी सूर्य इसी प्रकार चला करते हैं। यहाँ के मण्डल का परिमाण भी संलेप से योजनों में सुनिये ।(३४-१३७।. इस मण्डल का प्रमाण इक्कीस ' हजार दो सो इककीस योजन कहा गया है । मण्डल का विष्कम्भ या विस्तार बक्र है। सूर्य प्रति दिन मण्डलक्रम से अथात् एक के बाद दूसरे पर विचरण किया करते हैं।१३५-१४०। कुम्हार का चकक्‍का ज॑से शीघत्ष घूम आता है, उसी प्रकार सूर्य भी दक्षिण दिल्ला में जाकर ज्ञीघत्र लौट आते हैं। सूब॑ थोड़े हो काल में आर्थात् बारह घड़ियों में ही दक्षिण दिशा की उत्तमोत्तम भूमि में विचर आते हैं। दिन में सूय॑ साढ़े तेरह नक्षत्रों का परिभ्रमण कर लेते हैं और रात में बे अठारह मुह॒तों में फिर उतने ही

English

You have disregarded my words andh ave adhered to detachment. You hate your own birth. Hence you do not

अध्याय ६७

श्लोक 9

देव्युवाच: भार्ययाभ्यर्थितो भर्ता कारणं बहु भाषते ।लघुत्वं याति सा नारी एवं शास्त्रेषु पठ्यते

devyuvāca: bhāryayābhyarthito bhartā kāraṇaṃ bahu bhāṣate / laghutvaṃ yāti sā nārī evaṃ śāstreṣu paṭhyate

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रों का परिभ्रमण करते हूँ कुम्हार के चक्‍के के बीच का हिस्सा जिस प्रकार धीरे-धीरे घृमता है, उसी प्रकार उत्तरायण होने पर सूर्य का भी पराक्रम मन्‍्द हो जाता है. और वे धीरे-धीरे चलने लगते हैं । इस समय सूर्य अधिक देर में थोड़ी सी ही दूरी तय कर पाते हैं ।!४१-१४६। उत्तरायण काल में पश्चिम दिद्या में मन्द पराक्रम वाले सूय॑ अठारह मुहतों में चोदह नक्षत्रों का परिशक्रमण दिन में करते हैं। फिर रात में

English

When they bowed to him and implored, Brahma said to them again: "Who deserves (i.e. is capable) to be indepen¬ dent' in this world without being permitted by me.

अध्याय ६७

श्लोक 10

प्राणत्यागं करिष्यामि यदि मां त्वं न मन्यसे ।पार्वत्या प्रेरितो देवो गतो ऽसौ दानवं प्रति

prāṇatyāgaṃ kariṣyāmi yadi māṃ tvaṃ na manyase / pārvatyā prerito devo gato 'sau dānavaṃ prati

हिन्दी अर्थ

त्रिशन्मुहतनिवा55हरहोरात्र श्रुवो श्रमन् । उभयो: काष्ठयोमंध्ये क्रमते सण्डलानि सः १४६ उभयोः काष्ठयोमंध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु । दिवा नकत॑ च सूर्यस्य सन्‍दा शीक्रा च वे गतिः

English

Everything is pervaded by me. As against my will how will living beings attain anything auspicious or inauspicious.

अध्याय ६७

श्लोक 11

ईश्वर उवाच: किमर्थं पिबसे धूमं किमर्थं तप्यसे तपः ।किं दुःखं किं नु सन्तापो वद कार्यमभीप्सितम्

īśvara uvāca: kimarthaṃ pibase dhūmaṃ kimarthaṃ tapyase tapaḥ / kiṃ duḥkhaṃ kiṃ nu santāpo vada kāryamabhīpsitam

हिन्दी अर्थ

दक्षिणे प्रकरमे चेव दिवा शीघ्र' विधोयते । गतिः सूर्यस्य नकतं वे मनन्‍्दा चापि तथा स्मुता.

English

Whatever exists in the lvorld or is endowed with Sattva (existence) or Asattva (non-existence) has been pei- vaded by me with intellect and soul. Who in the world dare to deceive me?

अध्याय ६७

श्लोक 12

युवा त्वं दृश्यसे ऽद्यापि वर्षविंशतिर् एव च ।तदाचक्ष्व हि मे सर्वं तपसः कारणं महत्

yuvā tvaṃ dṛśyase 'dyāpi varṣaviṃśatir eva ca / tadācakṣva hi me sarvaṃ tapasaḥ kāraṇaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

एवं गतिविशेषेण विभजनराज्यहानि तु। तथा विचरते भार्ग समेन विषमेण चर. लोकालोके स्थिता ये ते लोकपालाश्रतुदिशम् । अगस्त्यश्ररते तेषासुपरिष्टाज्जवेन तु ॥। भजन्नसावहोरात्रमेव॑ गतिविशेषणेः

English

Whatever has been conjectured, decided or considered by the living beings is entirely known to me.

अध्याय ६७

श्लोक 13

दानव उवाच: अचला दीयतां भक्तिर्मम स्थैर्यं तवोपरि ।अपरं वर्षसाहस्रं निर्विघ्नं मे गतं विभो

dānava uvāca: acalā dīyatāṃ bhaktirmama sthairyaṃ tavopari / aparaṃ varṣasāhasraṃ nirvighnaṃ me gataṃ vibho

हिन्दी अर्थ

दक्षिणे नागवीथ्यायां लोकालोकस्य चोत्तरभ् । लोकसंतारकों हांष वेश्वानरपथादबहिः:

English

The entire Universe consisting of the mobile and the

अध्याय ६७

श्लोक 14

दिवसानां सहस्रे द्वे पूर्णे त्वत्तपसा मम

divasānāṃ sahasre dve pūrṇe tvattapasā mama

हिन्दी अर्थ

पृष्ठे यावत्प्रभा सौरी पुरस्तात्संप्रकाशते । पाश्वयो: प्ृष्ठतस्तावललोकालोकस्य सर्वतः भी वे उतने ही नक्षत्रों का परिभ्रमण अठारह मुहरतों में ही करते हैं। फिर चक्र की गति धीमी पड़ जाने से जसे उसके बीच का मृत्पिण्ड घूमता रहता है उसी प्रकार दोनों दिशाओं के मध्य में अवस्थित ध्रूव भी उस समय घूमा करता है। ध्रूव तीस मुह॒तों में एक अहोरात्र का परिम्रमण कर दोनों दिशाओं के मध्य में स्थित मण्डलों की परिक्रमा करता है । कुम्हार के चक्‍के का नाभि-देश ज॑से जहाँ का तहाँ पड़ा रहता है,

English

Since I have transformed myself for the sake of creation and not for any other purpose, who will be free

अध्याय ६७

श्लोक 15

ईश्वर उवाच: याचयाभीप्सितं कार्यं तुष्टो ऽहं तव सुव्रत ।देवस्य वचनं श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः

īśvara uvāca: yācayābhīpsitaṃ kāryaṃ tuṣṭo 'haṃ tava suvrata / devasya vacanaṃ śrutvā cintayāmāsa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

उसी प्रकार ध्रूव भी एक स्थान पर ही वर्तमान रहते हैं (!४७-१५०। दोनों दिशाओं के मध्य में मंडलों का परिभ्रमण करने वाले सूर्य की गति दिन में मन्दर और रात में तीत्र हो जाती है। चर्वठमा की उत्तर दिशा में गति होने से दिन की गति मनन्‍्द पड़ जाती है और उसी दिशा में सूर्य की गति होने से रात की गति तीव्र हो जाती है। चन्द्रमा के दक्षिण जाने से दिन की गति तीत्र हो जाती है और सूर्य दक्षिण जाने से रात

English

After saying this to the group ofjaya Devas who ac¬ cepted his punishment and who were dejected, Prajapati spoke again to them (in consolation).

अध्याय ६७

श्लोक 16

किं नाकं याचयाम्यद्य किमद्य सकलां महीम् ।एवं संचिन्तयामास कामबाणेन पीडितः

kiṃ nākaṃ yācayāmyadya kimadya sakalāṃ mahīm / evaṃ saṃcintayāmāsa kāmabāṇena pīḍitaḥ

हिन्दी अर्थ

की गति मन्द हो जाती है ।१५१-१५३। इस प्रकार अपने गति-विशेष से दिन-रात का विभाग करते हुये वे सम और विषम मार्ग से विचरण किया करते हैं । लोकालोक पव॑त के चारों ओर जो लोकपालगण अवस्थित हैं उनके ऊपर होकर अगस्त्य वेग से चला करता है और यही अपने गति विशेष से दिन-रात का विभाग किया करता है ।१५४-१५५। नागवीधी के दक्षिण और लोकालोक के उत्तर एवं बंदवानर पथ के बाहर लोक को तारने वाला अगस्त्य वतेमान है। लोकालोक पबेत के पृष्ठ भाग और अग्रभाग में सूयें की जितनौ प्रभा चमकती है, उतनी ही उसके दोनों पादवों में पष्ठ भाग में और सभी स्थानों में चमकता है। सारांश यह है कि स॒र्य उस पव॑त के दो भागों को प्रकाशित करते हैं, तो अगस्त्य भी उसके दो भागों को प्रकाशित करता

English

"Since, after open declaration to me, renunciation had been adopted by you formerly and since excessive effort, though fruitless, had been put in by you, O Devas, your future births will result in ultimate happiness.

अध्याय ६७

श्लोक 17

दानव उवाच: यदि तुष्टो ऽसि मे देव वरं दास्यसि मे प्रभो ।सङ्ग्रामैस्तु न तुष्टो ऽहं बलं नास्तीति किंचन

dānava uvāca: yadi tuṣṭo 'si me deva varaṃ dāsyasi me prabho / saṅgrāmaistu na tuṣṭo 'haṃ balaṃ nāstīti kiṃcana

हिन्दी अर्थ

पोजनानां सहर्नाणि दशोध्वें तुच्छितो गिरिः । प्रकाशश्रवाप्रकाशभ्र स्वतः परिमण्डल:

English

O excellent Devas, your birth will be in accordance with your own will. In the six Manvantaras beginning with Svayambhuva and ending with Vaivasvata, O Suras, all of you will be moving ahead, deluded (by Avidya)". After knowing

अध्याय ६७

श्लोक 18

यस्य मूर्धन्यहं देव पाणिना समुपस्पृशे ।देवदानवगन्धर्वो भस्मसाद्यातु तत्क्षणात्

yasya mūrdhanyahaṃ deva pāṇinā samupaspṛśe / devadānavagandharvo bhasmasādyātu tatkṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रचन्धसुर्याश्व ग्रहास्तारागणे: सह । अभ्यन्तरं प्रकाशन्ते लोकलोकस्य वे गिरेः एतावानेव लोकस्तु निरालोकस्त्वतः परम् । लोफालोक एकधा तु निरालोकस्त्वनेकथा १६० लोकालोक तु संध्ते यस्मात्सूयें: परिग्रहम् । तस्मात्संध्येति तामाहुरुषाब्युष्ट्योयंदन्तरम् ॥।

English

"Those who perform holy actions such as the study of the three Vedas, maintenance of celibacy, procreation of progeny, performance of oraddhas, and Yajfias and practice of charity become free from sin (Rajas) and are always praised by others".

अध्याय ६७

श्लोक 19

ईश्वर उवाच: यत्त्वया चिन्तितं किंचित्तत्सर्वं सफलं तव ।उत्तिष्ठ गच्छ शीघ्रं त्वं भवनं प्रति दानव

īśvara uvāca: yattvayā cintitaṃ kiṃcittatsarvaṃ saphalaṃ tava / uttiṣṭha gaccha śīghraṃ tvaṃ bhavanaṃ prati dānava

हिन्दी अर्थ

उषा रात्रि: स्मृता विप्रेव्युष्टिश्वापि त्वहः स्मृतम् द १६१

English

Aftc" reciting thus the verse he spoke to the Devas, Jayas again—"When the Vaivasvata Manvantara is over, you w:Ii come here near me.

अध्याय ६७

श्लोक 20

दानव उवाच: स्थीयतां देवदेवेश यावज्ज्ञास्यामि ते वरम् ।युष्मन्मूर्ध्नि न्यसे पाणिं प्रत्ययो मे भवेद्यथा

dānava uvāca: sthīyatāṃ devadeveśa yāvajjñāsyāmi te varam / yuṣmanmūrdhni nyase pāṇiṃ pratyayo me bhavedyathā

हिन्दी अर्थ

सूर्य हि प्रसमानानां संध्याकाले हि रक्षसाम् । प्रजापतिनियोगेन शापस्तेषां दुरात्मनाम् ॥ तिल्रः कोटचस्तु विख्याता मन्देहा नाम राक्षसाः । प्रार्थथन्ति सहरस्रांशुमुदयन्तं दिने दिने ॥ तापयन्तो दुरात्मानः सुर्यंसिच्छन्ति खादितुम् .

English

Then you will attain eternal Siddhi along with me". After speaking thus to them, Brahma vanished there itself.

अध्याय ६७

श्लोक 21

ततश्चानन्तरं देवश्चिन्तयानो महेश्वरः ।न स्कन्दो न हरिर्ब्रह्मा यः कार्येषु क्षमो ऽधुना

tataścānantaraṃ devaścintayāno maheśvaraḥ / na skando na harirbrahmā yaḥ kāryeṣu kṣamo 'dhunā

हिन्दी अर्थ

अथ सू्ंस्य तेषां च युद्धमासोत्सुदारुणम् । ततो ब्रह्मा च देवाश्व ब्राह्मणाश्चेव सत्तमा: ॥ संध्येति समुपासन्त: क्षेपयन्ति सहाजलमभ्

English

Thereafter, their bodies turned into twelve lakes. They came to be known by the name Jaya and they resembled the oceans.

अध्याय ६७

श्लोक 22

ज्ञात्वा चैवापदं प्राप्तां देवः प्रार्थयते वृषम् ।अनेन सह पापेन युध्यस्व साम्प्रतं क्षणम्

jñātvā caivāpadaṃ prāptāṃ devaḥ prārthayate vṛṣam / anena saha pāpena yudhyasva sāmprataṃ kṣaṇam

हिन्दी अर्थ

ओंक्रब्रह्मसंयुक्तं गायत्र्या चाभिमन्त्रितम् । तेन दह्यान्ति ते देत्या वज्रभुतेत वारिणा. ( + अग्निहोत्रे हृयमाने समन्तादुबाह्मणाहुतिः । सुर्नज्योति: सहस्रांशुः सूर्यो दीप्यति भास्करः)

English

Then, in that Svayaiiibhuva Manvantara, those Suras (Gods) were born as the sons Ruci and Ajita. They were twelve in number and were known as Ajitas. 1

अध्याय ६७

श्लोक 23

करं प्रासारयद् दैत्यो देवं मूर्ध्नि किल स्पृशेत् ।लाङ्गूलेनाहतो दैत्यो विषण्णः पतितो भुवि

karaṃ prāsārayad daityo devaṃ mūrdhni kila spṛśet / lāṅgūlenāhato daityo viṣaṇṇaḥ patito bhuvi

हिन्दी अर्थ

है । यह पर्बत एक हजार दस योजन ऊँचा है। यह एक ओर से प्रकाशवान् और दूसरी ओर से अन्धकारपूर्ण एवं चारों ओर मंडलाकार है । चन्द्र-सूर्यादि नक्षत्र ग्रह ताराओं के साथ इस लोकाकोक पर्बत के भीतर ही प्रकाशित होते हैं ।१५६-१५९। यहाँ तक तो लोक है, उसके बाद निरलोक हैं। लोकालोक एके ही है; किन्तु निरालोक की गणना नहीं की जा सकती है। जिस कारण सू्य॑ भ्रमण करते समय लोकालोक का संधान

English

These mental sons known as the twelve Ajitas were \ idhi, Munaya (?), Ksema, Nanda, Avyaya, Prana, Apana, Sudhama, Kratu, Sakti and Vyavasthita.

अध्याय ६७

श्लोक 24

देवस्तु दक्षिणामाशां गतश्चैवोमया सह ।भयभीतो निरीक्षेत ग्रीवां भज्य पुनःपुनः

devastu dakṣiṇāmāśāṃ gataścaivomayā saha / bhayabhīto nirīkṣeta grīvāṃ bhajya punaḥpunaḥ

हिन्दी अर्थ

करते हैं इसी कारण उषा और व्युष्टि के मध्य को द्विजगण संध्या कहा करते है एवम् उषा को रात्रि कहते हैं और व्युष्टि को दिन ।१६०-१६१। एक बार संध्या काल में दुरात्मा राक्षसों ने सूर्य को खा जाता चाहा; किन्तु प्रजापति ने उन्हें शाप दे दिया, जिससे उनकी (तात्कालिक) मृत्यु हो गई; परन्तु उनकी देह सदा के लिये अक्षय हो गयी । ये मन्देह नामक राक्षस संख्या में तीन करोड़ हैँ। ये दुरात्मा प्रति दिन उद्य काल में सु को खा जाना चाहते हैं और उन्हें पीड़ा पहुँंचाते हैं !६२-१६३। तब सूर्य के , साथ उन राक्षसों का घनघोर युद्ध होता है । ब्राह्मणों के साथ श्रेष्ठ देवतागण और ब्रह्मा उस समय सन्ध्या की उपासना करने लग जाते है एवं गायत्री तथा ओंकार से अभिमन्त्रित कर महाजल प्रदान करते हैँ ।१६४। उस वबजभूत जल से वे देत्यगण जल जाते हैं । इनता ही नहीं ब्राह्मण लोग भी सर्ंत्र अग्निहोत्र में यथाविधि आहुतियाँ

English

In Yajnas they are proclaimed as the partakers of the fruits of Yajnas along with the Suras in the Svayaiiibhuva Manvantra. Again in the Svarocisa Manvantara, they were born as the sons of Svarocisa and Tusita,

अध्याय ६७

श्लोक 25

गते चादर्शनं देवे युयुधे वृषभेण सः ।द्वावेतौ बलिनां श्रेष्ठौ युयुधाते महाबलौ

gate cādarśanaṃ deve yuyudhe vṛṣabheṇa saḥ / dvāvetau balināṃ śreṣṭhau yuyudhāte mahābalau

हिन्दी अर्थ

देने लग जाते हैं. जिससे सहन क्रिरण वाले प्रभा-सम्प्न्न सुये जगमगा उठते है । तब फिर महातेजस्वी, अत्यन्त

English

They were known by the names Tusitas 2 and Pranas. They were the Suras and partakers of Yajnas. Again theses Tusitas were born as the auspicious sons of Uttama and Satya in the Uttama Manvantara. Then those Devas were remembered as Satyas in the Uttama Manvantara.

अध्याय ६७

श्लोक 26

प्रहारैर् वज्रसदृशैः कोपेन घटिकात्रयम् ।पाणिभ्यां न स्पृशेद् यो वै वृषभस्य शिरस्तथा

prahārair vajrasadṛśaiḥ kopena ghaṭikātrayam / pāṇibhyāṃ na spṛśed yo vai vṛṣabhasya śirastathā

हिन्दी अर्थ

+घनुरिचिह्वान्तगंतग्रन्थ क. पुस्तके नास्ति । रै८० वायुपुराणम्

English

In the Dvapara Yuga of the third Manvantara, they became the partakers of Yajnas. When the Tamasa

अध्याय ६७

श्लोक 27

हत्वा लाङ्गूलपातेन आगतो वृषभस्तदा ।उत्थितश्चाप्यसौ दैत्यो व्रजते वृषपृष्ठतः

hatvā lāṅgūlapātena āgato vṛṣabhastadā / utthitaścāpyasau daityo vrajate vṛṣapṛṣṭhataḥ

हिन्दी अर्थ

तत: प्रयाति भगवान्त्राह्मण: परिवारितः । वालखिल्येश्र मुनिभिः कृता्थें: समरीचिभिः १६८ काष्ठा निमेषा दश पतन्च चेव त्रिशच्च काष्ठा गणयेत्कलान्तभ् ।

English

Only 11 are enumerated.

अध्याय ६७

श्लोक 28

वायुवेगेन सम्प्राप्तो यत्र देवो महेश्वरः ।आगतं दानवं दृष्ट्वा वृषो वचनमब्रवीत्

vāyuvegena samprāpto yatra devo maheśvaraḥ / āgataṃ dānavaṃ dṛṣṭvā vṛṣo vacanamabravīt

हिन्दी अर्थ

त्रिशत्कलाश्चेव भवेन्मुह॒तंस्तेलिशता राज्यहनी समेते हासव॒ष्टी त्वहर्भागेदिवसानां यथाक्रमम् । संध्या मुहतंमानं तु क्ासे वृद्धों समा स्मृता १७० लेखाप्रभृत्यथा55दित्ये त्रिमुहूर्तागते तु वे । प्रातस्तनः स्मृतः कालो भागस्त्वह्नः स पत्चमः .

English

The groups of gods are named after their mothers—a relic of matriarch- cal society?

अध्याय ६७

श्लोक 29

आरुह्य पृष्ठे मे देव शीघ्रमेव हि गम्यताम् ।आरुह्य वृषभं देवो जगाम चोमया सह

āruhya pṛṣṭhe me deva śīghrameva hi gamyatām / āruhya vṛṣabhaṃ devo jagāma comayā saha

हिन्दी अर्थ

तस्मात्प्रातस्तनात्कालात्त्रिमुहतंस्तु संगवः । मध्याह्नस्त्रिमुहतंस्तु तस्मात्कालाच्च संगवात्ु .

English

When the Carisnava Manvantara arrived those Devas, the Haris, were born as the sons of Vaikuntha and Carisnu. In the fifth Manvantara those Devas were known by the name Vaikuntha 2.

अध्याय ६७

श्लोक 30

नाकं प्राप्तस् ततो देवो गतः शक्रस्य मन्दिरम् ।नात्यजद्देवपृष्ठं तु दानवो बलदर्पितः

nākaṃ prāptas tato devo gataḥ śakrasya mandiram / nātyajaddevapṛṣṭhaṃ tu dānavo baladarpitaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्मान्मध्यंदिनात्कालादपराहू ण इति स्मृतः । न्नय एव मुह॒र्तास्तु तस्मात्कालाच्च सध्यमात् अपराह्न व्यतीपाते कालः सायाह्नू उच्यते । दशपच्च मुहूर्ताद मुह॒र्तास्त्रय एवं च

English

In the Caksusa Manvantara, those Devas, the Vaiku- nthas were born as the twelve sons of Dharma and Sadhya.

अध्याय ६७

श्लोक 31

इन्द्रलोकं परित्यज्य ब्रह्मलोकं गतस्तदा ।यत्रयत्र व्रजेद्देवो भयात्सह दिवौकसैः

indralokaṃ parityajya brahmalokaṃ gatastadā / yatrayatra vrajeddevo bhayātsaha divaukasaiḥ

हिन्दी अर्थ

बर्धते हूसते चेव अयने दक्षिणोत्तरे । अहस्तु ग्रसते रात्रि राजिस्तु ग्रसते त्वहः १७६

English

When the Caksusa Manvantara elapsed and the Vaivasvata Manvantara arrived at the beginning of the first Treta Yuga (of that Manvantara), these Sadhyas- were born as the twelve Adityas, by means of their parts as the sons of Aditi and Kasyapa, the son of Marlci. Thus those who were origin¬ ally Jayas were born as Sadhyas in the Svayambhuva Manvan¬ tara as a result of the curse of (Brahma). Again they were born in the Caksusa Manvantara and were born as Adityas in the present Vaivasvata (Manvantara).

अध्याय ६७

श्लोक 32

अपश्यत्तत्र तत्रैव पृष्ठे लग्नं तु दानवम् ।सर्वांल् लोकान् भ्रमित्वा तु देवो विस्मयमागतः

apaśyattatra tatraiva pṛṣṭhe lagnaṃ tu dānavam / sarvāṃl lokān bhramitvā tu devo vismayamāgataḥ

हिन्दी अर्थ

द्तिमान् और महापराक्रमी सूय॑ं सौ हजार योजन ऊपर उठ जाते हैं। इतना हो जाने के बाद भगवान् ब्रह्मा कार्य सम्पन्न करने वाले मुनियों, ब्राह्मणों और मरीचि तथा वालखिल्य ऋषियों के साथ अपने स्थान को लौट जाते है ।१६५-१६८। पन्द्रह निमेषों की काष्ठा, तीस काष्ठा की कला, फिर तीस कला का मुहु्त और तीस मुहुर्तों का रात-दिन होता है। भाग के अनुसार दिवसों का यथाक्रम वृद्धि और ह्ास होता रहता रहता है, किन्तु सनध्या का परिणाम सदा एक मृहत॑ रहता है। दिन के न्यूताधिक होने का प्रभाव इस पर नहीं पड़ता है। सुययें जब अपनी रेखा पर उदय काल से तीन मुहतं तक चल चुकते है, तब वह॒ काल प्रातस्तन कहलाता है और वह दिन का पाँववाँ भाग होता है ।१६६-१७१। उस प्रातस्तन कान के बाद तीन मूहते तक संगव काल कहलाता है । उस संगव काल के बाद तीन मुह॒तं तक मध्याक्ष काल कहलाता है । उस मध्याह्व

English

He who faithfully reads this story of the seven births of the Devas at the bidding of the lord, does not meet with any obstacle or sin.

अध्याय ६७

श्लोक 33

न स्थानं विद्यते किंचिद्यत्र विश्रम्यते क्षणम् ।देवदानवयोस्तत्र युद्धं ज्ञात्वा सुदारुणम्

na sthānaṃ vidyate kiṃcidyatra viśramyate kṣaṇam / devadānavayostatra yuddhaṃ jñātvā sudāruṇam

हिन्दी अर्थ

काल के बाद तीन मुह॒तं तक अपराह्न रहता है। अपराक्तु बीत जाने के बाद का समय सायाह्न कहलाता है यह सायाह्व पन्द्रह मुहतों के बाद तीन मुहतों तक रहता है ।१७२-१७४॥ जब विषुवत् रेखा पर सूर्य स्थिर रहते हैँ, तब पन्द्रह मुहुर्तों का दिन और पन्द्रह मृह्तों की रात होती है। सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने पर रात और दिन घटते-बढ़ते रहते हैं । इसीसे कभी दिन रात को ग्रस लेता है और कभी

English

Thus the seven births of Jayas with seven charac¬ teristics have been narrated by me. 2 What else do you wish to hear?

अध्याय ६७

श्लोक 34

हर्षितात्मा मुनिस्तत्र चिरं नृत्यति नारदः ।धन्यो ऽहमद्य मे जन्म जीवितं च सुजीवितम्

harṣitātmā munistatra ciraṃ nṛtyati nāradaḥ / dhanyo 'hamadya me janma jīvitaṃ ca sujīvitam

हिन्दी अर्थ

रात दिन को ।१७४५-१७६। शरद् और वसन्‍्त काल के मध्य में सूर्य विषुवत् रेखा पर चले जाते हैं, + इदमर्ध नास्ति ख. गघ॒, हछ. पुस्तकेष ।

English

Narrate to us the origin and death in detail, of the Daityas, Danavas, Gandharvas, Serpents, Raksasas, all the Bhutas (goblins), Pisacas (ghosts), animals, birds and creepers.

अध्याय ६७

श्लोक 35

महान्तं च कलिं दृष्ट्वा संतोषः परमो ऽभवत् ।देवदानवयोस्तत्र युद्धं त्यक्त्वा च नारदः

mahāntaṃ ca kaliṃ dṛṣṭvā saṃtoṣaḥ paramo 'bhavat / devadānavayostatra yuddhaṃ tyaktvā ca nāradaḥ

हिन्दी अर्थ

निरमेषादिकृतः कालः काष्ठाया दश पश्च च। कलायास्त्रिशतः काष्ठा मात्राशीतिहयास्मिका ११७६

English

Thus requested, Siita told these excellent sages: "We have heard that Dili bore two sons to Kasyapa.

अध्याय ६७

श्लोक 36

आजगाम ततो विप्रो यत्र देवो महेश्वरः ।दृष्ट्वा देवो ऽथ तं विप्रं प्रतिपूज्याब्रवीद् इदम्

ājagāma tato vipro yatra devo maheśvaraḥ / dṛṣṭvā devo 'tha taṃ vipraṃ pratipūjyābravīd idam

हिन्दी अर्थ

शतध्नैकोनकास्त्रिशन्सात्रात्रिशत्बडुत्तरा । द्विषष्टिभावत्रयोविशन्मात्रायां च चला भवेतू. चत्वार्येब शतान्याहुविश्वुती बेधसे युगे । चरांशो ह्य॑ष विज्ञेगों नालिका चात्र कारणम् १८२ संवत्सरादयः पचच चतुर्मानविकल्पितः । निश्चयः सर्वकालस्य युगमित्यभिधीयते ३१८३

English

Those two sons are remembered as the eldest of all the sons of Kasyapa. The word Kaiipu means 'a mat*.

अध्याय ६७

श्लोक 37

भो नारद मुनिश्रेष्ठ जानीषे केशवं क्वचित् ।गत्वा तत्र च शीघ्रं त्वं केशवाय निवेदय

bho nārada muniśreṣṭha jānīṣe keśavaṃ kvacit / gatvā tatra ca śīghraṃ tvaṃ keśavāya nivedaya

हिन्दी अर्थ

पत्चमो वत्सरस्तेषां कालस्तु परिसंज्ञितः १८४ विशं शत भवेत्यूर्ण पवंणां तु रवेयुगम् । एतान्यष्टादर्शास्त्र (त्रि)शदुदयों भास्करस्य च १८५ ऋतवस्त्रिशतः सारा अयनानि दशैव तु । पश्चत्रिशच्छतं चापि षष्टिमसासाश्च भास्करः १८६ त्रिशदेव त्वहोरात्रं स तु मासश्च भास्करः । एकबष्टिस्त्वहो रात्रा दनुरेको विभाव्यते

English

The same set of gods, viz. Jayas is born in the beginning of each Manvantara with different names such as 'Tusita' in Svarocisa, 'Satya' in Uttama, Aditya in Vaivasvata. They derived their names from their mothers.

अध्याय ६७

श्लोक 38

नारद उवाच: देवदानवसिद्धानां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।सर्वेषामेव देवेशो हरते ध्रुवमापदम्

nārada uvāca: devadānavasiddhānāṃ gandharvoragarakṣasām / sarveṣāmeva deveśo harate dhruvamāpadam

हिन्दी अर्थ

अह्वां तु त्यधिकाशीतिः शर्त चाष्यधिक भवेत् । मान तच्चित्रभानोस्तु विज्ञेयं भुवनस्थ तु उस समय विषुव अर्थात् दिन-रात बराबर होता है। पर्द्रह दिनों का एक पक्ष, दो पक्षों का एक मास, दो महीनों की एक ऋतु तीन ऋतुओं का एक अयन और दो अयनों का एक संवत्सर होता है ।१७७-१७८। निमेष दि के द्वारा काल का विभाग किया जाता है। पन्द्रह निमेषों की एक काष्ठा और तोौस काष्ठाओं की कला, बयासी कलाओं की मात्रा होती है ! निन्‍्यानवे (?) छत्तीस, बासठ और तेईस मात्राओं की. चला होती है ।

English

It is noteworthy that these gods also are named after their mother.

अध्याय ६७

श्लोक 39

असंभाव्यं न वक्तव्यं मनसापि न चिन्तयेत् ।ईदृशीं नैव बुध्यामि आपदं च विभो तव

asaṃbhāvyaṃ na vaktavyaṃ manasāpi na cintayet / īdṛśīṃ naiva budhyāmi āpadaṃ ca vibho tava

हिन्दी अर्थ

चालीस हजार आठ सौ सत्तर या नब्बे मात्राओं की विद्युति होती है। चार सौ विद्युत् परिमाणों का सरांश या नलिका होती है ।१७९-१८२। पाँच प्रकार के जों संवत्सरादि हैं, उनका चतुरतिध मान कहा गया है। सभी काल में युगादि का भी निश्चय इसी प्रकार होता है । वत्सरों की विशेष संज्ञा इस प्रकार कही गयी है-पहला संवत्सर. दूसरा परिबत्सर, तीसरा इद्वत्सर चौथा अनुवत्सर और पाँचवां वत्सर ।१८३-१८४। बीस सो पर्वों के

English

O holy lord, mention in detail to us the name, origin and prowess of the noble-souled Daitya Hiranyakasipu.

अध्याय ६७

श्लोक 40

ईश्वर उवाच: गच्छ नारद शीघ्रं त्वं यत्र देवो जनार्दनः ।विदितं च त्वया सर्वं यत्कृतं दानवेन तु

īśvara uvāca: gaccha nārada śīghraṃ tvaṃ yatra devo janārdanaḥ / viditaṃ ca tvayā sarvaṃ yatkṛtaṃ dānavena tu

हिन्दी अर्थ

पूर्ण हो जाने पर एक सूर्य युग होता है। यह सूर्य के अठारह और तीस (अड़तालीस) बार उदय होने पर होता है ' सूर्य के दस अयन तीस ऋतुओं के होते है । इस प्रकार के पेंतीस सो अयनों के सूर्य के साठ महीने होते है ८५-१८६। सूथथ के एक महीने में तीस दिन-रात होते हैं। इस प्रकार के एकसठ अहोरात्र का एक दनु होता है। भानु का भुवन-भ्रमण मान एक सौ तिरासी दिनों का है । सौर, सौम्य, नक्षत्र ओर सावन नामक शे८२ वायुपुराणमु

English

Formerly the holy Asvamedha of Kasyapa was per¬ formed at Puskara. It was graced by (the presence of) deities and Gandharvas.

अध्याय ६७

श्लोक 41

अवध्यो दानवो ह्येष सेन्द्रैर् अपि मरुद्गणैः ।गत्वा तु केशवं देवं निवेदय महामुने

avadhyo dānavo hyeṣa sendrair api marudgaṇaiḥ / gatvā tu keśavaṃ devaṃ nivedaya mahāmune

हिन्दी अर्थ

सोरसोम्यं तु विज्ञेयं नाक्षत्रं सावनं तथा। नामान्येतानि चत्वारि ये: पुराणं विभाव्यते

English

For the purpose of discourses etc. in accordance with the excellent injunctions (in sacred scriptures) there were five golden seats kept there.

अध्याय ६७

श्लोक 42

नारद उवाच: न तु गच्छाम्यहं देव सुप्तः क्षीरोदधौ सुखी ।केशवः प्रेरणे ह्येषामादेशो दीयतां प्रभो

nārada uvāca: na tu gacchāmyahaṃ deva suptaḥ kṣīrodadhau sukhī / keśavaḥ preraṇe hyeṣāmādeśo dīyatāṃ prabho

हिन्दी अर्थ

तेश्चापि शुद्भवान्नाम सर्वतश्चेव विश्वुतः । एकमार्गश्च विस्तारों विष्कम्भश्चापि कोतित: अहस्तुल्यामथा रात्रि करोति तिमिरापहः १९४ हरिताभ्न हया दिव्यास्ते नियुक्ता महारथे । अनुलिप्ता इवा55भाति पद्म रक्‍त॑र्गंभस्तिभिः

English

Three of them were sanctified by means of Kusa grass. The (fourth had a) bundle of Kusa grass (over it) and (the fifth) a plank (over it). The four seats were intended for the chief Rtviks.

अध्याय ६७

श्लोक 43

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा राजानं च तथा प्रभुम् ।गुरुं चैवादितः कृत्वा शयानं न प्रबोधयेत्

mātrā svasrā duhitrā vā rājānaṃ ca tathā prabhum / guruṃ caivāditaḥ kṛtvā śayānaṃ na prabodhayet

हिन्दी अर्थ

मेषान्ते च तुलान्ते च भास्करोदयतः स्मुताः । मुहर्ता दश पञचेव अहो रात्रिश्न तावदी

English

The fifth was an auspicious, divine, golden one intend¬ ed for the Hotr. It was covered with divine cloth.

अध्याय ६७

श्लोक 44

ईश्वर उवाच: यदि क्वचिद् अगारेषु वह्निरुत्पद्यते महान् ।निधनं यान्ति तत्रस्था यद् बुध्येर् अन्नसूरयः

īśvara uvāca: yadi kvacid agāreṣu vahnirutpadyate mahān / nidhanaṃ yānti tatrasthā yad budhyer annasūrayaḥ

हिन्दी अर्थ

कृत्तिकानां यदा सुय्यः प्रथमांशगतों भवेत् । विशाखानां तथा ज्ञेयश्रतुर्थाश निशाकरः विशासायां यदा सुर्यश्ररतेंइशं तृतीयकम् । तदा चद्र॑ विजानीयात्कृत्तिकाशिरसि स्थितम्ू १९८ विषुवन्तं तदा विद्यादेवमाहुमंहष॑यः । सुर्येण विषुवं विद्यात्कालं सोमेन लक्षयेत्

English

Diti who had been pregnant for ten thousand years was occupying the seat of Paint (i.e. the wife of the sacificer, viz. Kasyapa).

अध्याय ६७

श्लोक 45

नारद उवाच: शीघ्रं गच्छ महादेव आत्मानं रक्ष सुप्रभो ।गच्छाम्यहं न सन्देहो यत्र देवो जनार्दनः

nārada uvāca: śīghraṃ gaccha mahādeva ātmānaṃ rakṣa suprabho / gacchāmyahaṃ na sandeho yatra devo janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

चार प्रकार के मान सभी पुराणों में कहे गये हैं। १८०७-१८९। इवेत पर्वत के उत्तर झशूद्भधवानू नाम का एक पर्वत है, जिसके तीनों श्यड्भ आकाद को छते रहते हैं । उन्हीं शज्भों के कारण उसका श्वृद्भवान नाम विख्यात है। इसका विस्तार तथा विष्कम्भ आदि पहले ही बताया जा चुका है ।१९०-१६१। इसका पूव॑-श्वद्भ सोने का है और दक्षिण ओर चाँदी का शिखर है, जो स्फटिक की तरह है, उत्तर दिशा में एक अत्युत्तम शज़ु

English

The boy in the womb came out of the belly of his mother and sat on the golden seat intended for the Hotr. Seated there he narrated the verses of the four Vedas and the fifth one, the Akhyanas (Puranas) like Kasyapa. On seeing him, the sages gave him that name.

अध्याय ६७

श्लोक 46

ततो नन्दिमहाकालौ स्तम्भहस्तौ भयानकौ ।जघ्नतुर्दानवं तत्र मुद्गरादिभिरायुधैः

tato nandimahākālau stambhahastau bhayānakau / jaghnaturdānavaṃ tatra mudgarādibhirāyudhaiḥ

हिन्दी अर्थ

है जो सभी रत्नों से परिपूर्ण है इन्हीं तीनों शिख रों से वह पव॑त श्वुज्भवान् कहलाता है । शरद और वसन्‍त काल में मध्यम गति अवलम्बन कर के भगवान् भास्कर उस पर्वत के उस शिखर का अवलम्बन करते हैं, जो विषुवत् रेखा के सल्नलिकट है। उन दिनों सूर्य दिन रात्रि को बराबर बना देते है ।१६९२-१९४। सूर्य के महारथ में हरित वर्ण के अर्थात् हरे रज्ध के दिव्य घोड़े जुते हुये हैं, जितके शरीर कौ कान्ति पद्मराग मणि के समान है ' मेष और तुला राशि पर सूर्य के जाने पर रात तथा दिन पन्वह-पन्द्रह मुहतों के ही होते हैं ।१६५-१६६। सूर्य जिस समय क्ृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण में पहुंचते हैं, उस समय चन्द्रमा विशाखा के चतुर्थ चरण में वतंमान रहते हैं। जब सूर्य विशाखा के तीसरे अंश या चरण में जाते हैं, तब तक चन्द्रमा इत्तिका के शिर पर पहुँच जाते हैं। मह॒रषिगण इसे! को विषुव काल कहा करते हैं। चन्द्र-सु्यं की गति से ही

English

Thanks to that act, he became renowned as Hiranya¬ kasipu. Hiranyaksa was his younger brother. Simhika was the

अध्याय ६७

श्लोक 47

त्रयो ऽपि च महाकायाः सप्ततालप्रमाणकाः ।न शमो जायते तेषां युध्यतां च परस्परम्

trayo 'pi ca mahākāyāḥ saptatālapramāṇakāḥ / na śamo jāyate teṣāṃ yudhyatāṃ ca parasparam

हिन्दी अर्थ

इस विषुव काल का ज्ञान होता है। जब दिन और रात का मान बराबर हो जाता है, तब विषुव होता

English

The author's fondness for popular etymologies (similar to that of Brahmana-writers) leads him to create such stories as in vv. 53-59.

अध्याय ६७

श्लोक 48

ततश्चानन्तरं विप्रो ऽगच्छत् तं केशवं प्रति ।सुप्तं क्षीरार्णवे ऽपश्यच्छेषपर्यङ्कसंस्थितम्

tataścānantaraṃ vipro 'gacchat taṃ keśavaṃ prati / suptaṃ kṣīrārṇave 'paśyaccheṣaparyaṅkasaṃsthitam

हिन्दी अर्थ

ऊनरात्राधिमासौं च कलाकाष्ठामुहर्तकाः । पोर्णमासी तथा ज्ञेया अमावास्या तथव च॥ सिनीवाली कुहृश्चेव राका चानुमतिस्तथा २०१ संवत्सरास्ततो ज्ञेया: पत्चावदा ब्रह्मण: सुता । तस्मात्तु ऋतवो ज्ञेया ऋतवो ह्यन्तराः स्मृताः ॥२०२३े तस्मादनुमुखा ज्ञेया अमावास्या5स्थ पर्वण: । तस्मात्त विषुव॑ ज्ञेयं पितृदेवहितं सदा

English

Hiranyakasipu, the Daitya (son of Diti), performed severe penances for a hundred thousand years without taking any food and standing topsy-turvy.

अध्याय ६७

श्लोक 49

लक्ष्म्या पादयुगं गृह्य ऊरूपरि निवेशितम् ।अप्सरोगीयमानं तु भक्त्यानम्य च केशवम्

lakṣmyā pādayugaṃ gṛhya ūrūpari niveśitam / apsarogīyamānaṃ tu bhaktyānamya ca keśavam

हिन्दी अर्थ

एवं ज्ञात्वा न मुहं त देवे पिच्ये च सानवः । तस्मात्स्मृतं प्रजानां वे विधुवत्सबं्ग सदा

English

Brahma who was delighted (at his penance) gratified him with a boon (whereby he attained deathlessncss from all living beings). O leading Brahmanas, conquering Devas through his Yogic power he attained the lordship of all {Lit, the state of being all Devas).

अध्याय ६७

श्लोक 50

अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ।उत्थापयस्व देवेशं लक्ष्मि त्वम् अविशङ्किता

adya me saphalaṃ janma jīvitaṃ ca sujīvitam / utthāpayasva deveśaṃ lakṣmi tvam aviśaṅkitā

हिन्दी अर्थ

आलोकान्तः स्मृतों लोको लोकान्तो लोक उच्यते । लोकपाल स्थितास्तत्र लोकालोकस्य मध्यतः ॥ चत्वारस्ते महात्मानस्तिष्ठन्त्याभुतसंप्लवात् । सुधामा चेव वे्राज: कर्देमः शद्भुपास्तथा ॥ हिरण्यलोमा पजेन्यः केतुमानरजतश्र्व यः निहेद्ा निरभीसाना निस्तन्‍त्रा निष्परिग्रहा: । लोकपालाः स्थिता हां ते लोकालोके चतुदिशम्

English

(He requested further:) "May Danavas and Asuras be equal to Devas and attain the greatness of Marut gods. May this boon be granted. 55

अध्याय ६७

श्लोक 51

नारदस्य वचः श्रुत्वा पदाङ्गुष्ठं व्यमर्दयत् ।नारदस्तिष्ठते द्वारि उत्तिष्ठ मधुसूदन

nāradasya vacaḥ śrutvā padāṅguṣṭhaṃ vyamardayat / nāradastiṣṭhate dvāri uttiṣṭha madhusūdana

हिन्दी अर्थ

है। इस समय पितरों के निमित्त दान देना चाहिए। यह दान विशेष कर ब्राह्मणों को देना चाहिए; क्योंकि ब्राह्मण ही देवों के मृख कहे जाते हैं।॥१९७-२००। कला, काष्ठा और मुहूर्तादि के भेद से ऊनरात्र और अधिक मास होते हैं। अनुमति और राका नामक दो प्रकार की पूणिमा तथा सिनीवाली और कुह नामक दो प्रकार की अमावास्या होती है ।२०१। माघ, फाल्गुन, चत, वेशाख, ज्येष्ठ और आपषाढ़ उत्तरायण है, एवं

English

Thus requested Brahma, granted him what he wished and after granting him the divine boons, he vanished there it¬ self. Hiranyakasipu, the son of Diti, has been glorified by the ancient people by means of verses.

अध्याय ६७

श्लोक 52

देवो ऽपि नारदं दृष्ट्वा परं हर्षमुपागतः ।स्वागतं तु मुनिश्रेष्ठ सुप्रभाताद्य शर्वरी

devo 'pi nāradaṃ dṛṣṭvā paraṃ harṣamupāgataḥ / svāgataṃ tu muniśreṣṭha suprabhātādya śarvarī

हिन्दी अर्थ

श्रावण, भाद्रपद, आश्विन कातिक, मार्गशी्ष पौष एवं दक्षिणायन इन्हीं बारह महीनों का एक संवत्सर होता है। पञ्चाब्द या पञ्च संवत्सर ब्रह्मतनय कहलाता है। ऋतुय इन्हीं से उत्पन्न हुई हैं और इन्हीं का अंश कहलाती हैं ।२०२-२०३। इस कारण देव पितरों का कार्य पर्वानुमृख अमावास्था में करना चाहिए और अमावास्या की अपेक्षा विषुव में करना श्रेष्ठ है। मानव इस विषुव रहस्य को जान कर कभी भी देव पितरों के कार्य में प्रमाद न करे, इसलिये सभी प्रजा को यह विषुव तत्त्व जान लेना चाहिए ।२०४-२०५॥। आलोक द का जहाँ तक अन्त है, वहाँ तक लोक है; लोकान्तपयंन्त लोक कहलाता है। साराश यह कि लोकालोक पव॑त आलोक के शेष भाग में वतंमान है । इस लोकालोक के मध्य में लोकपालमण स्थित हैं । वेराज सुधामा, शब्भुपा- भिधेय कर्दम, पर्जन्य, हिरण्यलोमा और केतुमान् रजत नामक चार महात्मा लोकपाल वहाँ प्रलयकाल तक रहते

English

"The Devas along with great sages made obeisance to that quarter which is resorted to by King Hiranyakasipu. 55

अध्याय ६७

श्लोक 53

नारद उवाच: अद्य मे सफलं देव प्रभातं तव दर्शनात् ।कुशलं च न देवानां शीघ्रम् उत्तिष्ठ गम्यताम्

nārada uvāca: adya me saphalaṃ deva prabhātaṃ tava darśanāt / kuśalaṃ ca na devānāṃ śīghram uttiṣṭha gamyatām

हिन्दी अर्थ

हैं ।२०६-२०७। ये लोकपाल वहाँ चारों ओर निद्व॑न्द्भ, निरभिमान, झासनविहीन और परिजन शुन्ध होकर

English

O Brahmanas, Hiranyakasipu, the lord of Daityas, had such prowess. In ancient times, Visnu, in the form of Man- Lion, became death unto him (i.e. killed him). He was torn by him by means of his claws. Hence the nailsare remembered pure 1.

अध्याय ६७

श्लोक 54

श्रीविष्णुरुवाच: ब्रह्मा चेन्द्रश्च रुद्रश्च ये चान्ये तु मरुद्गणाः ।आपदः कारणं यच्च तत्समाख्यातुम् अर्हसि

śrīviṣṇuruvāca: brahmā cendraśca rudraśca ye cānye tu marudgaṇāḥ / āpadaḥ kāraṇaṃ yacca tatsamākhyātum arhasi

हिन्दी अर्थ

तत्रा5घसते प्रजावन्तो मुनयो हयग्निहोत्रिण: । लोकस्य संतानकराः पितृयाणे पथ्चि स्थिताः भूतारम्भकृतं कर्म आशिषा ऋत्विगुच्यते । प्रारभन्‍्ते लोककामास्तेषां पन्‍था: स दक्षिण...

English

Hiranyaksa had five valorous sons of great strength. Utkura, Sakuni, Kalanabha, the valorous Mahanabha and Bhutasantapana—these sons of Hiranyaksa were invincible even to Devas.

अध्याय ६७

श्लोक 55

नारद उवाच: दानवेन महातीव्रं तपस्तप्तं सुदारुणम् ।रुद्रेण च वरो दत्तो भस्मत्वं मनसेप्सितम्

nārada uvāca: dānavena mahātīvraṃ tapastaptaṃ sudāruṇam / rudreṇa ca varo datto bhasmatvaṃ manasepsitam

हिन्दी अर्थ

चलितं ते पुनर्धर्म स्थापयन्ति युगे युगे । संतत्या तपसा चेव मर्यादाभिः श्रुतेन च २१२

English

Their sons and grandsons composed the group (of Dai¬ tyas) named Badeya. They were a hundred thousand in number and were killed in (the battle?) Tarakamaya 2.

अध्याय ६७

श्लोक 56

वरदानबलेनैव स देवं हन्तुम् अर्हति ।ईदृशं चेष्टितं ज्ञात्वा नीतो देवो ऽमरैः सह

varadānabalenaiva sa devaṃ hantum arhati / īdṛśaṃ ceṣṭitaṃ jñātvā nīto devo 'maraiḥ saha

हिन्दी अर्थ

लोकसंब्यवहारेण भृतारम्भप्रकृतेन च । इच्छाद्वेषप्रकृत्या च मैथुनोपगसेन च तथा कायकृतेनेह सेवनाहिषयस्य च्। एतंस्ते: कारण: सिद्धा: श्मशानानि हि भेजिरे ॥।

English

Hiranyakasipu had four sons of great strength. Prahlada was the eldest and the others were Anuhlada, Samhrada and Hrada. Understand the sons of Hrada.

अध्याय ६७

श्लोक 57

नारदस्य वचः श्रुत्वा जगाम समुनिर्हरिः ।दृष्ट्वा देवस्तमीशानं गच्छन्तं दिशमुत्तराम्

nāradasya vacaḥ śrutvā jagāma samunirhariḥ / dṛṣṭvā devastamīśānaṃ gacchantaṃ diśamuttarām

हिन्दी अर्थ

नागवोी थ्युत्तरे यच्च सप्तर्षिभ्यश्र दक्षिणम् उत्तरः सबितुः पन्‍्था देवयानस्तु स स्मृतः २१७ यत्र ते वासिनः सिद्धा विमला ब्रह्मचारिण: । सतत ते जुगुप्सन्ते तस्मान्मृत्युजितस्तु तेः

English

Another reading—His nails were neither wet nor dry—Bd.P.

अध्याय ६७

श्लोक 58

दृष्ट्वा देवं च रुद्रो ऽथ परिष्वज्य पुनःपुनः ।नमस्कृत्य जगन्नाथं देवं च मधुसूदनः

dṛṣṭvā devaṃ ca rudro 'tha pariṣvajya punaḥpunaḥ / namaskṛtya jagannāthaṃ devaṃ ca madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

निवास करते हैं। अगस्त्यं के उत्तर और अजवाोथी के दक्षिण एवं वेश्वानर मार्ग के बाहर जो मार्ग है वह पितृयान है। उस पितृयान मार्ग में लोक विस्तारक, प्रजावाबू, अग्निहोश्नकर्ता मुनिगण निवास करते हैं। ये सब प्रजाजन की वृद्धि करने की अभिलाषा से आशीर्वाद द्वारा जीवों के प्रारब्ध कम को पुष्ट या आरम्भ करते हैं। इनका दक्षिण पथ है ।२०५-२११। सन्‍्तान, तपस्था, मर्यादा और शस्त्र ज्ञानादि द्वारा ये प्रत्येक युग में विचलित धर्म का पुमः संस्थापन करते हैं। इनके पूर्व॑वर्ती वंशधरों के घर में जिस प्रकार परवर्ती वंशघरों का जन्म होता है, उसी प्रकार परवर्ती वंशधर के घर में पूवंवर्ती वंशधर के मरण होने पर जन्म होता है । इसी प्रकार इनका परिवर्तन होता रहता है और प्रलय काल तक ये वतंमान रहते हैं ।२१२०२१३॥ अठासी हजार गहस्थ मुनिगण सूर्य के दक्षिण भाग में चन्द्रतारा आदि जब तक रहते हैं तब तक रहते हैं । ये क्रियावान् द

English

The battle fought after the abduction of Bfhaspati's wife Tara by Candra. In that battle Daityas sided with Ganora.

अध्याय ६७

श्लोक 59

विष्णुर् उवाच: भयस्य कारणं देव कथ्यतां च महेश्वर ।देवदानवयक्षाणां प्रेषयेयं यमालयम्

viṣṇur uvāca: bhayasya kāraṇaṃ deva kathyatāṃ ca maheśvara / devadānavayakṣāṇāṃ preṣayeyaṃ yamālayam

हिन्दी अर्थ

रूप से जन्म ग्रहण करके इमशान में आश्रय ग्रहण करते हैं। लोक व्यवहार, भृतों का आरम्भ, इच्छा-द्वेषादि युक्त प्रकृति, मैथुन कर्म और कायकृत विषय-भोग-जनित दोष आदि कारणों से सिद्धणण श्मशान का सेवन करते हैं। इत मुनियों ने प्रजा कामना से द्वापर युग में जन्म ग्रहण किया था।२१४-२१६। नागवीथी के उत्तर ओर सप्तर्षि के दक्षिण एवं सविता के उत्तर जो मार्ग है, वह देववान कहलाता हैं। वहाँ निवास करने वाले

English

Hrada and Nisunda were the sons ofHrada. The valo¬ rous Sunda and Upasunda were the sons of Nisunda.

अध्याय ६७

श्लोक 60

ललाटे च कृतो धर्मो युष्माकं च महेश्वर ।छित्त्वा शिरस्तथाङ्गानि इन्द्रियाणि न संशयः

lalāṭe ca kṛto dharmo yuṣmākaṃ ca maheśvara / chittvā śirastathāṅgāni indriyāṇi na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

विमल, सिद्ध ब्रह्मचारी ग॒ृहस्थ धर्म को सदा हेय समझते हैं । इसी से वे मृध्युंजय हैं ।९११७-२१५। इनके अनन्तर ( ते प्रसड्भर॒तु लोकस्य मैथुनस्य तु वर्जनात् । इच्छाद्ेषनिवृत्त्या च भूतारम्भविवजनात् ॥।

English

Brahmaghna, Mahaviryaand Muka became the succes¬ sors ofHrada. MarJca, son of Sunda, was born ofTadaka.

अध्याय ६७

श्लोक 61

ईश्वर उवाच: नास्ति सौख्यं च मूर्खेषु नास्ति सौख्यं च रोगिषु ।पराधीनेन सौख्यं तु स्त्रीजिते च विशेषतः

īśvara uvāca: nāsti saukhyaṃ ca mūrkheṣu nāsti saukhyaṃ ca rogiṣu / parādhīnena saukhyaṃ tu strījite ca viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

पृष्टिश्व कामसंयोगाच्छब्दादेदो षदर्शनात् ॥ै२२० इत्येतेः कारण: शुद्धस्तेआ्मृतत्व॑ हि मेजिरे । आभृतसंप्लवस्थानममृतत्व॑ विभाव्यते २२१ त्रैलोक्यस्थितिकालो5यमपुनर्माग गामिनः । ब्रह्महत्याश्वमेधास्यां पुण्यपापक्रतो5परम् ॥ आभूतसंप्लवान्ते तु क्षीयन्ते हू ध्वेरेतसः या (

English

Tadaka was killed by the powerful Raghava (Rama). Muka was killed bySavyasac! (i.e. Arjuna) inKirata (i.e. when Mva assumed the form of a hunter to test Arjuna).

अध्याय ६७

श्लोक 62

स्त्रीजितेन मया विष्णो वरो दत्तस्तु दानवे ।यस्य मूर्ध्नि न्यसेत्पाणिं स भवेद् भस्मपुंजवत्

strījitena mayā viṣṇo varo dattastu dānave / yasya mūrdhni nyasetpāṇiṃ sa bhaved bhasmapuṃjavat

हिन्दी अर्थ

ऊर्ध्वोत्तरमृषिभ्यत्तु श्रुवो यत्रास्ति वे स्मृतम्॥ एतद्विष्णुपदं दिव्यं तृतीय॑ व्योस्नि भास्वरम् ॥। तत्र गत्वा न शोचन्ति तद्विष्णो: परम पदम्। धर्मश्रुवाद्यास्तिष्ठन्ति यत्र ते लोकसआाधकाः इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते ज्योतिष्प्रचारो नाम पश्चाह्योड्ष्यायः ॥५०॥।

English

Anuhlada's sons were Vayu and Sinivall. Their descen¬ dants running to a hundred thousand constituted the group of demons remembered as Halahala.

अध्याय ६७

श्लोक 63

अजेयश्चामरश्चैव मया ह्युक्तः स केशव ।हन्तुमिच्छति मां पाप उपायस्तव विद्यते

ajeyaścāmaraścaiva mayā hyuktaḥ sa keśava / hantumicchati māṃ pāpa upāyastava vidyate

हिन्दी अर्थ

.. ए फऊक्‍फखऋ्॒रऔ इ ञऔसऔ िृ जकरे्र्ल्--++++++.+3भ+ैप/ैा

English

Vairocana, the son of Prahlada, had five sons. GavesthI, Kalanemi, Jambha, Baskala and Sambhu (who was the youn¬ gest of them all) are remembered as the sons of Prahladi (i.e. Vairocana).

अध्याय ६७

श्लोक 64

विष्णुरुवाच: गच्छन्तु अमराः सर्वे युष्माभिः सह शङ्कर ।उपायं सर्जयाम्यद्य वधार्थं दानस्य च

viṣṇuruvāca: gacchantu amarāḥ sarve yuṣmābhiḥ saha śaṅkara / upāyaṃ sarjayāmyadya vadhārthaṃ dānasya ca

हिन्दी अर्थ

अठ्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता ऋषिगण हू, जो सूथं के उत्तर पथ में प्रलयक्राल तक बास करते हैं। ये लोक व्यवहार से विरत हैं, मैथुन नहीं करते, इच्छा-द्वेषादि का संग्रह भूतों का आरम्भ सृष्टि) नहीं करते, इच्छापूर्ति से विरक्त और शब्दादि दोष का दर्शन (आप्त वाक्य में दोष) भी नहीं करते हैँ । अतएवं इन शुद्ध कारणों के द्वारा इन्होंने अमृतत्व लाभ किया है और प्रलयकाल तक अमृतत्व का उपभोग करते हैं 4११९-२२ १। यही तीनों लोकों की स्थित का काल है। पुनर्जन्म से रहित मुक्त ब्यक्ति अथवा ब्रह्मह॒त्या करने वाले पापी, अश्वमेध करने वाले पुण्यात्मा और ऊध्द्धवरेता मुनिगण इस महाप्रलयकाल तक रहते हैं । इसके बाद इन सबका क्षय हो जाता है। सप्तर्षि मण्डल के ऊपर ध्रव तक विष्णु पद कहलाता है । यह आकाश में दिव्य और प्रकाशवान् तीक्षरा पदार्थ है। यहाँ जाने पर फिर कोई चिस्ता नहीं सताती है। यह विष्णु का परम पद है। लोक साधक

English

I shall mention their invincible sons in accordance with their importance. Sumbha, Nisumbha and Visvaksena— these were the sons of the powerful Gavesthin. Jambha's sons were Satadundubhi, Daksa and Khartda. Those three were Jariibha's sons.

अध्याय ६७

श्लोक 65

रेवायाश्च तटे तिष्ठ देव त्वममरैः सह ।कालक्षेपो न कर्तव्यो गम्यतां त्वरितं प्रभो

revāyāśca taṭe tiṣṭha deva tvamamaraiḥ saha / kālakṣepo na kartavyo gamyatāṃ tvaritaṃ prabho

हिन्दी अर्थ

ध्र॒व आदि इसी विष्णु पद के सहारे टिके हुये हैं

English

Virodha, Manu, Vrksayu and Kus'alimukha—these were the sons of Baskala. Listen to the (enumeration of the) sons of Kalanemi.

अध्याय ६७

श्लोक 66

दक्षिणा यत्र गङ्गा च रेवा चैव महानदी ।यत्रयत्र च दृश्येत प्राची चैव सरस्वती

dakṣiṇā yatra gaṅgā ca revā caiva mahānadī / yatrayatra ca dṛśyeta prācī caiva sarasvatī

हिन्दी अर्थ

३८६ क्‍ वायुपुराणम् अमन्ते कथमेतानि ज्योतीषि दिवि मण्डलम् । तियंग्व्यूहेन सर्वाणि तथवासंकरेण च ॥।

English

Brahmajit, Ksatrajit, Devantaka and Narantaka—these were the sons of Kalanemi. Listen to the progeny ofSambhu.

अध्याय ६७

श्लोक 67

तत्समं च महातीर्थं न मर्त्ये चैव दृश्यते ।स्नानं ये तत्र कुर्वन्ति दानं चैव तु भक्तितः

tatsamaṃ ca mahātīrthaṃ na martye caiva dṛśyate / snānaṃ ye tatra kurvanti dānaṃ caiva tu bhaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले--स्वायम्भुव मन्वन्तर के वर्णन-प्रसद्भ में भुतकालिक वृत्तान्त कह चुके हैं। अब हम अनुक्रम से भविष्य की बातों का विवरण सुनाते हैं। यह सुन कर मुनिग्रों ने लोमहरषण सूत से पूछा कि सूर्य-चन्द्र

English

Dhanuka, Asiloman, Nabala, Gomukha, Gavaksa and Goman—these are said to be the sons of Sambhu.

अध्याय ६७

श्लोक 68

सप्तजन्मकृतं पापं नश्यते नात्र संशयः ।एतत् तीर्थं महापुण्यं सर्वपातकनाशनम्

saptajanmakṛtaṃ pāpaṃ naśyate nātra saṃśayaḥ / etat tīrthaṃ mahāpuṇyaṃ sarvapātakanāśanam

हिन्दी अर्थ

आदि ग्रहों की गति किस प्रकार की होती है ऋषिगरण बोले--यह ज्योतिश्चक्त गगनमण्डल में किस प्रकार घूमता है। यह व्यूहाकार ठेढ़ा-मेढ़ा घूमता हुआ भी आपस में टकराता नहीं है । इसे कौंत घुमाता है ? अथवा यह स्वयं घूमता है ? यह सब हम जानने की इच्छा करते हैं; क्योंकि यह कथा जीबों को भ्रम में डाल देने वाली है। इसी से सुनने की इच्छा

English

Virocana's son Bali alone was very valorous. A hundred sons were born to Bali. All of them were kings.

अध्याय ६७

श्लोक 69

गम्यतां तत्र देवेश लुङ्केशं त्वं सहामरैः ।विष्णोस्तु वचनादेव प्रविष्टो ह्रदमुत्तमम्

gamyatāṃ tatra deveśa luṅkeśaṃ tvaṃ sahāmaraiḥ / viṣṇostu vacanādeva praviṣṭo hradamuttamam

हिन्दी अर्थ

: होती हैं। सुतसत्तम ! आप हम लोगों को यह कथा सुनावें

English

Among them, four were very imporant. They were valorous and extremely powerful. The thousand-handed eldest son Bana was wealthy and honoured (by all). The others were Kumbhanabha, Gardabhaksa, Kusi and others. Sakuni and Putana were the two daughters of Bali. Bali's sons and grandsons numbered hundreds and thousands.

अध्याय ६७

श्लोक 70

रतिं सुमहतीं चक्रे सह तत्र मरुद्गणैः ।ततश्चानन्तरं देवो मायां कृत्वा ह्यनेकधा

ratiṃ sumahatīṃ cakre saha tatra marudgaṇaiḥ / tataścānantaraṃ devo māyāṃ kṛtvā hyanekadhā

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले--जीवों को आश्चयं चकित करने वाली यह कथा हम कहते हैं, आप लोग सुनें। यह ज्योतिरचक्र प्रत्यक्ष होते हुये भी अज्ञेय होने के कारण भ्रम में डाल देता है। आकाश में जो यह चारों ओर पोडसो चतुर्दिशं पुच्छे शैशुमारे व्यवस्थितः । उत्तानपावपुत्रोसौ सेढीभुतो ध्रुवो दिवि

English

They constituted a group of demons famous by the name Baligana. They were valorous and manly. Bana whose mind was like that of Indra, had his capital city Lauhitya (Soni- tapura in Assam).

अध्याय ६७

श्लोक 71

वसन्तमासं संसृज्य उद्यानवनशोभितम् ।अशोकैर्बकुलैश्चैव ब्रह्मवृक्षैः सुशोभनैः

vasantamāsaṃ saṃsṛjya udyānavanaśobhitam / aśokairbakulaiścaiva brahmavṛkṣaiḥ suśobhanaiḥ

हिन्दी अर्थ

स हि शभ्रमन्श्रामयते चन्द्रादित्यों ग्रहैः सह भ्रमन्‍्तमनुगच्छन्ति नक्षत्राणि च चक्रवत् .. ७ प्रुवस्यथ मनसा चासो सर्पते भगणः स्वयम् । सुर्याचनद्रमसों तारा नक्षत्राणि ग्रहैः सह पद वातानोकमयेबंन्धैर्ुवे बद्धानि तानि वे । तेषां योगश्व भेदाभ्व कालचारस्तथैव च १६ अस्तोदयौ तथोत्पाता अयने दक्षिणोत्तरे । विषुवद्भ्रहवर्णाश् श्रुवात्सबं प्रबर्तते

English

Diti who lost her sons gratified Kasyapa. Well-propiti¬ ated by her, the delighted Kasyapa asked her to choose a boon freely. She chose the boon. 1

अध्याय ६७

श्लोक 72

श्रीवृक्षैश्च कपित्थैश्च शिरीषैर् राजचम्पकैः ।श्रीफलैश्च तथा तालैः कदम्बोदुम्बरैस् तथा

śrīvṛkṣaiśca kapitthaiśca śirīṣair rājacampakaiḥ / śrīphalaiśca tathā tālaiḥ kadambodumbarais tathā

हिन्दी अर्थ

श्रुवेणाधिकृतांश्चेव सुर्यो5पावुत्य तिष्ठति । तदेष दीप्तकिरणः स फालाग्निदिवाकर: परिवतंक्रमाद्विप्रा भाभिरालोकयन्दिश: । सूर्य: किरणजालेन वायुयुक्तेन सर्वशः ॥ जगतो जलमादत्त कृत्स्नस्प द्विजसत्तमा “

English

The holy lord granted her the boon requested for. The son ofMarici, of fierce splendour, asked her, "What do you wish?"

अध्याय ६७

श्लोक 73

अश्वत्थादिद्रुमैश्चैव नानावृक्षैरनेकशः ।नानापुष्पैः सुगन्धाढ्यैर्भ्रमरैश्च निनादितम्

aśvatthādidrumaiścaiva nānāvṛkṣairanekaśaḥ / nānāpuṣpaiḥ sugandhāḍhyairbhramaraiśca nināditam

हिन्दी अर्थ

आदित्यपीतं सुर्याग्ने: सोम संक्रमते जलम्। नाडीभिर्वायुयुक्ताभिलेकिधान प्रवर्तते 0१४ यत्सोमात्खवते सूर्य तदर्न ष्ववतिष्ठते । मेघा बायुनिघातेन विसुजन्ति जल॑ भुवि

English

She said to her gratified husband, Kasyapa, the son of Marici, with palms joined in reverence—"O holy lord, my sons have been killed by your sons born of Aditi. I wish for a son who will be endowed with penance of long duration and who will kill Sakra. I shall perform penance. It behoves you to impregnate me."

अध्याय ६७

श्लोक 74

तस्मिन्मध्ये महावृक्षो न्यग्रोधश्च सुशोभनः ।बहुपक्षिसमायुक्तः कोकिलारावनादितः

tasminmadhye mahāvṛkṣo nyagrodhaśca suśobhanaḥ / bahupakṣisamāyuktaḥ kokilārāvanāditaḥ

हिन्दी अर्थ

एवसुत्क्षिप्यते चेव पतते चर पुनर्जलम् । न नाशमु(उ)दकस्यास्ति तदेव परियवतंते . संधारणाय भूतानां मायधा विश्वनिर्मिता । अनया सायया व्याप्त त्रलोक्यं सचराचरम्

English

On hearing her words, Kas'yapa, the highly brilliant son of Marici, replied to Diti who was extremely sad:

अध्याय ६७

श्लोक 75

कृष्णेन च कृतं तस्मिन्कन्यारूपं च तत्क्षणात् ।न तस्याः सदृशी कन्या त्रैलोक्ये सचराचरे

kṛṣṇena ca kṛtaṃ tasminkanyārūpaṃ ca tatkṣaṇāt / na tasyāḥ sadṛśī kanyā trailokye sacarācare

हिन्दी अर्थ

सौर मण्डल स्थित है, उसके पुच्छ भाग में उत्तनपाद के पुत्र ध्रव मेघिस्तम्भ (केन्द्र) के रूप में वतंमान हैं ।५-६। ये स्वयं घूमते हैं और ग्रहों के साथ चन्द्र-सूयं को भी घुमाते हैं। घूमते हुये ध्रूव का नक्षत्र-समृह चक्र की तरह अनुसरण करता है। धूब के ही अनुकूल सुय्य, चन्द्र, तारा. नक्षत्र ग्रह आदि नक्षत्र मण्डल घूमा करते हैं। वायु समूह के बन्धन द्वारा यह नक्षत्र मण्डल श्रूव में बंधा हुआ है। उनका योग, भेद, कालाचार,

English

"May it be so. Welfare unto you. Be pure, O ascetic lady. You will bear a good son who will kill Sakra in battle.

अध्याय ६७

श्लोक 76

अन्याश्च कन्यकाः सप्त सुरूपाः शुभलोचनाः ।दिव्यरूपधराः सर्वा दिव्याभरणभूषिताः

anyāśca kanyakāḥ sapta surūpāḥ śubhalocanāḥ / divyarūpadharāḥ sarvā divyābharaṇabhūṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

अस्त, उदय, उत्पात, दक्षिणोत्तर अयन, विषुव और ग्रहवर्ण ध्र,व से ही उत्पन्न होते हैं ।७-१०। वर्षा, घाम, हिम, रात, दिन और संन्ध्या तथा प्रजाजन का शुभाशुभ व्यापार ध्रव से ही उत्पन्न होते हैं। सभी नक्षत्रादि प्रूव के ही अधिकार में हैं। सूर्य केवल उन्हें आबुत करते हैं। वही प्रदीप्त क्रिरण ध्रव कालाण्नि और दिवाकर भी हैं। विप्रो ! परिवतंन क्रम से सूये वायु युक्त किरण द्वारा दिशाओं को आलोकमय कर सम्पूर्ण जगत् का जल शोषण करते हैं ।११-१३॥ वह सूर्य द्वारा खींचा हुआ जल अग्निमय सूर्य से वायु युक्त नाड़ी द्वारा सोम में संक्रान्त होता है। फिर लोक रक्षा के लिये वृष्टि रूप में परिवर्तित होता है। सोम से जो जल स्रवित होता है, वह आकाश में या मेघ में ठहरता है। फिर वायु के धक्के से मेघ जल बरसाया करते हैं । इसी प्रकार जल की वृष्टि और शोषण होता है। जल का कभी भी नाश नहों होता है; प्रत्युत ऐसा ही

English

If you (continue to) remain pure for full hundred years you will bear a son who will be the foremost in the three worlds".

अध्याय ६७

श्लोक 77

पुमांसमभिकाङ्क्षन्त्यो यद्येकः कामयेत् स्त्रियः ।मौक्तिकैर् रत्नमाणिक्यैर् वैडूर्यैश्च सुशोभनैः

pumāṃsamabhikāṅkṣantyo yadyekaḥ kāmayet striyaḥ / mauktikair ratnamāṇikyair vaiḍūryaiśca suśobhanaiḥ

हिन्दी अर्थ

परिवर्तन हुआ करता है। जीवों को रक्षा के लिये विधाता के द्वारा यह माया निर्मित की गई है। इसी माया के द्वारा सचराचर तीनों लोक व्याप्त हैं ।१४-१७। देव दिवाकर ही विश्वेश, लोककर्ता, सहस्रांशु, प्रजापति,

English

After saying this, the holy lord of great brilliance had sexual intercourse with her. After embracing her, the holy sage went on his tour of the three worlds.

अध्याय ६७

श्लोक 78

कामहारैश्च वंशैश्च बद्धो हिन्दोलकः कृतः ।आरूढाश्च महाकन्या गायन्ते सुस्वरं तदा

kāmahāraiśca vaṃśaiśca baddho hindolakaḥ kṛtaḥ / ārūḍhāśca mahākanyā gāyante susvaraṃ tadā

हिन्दी अर्थ

रे८५ . वायुपुराणम् विश्वेशों लोकक़द्देवः सहलांशुः प्रजापतिः । धाता क्ृत्स्नस्थ लोकस्य प्रभुविष्णुदिवाकर:ः १८ सार्वलौकिकमम्भो वे यत्सोमान्नभसश्च्युतम् । सोमावारं जगत्सबंमेतत्तथ्यं प्रकीतितम् १६

English

After the departure of her husband, that extremely delighted noble lady Diti went to the forest Kusala and perform¬ ed a very terrible penance.

अध्याय ६७

श्लोक 79

मारुतः शीतलो वाति वनं स्पृष्ट्वा सुशोभनम् ।वातेन प्रेरितो गन्धो दानवो घ्राणपीडितः

mārutaḥ śītalo vāti vanaṃ spṛṣṭvā suśobhanam / vātena prerito gandho dānavo ghrāṇapīḍitaḥ

हिन्दी अर्थ

सोमाधारा नदी गड््ा पवित्रा विमलोदका । सोमपुत्रपुरोगाश्च महानयो द्विजोत्तमाः

English

While she was performing the penance, the thousand¬ eyed Indra, the most excellent among Suras, served her by means of his rich attributes.

अध्याय ६७

श्लोक 80

ततः कुसुमगन्धेन विस्मयं परमं गतः ।आघ्राय चेदृशं पुण्यं न दृष्टं न श्रुतं मया

tataḥ kusumagandhena vismayaṃ paramaṃ gataḥ / āghrāya cedṛśaṃ puṇyaṃ na dṛṣṭaṃ na śrutaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

समुद्राद्रायुसंयोगाहहन्त्यापो गभस्तयः । यतस्त्वुतुवशात्काले परिवर्तो दिवाकरः ४ अभ्रस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः स्वंभुतहितार्थाय वायुभिश्व समन्‍्ततः १२५ ततो वर्षति षण्मासान्सवेसुतविवृद्धये । बायव्यं स्तनितं चेब वेद्युतं चार्निसंभवम् ..

English

Verses 86-134 describe the birth of Marut-gods from Diti and her final reconciliation with Indra. Indra's entry into Diti's womb and splitting of his prospective killer into 49 parts and the derivation of the name 'Marut' from Indra's threat 'ma rodih' (Don't cry) is a Puranic elaboration of a Vedic concept where the seven Maruts are said to be seven Pranas, Indra being the main Praria controlling the Maruts (Sat. Br. 9.3.1.7). For similar ela¬ boration cf. V 21.32-41, Mt. P. Ch. 7.Bd. 3.5.45-81 is practically identical with our text.

अध्याय ६७

श्लोक 81

वने चिन्तयतः किंचिद् ध्वनिगीतं सुशोभनम् ।गीतस्य च ध्वनिं श्रुत्वा मोहितो मायया हरेः

vane cintayataḥ kiṃcid dhvanigītaṃ suśobhanam / gītasya ca dhvaniṃ śrutvā mohito māyayā hareḥ

हिन्दी अर्थ

मेहनाच्च मिहेर्धातोमेंघत्वं व्यअजयन्ति च। न अश्यन्ति यतस्त्वापस्तद्र' कवयो बिदुः २७ मेघानां पुनरत्पत्तिस्त्रिविधा योनिरुच्यते । आर्नेया ब्रह्मजाश्चव पक्षजाश्र पृथग्विधाः ॥

English

He brought and gave her sacrificial fire and twigs, wood and Kusa grass, fruits and roots. The thousand-eyed lord gave her whatever else she required.

अध्याय ६७

श्लोक 82

व्याधस्यैव महाकूटे पतन्ति च यथा मृगाः ।कालस्पृष्टस्तथा कृष्णे पतितश्च नराधिप

vyādhasyaiva mahākūṭe patanti ca yathā mṛgāḥ / kālaspṛṣṭastathā kṛṣṇe patitaśca narādhipa

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण लोकों के धारण कर्ता, प्रभु और विष्ण हैं । सांवेलौकिक जो जल है, वह सोम से मेघमण्डल में ही द्रवित हुआ है; इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् चन्द्र के ही द्वारा प्रतिष्ठित है। यह हमने यथार्थ बात कही है। सूर्य से ताप मिकलता है और चन्द्र से शीतलता ये ही शीनोष्ण तत्त्व पृथ्वी को धारण करते हैं ।( ८-२ ०॥ पवित्र और विभमल जलवाली गंगा नदी का आधार चन्द्र हैं। विप्रो ! महानदियाँ भी चन्द्रपुत्र की पुरोवर्तिनी हैं। सभी जीव-जन्तुओं के शरीर में जल है; भतः स्थावर-जंगम जब दग्ध होते हैं, तब उनके शरीर से जल भाप होकर निकल जाता है। उससे मेघ बनते हैं; क्योंकि मेघ ही जल का अधार स्थान है ।२१-२२२॥। सूर्य का तेज किरणजाल द्वारा जीव-जन्तुओं से जल ग्रहण कर लेता है समुद्र के जल को भी किरणों के द्वारा वाधुवेग से खींच लेता है। फिर सूर्य देव ऋतु परिवर्तत होने पर स्वयं नवीनता धारण करते हैं और मेघों को निर्मल

English

By massaging her limbs and by assuaging her weariness, bakra served her on all occasions. Thus propitiated, Diti spoke to Sakra:

अध्याय ६७

श्लोक 83

दृष्ट्वा कन्यां च तां दैत्यो मूर्च्छया पतितो भुवि ।पतितेन तु दृष्टैका कन्या वटतले स्थिता

dṛṣṭvā kanyāṃ ca tāṃ daityo mūrcchayā patito bhuvi / patitena tu dṛṣṭaikā kanyā vaṭatale sthitā

हिन्दी अर्थ

जल किरणों द्वारा प्रदान करते हैं। तब वायु द्वारा प्रेरित होने पर मेघों में रका हुआ जल चारों ओर बरसने लगता है । इसी तरह सभी जीवों के कल्याण के लिये वायु-सम्बन्धी गजंना और अग्नि सम्त्नस्धी विद्युत् को साथ करके छः महीने तक मेघ बरसते रहते हैं ।१३-२६। मिह धातु क्षरणार्थक है । इसी से मेघ शब्द निष्पन्न हुआ है और मेघत्व को प्रकट को करता है। जिससे जल भ्रष्ट नहीं होता है, अतः उसे पण्डित लोग अश्न

English

"O excellent one among Suras, I am delighted with you, O dearson, only ten more years remain; welfare unto you; you will then see your brother.

अध्याय ६७

श्लोक 84

आस्यं दृष्ट्वा तु नारीणां पुनः कामेन पीडितः ।गृहीत्वा हेमदण्डं तु तां पातयितुम् इच्छति

āsyaṃ dṛṣṭvā tu nārīṇāṃ punaḥ kāmena pīḍitaḥ / gṛhītvā hemadaṇḍaṃ tu tāṃ pātayitum icchati

हिन्दी अर्थ

कहते हैं ।२७। मेष तीन प्रकार के हैं; अतः उनकी उत्पत्ति भी तीन प्रकार हुई है। अग्नेय, ब्रह्मज ओर पक्षज मृका घना महाकाया आवहस्य वशानुगाः । क्रोशमात्राश्च वर्षन्ति क्रोशार्धादपि या पुनः ३२ पर्व तग्रानितम्बेघु वर्षन्ति च रमन्ति च। बलाकागर्भदाश्चेव बलाकाकार्भधारिण:

English

After saying this to Sakra, and when the sun reached

अध्याय ६७

श्लोक 85

कन्योवाच: मा मानुस्पर्शयत्वं हि कुमार्यहं कुलोत्तम ।भो मुञ्च मुञ्च मां शीघ्रं यावद्गच्छाम्यहं गृहम्

kanyovāca: mā mānusparśayatvaṃ hi kumāryahaṃ kulottama / bho muñca muñca māṃ śīghraṃ yāvadgacchāmyahaṃ gṛham

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मना नाम ते मेघा ब्रह्मनिश्वाससंभवाः । ते हि विद्युदुगुणोपेताः स्तनयन्ति स्व॒नप्रियाः

English

Seeing her impure inasmuch as her hair spread over her feet, Sakra laughed and rejoiced on getting that opportune moment.

अध्याय ६७

श्लोक 86

दानव उवाच: अहं विवाहमिच्छामि त्वया सह सुशोभने ।भूपृष्ठे सकले राज्ञी भवस्येवं न संशयः

dānava uvāca: ahaṃ vivāhamicchāmi tvayā saha suśobhane / bhūpṛṣṭhe sakale rājñī bhavasyevaṃ na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

जीमूता नाम ते मेघा येम्यो जीवस्य संभवाः + द्वितीय॑ प्रवहूं वायु मेघास्ते तु समाश्षिताः एते योजनसात्राच्च सार्धार्धान्निष्कृतादपि । वृष्टिसगंस्तथा तेषां धारासाराः प्रकीतिताः ॥॥

English

Then Purandara (Indra) entered her open body. After entering and seeing the immense (unmeasurable) foetus of great power, Indra ofgreat fame pierced the important enemy (?)with his thunderbolt.

अध्याय ६७

श्लोक 87

कन्योवाच: पिता रक्षति कौमार्ये भर्ता रक्षति यौवने ।पुत्रो रक्षति वृद्धत्वे न स्त्री स्वातन्त्र्यम् अर्हति

kanyovāca: pitā rakṣati kaumārye bhartā rakṣati yauvane / putro rakṣati vṛddhatve na strī svātantryam arhati

हिन्दी अर्थ

पुष्करावतंका नाम ये मेघाः पक्षसंभवाः क्‍ शक्रेण पक्षाश्छिन्ना ये पबंतानां महौजसाम् । काकगानां प्रवृद्धानां भुतानां शिवमिच्छता रे८

English

On being split by the thunderbolt of hundred knots, the foetus cried in a high and terrible pitch, quaking again and again. Sakra then spoke to the foetus—"Do not cry (Ma Rodih) 1."

अध्याय ६७

श्लोक 88

न स्वातन्त्र्यं ममैवास्ति उत्पन्नाहं महत्कुले ।याच्यस्तु मत्पिता भ्राता मातापि हि तथैव च

na svātantryaṃ mamaivāsti utpannāhaṃ mahatkule / yācyastu matpitā bhrātā mātāpi hi tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

नाम से मेष प्रथक-पृथक् तीन प्रकार के हैं। उमकी उत्प त्ति इस प्रकार हुई है--अग्नेय मेघ जल से उत्पन्न हुये हैं; क्योंकि शीतलता, वायु और दुदिन आदि जो कुछ उनमें वतंमान हैं. वे जल से उत्पन्न होने के कारण ही उनमें आये हैं ।२८-२९। ये मेघ, भेंस, सुअर या मतवाले हाथी का रूप धारण का पृथ्वी के निकट आते हैं और चबकर लगाया करते हैं। उन मेघों का नाम जीमूत है, जो देर तक बरसते रहते है जो बिजली चमकाना नहीं जानते है और जो वृष्टि द्वारा जीव जन्तुओं को बढ़ाया करते हैं ।३००३१। ये मेघ शब्द-विहीन,

English

With his thunderbolt, Indra cut off the foetus into seven pieces and split each of the pieces into seven pieces again. Then Diti woke up.

अध्याय ६७

श्लोक 89

दानव उवाच: यदि मां नेच्छसे त्वद्य स्वातन्त्र्यं नावलम्बसे ।ममापि च तदा हत्या सत्यं च शुभलोचने

dānava uvāca: yadi māṃ necchase tvadya svātantryaṃ nāvalambase / mamāpi ca tadā hatyā satyaṃ ca śubhalocane

हिन्दी अर्थ

विशाल-शरीर और वायु के बशवर्ती हैं। ये एक कौस अथवा आधा कोस ऊपर से बरसा करते हैं। ये पव॑तों के कटिभाग में भी बरसा करते और घूमते रहते हैं। ये वलाका (बगुला) को गर्भदान करते हैं; इसलिये ये वकपड॒क्ति के गर्भदाता भी कहलाते हैं । ब्रह्म के निःश्वास से उत्पन्न भेघों का ताम है ब्रह्यज । ये गरजते हैं, कौंधते हैं और इनका गजन बड़ा भला जान पड़ता है ।३२-३४। इनके शब्द को सून्तकर भूमि उस प्रकार

English

"It should not be killed. It should not be killed", so shouted Diti. With due deference to the words of his mother, Indra jumped out of her belly. Armed with his thunderbolt, Sakra spoke to Diti with palms joined in reverence:

अध्याय ६७

श्लोक 90

कन्योवाच: विश्वासो नैव कर्तव्यो यादृशे तादृशे नरे ।नराः स्त्रीषु विचित्राश्च लम्पटाः काममोहिताः

kanyovāca: viśvāso naiva kartavyo yādṛśe tādṛśe nare / narāḥ strīṣu vicitrāśca lampaṭāḥ kāmamohitāḥ

हिन्दी अर्थ

पुलकित हो जाती है, जैसी राज्याभिषेक होने से रानी पुलकित होकर नवीन यौवन सुख का अनुभव करती है । चराचर जीबों के कल्याण के लिये पृथ्वी इन मेघों से प्रेम करती है ।३५। जीवनोत्पादक जीमूत नामक मेध द्वितीय प्रवह नामक वायु का आश्रय ग्रहण कर स्थित हैं । ये एक योजन, आधा योजन या चौथाई योजन ऊपर से मूसलधार वृष्टि किया करते हैं। इनके बरसने का यही ढंग है। पुष्करावतंकादि मेघ पक्षसम्भव हैं । पूरे काल में चराचरों का कल्याण चाहने वाले इन्द्र ने महाबलशाली, विश्ञालकाय और ६इच्छानुरूप गमन करने

English

"O noble lady, you went to sleep in a defiled state since the hair were spread over your feet. On seizing that oppor¬ tunity I have split the foetus that would have been the slayer of Sakra in battle. It behoves you to firgive me."

अध्याय ६७

श्लोक 91

परिणीय तु मां त्वं हि भुङ्क्ष्व भोगान्मया सह ।जन्मनाशो भवेत् पश्चान्न त्वं नान्यो भवेन्मम

pariṇīya tu māṃ tvaṃ hi bhuṅkṣva bhogānmayā saha / janmanāśo bhavet paścānna tvaṃ nānyo bhavenmama

हिन्दी अर्थ

पुष्करा नाम ते मेघा बृहन्तस्तोयमत्सराः । पुष्करावतंकास्तेन कारणेनेह शब्द्रिता:... ३६ नानारूपधराश्चेव महाघोरतराश्च ते । कल्पान्तवुष्ठेः स्रष्टारः संवर्ताग्नेनियासका:

English

May my sons have seven abodes in heaven. Let my seven sons roam about these wind-regions (Vataskandhas) ( at i- ways of wind). May they be renowned as the seven Maruts, the

अध्याय ६७

श्लोक 92

ब्राह्मणी क्षत्रिणी वैशी शूद्री यावत् तथैव च ।द्वितीयो न भवेद् भर्ता एकाकी चेह जन्मनि

brāhmaṇī kṣatriṇī vaiśī śūdrī yāvat tathaiva ca / dvitīyo na bhaved bhartā ekākī ceha janmani

हिन्दी अर्थ

वर्षन्त्येते युगान्तेषु तृतीयास्ते प्रकोतिताः । अनेकरूपसंस्थानाः पुरयन्तो महीतलम् ॥॥ बाय॑ पर वहन्तः स्युराशिताः कल्पसाधकाः ॥४ १

English

May the first Skandha (region) be on the Earth, the second in the Sun, the third in the Moon, audthe fourth should be known in the groups of luminaries.

अध्याय ६७

श्लोक 93

दानव उवाच: यत्त्वया गदितं वाक्यं तन्मया धारितं हृदि ।प्रत्ययं मे कुरुष्वाद्य यत्ते मनसि रोचते

dānava uvāca: yattvayā gaditaṃ vākyaṃ tanmayā dhāritaṃ hṛdi / pratyayaṃ me kuruṣvādya yatte manasi rocate

हिन्दी अर्थ

तान्येवाण्डकपालस्य सर्वे सेघाः प्रकीतिता

English

May the fifth Skandha be among the planets, the sixth in the sphere of the Seven Sages and the seventh m Dhruva. That is the last region of the wind.

अध्याय ६७

श्लोक 94

कन्योवाच: जानीष्व गोपकन्यां मां क्रीडामि सखिभिः सह ।अस्मत्कुलेषु यद्दिव्यं तत्कुरुष्व यथाविधि

kanyovāca: jānīṣva gopakanyāṃ māṃ krīḍāmi sakhibhiḥ saha / asmatkuleṣu yaddivyaṃ tatkuruṣva yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

गजानां पव॑तानां च मेघानां भोगिभिः सह । कुलमेक॑ पृथरभुतं योनिरेका जल॑ स्पृ तम् ३४४ श्रेष्ठ: परिवहो नाम तेषां वायुरपाश्रय: । योइसो बिभति भगवान्गड्रामसाकाशगोचराम् ॥ दिव्याम्ृतजलां पुण्यां त्रिधा स्वर्गंपथे स्थिताम्

English

May my sons roam about among them on different

अध्याय ६७

श्लोक 95

न तद्दिव्यं कुले ऽस्माकं विषं कोशं न तत्तुला ।गोपान्वयेषु सर्वेषु हस्तः शिरसि दीयते

na taddivyaṃ kule 'smākaṃ viṣaṃ kośaṃ na tattulā / gopānvayeṣu sarveṣu hastaḥ śirasi dīyate

हिन्दी अर्थ

तस्याविष्यन्दर्ज तोय॑ं दिग्गजाः पृथुभिः करें: । शीकर संप्रमुच्चति नोहार इति स स्पृतः

English

The second Valaskandha extends from the clouds upto the Sun. It is called Pravaha. Let the second set (of my sons) walk in the second Vataskandha.

अध्याय ६७

श्लोक 96

कामान्धेनैव राजेन्द्र निक्षिप्तो मस्तके करः ।तत्क्षणाद् भस्मसाद्भूतो दग्धस् तृणचयो यथा

kāmāndhenaiva rājendra nikṣipto mastake karaḥ / tatkṣaṇād bhasmasādbhūto dagdhas tṛṇacayo yathā

हिन्दी अर्थ

बाले पर्व॑तों का पक्ष काट दिया था ॥३६-३८। वे ही विशाल पक्ष जलपूर्ण होकर मेघाकार हो गये । उच्त मेघों का नाम हुआ पुष्कर । इसी कारण वे पुष्करावतंक नाम से प्रसिद्ध हैं। ये मेघ नाना रूप को धारण करने वाले, महाभयद्धुर, कल्पान्त में वृष्टि करने वाले और संवर्तक अग्नि के नियामक हैं ३६-४०। ये तृतीय श्रेणी के मेघ कल्पान्त में वृष्टि करते हैं और विविध रूप धारण कर महीमण्डल को पूर्ण कर देते हैं एवं परावह वायु का आअय लेकर कलपों को बदल दिया करते हैं। चार मुंहवाले' स्वयम्भू ब्रह्म, जिस प्राकृत अण्डकपाल से उत्पन्न हुये हैं, उसी अण्डपाल से सभी मेघ हुये हैं ॥४१-४२। सभी मेघों को धुम आप्याधित यानी तृप्त करते हैं। उन सभी मेघों में पजंन्‍्य श्रेष्ठ हैं और दिग्गज चतुष्टय । गज, पर्वत, सेघ और साँपों का कुल प्रथक होने पर भी एक ही है; क्योंकि इन सब का उत्पत्ति-स्थान जल ही कहा गया है ।४२-४४। हैमन्त काल में सम्पूर्ण सस्यों की बृद्धि

English

Above the solar region and extending upto the Moon is the Vataskandha remembered as Udvaha. May the third set (of my sons) walk through the Valaskandha.

अध्याय ६७

श्लोक 97

केशवोपरि देवैस्तु पुष्पवृष्टिः शुभा कृता ।हृष्टाः सर्वे ऽगमन्देवाः स्वस्थानं विगतज्वराः

keśavopari devaistu puṣpavṛṣṭiḥ śubhā kṛtā / hṛṣṭāḥ sarve 'gamandevāḥ svasthānaṃ vigatajvarāḥ

हिन्दी अर्थ

करने के लिये शीत सम्भव दिग्गज और पर्जन्य तुषार वृष्टि किया करते हं। श्रेष्ठ परिवह वायु इन सबका आश्रय-स्थान है। यही भगवान् परिवह वायु स्वगंपथ में तीन धाराओं में बहने वाली, दिव्य, पवित्र और अमृत की तरह जल वाली आकाश-गड़ा को धारण करने वाले हैं। आकाश-गड्भा के जल को दिग्गजगण अपनी मोटी सूंड्ों से फुहारे की तरह उछालते हैं। बही जलकण नौहार कहलाता है ।४१५-४७। सुमेरु के दक्षिण और

English

Above the lunar region and extending upto the stars is the fourth Vataskandha which is called Suvaha. O lord, may the fourth set of my sons walk therein.

अध्याय ६७

श्लोक 98

क्षीरोदं केशवो गच्छत्कालपृष्ठे निपातिते ।य इदं शृणुयाद्भक्त्या चरितं दानवस्य च

kṣīrodaṃ keśavo gacchatkālapṛṣṭhe nipātite / ya idaṃ śṛṇuyādbhaktyā caritaṃ dānavasya ca

हिन्दी अर्थ

हिमालय के उत्तर हेमकूट नामक एक परत है। इसके निकट पुण्ड़ू नामक एक प्रसिद्ध नगर है।४८। वहाँ तुषार- तस्मिन्निपतितं वर्ष यत्तुषारसमुझूब । ततस्तदावहो वायुहिसशलात्समुद्दहन् ॥।

English

This psuedo-scientific classification of higher space into seven strata

अध्याय ६७

श्लोक 99

स जयी जायते नित्यं शङ्करस्य वचो यथा ।एतस्मात् कारणाद् राजंल् लिङ्गेश्वरमिति श्रुतम्

sa jayī jāyate nityaṃ śaṅkarasya vaco yathā / etasmāt kāraṇād rājaṃl liṅgeśvaramiti śrutam

हिन्दी अर्थ

मेघावा(उचा55)प्यायनं चेव स्वमेतत्प्रकीतितम् । सूर्य एवं तु वष्टीनां ख्रष्ठा समुपदिश्यते

English

Above the planets and extending up to the Seven Sages (Great Bear) is the sixth Skandha which is called Parahala (Anu-

अध्याय ६७

श्लोक 100

लीनं च पातकं यस्मात् स्नानमात्रेण नश्यति ।त्वगस्थि शोणितं मांसं मेदःस्नायुस्तथैव च

līnaṃ ca pātakaṃ yasmāt snānamātreṇa naśyati / tvagasthi śoṇitaṃ māṃsaṃ medaḥsnāyustathaiva ca

हिन्दी अर्थ

श्रुवेषा55वेष्टितां सुर्येस्ताभ्यां वृष्टिः प्रवरतते । ध्रुवेणा5४वेष्टितों वायुव् ५िट संहरते पुनः ५२ हिरण्मयेन भगवान्परवंणा तु महौजसा। नष्टवर्त्माइन्धकारेण षट्प्रकारेकनेमिना॥ द चक्रेण भास्वता सूर्यः स्यन्दनेन प्रसपेति

English

Above the Seven Sages and extending up to Dhruva (Pole Star) is the seventh Vataskandha which is called Parivaha- Maymy sons stay therein.

अध्याय ६७

श्लोक 101

मज्जाशुक्रगतं पापं नश्यते जन्मकोटिजम् ।लुङ्केश्वरे महाराज तोयं पिबति भक्तितः

majjāśukragataṃ pāpaṃ naśyate janmakoṭijam / luṅkeśvare mahārāja toyaṃ pibati bhaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

स् तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथो हार्थवशेन तु । असज्भः काचचनो दिव्यो युक्तः परमगहँयः .. ३५७

English

May my sons move about all these on different occa¬ sions. There let these be known by the name Maruts."

अध्याय ६७

श्लोक 102

त्रिभिः प्रसृतिमात्राभिः पापं याति सहस्रधा ।विशेषेण चतुर्दश्यामुभौ पक्षौ तु चाष्टमी

tribhiḥ prasṛtimātrābhiḥ pāpaṃ yāti sahasradhā / viśeṣeṇa caturdaśyāmubhau pakṣau tu cāṣṭamī

हिन्दी अर्थ

तेनासो सपंति व्योस्नि भास्वता तु दिवाकरः ४८ की ही वृष्टि हुआ करती है। तब फिर आवह नामक वायु उस तुषार को अपने सामथ्यं से बटोर कर उस महाशल से महागिरि हिमालय पर बरसा देते हैं। यह वृष्टि हिमालय तक ही समाप्त हो जाती है। इसके बाद अन्य देशों में वैसी वष्टि नहीं होती; किन्तु जो कुछ भी होती है, उसी से सस्य-वृद्धि होती है ४९-५०। मेघ और उनका वद्धि-वृत्तान्त इस प्रकार कहा गया; किन्तु वास्तव में वृष्टि करने वाले सूर्य ही बताये गये हैँ । सूर्य

English

Then the mother and the son named them Maruts through the actions performed by them. They separately named the seven Maruts of each set.

अध्याय ६७

श्लोक 103

उपोष्य यो नरो भक्त्या पित्ःणां पाण्डुनन्दन ।उद्धृतास्तेन ते सर्वे नारकीयाः पितामहाः

upoṣya yo naro bhaktyā pitḥṇāṃ pāṇḍunandana / uddhṛtāstena te sarve nārakīyāḥ pitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

के द्वारा वृष्टि होती है ओर वायु के द्वारा बृष्टि रोकी जाती है; इसलिये प्रूव से अवेष्टित सूर्य और वायु ही वृष्टि करने वाले और थृष्टि को रोकने वाले हैँ ।११-५२। वायु सूर्य ग्रह से निकल कर सम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल का परिभ्रमण कर दिन के अन्त में पुनः प्रूव द्वारा परिवेष्टित सूर्य में ही प्रवेश कर जाता है। अब सूर्य के रथ का संनिवेश सुनिये । इस रथ में एक चकका, पाँच अरायें और तीन नाभियाँ हैँ । अन्धकार से आच्छन्न पथ

English

The following constitute the other sets: Krta, Satva, Dhruva, Dharta, Vidharta, Vidharaya, Dhvanta, Dhuni, Ugra, Bhlma, Abhiyu, Saksipa. This is known as Ahvayagana*, Idpk, Anyadrk, Yadrk, Pratikrt, Samiti, Samrambha, Idrk, Purusa, Anyadrk sa, Cetasa, Samita, Asamitadrksa, Pratidrksa and others.

अध्याय ६७

श्लोक 104

काकिणीं चैव यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे ।तेन दानफलं सर्वं कुरुक्षेत्रादिकं च यत्

kākiṇīṃ caiva yo dadyād brāhmaṇe vedapārage / tena dānaphalaṃ sarvaṃ kurukṣetrādikaṃ ca yat

हिन्दी अर्थ

पर इस हिरण्मय अत्यन्त भास्वर, महावेगशाली, षड्विध नाभिवाले और तेजोमय रथ के चक्र से अन्धकार को नष्ट करते हुये भगवान् सूर्य गमन करते हें ।१३-५५॥ इस रथ का विस्तार दस हजार योजन है। इस रथ के मध्य से ईषादण्ड का प्रमाण दुगुना है। प्रयोजन वश या सूय के लिये ब्रह्मा ने इस रथ का निर्माण किया है। यह रथ असज्भ, सुवर्णमय, दिव्य और परम वेगगामी अइवों से युक्त है। छन्दः स्वरूप अबवों से युक्त यह रथ जहाँ शुक्र हैं, वहाँ ठहरा है एवं लक्षण में वरुण के रथ के समान है। इसी चमकोले रथ के द्वारा सूय॑

English

These forty-nine are the different Maruts with their own separate names. They have been enumerated by Diti and Indra.

अध्याय ६७

श्लोक 105

प्राप्तं तु नान्यथा राजञ्छङ्करो वदते त्विदम् ।स्पर्शलिङ्गमिदं राजञ्छङ्करेण तु निर्मितम्

prāptaṃ tu nānyathā rājañchaṅkaro vadate tvidam / sparśaliṅgamidaṃ rājañchaṅkareṇa tu nirmitam

हिन्दी अर्थ

३८२ : वायुपुराणम्

English

On hearing their names, Diti said to Indra, "O son, may my sons roam about in the Vdtaskandha. May my sons walk in the company of Devas. Welfare unto you.

अध्याय ६७

श्लोक 106

स्पर्शमात्रे मनुष्याणां रुद्रवासो ऽभिजायते ।तेन दानफलं सर्वं कुरुक्षेत्रादिकं च यत्

sparśamātre manuṣyāṇāṃ rudravāso 'bhijāyate / tena dānaphalaṃ sarvaṃ kurukṣetrādikaṃ ca yat

हिन्दी अर्थ

तस्य काष्ठाः स्मृता घाणा ईषादण्डः क्षणास्तु वे । नि्ेषाध्चानुकर्षो5सप ईषा चास्य लवाः स्मृता: ॥ रात्रिवंरूथों धर्मोउस्य ध्वज ऊध्वः समुच्छितः । युगाक्षकोटी ते तस्य अर्थंकामाबुभो स्पूती..

English

On hearing her words, the thousand-eyed Purandara joined his palms in reverence and said: "Mother, be it so.

अध्याय ६७

श्लोक 107

एतस्मात् कारणाद् राजंल् लोकपालाश्च रक्षकाः ।दुर्गा च रक्षणे सृष्टा चतुर्हस्तधरा शुभा

etasmāt kāraṇād rājaṃl lokapālāśca rakṣakāḥ / durgā ca rakṣaṇe sṛṣṭā caturhastadharā śubhā

हिन्दी अर्थ

सप्ताध्वरूपाच्छन्दांसि वहन्ते वामतो धुरम् । गायत्री चेंब त्रिष्दुण्च अनुष्दुबूजगती तथा ३६४

English

Undoubtedly all this will happen as mentioned by you. These sons of noble souls (shall) become Devas and will be ho¬ noured by Devas. Similarly, your sons will become partakers of the fruits of Yajiias along with Devas."

अध्याय ६७

श्लोक 108

धनदो लोकपालेशो रक्षकश्चेश्वरस्य च ।रक्षति च सदा कालं ग्रहव्यापाररूपतः

dhanado lokapāleśo rakṣakaśceśvarasya ca / rakṣati ca sadā kālaṃ grahavyāpārarūpataḥ

हिन्दी अर्थ

सहचक़ों अमत्यक्ष: सहाक्षों भ्रसति श्रुवः। अक्षः सहैब चक्रेण अ्रमते5सो श्रुवेरितः तेनासौ तरणिदेंवस्तरसा सर्पते दिवि। युगाक्षकोटिसंबद्धो रश्मी द्वो स्थन्दनस्य हि ६८

English

Hence all those Maruts should be known as Devas (shining ones), younger brothers of Indra and Amaras (deathless ones). All of them, the sons of Diti were ascetics and gods. After knowing this decisively, the mother and the son of ascetic nature went to heaven delightedly. Sakra too went to heaven.

अध्याय ६७

श्लोक 109

पुत्रभ्रातृसमारूपैः स्वामिसम्बन्धरूपिभिः ।लङ्केश्वरं च राजेन्द्र देवैर्नाद्यापि मुच्यते

putrabhrātṛsamārūpaiḥ svāmisambandharūpibhiḥ / laṅkeśvaraṃ ca rājendra devairnādyāpi mucyate

हिन्दी अर्थ

युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्थन्दनस्य तु । भुवेण संगृहीते वे द्विचक्रश्वेतरज्जुवत्

English

He who reads or listens to the auspicious origin of Maruts shall become long-lived. He never meets with (he fear of drought.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 67
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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