अध्याय ६७
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे मातृतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्षष्टितमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ६७ श्रीमार्कण्डेय उवाच: तस्यैवानन्तरं तात जलमध्ये व्यवस्थितम् ।लुङ्केश्वरम् इति ख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe mātṛtīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭṣaṣṭitamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 67 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tasyaivānantaraṃ tāta jalamadhye vyavasthitam / luṅkeśvaram iti khyātaṃ surāsuranamaskṛtam
हिन्दी अर्थ
योजन चला करते हैं। क्षीरोद समुद्र के उत्तर उदित होकर चलते हुये सूये जब दक्षिण दिल्ला से लौटकर विषुव रेखा पर स्थित होते हैं, उस काल में विषुब मण्डल के योजन-प्रमाण को धुनिये ।(२२-१२५२। इस विषुव का विस्तार तीन करोड़ एकासी लाख योजन है। छठ शाकद्वीप के उत्तर उदित होकर विचरण करते समय जब सूर्य श्रावण मास में उत्तर दिशा में चले जाते हैं, तब उत्तरीय दिशा के मण्डल-प्रमाण को
English
On hearing his words, the sages and ascetics of the Naimisa forest asked the most excellent one (i.e. Suta) in due course.