अध्याय ८
श्लोक 1
अध्यायः ४० विदुर उवाच ।योऽभ्यर्थितः सद्भिरसज्जमानः करोत्यर्थं शक्तिमहापयित्वा ।क्षिप्रं यशस्तं समुपैति सन्तमलं प्रसन्ना हि सुखाय सन्तः
adhyAyaH 40 vidura uvAcha | yo.abhyarthitaH sadbhirasajjamAnaH karotyartha.n shaktimahApayitvA | xipra.n yashastaM samupaiti santamalaM prasannA hi sukhAya santaH
हिन्दी अर्थ
जो धीर पुरुषोंके बचनोंके परिणामपर विचार करके उन्हें कार्यरूपमें परिणत करता है, बह चिर्कांलंतक यदहाकां भांगी बना रहता है जो विद्भान् पापरूप फल देनेवाले कर्मोका आरम्भ नहीं करता, वह बढ़ता है; किन्तु जो पूर्वमें किये हुए पापोंका विचार करके उन्हींका अनुसरण करता है, बह खोटी बुद्धिवाला मनुष्य अगाध कीचड़से भरें हुए बीहड़ नंरकमें गिराया जाता है॥ ३५॥ मन्त्रभेदस्थ षद् ग्राज्ञो द्वाराणीमानि लक्षयेत्। अर्थसंततिकामश्च॒ रक्षेदेतानि नित्यहा: ॥ ३६॥ श्१्० « “विदुरनीतिः कक अर के हैक कैफ कै हक है ऊै ऊै कै जै है कै ५ कै ऊ कै के बे अे कक है सै के अर के है कै है जज अप कै जे तर जज" मर्द स्वप्रमस्िज्ञानमाकारं चात्मसम्भवम । दुष्टामात्येचु.. विश्रम्भ॑ दूताच्ाकुशलादपि
English
"Vidura said, 'Worshipped by the good and abandoning pride, that good man who pursueth his objects without outstepping the limits of his power, soon succeedeth in winning fame, for they that are good, when gratified with a person, are certainly competent to bestow happiness on him.