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अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.10
सत्यापित
मूल संस्कृत
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा । न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभागसौ ॥ १० ॥
IAST लिप्यंतरण
yasyābhimāno mokṣe'pi dehe'pi mamatā tathā | na ca jñānī na vā yogī kevalaṃ duḥkhabhāg asau || 10 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
यस्य, अभिमानः, मोक्षे, अपि, देहे, अपि, ममता, तथा, न, च, ज्ञानी, न, वा, योगी, केवलम्, दुःख-भाक्, असौ
- यस्य मोक्षे अपि अभिमानः
- जिसके मन में 'मैं मुक्त हो गया हूँ' का भी अहंकार है
- तथा देहे अपि ममता
- और शरीर में 'यह मेरा शरीर है' का मोह बना हुआ है
- असौ न च ज्ञानी न वा योगी
- वह पुरुष न ज्ञानी है और न योगी
- केवलम् दुःख-भाक्
- वह तो केवल दुख और भ्रम का ही भागीदार है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जिसका मोक्ष में भी अभिमान है और देह में ममता है, वह न ज्ञानी है और न योगी, वह केवल दुख का ही भागीदार है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक पाखंडी और अधूरे साधकों पर कड़ा प्रहार करता है। कुछ लोग शास्त्रों की दो-चार बातें सीखकर यह घमंड करने लगते हैं कि "मैं तो मुक्त पुरुष हूँ, मैं सिद्ध ज्ञानी हूँ।" किंतु दूसरी तरफ, उनके शरीर, भोजन, मान-सम्मान और सुख-सुविधाओं में उनका गहरा मोह चिपका रहता है। अष्टावक्र स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति न तो ज्ञानी है और न योगी; वह केवल अपने अहंकार के कारण दुख ही भोगेगा। मोक्ष कोई उपाधि या तमगा नहीं है जिसे पहनकर घमंड किया जाए; वह तो ‘मैं’ के मिटने का नाम है।
सरल हिन्दी में समझें
आध्यात्मिक रास्ते पर सबसे बड़ा खतरा होता है—"आध्यात्मिक घमंड" (Spiritual Ego)।
कुछ लोग थोड़ा-सा ध्यान सीखकर या किताबें पढ़कर खुद को बहुत बड़ा महात्मा समझने लगते हैं। वे कहते हैं कि "मैं तो मुक्त हो चुका हूँ", लेकिन अगर कोई उनकी थोड़ी-सी बुराई कर दे या शरीर को कोई कष्ट हो जाए, तो वे तुरंत तिलमिला उठते हैं।
अष्टावक्र कहते हैं कि ऐसा इंसान न ज्ञानी है और न योगी। वह सिर्फ अपने भ्रम में जी रहा है और आगे चलकर बहुत दुख पाएगा। सच्ची मुक्ति का मतलब है कि आपके अंदर से "मैं कुछ खास हूँ" का यह घमंड पूरी तरह गायब हो जाए।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. मोक्षाभिमान (spiritual pride) अहंकार का सबसे सूक्ष्म और खतरनाक रूप है। 2. देह में ममता रहते हुए मोक्ष का दावा करना आत्म-वंचना (self-deception) है। 3. अहंकार जब सांसारिक विषयों से थकता है तो वह आध्यात्मिक उपलब्धियों को अपना आभूषण बना लेता है। 4. अष्टावक्र गीता का 1.25 ‘आत्मानं मन्यते मुक्तो’ यहाँ अहंकार-शून्य अनुभूति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 5. केवलम् दुःखभाक् स्पष्ट करता है कि पाखंड और आत्म-प्रवंचना का परिणाम केवल मानसिक क्लेश है। 6. सच्चा आत्मज्ञान साधक को अत्यंत विनम्र, निरहंकारी और सहज बना देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे कोई भिखारी राजा का मुकुट चुराकर पहन ले लेकिन अंदर से भीख माँगने की आदत न छूटे, वैसे ही देह-आसक्ति रखते हुए खुद को मुक्त कहना केवल एक ढोंग है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक सोशल मीडिया पर जब कोई व्यक्ति खुद को बड़ा ‘गुरु’ या ‘इनलाइटेन्ड’ बताकर दूसरों को नीचा दिखाता है लेकिन अपनी तारीफ और फॉलोअर्स के लिए बेचैन रहता है, तो वह इसी आध्यात्मिक अहंकार में होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आध्यात्मिक ज्ञान का भी घमंड मत पालिए; जब तक ‘मैं’ और ‘मेरा शरीर’ का मोह है, तब तक कोई मुक्ति नहीं है।
सामान्य गलतफहमी
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘देहेऽपि ममता तथा’ का अर्थ शरीर के स्वास्थ्य, पोषण या बीमारी में दवा की उपेक्षा करना नहीं है, बल्कि देह को ही सब कुछ मानकर घमंड करने से बचना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में यह विचार आए कि "मैं दूसरों से ज्यादा समझदार या आध्यात्मिक हूँ", तो तुरंत रुकें और उस घमंड को मुस्कुराकर विदा कर दें। (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी आध्यात्मिक समझ मुझे और अधिक सरल और विनम्र बना रही है, या मेरे अंदर एक नया श्रेष्ठता का घमंड भर रही है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन से कहें: "मैं कोई खास ज्ञानी नहीं हूँ, मैं केवल एक सरल और शांत चेतना हूँ।"
एक पंक्ति में सार: जिसके मन में मोक्ष का अभिमान और देह में ममता है, वह न ज्ञानी है न योगी; वह केवल दुख का भागीदार है।
English
Translation: He who harbors pride even in liberation and clings to possessiveness toward the body is neither an enlightened knower nor a yogi, but purely a sufferer of grief.
Simple explanation: Spiritual vanity is the subtlest fetter. Claiming high enlightenment while still clinging stubbornly to bodily identification and status is sheer self-deception. Such a person is neither a knower nor a yogi, but a victim of vanity.
विषय और संबंधित श्लोक
- आध्यात्मिक-अहंकार
- देहाध्यास-त्याग
- आत्म-वंचना
- सच्ची-विनम्रता
- श्लोक 16.9: वीतरागो हि निर्दुःखः।
- श्लोक 16.11: हरो यद्युपदेष्टा ते।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का दसवाँ श्लोक।