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अध्याय 16 · ज्ञान-संग्रह से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 16.8
सत्यापित
मूल संस्कृत
प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः ॥ ८ ॥
IAST लिप्यंतरण
pravṛttau jāyate rāgo nirvṛttau dveṣa eva hi | nirdvandvo bālavad dhīmān evam eva vyavasthitaḥ || 8 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
प्रवृत्तौ, जायते, रागः, निर्वृत्तौ, द्वेषः, एव, हि, निर्द्वन्द्वः, बालवत्, धीमान्, एवम्, एव, व्यवस्थितः
- प्रवृत्तौ रागः जायते
- संसार के कर्मों में उलझने पर आसक्ति (राग) बढ़ती है
- निर्वृत्तौ द्वेषः एव हि
- और हठपूर्वक कर्म त्यागने पर द्वेष पैदा होता है
- धीमान् बालवत्
- इसलिए बुद्धिमान पुरुष छोटे बालक के समान
- निर्द्वन्द्वः एवम् एव व्यवस्थितः
- द्वंद्वों से मुक्त होकर सहज रूप से स्थित रहता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
प्रवृत्ति में राग उत्पन्न होता है और निवृत्ति में द्वेष; इसलिए बुद्धिमान पुरुष बालक के समान निर्द्वन्द्व होकर सहज भाव में स्थित रहता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यदि मनुष्य सांसारिक कार्यों में लिप्त रहता है, तो उसमें राग (आसक्ति) बढ़ जाता है। और यदि वह जबरन सब कुछ छोड़कर भागता है, तो उसके मन में संसार और लोगों के प्रति द्वेष (चिढ़) पैदा हो जाता है। सच्चा ज्ञानी इन दोनों अतियों से बचता है। वह किसी छोटे अबोध बालक की तरह निर्दोष और सरल हो जाता है—न कर्म करने का कोई अहंकार, न कर्म छोड़ने की कोई हठधर्मिता। वह जो स्वाभाविक रूप से सामने आ जाए, उसे बिना राग-द्वेष के स्वीकार करके अपनी शांति में रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
यहाँ अष्टावक्र जीवन जीने की सबसे सुंदर और सहज कला सिखाते हैं।
अगर आप दुनिया के कामों में बहुत ज्यादा घुस जाते हैं, तो आप उनसे चिपक जाते हैं (राग)। और अगर आप सब कुछ छोड़कर भागने की कोशिश करते हैं, तो आपके अंदर दुनिया के प्रति कड़वाहट आ जाती है (द्वेष)।
सच्चा बुद्धिमान वह है जो एक छोटे बच्चे की तरह जीता है। बच्चे के मन में न कल की चिंता होती है, न कोई बनावटी योजना, और न किसी से दुश्मनी। वह इस पल में जैसा है, वैसा ही खुश रहता है। ज्ञानी भी बिना किसी नाटक के बिल्कुल सहज और शांत होकर जीता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों अहंकार-चालित होने पर नए बंधन बन जाती हैं। 2. बालवत स्थिति का अर्थ अज्ञान या नासमझी नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह-शून्यता और सहजता (spontaneity) है। 3. उपनिषदों का आदेश ‘बाल्येन तिष्ठासेत्’ (बालक की तरह रहो) यहाँ पूर्ण रूप से साकार होता है। 4. निर्द्वन्द्वः वह है जिसके लिए अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ अपना भेद खो देती हैं। 5. व्यवस्थितः शब्द चित्त की उस स्वाभाविक स्थिरता का सूचक है जिसे किसी कृत्रिम साधन की आवश्यकता नहीं। 6. यह अद्वैत आचरण की सबसे व्यावहारिक और सुंदर व्याख्या है।
उदाहरण से समझें: जैसे छोटा बच्चा रेत का घर बनाता है और बिना रोए उसे ढहाकर आगे बढ़ जाता है, वैसे ही ज्ञानी बिना किसी चिपकाव के जीवन के कार्यों में भाग लेता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब कोई व्यक्ति ऑफिस में अपना काम पूरी ईमानदारी से करता है लेकिन काम के खत्म होते ही तनाव को वहीं छोड़कर घर पर बच्चों की तरह खिलखिलाता है, तो यह उसी सहजता का आधुनिक उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: न कर्मों में लिप्त होइए और न उनसे नफरत करके भागिए; बालक की तरह सरल और निष्कपट होकर हर क्षण को सहजता से जीएँ।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘बालवत्’ का अर्थ बचकानी हरकतें करना या कानूनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ना नहीं है, बल्कि मन के अंदर से कपट और अहंकार को विदा करना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज किसी से बात करते समय अपने चेहरे से बनावटी गंभीरता हटाकर एक बालक की तरह सहज और सच्चे मन से संवाद करें। (दिनभर)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने जीवन में बहुत ज्यादा गंभीर और बनावटी बनकर अपनी स्वाभाविक मासूमियत और शांति को खो चुका हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपने मन को बिल्कुल निर्दोष महसूस करें, जैसे किसी छोटे बच्चे का मन होता है जिसमें कोई छल नहीं होता।
एक पंक्ति में सार: प्रवृत्ति में राग और निवृत्ति में द्वेष होता है; बुद्धिमान पुरुष बालक की तरह निर्द्वन्द्व होकर सहज रहता है।
English
Translation: Attachment arises from worldly engagement and aversion from renunciation. Therefore, the wise one, free from dualities, abides as a child, settled in spontaneous being.
Simple explanation: Compulsive action breeds attachment, while forced ascetic withdrawal fosters bitter aversion. The wise person avoids both extremes, living with the natural innocence and freedom of a child, utterly settled beyond artificial contrivances.
विषय और संबंधित श्लोक
- बालवत-स्थिति
- प्रवृत्ति-निवृत्ति-पार
- निर्द्वन्द्व
- सहज-जीवन
- श्लोक 16.7: स्पृहा जीवति यावद्वै।
- श्लोक 16.9: हातुमिच्छति संसारम्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। सोलहवें प्रकरण का आठवाँ श्लोक।