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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक १००/१००100%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.100

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः । यथातथा यत्रतत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १०० ॥

IAST लिप्यंतरण

na dhāvati janākīrṇaṃ nāraṇyam upaśāntadhīḥ | yathātathā yatratatra sama evāvatiṣṭhate || 100 ||

सरल उच्चारण: na dhaavati janaakeernam naaranyam upashaantadheeh yathaatathaa yatratatra sama evaavatishthate (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, धावति, जन-आकीर्णम्, न, अरण्यम्, उपशान्त-धीः, यथा-तथा, यत्र-तत्र, समः, एव, अवतिष्ठते

उपशान्त-धीः
परम शांत बुद्धि वाला जीवनमुक्त ज्ञानी
जन-आकीर्णम् न धावति
न तो लोगों से भरी भीड़ की ओर (संग के लिए) दौड़ता है
न अरण्यम्
और न जंगल की ओर (पलायन के लिए) भागता है
यथा-तथा यत्र-तत्र
वह जैसे-तैसे, जहाँ-कहीं भी (प्रारब्धवश) रहे
समः एव अवतिष्ठते
सदा सर्वत्र समभाव में ही प्रतिष्ठित रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

परम शांत बुद्धि वाला ज्ञानी न तो भीड़भाड़ वाले नगर की ओर भागता है और न जंगल की ओर; वह जिस किसी भी परिस्थिति में, जहाँ कहीं भी हो, सदा समभाव में ही स्थित रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अष्टावक्र गीता के सबसे विशाल और शिखर अठारहवें प्रकरण का सौवाँ और अंतिम श्लोक है। यहाँ अष्टावक्र जीवनमुक्ति की पूर्ण सहजता का महा-निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। जो अभी कच्चा साधक है, वह कभी भीड़ से घबराकर जंगल भागता है, और कभी जंगल के अकेलेपन से ऊबकर शहर की ओर दौड़ता है। किंतु जिस ज्ञानी की बुद्धि परमात्मा में पूरी तरह उपशांत हो चुकी है, उसके लिए शहर और जंगल दोनों एक समान हैं। वह न भीड़ की ओर भागता है और न एकांत के पीछे। वह जहाँ है, जिस हाल में है, महल में हो या झोपड़ी में, अनुकूलता में हो या प्रतिकूलता में—हर जगह अपने नित्य, अचल, अद्वैत समभाव में स्थित रहता है। इति श्रीअष्टावक्रगीतायामष्टादशं प्रकरणं समाप्तम्।

सरल हिन्दी में समझें

एक सच्चा ज्ञानी न तो लोगों की भीड़ देखकर भागता है कि "यहाँ बहुत शोर है", और न वह जंगलों की गुफाओं में भागता है कि "वहाँ शांति मिलेगी।"

वह जानता है कि शांति किसी जगह पर नहीं, उसके अपने ही भीतर है।

वह जहाँ भी रहता है—चाहे भरे बाज़ार में हो या शांत पहाड़ पर, जिस भी हाल में ज़िंदगी उसे रखे—वह हर जगह बिल्कुल शांत, सम और खुश रहता है। उसे कहीं भागने की ज़रूरत नहीं होती; वह अपनी आत्मा के अखंड साम्राज्य में सदा विश्राम करता है।

यहीं पर अष्टावक्र गीता का यह महान सौ श्लोकों वाला अठारहवाँ प्रकरण संपन्न होता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. न धावति जनाकीर्णं नारण्यम् प्रवृत्ति (संसार) और निवृत्ति (जंगल) दोनों के आग्रह से पूर्ण मुक्ति की घोषणा है। 2. उपशान्तधीः अष्टावक्र के ‘उपशम प्रकरण’ का मूल प्रतिपाद्य है—चित्त की आत्यंतिक और अखंड शांति। 3. यथातथा यत्रतत्र देश, काल और परिस्थिति की सीमाओं से परे सर्वत्र समभाव की पराकाष्ठा है। 4. सम एवावतिष्ठते अद्वैत जीवनमुक्ति की अंतिम सिद्धि है—‘ब्रह्मणि स्थितः’। 5. यह प्रकरण साधक को किसी भी प्रकार के पलायनवाद से बचाकर जीवन की हर परिस्थिति में सम और शांत रहने का सर्वोच्च संदेश देकर पूर्ण होता है।

उदाहरण से समझें: जैसे आकाश न तो शहर की इमारतों से तंग होता है और न जंगल के सन्नाटे से खुश होता है, वह हर जगह एक जैसा निर्लेप रहता है; ज्ञानी भीड़ और जंगल दोनों में समान रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

चाहे मुंबई की खचाखच भरी लोकल ट्रेन हो या ऋषिकेश का शांत गंगा किनारा, एक सच्चा साधक अपने हेडफ़ोन हटाकर भी अपने भीतर की अगाध शांति में मुस्कुराता रहता है; सच्ची शांति स्थान में नहीं, अंतर्मन में होती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: शांति ढूँढने के लिए पहाड़ों पर भागने की ज़रूरत नहीं है; अपने भीतर उतरिए, आप जहाँ भी हैं वहीं सम और शांत होकर परमात्मा का आनंद ले सकते हैं।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘न धावति अरण्यम्’ का अर्थ तीर्थों या एकांत का विरोध करना नहीं है; यह इस सत्य का बोध है कि सच्ची शांति बाहरी स्थान में नहीं, अंतःकरण के उपशम में है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जहाँ भी हों—कार्यालय में, बाज़ार में या घर पर—2 मिनट के लिए कहें: "मुझे कहीं भागने की ज़रूरत नहीं, मेरी आत्मा इसी क्षण यहाँ परम शांत है।" (भीड़ या काम के बीच)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं हमेशा यह सोचकर अशांत रहता हूँ कि अगर मैं किसी दूसरी जगह चला जाऊँ तो मुझे शांति मिल जाएगी?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न शहर, न जंगल; जहाँ मैं हूँ वहीं परब्रह्म का अखंड साम्राज्य है; मैं सर्वत्र सम, शांत और उपशांत आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: शांत बुद्धि वाला ज्ञानी न भीड़ में भागता है न जंगल में; जहाँ जैसे भी हो, सदा समभाव में स्थित रहता है।

English

Translation: The one of tranquil mind runs neither to the crowded town nor to the forest; however and wherever he is, he abides ever in equanimity.

Simple explanation: The sage of serene, tranquil mind rushes neither toward the crowded city nor flees into the wilderness; wherever and however he finds himself, he abides ever steadfast in sublime equanimity.

विषय और संबंधित श्लोक

  • उपशान्त-धी
  • भीड़-जंगल-समता
  • यथातथा-यत्रतत्र
  • उपशम-पूर्णाहुति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.99: जीवने नाभिनन्दति।
  • श्लोक 18.1: यस्य बोधोदये तावत्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 429–431 (PDF पृ. 436–438)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सौवाँ और अंतिम श्लोक। अष्टादश प्रकरण की पूर्णता।