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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.19
समीक्षा आवश्यक
मूल संस्कृत
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः । नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता ॥ १९ ॥
IAST लिप्यंतरण
bhāvābhāvavihīno yas tṛpto nirvāsano budhaḥ | naiva kiñcit kṛtaṃ tena lokadṛṣṭyā vikurvatā || 19 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
भाव-अभाव-विहीनः, यः, तृप्तः, निर्वासनः, बुधः, न, एव, किञ्चित्, कृतम्, तेन, लोक-दृष्ट्या, विकुर्वता
- यः भाव-अभाव-विहीनः
- जो अस्तित्व और अनस्तित्व के द्वंद्व से रहित है
- तृप्तः निर्वासनः बुधः
- सदा आत्म-तृप्त और वासनारहित ज्ञानी पुरुष है
- लोक-दृष्ट्या विकुर्वता तेन
- सांसारिक लोगों की दृष्टि में अनेक प्रकार के कर्म करते हुए भी
- किञ्चित् न एव कृतम्
- उसने वास्तव में कुछ भी नहीं किया है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जो भाव और अभाव से रहित, तृप्त और वासनारहित ज्ञानी है, वह संसार की दृष्टि में तरह-तरह के कर्म करते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अकर्मण्यता (actionlessness) के सर्वोच्च रहस्य को दोहराता है। संसार के लोग केवल बाहरी क्रिया को देखते हैं और कहते हैं कि "यह महात्मा तो बहुत काम कर रहा है या राज्य चला रहा है।" किंतु ज्ञानी के अंतःकरण में न तो किसी चीज़ को पाने का भाव है, न खोने का दुख, और न कोई व्यक्तिगत वासना। वह जो कुछ करता है, वह केवल प्रकृति के नियमों द्वारा हो रहा है। आत्मा अकर्ता होने के कारण उसके खाते में कोई कर्म नहीं जुड़ता। वह कर्म करते हुए भी सर्वथा अकर्ता रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
अगर कोई अभिनेता नाटक में किसी का कत्ल कर दे या किसी को बहुत सारा धन दान दे दे, तो क्या असली अदालत उसे सज़ा देती है या इनाम देती है? बिल्कुल नहीं, क्योंकि सब जानते हैं कि वह सिर्फ एक्टिंग कर रहा था।
इसी तरह, ज्ञानी व्यक्ति जब दुनिया में कोई भी काम करता है—चाहे वह घर संभालना हो या बड़ा फैसला लेना—वह अंदर से जानता है कि वह केवल एक भूमिका निभा रहा है।
उसके दिल में न कोई लालच होता है और न कोई स्वार्थ। इसलिए बाहर से देखने वालों को लगता है कि वह बहुत कुछ कर रहा है, लेकिन अंदर से उसने कुछ भी नहीं किया होता। वह बिल्कुल निर्लेप रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. भावाभावविहीनः चित्त की उस निष्पक्षता को दर्शाता है जहाँ न किसी वस्तु का आग्रह है न अभाव का दुख। 2. लोकदृष्ट्या विकुर्वता बाह्य क्रियाशीलता और आंतरिक अक्रियता के द्वैध को स्पष्ट करता है। 3. नैव किञ्चित् कृतं गीता के ४.२२ ‘कृत्वापि न निबध्यते’ की पूर्ण दार्शनिक व्याख्या है। 4. कर्म का फल कर्तापन के अहंकार से चिपकता है; अहंकार के अभाव में कर्म भस्म हो जाते हैं। 5. यह साधक को कर्म से भागने के बजाय कर्म के कर्तापन को छोड़ने की प्रेरणा देता है। 6. सच्चा संन्यास बाह्य अकर्मण्यता में नहीं, आंतरिक वासना-शून्यता में है।
उदाहरण से समझें: जैसे सूरज की रोशनी में लोग अच्छे और बुरे काम करते हैं लेकिन सूरज किसी काम का कर्ता नहीं बनता, वैसे ही ज्ञानी के शरीर द्वारा किए गए कर्म उसकी आत्मा को नहीं छूते। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब कोई डॉक्टर किसी मरीज का ऑपरेशन पूरी एकाग्रता और कुशलता से करता है लेकिन व्यक्तिगत मोह से मुक्त रहता है, तो वह निष्काम भाव से कार्य करता है; ज्ञानी का पूरा जीवन ऐसा ही होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया के काम पूरी निष्ठा से कीजिए, लेकिन ‘यह मैंने किया’ का अहंकार छोड़ दीजिए; अकर्ता रहकर जीने में ही मुक्ति है।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘नैव किञ्चित् कृतं’ का अर्थ अनैतिक या गैर-कानूनी आचरण करके अपनी जिम्मेदारी से बचना नहीं है; यह अहंकार-मुक्त आचरण का आध्यात्मिक सत्य है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज कोई भी काम करते समय यह याद रखें: "हाथ और बुद्धि काम कर रहे हैं, मेरी आत्मा केवल निर्लेप साक्षी है।" (काम करते समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने किए गए कामों का श्रेय लेकर अपने सिर पर नया बोझ बांध रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सारे कर्म प्रकृति द्वारा हो रहे हैं; मैं सदा अकर्ता, शांत और तृप्त आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: भाव-अभाव से रहित, तृप्त और वासनारहित ज्ञानी संसार की दृष्टि में कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता।
English
Translation: De-identified with existence and non-existence, content and free from latent craving, the wise one does nothing at all, even while actively engaged in the eyes of the world.
Simple explanation: Free from the concepts of being and non-being, content and devoid of latent desires, the sage does nothing whatsoever in reality, even though to ordinary worldly observers he appears intensely active.
विषय और संबंधित श्लोक
- अकर्ता-भाव
- लोकदृष्ट्या-कर्म
- निर्वासन-बुध
- नैष्कर्म्य-सिद्धि
- श्लोक 18.18: वर्तमानोऽपि लोकवत्।
- श्लोक 18.20: प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा।
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम में यह श्लोक 19 है (पहले ड्राफ्ट में 18 लिखा गया था, क्योंकि स्वाराज्ये वाला श्लोक छूट गया था)। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से मिलाया गया; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन फिर नहीं देखा गया।