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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.2
सत्यापित
मूल संस्कृत
अर्जयित्वाखिलान् अर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान् । न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत् ॥ २ ॥
IAST लिप्यंतरण
arjayitvākhilān arthān bhogān āpnoti puṣkalān | na hi sarvaparityāgam antareṇa sukhī bhavet || 2 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
अर्जयित्वा, अखिलान्, अर्थान्, भोगान्, आप्नोति, पुष्कलान्, न, हि, सर्व-परित्यागम्, अन्तरेण, सुखी, भवेत्
- अखिलान् अर्थान् अर्जयित्वा
- संसार के सारे धन-संपत्ति को कमाकर
- पुष्कलान् भोगान् आप्नोति
- और प्रचुर विषय-भोगों को प्राप्त करके भी
- सर्व-परित्यागम् अन्तरेण
- सब कुछ के (आंतरिक मानसिक) त्याग के बिना
- सुखी न हि भवेत्
- मनुष्य कभी सच्चा सुखी नहीं हो सकता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
संसार के समस्त पदार्थों को कमाकर और प्रचुर भोगों को पाकर भी, सब कुछ के आंतरिक त्याग के बिना कोई सुखी नहीं हो सकता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक सांसारिक उपलब्धियों की अंतिम सीमा दिखाता है। मनुष्य सोचता है कि जब उसके पास बहुत सारा धन, महल, नौकर-चाकर और सुख-सुविधाएं होंगी, तब वह सुखी हो जाएगा। किंतु संसार का इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा भी भीतर से अशांत और अतृप्त रहे। अष्टावक्र कहते हैं कि जब तक मन के अंदर से संग्रह और स्वामित्व की पकड़ (सर्वपरित्याग) नहीं छूटती, तब तक वास्तविक शांति असंभव है।
सरल हिन्दी में समझें
इंसान सोचता है कि अगर उसके पास दुनिया की सारी दौलत और सुख आ जाए, तो उसकी सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी।
लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि आप चाहे पूरी दुनिया की दौलत इकट्ठा कर लें और सारे ऐशो-आराम भोग लें, फिर भी आपके मन को सच्ची शांति तब तक नहीं मिलेगी जब तक आप अंदर से सब कुछ पकड़ने की ज़िद नहीं छोड़ते।
सच्चा सुख चीज़ों को जोड़ने में नहीं, बल्कि मन से उनके बोझ को उतार फेंकने में है। जब तक दिल में लोभ और पकड़ है, तब तक इंसान कंगाल ही रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. पदार्थ-संग्रह (accumulation) तृष्णा को बढ़ाता है, शांत नहीं करता। 2. सर्वपरित्यागम् का अर्थ बाहरी वस्तुओं को फेंकना नहीं, अपितु आंतरिक ममत्व और स्वामित्व का विसर्जन है। 3. कठोपनिषद् की यह घोषणा ‘न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः’ (धन से मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो सकता) यहाँ चरितार्थ होती है। 4. सुख आत्मा का स्वभाव है, वह किसी बाह्य पदार्थ का परिणाम नहीं हो सकता। 5. यह भोगवादी दृष्टि (consumerism) की व्यर्थता को उजागर करने वाला सार्वभौमिक सत्य है। 6. साधक को बाहरी संचय के स्थान पर आंतरिक अनासक्ति की ओर मोड़ने का निर्देश है।
उदाहरण से समझें: जैसे खारा पानी पीने से प्यास बुझने के बजाय और बढ़ जाती है, वैसे ही धन-भोग बटोरने से मन की अशांति और बढ़ जाती है; सच्चा सुख पानी की चाह छोड़ने में है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
आधुनिक समाज में जब किसी व्यक्ति के पास बड़ा बैंक बैलेंस, लग्जरी कार और महंगे गैजेट्स होने के बावजूद वह डिप्रेशन और अनिद्रा से जूझता है, तो यह इसी सत्य का प्रमाण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया भर की दौलत भी आपको शांति नहीं दे सकती; मन से पकड़ने की ज़िद छोड़िए, तभी सच्चा सुख मिलेगा।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘सर्वपरित्यागम्’ का अर्थ परिवार और नौकरी को सड़क पर छोड़ देना नहीं है, बल्कि मानसिक आसक्ति और लोभ को छोड़ना है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज अपनी किसी ऐसी चीज़ को देखें जिसके खो जाने का आपको बहुत डर रहता है, और मन में कहें: "यह चीज़ मेरी आत्मा से बड़ी नहीं है।" (घर या दफ्तर में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी आंतरिक खुशी को बाहरी सामान और बैंक बैलेंस की संख्या से जोड़कर देख रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरे पास जो कुछ है, वह प्रकृति की धरोहर है; मेरा असली स्वरूप सर्वथा स्वतंत्र और पूर्ण है।"
एक पंक्ति में सार: समस्त धन कमाकर और प्रचुर भोग पाकर भी, आंतरिक सर्व-त्याग के बिना कोई कभी सुखी नहीं हो सकता।
English
Translation: Though one acquires all wealth and attains abundant pleasures, never can one become truly happy without the total inner renunciation of everything.
Simple explanation: External accumulation can never quell the fever of existential lack. Even if the entire world’s riches are amassed, genuine fulfillment remains impossible without relinquishing internal possessiveness and identification.
विषय और संबंधित श्लोक
- सर्व-परित्याग
- भोग-सीमा
- आंतरिक-शांति
- ममत्व-त्याग
- श्लोक 18.1: यस्य बोधोदये।
- श्लोक 18.3: कर्तव्यदुःखमार्तण्ड।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का दूसरा श्लोक।