दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.40
सत्यापित
मूल संस्कृत
क्वात्मनो दर्शनं तस्य यो दृष्टमवलम्बते । धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ ४० ॥
IAST लिप्यंतरण
kvātmano darśanaṃ tasya yo dṛṣṭam avalambate | dhīrās taṃ taṃ na paśyanti paśyanty ātmānam avyayam || 40 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, आत्मनः, दर्शनम्, तस्य, यः, दृष्टम्, अवलम्बते, धीराः, तम्, तम्, न, पश्यन्ति, पश्यन्ति, आत्मानम्, अव्ययम्
- तस्य आत्मनः दर्शनम् क्व
- उस मनुष्य को आत्मदर्शन कैसे हो सकता है
- यः दृष्टम् अवलम्बते
- जो आँखों से दिखने वाले दृश्यों का सहारा लेता है
- धीराः तम् तम् न पश्यन्ति
- ज्ञानी लोग इन अलग-अलग दृश्य पदार्थों को नहीं देखते
- पश्यन्ति आत्मानम् अव्ययम्
- वे केवल अविनाशी आत्मा का ही नित्य दर्शन करते हैं
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जो आँखों से दिखने वाले दृश्य पदार्थों का सहारा लेता है, उसे आत्मदर्शन कहाँ? धीर ज्ञानी इन भिन्न-भिन्न दृश्यों को नहीं देखते, वे सर्वत्र केवल अविनाशी आत्मा को ही देखते हैं।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: आत्मदर्शन का अर्थ किसी देवी-देवता का रूप देखना या कोई प्रकाश देखना नहीं है, क्योंकि जो कुछ दिखाई देता है वह ‘दृश्य’ है और नश्वर है। आत्मा तो वह ‘द्रष्टा’ है जो सबको देखता है। जो अज्ञानी किसी अनुभव, प्रकाश या दृश्य को पकड़कर बैठ जाता है, वह अभी आत्मा से दूर है। ज्ञानी पुरुष भिन्न-भिन्न नामों और रूपों (तं तं) में नहीं उलझते; वे हर दृश्य के पीछे छिपे हुए उस एक अविनाशी आत्म-तत्त्व (अव्ययम्) को ही देखते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
जब आप किसी टीवी पर अलग-अलग सीरियल देख रहे होते हैं, तो क्या आप भूल जाते हैं कि यह सब केवल एक कांच की स्क्रीन पर हो रहा है?
अज्ञानी व्यक्ति संसार के रंग-बिरंगे तमाशों और दृश्यों में इतना खो जाता है कि वह उस शक्ति को भूल जाता है जिससे वह देख रहा है।
लेकिन ज्ञानी व्यक्ति तमाशों को नहीं देखता। वह हर चीज़ में—सुख में, दुख में, पेड़ में, पहाड़ में—केवल उसी एक अमर परमात्मा को देखता है जो कभी नहीं बदलता।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. दृष्टम् अवलम्बते दृश्य और द्रष्टा के विवेक के अभाव को दर्शाता है (दृग्-दृश्य विवेक)। 2. जो कुछ देखा जा सकता है वह ‘इदम्’ (यह) है, आत्मा तो सदा ‘अहम्’ (साक्षी) है। 3. तं तं न पश्यन्ति नाम-रूपात्मक प्रपंच के बाध का सूचक है। 4. पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् सर्वत्र केवल एक अद्वितीय, अविनाशी ब्रह्म के दर्शन की घोषणा है। 5. यह ईशावास्योपनिषद् के ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ के सिद्धांत की व्यावहारिक सिद्धि है। 6. साधक को दृश्य-अनुभवों के पीछे भागने के बदले स्वयं द्रष्टा में प्रतिष्ठित होने का आदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे कोई सोने के गहनों को देखते समय हार या कंगन के रूप को न देखकर केवल सोने को ही देखता है, वैसे ही ज्ञानी संसार के रूपों में केवल आत्मा को देखता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप अपने स्मार्टफोन पर कोई वेबसाइट देख रहे हों, तो आप पिक्सल के रंगों में नहीं उलझते, आप जानते हैं कि यह सब डिजिटल स्क्रीन का खेल है; ज्ञानी संसार के दृश्यों को आत्मा की स्क्रीन पर ऐसे ही देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दिखने वाले दृश्यों और अनुभवों के पीछे मत भागिए; उस देखने वाले साक्षी को पहचानिए जो कभी नहीं मिटता।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘तं तं न पश्यन्ति’ का अर्थ व्यावहारिक रूप से आँखों पर पट्टी बाँध लेना नहीं है; यह रूपों के प्रति राग-द्वेष से मुक्ति की दृष्टि है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब आँखें किसी सुंदर या कुरूप वस्तु पर पड़ें, तो तुरंत सोचें: "रूप बदल जाएगा, लेकिन इसे देखने वाली मेरी आत्मा सदा एक जैसी है।" (देखते समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं ध्यान में किसी खास रोशनी या अनुभव की तलाश कर रहा हूँ, बजाय इसके कि उस रोशनी को देखने वाले साक्षी को जानूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट अपनी आँखें खोलकर कमरे की चीज़ों को देखें, लेकिन ध्यान चीज़ों पर न रखकर उस पर रखें जो इन सबको देख रहा है: "मैं द्रष्टा हूँ, दृश्य नहीं।"
एक पंक्ति में सार: दृश्य का सहारा लेने वाले को आत्मदर्शन नहीं होता; ज्ञानी दृश्य को नहीं बल्कि अविनाशी आत्मा को देखते हैं।
English
Translation: Where is Self-realization for one whose perception relies on what is seen? The wise do not see this and that; they behold only the imperishable Self.
Simple explanation: How can there be Self-realization for one who depends on external phenomena? The wise do not fixate upon this object or that; they behold only the imperishable Self everywhere.
विषय और संबंधित श्लोक
- दृग्-दृश्य-विवेक
- अव्यय-दर्शन
- साक्षी-बोध
- प्रपंच-बाध
- श्लोक 18.39: धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य।
- श्लोक 18.41: क्व निरोधो विमूढस्य।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चालीसवाँ श्लोक।