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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ५२/१००52%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.52

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

उच्छृङ्खलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते । न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा ॥ ५२ ॥

IAST लिप्यंतरण

ucchṛṅkhalāpy akṛtikā sthitir dhīrasya rājate | na tu saspṛhacittasya śāntir mūḍhasya kṛtrimā || 52 ||

सरल उच्चारण: uchchhringkhalaapy akritikaa sthitir dheerasya raajate na tu sasprihachittasya shaantir moodhasya kritrimaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

उच्छृङ्खला, अपि, अकृतिका, स्थितिः, धीरस्य, राजते, न, तु, सस्पृह-चित्तस्य, शान्तिः, मूढस्य, कृत्रिमा

धीरस्य अकृतिका स्थितिः
धीर ज्ञानी की स्वाभाविक और निष्कपट आंतरिक स्थिति
उच्छृङ्खला अपि राजते
बाहर से नियमों से परे (स्वच्छंद) दिखने पर भी शोभा पाती है
तु सस्पृह-चित्तस्य मूढस्य
किंतु वासनाओं से भरे चित्त वाले अज्ञानी की
कृत्रिमा शान्तिः न
बनावटी (दिखावटी) शांति कभी शोभा नहीं पाती

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

धीर ज्ञानी की अकृत्रिम और सहज स्थिति लोकदृष्टि में बंधनरहित दिखने पर भी सुशोभित होती है; किंतु वासनायुक्त चित्त वाले अज्ञानी की बनावटी शांति कभी शोभा नहीं पाती।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: ज्ञानी का जीवन किसी कृत्रिम ढर्रे या दिखावे में नहीं बंधा होता। वह अंदर से पूर्णतः निष्पाप और अकृतक (स्वाभाविक) होता है। यदि लोकदृष्टि में वह कभी सामाजिक मर्यादाओं से स्वच्छंद भी दिखे, तो भी उसका अंतःकरण गंगाजल की तरह पवित्र और प्रकाशमान रहता है। इसके विपरीत, जो अज्ञानी बाहर से बहुत शांत, गंभीर और ध्यानी बनकर बैठता है, किंतु भीतर से वासनाओं और कामनाओं की आग में जल रहा होता है, उसकी वह बनावटी शांति पाखंड मात्र है।

सरल हिन्दी में समझें

एक असली फूल और एक प्लास्टिक के फूल में क्या फर्क होता है? प्लास्टिक का फूल देखने में बहुत सलीके का लगता है लेकिन उसमें कोई जान और खुशबू नहीं होती; असली फूल थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है लेकिन उसमें जीवन की महक होती है।

ज्ञानी व्यक्ति किसी दिखावे या पाखंड में नहीं जीता। वह बाहर से बिल्कुल सहज रहता है, लेकिन उसका दिल पूरी तरह सच्चा और पवित्र होता है।

दूसरी तरफ, जो लोग केवल दिखावे के लिए साधु बनकर बैठते हैं पर दिल में लालच छिपाए रखते हैं, उनकी वह बनावटी शांति किसी काम की नहीं होती।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अकृतिका स्थितिः आंतरिक सहजता और पाखंड-शून्यता का सर्वोच्च लक्षण है। 2. उच्छृङ्खला का अर्थ अनैतिकता नहीं, बल्कि कृत्रिम सामाजिक पाखंडों और दिखावटी नियमों से मुक्ति है। 3. सस्पृहचित्तस्य वासना और तृष्णा से भरे अंतःकरण की ओर संकेत है। 4. कृत्रिमा शान्तिः उस जबरन साधी गई शांति की व्यर्थता को दर्शाती है जो भीतर से खोखली होती है। 5. यह दर्शाता है कि अद्वैत में आंतरिक सत्यता ही सब कुछ है, बाहरी स्वांग का कोई मूल्य नहीं। 6. साधक को दिखावटी धार्मिकता छोड़कर आंतरिक सत्य और सरलता को अपनाने की सीख देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे जंगली झरना बिना किसी तराशी हुई नाली के भी अपनी स्वच्छ धारा से सबको मुग्ध कर देता है, वैसे ही ज्ञानी की स्वाभाविक स्थिति सुशोभित होती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक वास्तविक विशेषज्ञ जो सादे कपड़ों में भी अपने ज्ञान से चमकता है, बनाम एक सूट-बूट वाला सेल्समैन जो भीतर से कुछ नहीं जानता; ज्ञानी की सादगी ऐसे ही सच्ची होती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दिखावे की शांति का मुखौटा उतारिए; अपने भीतर से वासनाओं को निकालिए और सच्चे व सहज बनिए।

सामान्य गलतफहमी

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘उच्छृङ्खला अपि’ का अर्थ अनुशासनहीन या अनैतिक हो जाना नहीं है; यह आंतरिक स्वाभाविकता का प्रतीक है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी को प्रभावित करने के लिए धार्मिक या आध्यात्मिक बनने का नाटक न करें; पूरी ईमानदारी से जैसे हैं वैसे रहें। (सत्यनिष्ठा में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं दूसरों के सामने शांत और ज्ञानी दिखने का नाटक करता हूँ, जबकि अंदर से मेरा मन बेचैन है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपने सारे मुखौटे उतार दें; परमात्मा के सामने अपनी पूरी सच्चाई के साथ शांत खड़े रहें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: ज्ञानी की स्वाभाविक स्थिति स्वच्छंद होकर भी शोभा पाती है; अज्ञानी की वासना-भरी बनावटी शांति व्यर्थ है।

English

Translation: The unconditioned and natural state of the wise shines even when appearing unrestrained; but not the artificial peace of the deluded whose heart is still full of longing.

Simple explanation: The uncontrived, natural state of the steadfast sage shines brilliantly even when appearing completely unconventional; whereas the artificial, forced peace of the deluded, whose heart secretly burns with longing, holds no value.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अकृतिका-स्थिति
  • स्वाभाविकता
  • कृत्रिम-शान्ति-त्याग
  • सच्चा-वैभव
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.51: समस्ताश्चित्तवृत्तयः।
  • श्लोक 18.53: विलसन्ति महाभोगैः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 333–335 (PDF पृ. 340–342)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बावनवाँ श्लोक।