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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ८४/१००84%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.84

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च । निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः ॥ ८४ ॥

IAST लिप्यंतरण

niḥsnehaḥ putradārādau niṣkāmo viṣayeṣu ca | niścintaḥ svaśarīre'pi nirāśaḥ śobhate budhaḥ || 84 ||

सरल उच्चारण: nihsnehah putradaaraadau nishkaamo vishayeshu cha nishchintah svashareerepi niraashah shobhate budhah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

निःस्नेहः, पुत्र-दारा-आदौ, निष्कामः, विषयेषु, च, निश्चिन्तः, स्व-शरीरे, अपि, निराशः, शोभते, बुधः

पुत्र-दारा-आदौ निःस्नेहः
पुत्र, पत्नी आदि संबंधियों में मोह (अंधी आसक्ति) से रहित
विषयेषु च निष्कामः
और सांसारिक विषय-भोगों के प्रति सर्वथा निष्काम
स्व-शरीरे अपि निश्चिन्तः
अपने शरीर के प्रति भी पूर्णतः चिंता-मुक्त
निराशः बुधः शोभते
आशा-तृष्णा से रहित ज्ञानी पुरुष परम सुशोभित होता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

पुत्र, पत्नी आदि में मोह-रहित, विषयों में निष्काम, अपने शरीर के प्रति भी चिंता-मुक्त और आशा-तृष्णा से रहित ज्ञानी पुरुष परम सुशोभित होता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: स्नेह का अर्थ है मोहजनित अंधा चिपकाव। ज्ञानी अपने परिवार का पालन-पोषण कर्तव्य और प्रेम से करता है, किंतु उसके मन में मोह की जंजीरें नहीं होतीं। वह जानता है कि सभी आत्माएँ स्वतंत्र हैं। विषयों में उसकी कोई कामना नहीं होती। यहाँ तक कि अपने शरीर की बीमारी या मृत्यु को लेकर भी वह निश्चिंत रहता है, क्योंकि वह जानता है कि शरीर तो प्रारब्ध के अनुसार चलेगा और गिरेगा। ऐसा आशा-रहित ज्ञानी परम शांति से शोभित होता है।

सरल हिन्दी में समझें

संसार में इंसान सबसे ज़्यादा किन तीन चीज़ों से बंधा है? परिवार के मोह से, सुख-सुविधाओं के लालच से और अपने शरीर की बीमारी या मौत के डर से।

ज्ञानी व्यक्ति ने इन तीनों बंधनों को काट दिया है। वह अपने परिवार से सच्चा प्रेम करता है पर अंधा मोह नहीं पालता।

उसे दुनिया के भोगों की कोई भूख नहीं होती, और अपने शरीर की भी कोई फालतू चिंता नहीं होती। वह हर उम्मीद और डर से आज़ाद होकर एक राजा की तरह चमकता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. निःस्नेहः का अर्थ क्रूरता नहीं, बल्कि मोह (attachment) और ममत्व का विसर्जन है। 2. निष्कामो विषयेषु चित्त के उपशम और आत्म-तृप्ति का लक्षण है। 3. निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि देहाध्यास की पूर्ण समाप्ति का सर्वोच्च प्रमाण है। 4. निराशः का तात्पर्य निराशा (depression) नहीं, बल्कि सांसारिक अपेक्षाओं और तृष्णाओं का अभाव है। 5. साधक को पारिवारिक और शारीरिक चिंताओं से मुक्त होकर आत्म-विश्रांति में जीने का मार्ग दिखाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पेड़ अपनी डालियों और फलों से प्रेम करता है लेकिन उनके झड़ने पर रोता नहीं, वैसे ही ज्ञानी परिवार और शरीर के साथ रहते हुए भी मोह-मुक्त रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक व्यक्ति जो अपने बच्चों को पूरी शिक्षा और प्यार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है और उनके जीवन में कोई दखलअंदाज़ी या उम्मीद नहीं रखता; सच्चा अनासक्त प्रेम ऐसा ही होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मोह और चिंताओं की जंजीरें काटिए; जब आप अपने शरीर की भी चिंता छोड़ देते हैं, तब जीवन की सच्ची स्वतंत्रता मिलती है।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। ‘निःस्नेहः’ का अर्थ परिवार को छोड़ देना या उनका अनादर करना नहीं है; यह अंधी आसक्ति और निर्भरता से मुक्ति की बात है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब परिवार या शरीर की कोई छोटी-मोटी चिंता मन को सताए, तो कहें: "प्रकृति सबका ध्यान रख रही है, मेरी आत्मा सदा निश्चिंत और शांत है।" (चिंता के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने परिवार और शरीर की फालतू चिंताओं में घुलकर अपनी वर्तमान शांति को नष्ट कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरा कोई बंधन नहीं, कोई आसक्ति नहीं; मैं शरीर और संसार से परे पूर्णतः निश्चिंत और स्वतंत्र आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: परिवार में मोह-मुक्त, विषयों में निष्काम और शरीर के प्रति भी निश्चिंत ज्ञानी परम शोभा पाता है।

English

Translation: Free from infatuation toward children and wife, desireless in senses, unconcerned even about his own body, the wise one shines without expectation.

Simple explanation: Free from blinding attachment toward progeny and spouse, desireless regarding sensory objects, unconcerned even regarding his own physical frame, the sage shines without expectations.

विषय और संबंधित श्लोक

  • मोह-मुक्ति
  • निश्चिंत-स्थिति
  • देह-चिंता-त्याग
  • निराश-बुध
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.83: न मृतो न च जीवति।
  • श्लोक 18.85: तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 397–399 (PDF पृ. 404–406)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चौरासीवाँ श्लोक।