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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.86
सत्यापित
मूल संस्कृत
पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः । स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥ ८६ ॥
IAST लिप्यंतरण
patatūdetu vā deho nāsya cintā mahātmanaḥ | svabhāvabhūmiviśrāntivismṛtāśeṣasaṃsṛteḥ || 86 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
पततु, उदेतु, वा, देहः, न, अस्य, चिन्ता, महात्मनः, स्वभाव-भूमि-विश्रान्ति-विस्मृत-अशेष-संसृतेः
- देहः पततु उदेतु वा
- यह शरीर गिर जाए (नष्ट हो जाए) अथवा उठ खड़ा रहे
- अस्य महात्मनः चिन्ता न
- इस महात्मा ज्ञानी को इसकी तनिक भी कोई चिंता नहीं होती
- स्वभाव-भूमि-विश्रान्ति
- क्योंकि अपने आत्म-स्वभाव रूपी परम भूमि में विश्राम पा लेने से
- विस्मृत-अशेष-संसृतेः
- वह संपूर्ण संसार-भ्रम को पूरी तरह भूल चुका है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
यह शरीर चाहे गिर जाए (नष्ट हो जाए) या बना रहे, इस महात्मा को इसकी तनिक भी चिंता नहीं होती; क्योंकि अपने आत्म-स्वरूप में विश्राम पाकर वह संपूर्ण संसार-भ्रम को भूल चुका है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह देहाध्यास की आत्यंतिक समाप्ति का अमर उद्घोष है। जब तक मनुष्य सोचता है कि "मैं शरीर हूँ", तब तक उसे मौत का भयानक डर सताता है। किंतु जिस महात्मा ने अपनी असली आत्मा (स्वभाव-भूमि) में परम विश्राम पा लिया है, उसके लिए शरीर केवल एक कपड़े की तरह है। कपड़ा चाहे फट जाए या नया रहे, आत्मा को क्या चिंता? वह पूरे संसार-प्रपंच को स्वप्न की तरह भूलकर अपने अमर स्वरूप में लीन रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब आपके हाथ से एक पुराना सूखा पत्ता ज़मीन पर गिर जाता है, तो क्या आप शोक मनाते हैं? नहीं, आपको पता भी नहीं चलता।
ज्ञानी व्यक्ति के लिए यह शरीर भी उस सूखे पत्ते जैसा हो जाता है।
शरीर आज मरे या सौ साल बाद, ज्ञानी को इसकी कोई फिक्र नहीं होती। उसने अपने भीतर परमात्मा के उस घर को पा लिया है जहाँ न कोई जन्म है और न कोई मौत। वह दुनिया के सारे दुखों को भूलकर अपने अमर आनंद में सो रहा है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. पततूदेतु वा देहो देह के प्रारब्ध-जन्य नाश या स्थिति के प्रति आत्यंतिक निर्लेपता का प्रतीक है। 2. स्वभावभूमिविश्रान्ति आत्मा को ही अपनी अंतिम और शाश्वत नींव स्वीकार करना है। 3. विस्मृताशेषसंसृतेः अविद्या और उसके कार्य (संसार) के आत्यंतिक बाध को प्रमाणित करता है। 4. यह उपनिषदों के ‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये’ (छांदोग्य ६.१४.२) का प्रत्यक्ष अनुभव है। 5. साधक को मृत्यु के भय से सर्वथा मुक्त करके अमरत्व का साक्षात्कार कराता है।
उदाहरण से समझें: जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुल को झाड़ियों में छोड़कर आगे बढ़ जाता है और पलटकर भी नहीं देखता कि केंचुल कहाँ गिरी, वैसे ही ज्ञानी शरीर के गिरने की कोई परवाह नहीं करता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप कोई पुराना किराए का घर खाली करके अपने खुद के आलीशान नए बंगले में शिफ्ट हो जाते हैं, तो पुराने मकान की दीवार गिरने की आपको कोई चिंता नहीं होती; आत्मा में स्थित ज्ञानी शरीर को ऐसे ही देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मौत के डर से आज़ाद हो जाइए; शरीर एक नश्वर वस्त्र है, आप कभी न मरने वाली अमर आत्मा हैं।
सामान्य गलतफहमी
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘पततु देहः’ का अर्थ आत्महत्या करना या शरीर को नुकसान पहुँचाना नहीं है; यह मौत के भय से मुक्त होकर अमर आत्म-स्थिति में जीने का सत्य है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब बीमारी या बुढ़ापे का कोई डर मन में आए, तो तुरंत कहें: "शरीर बदलता है, मेरी आत्मा कभी नहीं मरती, मैं अमर हूँ।" (भय के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मौत के डर से इतना डरा हुआ हूँ कि जीवन के वर्तमान आनंद को भी खो रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "यह शरीर प्रकृति को समर्पित है; मैं शरीर से परे अविनाशी, अचल और नित्य चैतन्य प्रकाश हूँ।"
एक पंक्ति में सार: शरीर गिरे या रहे महात्मा को कोई चिंता नहीं; अपने स्वरूप में विश्राम पाकर वह संसार को भूल चुका है।
English
Translation: Let the body fall or rise, the great-souled one has no care for it; resting in the ground of his true nature, he has forgotten the entire worldly cycle.
Simple explanation: Let the body drop away or endure, the great-souled sage has not the slightest anxiety over it; resting firmly in the bedrock of his essential nature, he has forgotten the entire empirical round.
विषय और संबंधित श्लोक
- देह-चिंता-मुक्ति
- स्वभाव-भूमि-विश्रांति
- विस्मृत-संसृति
- अमरत्व-बोध
- श्लोक 18.85: यथापतितवर्तिनः।
- श्लोक 18.87: अकिञ्चनः कामचारो।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छियासीवाँ श्लोक।