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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९२/१००92%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.92

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः । निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥

IAST लिप्यंतरण

kva svācchandyaṃ kva saṅkocaḥ kva vā tattvaviniścayaḥ | nirvyājārjavabhūtasya caritārthasya yoginaḥ || 92 ||

सरल उच्चारण: kva svaachchhandyam kva sangkochah kva vaa tattvavinishchayah nirvyaajaarjavabhootasya charitaarthasya yoginah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, स्वाच्छन्द्यम्, क्व, सङ्कोचः, क्व, वा, तत्त्व-विनिश्चयः, निर्व्याज-आर्जव-भूतस्य, चरित-अर्थस्य, योगिनः

निर्व्याज-आर्जव-भूतस्य
कपट-रहित परम सरल स्वभाव वाले
चरित-अर्थस्य योगिनः
और अपने जीवन के चरम लक्ष्य को पा चुके (कृतकृत्य) योगी के लिए
स्वाच्छन्द्यम् क्व
स्वच्छंदता कहाँ?
सङ्कोचः क्व
संकोच (बंधन) कहाँ?
वा तत्त्व-विनिश्चयः क्व
और तत्त्व का निश्चय कहाँ? (वह इन सभी मानसिक अवस्थाओं से परे है)

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

कपट-रहित परम सरल स्वभाव वाले और कृतकृत्य योगी के लिए स्वच्छंदता कहाँ? संकोच कहाँ? और तत्त्व का निश्चय भी कहाँ? (वह समस्त अवस्थाओं से परे हो चुका है)।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: ‘निर्व्याजार्जव’ का अर्थ है जिसके अंदर तनिक भी कपट, पाखंड या बनावट नहीं है, जो पानी की तरह बिल्कुल सीधा और सच्चा है। ‘चरितार्थ’ का अर्थ है जिसने जीवन का अंतिम सत्य पा लिया है और जिसके लिए कुछ पाना शेष नहीं रहा। ऐसे सिद्ध योगी के लिए न तो स्वच्छंदता का घमंड होता है, न समाज का कोई संकोच या भय होता है, और न ही "मैं ब्रह्म हूँ" का अलग से कोई विचार या निश्चय दोहराने की ज़रूरत होती है। वह केवल अपनी सहज स्थिति में जीता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब कोई यात्री अपनी यात्रा पूरी करके अपने घर के आरामदायक सोफे पर बैठ जाता है, तो क्या वह अपने टिकट या नक्शे को बार-बार देखता रहता है? नहीं, यात्रा पूरी हो चुकी होती है।

जिस इंसान ने अपने जीवन का असली मकसद पा लिया है और जो बिल्कुल सीधा और सच्चा बन चुका है, उसके लिए सारे नियम और साधन पूरे हो चुके होते हैं।

उसे न किसी बात का डर होता है, न संकोच, और न ही ज्ञान को दोहराने की मजबूरी। वह अपनी सहजता में परम शांत रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. निर्व्याजार्जवभूतस्य अद्वैत जीवनमुक्ति के परम निष्कपट और सरल स्वभाव का परिचायक है। 2. चरितार्थस्य कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता (nothing left to achieve) का स्पष्ट प्रमाण है। 3. क्व तत्त्वविनिश्चयः यह सिद्ध करता है कि सिद्धावस्था में ज्ञान भी एक मानसिक वृत्ति नहीं रहता, स्वभाव बन जाता है। 4. स्वाच्छन्द्य और संकोच दोनों मानसिक अवस्थाएँ हैं; आत्मा दोनों से परे असंग है। 5. साधक को आंतरिक सरलता और पूर्ण विश्रांति में प्रवेश करने का मार्ग दिखाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पके हुए फल को पेड़ से अलग होने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता, वह सहज ही गिर जाता है, वैसे ही चरितार्थ योगी समस्त साधनों से सहज ही मुक्त हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक महान चित्रकार जब अपनी सर्वश्रेष्ठ पेंटिंग पूरी कर लेता है, तो वह ब्रश और रंगों को धोकर रख देता है; चरितार्थ योगी भी साधना के उपकरणों को ऐसे ही विश्राम दे देता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने मन को निष्कपट और सरल बनाइए; जब जीवन का लक्ष्य मिल जाता है, तो सारे मानसिक संकोच और तर्कों की भागदौड़ थम जाती है।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘क्व स्वाच्छन्द्यम्’ का अर्थ अनुशासनहीन हो जाना नहीं है; यह समस्त मानसिक तनावों और कृत्रिमताओं के अंत का प्रतीक है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज अपने व्यवहार में पूरी सरलता और ईमानदारी रखें; किसी से कोई बात छिपाने या बनावटी बनने की कोशिश न करें। (निष्कपटता में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी अपने ज्ञान को मन में बार-बार दोहराकर खुद को आश्वस्त करने की कोशिश कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरी यात्रा पूरी हो चुकी है; मैं निष्कपट, कृतकृत्य और समस्त विकल्पों से परे शांत आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: निष्कपट और कृतकृत्य योगी के लिए न स्वच्छंदता है, न संकोच और न तत्त्व का कोई अलग निश्चय।

English

Translation: Where is unrestrained freedom, where is restriction, or where is conviction of truth, for the guileless, straightforward yogi who has fulfilled his destiny?

Simple explanation: Where is unbridled license, where is hesitation, and where is the deliberate conviction of truth, for the guileless, genuinely straightforward yogi who has attained the goal of life?

विषय और संबंधित श्लोक

  • निर्व्याज-आर्जव
  • चरितार्थ-योगी
  • कृतकृत्यता
  • निश्चय-पार
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.91: भावेषु गलिता यस्य।
  • श्लोक 18.93: आत्मविश्रान्तितृप्तेन।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 413–415 (PDF पृ. 420–422)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बयानवेवाँ श्लोक।