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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९४/१००94%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.94

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च । जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ ९४ ॥

IAST लिप्यंतरण

supto'pi na suṣuptau ca svapne'pi śayito na ca | jāgare'pi na jāgarti dhīras tṛptaḥ pade pade || 94 ||

सरल उच्चारण: suptopi na sushuptau cha svapnepi shayito na cha jaagarepi na jaagarti dheeras triptah pade pade (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

सुप्तः, अपि, न, सुषुप्तौ, च, स्वप्ने, अपि, शयितः, न, च, जागरे, अपि, न, जागर्ति, धीरः, तृप्तः, पदे, पदे

सुप्तः अपि सुषुप्तौ न च
सोया हुआ दिखने पर भी वह वास्तव में गहरी नींद (सुषुप्ति के अज्ञान) में नहीं होता
स्वप्ने अपि शयितः न च
और स्वप्नावस्था में भी वह सोता नहीं है
जागरे अपि न जागर्ति
और जाग्रत अवस्था में भी साधारण लोगों की तरह नहीं जागता (संसार को सत्य नहीं मानता)
धीरः पदे पदे तृप्तः
वह धीर ज्ञानी हर कदम और हर अवस्था में अपनी आत्मा में पूर्ण तृप्त रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सोया हुआ दिखने पर भी वह सुषुप्ति में नहीं होता, स्वप्न में भी सोया नहीं रहता, और जागते हुए भी साधारणवत् नहीं जागता; वह धीर ज्ञानी हर अवस्था और हर पद पर पूर्ण तृप्त रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह मांडूक्य उपनिषद् की तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे तुरीयावस्था का साक्षात वर्णन है। साधारण मनुष्य जागता है तो संसार के भ्रम में, सोता है तो सपनों के जाल में, और गहरी नींद में अज्ञान के अंधेरे में डूब जाता है। किंतु ज्ञानी की चेतना कभी नहीं सोती। जब उसका शरीर सोता है तो वह साक्षी बना रहता है; जब सपने आते हैं तो वह जानता है कि यह मन का खेल है; और जब वह जागता है तो संसार को स्वप्नवत् देखकर अलिप्त रहता है। वह तुरीय चैतन्य में हर समय अखंड तृप्त रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब एक चौकीदार रात को अपनी कुर्सी पर बैठता है, तो बाहर से देखने पर वह शांत दिखता है लेकिन अंदर से उसकी नज़र हर चीज़ पर होती है।

ज्ञानी व्यक्ति की चेतना भी कभी नहीं सोती। बाहर से लोग देखते हैं कि वह सो रहा है, लेकिन अंदर से उसकी आत्मा का दीया हर समय जलता रहता है।

सपनों में वह खोता नहीं, और जागते समय दुनिया के लालच और डर में नहीं फँसता। वह हर समय, हर पल अपने भीतर की अमर शांति में पूरी तरह खुश और तृप्त रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अवस्थात्रय-साक्षी आत्मा तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) से सर्वथा अछूती और परे है। 2. जागरेऽपि न जागर्ति यह दर्शाता है कि ज्ञानी संसार को सत्य नहीं मानता (प्रपंच-बाध)। 3. सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ ज्ञानी के उस नित्य बोध का प्रमाण है जो सुषुप्ति के अज्ञान में भी प्रकाशित रहता है। 4. पदे पदे तृप्तः देश, काल और अवस्था के बंधनों से मुक्त शाश्वत तृप्ति का द्योतक है। 5. साधक को जाग्रत-सुषुप्ति के तुरीय पद में प्रतिष्ठित होने का उपदेश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे महासागर की गहराई में पानी कभी नहीं सोता, चाहे सतह पर दिन हो या रात, वैसे ही ज्ञानी की आत्म-चेतना तीनों अवस्थाओं में सदा जागृत और तृप्त रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक स्मार्टफोन की स्क्रीन चाहे ऑन हो या ऑफ, उसका सीपीयू बैकग्राउंड में बिना रुके काम करता रहता है; ज्ञानी की साक्षी चेतना शरीर के सोने या जागने के पार ऐसे ही निरंतर जागती रहती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: आप जाग्रत, स्वप्न और नींद—तीनों के देखने वाले अमर साक्षी हैं; अपनी उस चेतना को पहचानिए जो कभी नहीं सोती।

सामान्य गलतफहमी

आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न जागर्ति’ का अर्थ दिन में आलसी होकर पड़े रहना नहीं है; यह जाग्रत अवस्था में भी सांसारिक मोह से मुक्त रहने की दृष्टि है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज रात को सोने से पहले 2 मिनट अनुभव करें: "शरीर सो जाएगा, सांसें चलती रहेंगी; मैं इन सबको देखने वाली अमर और जागृत आत्मा हूँ।" (सोते समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जाग्रत अवस्था की दुनिया को इतना सच मान बैठा हूँ कि अपनी नित्य जागृत तुरीय चेतना को भूल गया हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "जागना, सपना और गहरी नींद आते-जाते हैं; मैं तीनों का नित्य, शांत और अखंड साक्षी चैतन्य हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: सोकर भी न सोने वाला, जागकर भी न जागने वाला ज्ञानी हर अवस्था में अपनी आत्मा में पूर्ण तृप्त रहता है।

English

Translation: Sleeping he is not in deep slumber, dreaming he lies not asleep, waking he is not awake; the steadfast is content at every step.

Simple explanation: Though seemingly asleep he is not in slumber, though in dream he lies not asleep, though in the waking state he is not awake to delusion; the steadfast sage is contented at every single step.

विषय और संबंधित श्लोक

  • तुरीयावस्था
  • अवस्थात्रय-साक्षी
  • पदे-पदे-तृप्त
  • नित्य-जागृति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.93: तत् कथं कस्य कथ्यते।
  • श्लोक 18.95: ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 417–419 (PDF पृ. 424–426)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चौरानवेवाँ श्लोक।