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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९६/१००96%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.96

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान् । न मुमुक्षुर्न वा मुक्ता न किञ्चिन्न च किञ्चन ॥ ९६ ॥

IAST लिप्यंतरण

na sukhī na ca vā duḥkhī na virakto na saṅgavān | na mumukṣur na vā muktā na kiñcin na ca kiñcana || 96 ||

सरल उच्चारण: na sukhee na cha vaa duhkhee na virakto na sanggavaan na mumukshur na vaa muktaa na kinychin na cha kinychana (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, सुखी, न, च, वा, दुःखी, न, विरक्तः, न, सङ्गवान्, न, मुमुक्षुः, न, वा, मुक्ता, न, किञ्चित्, न, च, किञ्चन

न सुखी न च वा दुःखी
न वह सांसारिक रूप से सुखी है और न दुखी है
न विरक्तः न सङ्गवान्
न वह वैरागी है और न आसक्त (संगी) है
न मुमुक्षुः न वा मुक्ता
न वह मोक्ष चाहने वाला है और न मुक्त हुआ कोई व्यक्ति है
न किञ्चित् न च किञ्चन
वह न कुछ विशेष है और न कुछ भी नहीं है (वह समस्त विकल्पों से परे है)

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

न वह सुखी है न दुखी, न वैरागी है न आसक्त, न मुमुक्षु है न मुक्त; वह न कुछ है और न कुछ नहीं (वह समस्त सांसारिक और आध्यात्मिक द्वंद्वों से परे है)।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अद्वैत स्थिति की चरम नेति-नेति (न इति, न इति) है। जब तक कोई अपने को "सुखी" या "दुखी" मानता है, वह मन के स्तर पर है। जब कोई अपने को "वैरागी" या "मुक्त" मानता है, तो उसमें भी अहंकार का सूक्ष्म पर्दा रहता है। अष्टावक्र कहते हैं कि ज्ञानी के लिए ये सारे शब्द और उपाधियाँ समाप्त हो चुकी हैं। वह न तो बंधा था कि मुक्त कहलाए, और न वह किसी परिभाषा में बँधता है। वह समस्त द्वंद्वों और कल्पनाओं से परे शुद्ध सच्चिदानंद मात्र है।

सरल हिन्दी में समझें

जब आप किसी खाली कमरे में खड़े होकर कहें कि "यह कमरा अमीर है या गरीब, ज्ञानी है या अज्ञानी?", तो यह बात कितनी बेतुकी लगेगी! कमरा तो बस खाली जगह है, उस पर कोई लेबल नहीं लगता।

ज्ञानी व्यक्ति की आत्मा भी वैसी ही हर लेबल से आज़ाद हो चुकी होती है।

उसे न सुखी कहने की ज़रूरत है न दुखी, न वैरागी न संसारी, और न ही मुक्त। वह इतना साफ़ और स्वतंत्र हो चुका है कि दुनिया का कोई भी शब्द उसकी परिभाषा नहीं दे सकता। वह बस शुद्ध परमात्मा है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. न सुखी न दुःखी द्वंद्वों के आत्यंतिक विलय की तुरीयावस्था है। 2. न विरक्तो न सङ्गवान् राग और विराग दोनों से परे सहज असंगता का प्रमाण है। 3. न मुमुक्षुर्न वा मुक्ता मांडूक्य कारिका के ‘न निरोधो न चोत्पत्तिः’ के परम अद्वैत का सीधा साक्षात्कार है। 4. न किञ्चिन्न च किञ्चन भाव और अभाव, अस्ति और नास्ति दोनों के अतिक्रमण को सिद्ध करता है। 5. साधक को आध्यात्मिक साधना की अंतिम सीढ़ी पर अपनी साधक-पहचान को भी विसर्जित करने का आदेश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे आकाश को न नीला कहा जा सकता है न काला, न पवित्र न अपवित्र, आकाश केवल असीम आकाश है; ज्ञानी समस्त परिभाषाओं से परे ऐसा ही शुद्ध चैतन्य है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी कंप्यूटर फ़ाइल को पूरी तरह डिलीट करके रीसायकल बिन भी खाली कर देते हैं, तो वहाँ न फ़ाइल होती है न फ़ोल्डर, केवल खाली मेमोरी होती है; ज्ञानी का अंतःकरण समस्त लेबल्स से ऐसे ही खाली हो जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने ऊपर कोई भी आध्यात्मिक या सांसारिक ठप्पा मत लगाइए; सारे लेबल्स छोड़िए, आप केवल शुद्ध, शांत और असीम अस्तित्व हैं।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न किञ्चन’ का अर्थ शून्यता या निराशा में डूब जाना नहीं है; यह समस्त सीमाओं से मुक्त पूर्ण स्वतंत्रता का महा-सत्य है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन खुद को किसी पहचान में बांधने लगे (जैसे "मैं बहुत ज्ञानी हूँ" या "मैं बहुत दुखी हूँ"), तो तुरंत कहें: "मैं इन सभी लेबल्स से परे शुद्ध आत्मा हूँ।" (पहचान के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने दुखों या अपने ज्ञान को एक लेबल बनाकर उसी के घेरे में कैद होकर जी रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर सारे शब्दों को छोड़ दें: "न मैं सुखी हूँ, न दुखी; न बद्ध, न मुक्त; मैं केवल निशब्द और असीम परमात्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: न सुखी न दुखी, न विरक्त न आसक्त, न मुमुक्षु न मुक्त; ज्ञानी समस्त शब्दों और विकल्पों से परे है।

English

Translation: Neither joyful nor sorrowful, neither detached nor attached, neither seeking freedom nor liberated, he is neither something nor nothing.

Simple explanation: Neither happy nor unhappy, neither dispassionate nor attached, neither seeking liberation nor claiming to be liberated, he is neither this nor that, abiding beyond all conceptualization.

विषय और संबंधित श्लोक

  • द्वंद्वातीत
  • सर्व-लेबल-मुक्ति
  • नेति-नेति
  • निर्विकल्प-कैवल्य
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.95: साहंकारोऽनहंकृतिः।
  • श्लोक 18.97: विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 421–423 (PDF पृ. 428–430)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छानवेवाँ श्लोक।