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प्रकरण 2: दूसरा प्रकरणश्लोक १४/२५56%

अध्याय 2 · आत्मबोध का आश्चर्य

अष्टावक्र गीता, श्लोक 2.14

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक

अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन । अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥

IAST लिप्यंतरण

aho ahaṃ namo mahyaṃ yasya me nāsti kiñcana | athavā yasya me sarvaṃ yad vāṅmanasagocaram || 14 ||

सरल उच्चारण: aho aham namo mahyam yasya me naasti kinychana athavaa yasya me sarvam yad vaangmanasagocharam (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, यस्य, मे, न, अस्ति, किञ्चन, अथवा, यस्य, मे, सर्वम्, यत्, वाङ्मनसगोचरम्

यस्य मे नास्ति किञ्चन
जिसका कुछ भी (अपना) नहीं है
अथवा
या
सर्वम्
सब कुछ
यद् वाङ्मनसगोचरम्
जो कुछ वाणी और मन का विषय है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

आश्चर्य है! मुझे नमस्कार, जिसका कुछ भी (अलग से) नहीं है, अथवा जिसका वह सब कुछ है जो वाणी और मन का विषय है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार जनक कहते हैं कि मेरे में सम्बन्ध वाला कोई पदार्थ नहीं है, क्योंकि वास्तव में कोई पदार्थ सत्य नहीं है; केवल एक ब्रह्मात्मा ही परमार्थ से सत्य है। श्रुति का भाव दिया गया है कि इस चेतन में अनेक रूप जो दिखता है, वह वास्तव में नहीं है; जो ब्रह्म में नानात्व देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु पाता है। फिर जनक कहते हैं कि जितना मन और वाणी का विषय है, वह सब मिथ्या है और उसका मुझ चैतन्य आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं। इसी से वे अपने आश्चर्य-रूप आत्मा को नमस्कार करते हैं।

सरल हिन्दी में समझें

इस श्लोक के दो पहलू हैं। एक: मेरे पास अपना कुछ भी नहीं, क्योंकि जो कुछ दिखता है वह आता-जाता है। दूसरा: जो कुछ भी सोचा या कहा जा सकता है, वह सब मेरी जागरूकता में है।

दोनों बातें एक ही बात कहती हैं: मैं किसी चीज़ का मालिक बनकर बँधा नहीं हूँ, और किसी चीज़ से बाहर भी नहीं।

यह पकड़ को ढीला करने की बात है। इसका अर्थ यह नहीं कि चीज़ों या लोगों की देखभाल न की जाए।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक कहता है कि आत्मा का कुछ अलग से नहीं है, और साथ ही जो वाणी-मन का विषय है, वह सब आत्मा में है। 2. यह ‘मेरा-मेरा’ के स्वामित्व-भाव की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह आत्मा को असंग आधार के रूप में दिखाता है। 4. अध्याय में यह स्वामित्व और असंगता का सूत्र है। 5. 2.13 की असंगत उपस्थिति के बाद यह स्वामित्व की बात जोड़ता है। 6. यह परम दृष्टि है। 7. इसका अर्थ यह नहीं कि संबंधों और संपत्ति के प्रति ज़िम्मेदारी न रहे।

उदाहरण से समझें: जैसे आकाश में कितने भी बादल आएँ, आकाश किसी का मालिक नहीं बनता और किसी से बाहर भी नहीं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

वैराग्य

वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।

चित्र का वर्णन: एक खुली हथेली पर रखी गोल वस्तु, उँगलियाँ उसे जकड़ती नहीं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति अपनी हर चीज़ (फ़ोन, घर, पद) को खोने के डर से जकड़ा रहता है। जब वह देखता है कि चीज़ें आती-जाती हैं और वह उन्हें जानने वाला है, तो उसकी पकड़ ढीली होती है, पर वह उनकी देखभाल करता रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपनी चीज़ों की देखभाल कीजिए, पर उनके खो जाने के डर को अपना मालिक मत बनाइए।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यह श्लोक जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न है, दुख की उपेक्षा की अनुमति नहीं।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक वस्तु या संबंध का ध्यान रखते हुए यह भी देखिए कि उसे खोने का डर आपके व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है। (लगभग 5 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मैं किस चीज़ के खो जाने के डर से सबसे ज़्यादा जकड़ा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए एक प्रिय वस्तु को हाथ में लेकर कहिए: ‘मैं तुम्हारा ध्यान रखता हूँ, पर तुम्हारे बिना भी मैं पूर्ण हूँ।’ फिर उसे रख दीजिए।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: मेरा कुछ अलग से नहीं, पर सब मुझमें है: यही असंग रहकर जुड़े रहने की समझ है।

English

Translation: How wonderful: I bow to myself, who have nothing of my own, or else who have everything that is within reach of speech and mind.

Simple explanation: Nothing is owned apart from awareness, yet everything appears within it. The commentary points to loosened grip, not to neglect of care, duties or relationships.

विषय और संबंधित श्लोक

  • वैराग्य
  • असंगता
  • अद्वैत
  • आत्मज्ञान
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 2.13: असंगता के साथ आधार-रूपता।
  • श्लोक 2.15: ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय की त्रिपुटी का निषेध।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 60–61 (PDF पृ. 67–68)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। टीका में श्रुति के उद्धरण हैं, जिन्हें शब्दशः नहीं दोहराया गया।