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प्रकरण 2: दूसरा प्रकरणश्लोक १८/२५72%

अध्याय 2 · आत्मबोध का आश्चर्य

अष्टावक्र गीता, श्लोक 2.18

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक

अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम् । न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया ॥ १८ ॥

IAST लिप्यंतरण

aho mayi sthitaṃ viśvaṃ vastuto na mayi sthitam | na me bandho 'sti mokṣo vā bhrāntiḥ śāntā nirāśrayā || 18 ||

सरल उच्चारण: aho mayi sthitam vishvam vastuto na mayi sthitam na me bandho sti moksho vaa bhraantih shaantaa niraashrayaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अहो, मयि, स्थितम्, विश्वम्, वस्तुतः, न, मयि, स्थितम्, न, मे, बन्धः, अस्ति, मोक्षः, वा, भ्रान्तिः, शान्ता, निराश्रया

मयि स्थितम् विश्वम्
मुझमें स्थित विश्व
वस्तुतः न स्थितम्
वास्तव में स्थित नहीं
बन्धः मोक्षः
बन्धन और मोक्ष
भ्रान्तिः
भ्रम
शान्ता निराश्रया
शान्त हुआ, आधार-रहित

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

आश्चर्य है! विश्व मुझमें स्थित दिखता है, पर वास्तव में मुझमें स्थित नहीं है। मेरे लिए न बन्धन है, न मोक्ष; भ्रान्ति आश्रय-रहित होकर शान्त हो गई है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार यहाँ प्रश्न होता है कि मुक्ति क्या है, और यदि वह विचार से पैदा होती है तो अनित्य हो जाएगी, और यदि विचार से पैदा नहीं होती तो विचार-रहित लोगों की भी मुक्ति होनी चाहिए। उत्तर में जनक कहते हैं कि वास्तव में मुझमें न बंध है न मोक्ष, क्योंकि मैं नित्य चैतन्य-स्वरूप हूँ। फिर प्रश्न: यदि वास्तव में बंध-मोक्ष हैं ही नहीं, तो शास्त्र-विचार और गुरु के उपदेश का फल क्या हुआ? उत्तर: देह आदि में जो ‘मैं देह हूँ, मैं इन्द्रिय हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं कर्ता-भोक्ता हूँ’ वाली भ्रान्ति है, उसकी निवृत्ति ही फल है, यानी यह जानना कि मैं देह आदि से परे उनका साक्षी, शुद्ध ज्ञान-स्वरूप हूँ। इसी विचार से मेरी भ्रान्ति दूर हो गई है।

सरल हिन्दी में समझें

यह श्लोक बंधन और मुक्ति दोनों को एक कदम पीछे से देखता है। अगर मैं मूल रूप से जागरूकता हूँ, तो मैं किसी रस्सी से बँधा भी नहीं था और किसी ताले से छूटा भी नहीं। बंधन का एहसास भ्रम से था, और भ्रम का कोई ठोस आधार नहीं था, इसलिए वह शांत हो गया।

तब शास्त्र और गुरु का फल क्या? पुस्तक कहती है कि फल वही है: ‘मैं देह, कर्ता, भोक्ता, किसी जाति का’ वाली भूल का हटना।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक विश्व के मुझमें स्थित दिखने पर भी वास्तव में न स्थित होने, और बंध-मोक्ष के न होने की बात कहता है। 2. यह बंधन को वास्तविक वस्तु और मोक्ष को पाई जाने वाली वस्तु मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह भ्रान्ति को आश्रय-रहित बताता है, यानी आधार केवल आत्मा है। 4. अध्याय में यह बंध-मोक्ष के प्रश्न का निपटारा है। 5. 2.17 की अभ्यास-स्थिति के बाद इस श्लोक में परिणाम की घोषणा है। 6. यह परम दृष्टि है; व्यावहारिक स्तर पर साधना, उपदेश और प्रयास का फल माना गया है। 7. इसका अर्थ यह नहीं कि अभ्यास या सहायता बेकार है।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे जागने पर पता चलता है कि सपने में बँधा होना कभी हुआ ही नहीं था, और खुलने की ज़रूरत भी नहीं रही। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या

संपादकीय सहायक चित्र; यह श्लोक का शाब्दिक अर्थ नहीं है।

महासागर और लहरें

अनुभव बदलते हैं, चेतना का आधार बना रहता है।

चित्र का वर्णन: एक ही समुद्र में छोटी-बड़ी लहरें उठती और गिरती हैं।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति लंबे समय से मानता रहा कि वह किसी पुरानी गलती की ‘कैद’ में है। जब वह ईमानदारी से जाँचता है, तो पाता है कि कैद की दीवारें उसकी अपनी बनाई मान्यताएँ थीं, पर ज़िम्मेदारी और सुधार का काम अपनी जगह रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जिसे आप बंधन समझते रहे हैं, उसे परखिए; बहुत बार वह एक मान्यता निकलती है।

सामान्य गलतफहमी

इसका अर्थ यह नहीं कि सब कठिनाइयाँ झूठी हैं, और न यह कि सहायता, अभ्यास या पढ़ाई छोड़ दी जाए। जगत् की स्वतंत्र सत्ता पर प्रश्न का अर्थ दुख की उपेक्षा नहीं। मुक्ति कोई जादुई उपलब्धि नहीं।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक ऐसी बात लिखिए जिसे आप अपना ‘बंधन’ कहते हैं और उसके नीचे दो खाने बनाइए: ‘तथ्य’ और ‘मेरी मान्यता’। (लगभग 5–10 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: मेरे किस बंधन में तथ्य कितना है और मान्यता कितनी?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए अपनी एक ‘बाध्यता’ को याद कीजिए और देखिए कि उसे महसूस करने वाला उससे बड़ा है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जिस बंधन को हमने सच मान लिया था, उसका आधार केवल मान्यता थी।

English

Translation: How wonderful: the universe seems to rest in me but in truth does not. For me there is neither bondage nor liberation; the delusion has become still, without support.

Simple explanation: At the highest standpoint neither bondage nor liberation is a real thing; the fruit of study and a teacher is the end of mistaken identification. This does not mean practice, help or effort are useless.

विषय और संबंधित श्लोक

  • बंधन
  • मुक्ति
  • अद्वैत
  • आत्मज्ञान
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 1.11: बंधन-मोक्ष मान्यता से जुड़ा है।
  • श्लोक 2.19: ज्ञान के बाद विश्व की उत्पत्ति पुनः न होने की बात।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 64–66 (PDF पृ. 71–73)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया; मुद्रण में ‘भ्रान्तिः शान्तानिराश्रया’ जुड़ा हुआ है और पदच्छेद में अलग (शान्ता, निराश्रया)।