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प्रकरण 20: बीसवाँ प्रकरणश्लोक १४/१४100%

अध्याय 20 · अंतिम मौन

अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.14

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम् । बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva cāsti kva ca vā nāsti kvāsti caikaṃ kva ca dvayam | bahunātra kim uktena kiñcin nottiṣṭhate mama || 14 ||

सरल उच्चारण: kva chaasti kva cha vaa naasti kvaasti chaikam kva cha dvayam bahunaatra kim uktena kinychin nottishthate mama (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, च, अस्ति, क्व, च, वा, न, अस्ति, क्व, अस्ति, च, एकम्, क्व, च, द्वयम्, बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, किञ्चित्, न, उत्तिष्ठते, मम

क्व अस्ति क्व न अस्ति
होना कहाँ, न होना कहाँ
क्व एकम् क्व द्वयम्
एक कहाँ, दो कहाँ
बहुना अत्र किम् उक्तेन
यहाँ और अधिक कहने से क्या
किञ्चित् न उत्तिष्ठते मम
मुझमें कुछ उठता ही नहीं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

होना कहाँ और न होना कहाँ, एक कहाँ और दो कहाँ। यहाँ बहुत कहने से क्या। मुझमें कुछ उठता ही नहीं।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पहली पंक्ति बचे हुए दो जोड़े समेटती है। दूसरी पंक्ति संवाद रोकती है। किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मौन है, जीवन बंद करने का वाक्य नहीं। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

है या नहीं है। एक है या दो हैं। इन अंतिम झगड़ों के बाद अष्टावक्र कहते हैं कि और कहने से क्या लाभ।

मुझमें कुछ उठता ही नहीं। न नया पक्ष, न नई कथा।

यह वाक्य काम छोड़ने, लोगों को छोड़ने या स्वयं को हानि पहुँचाने के लिए नहीं है। यह कहानी का अंतिम विराम है। साँस, भोजन, वचन और देखभाल यहीं से आगे भी रहते हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अस्ति और नास्ति होने का अंतिम जोड़ा है। 2. एक और द्वय संख्या का अंतिम जोड़ा है। 3. बहुनात्र किमुक्तेन कथा की समाप्ति की रूढ़ वाक्य-रचना है। 4. न उत्तिष्ठते उदय न होना कहता है। 5. मम यहाँ गर्व नहीं, बोलने वाले का मौन है। 6. यदि इस मौन को खालीपन या हानि की इच्छा लगे तो सहायता-सेवा का समय है। यह श्लोक उसका उत्तर नहीं।

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे गीत अंतिम स्वर के बाद भी कमरा, श्रोता और साँस वहीं रहते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति लंबी बहसमांत में कहता है कि अब और कुछ नहीं कहना, और फिर भी घर जाकर खाना बनाता और अपने लोगों से बात करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: कहा जा चुका है। मौन जीवन रोकने का आदेश नहीं है। खालीपन घेर ले तो सहायता माँगें।

सामान्य गलतफहमी

किञ्चिन्नोत्तिष्ठते का अर्थ जीने की इच्छा मिटाना, काम छोड़ना या स्वयं को हानि पहुँचाना नहीं है। ऐसा विचार आए तो सहायता-सेवा से संपर्क करें।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज इस प्रकरण के बाद एक साधारण काम पूरा करें: पानी पीना, एक संदेश, या एक भोजन। (पढ़ने के बाद)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मौन के शब्द से अपने जीवन की साधारण देखभाल रोक रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बिना नया वाक्य जोड़े बैठें। फिर आँख खोलें, पानी पिएँ, और एक ज़रूरी छोटी बात किसी को कहें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: होना, न होना, एक और दो कहाँ हैं। अधिक क्या कहें। मुझमें कुछ उठता नहीं।

English

Translation: Where is “is,” where is “is not,” where is one, where is two? What more is there to say? Nothing at all rises in me.

Simple explanation: The last pairs fall, and speech stops. The silence is not advice to end one’s life or one’s care of others.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अस्ति-नास्ति
  • एक-द्वय
  • बहुना-किमुक्तेन
  • अंतिम-मौन
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 20.13: क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।