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अध्याय 3 · अनुभूति की परीक्षा
अष्टावक्र गीता, श्लोक 3.5
सत्यापित
मूल संस्कृत
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते ॥ ५ ॥
IAST लिप्यंतरण
sarvabhūteṣu cātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani | muner jānata āścaryaṃ mamatvam anuvartate || 5 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
सर्वभूतेषु, च, आत्मानम्, सर्वभूतानि, च, आत्मनि, मुनेः, जानतः, आश्चर्यम्, ममत्वम्, अनुवर्तते
- सर्वभूतेषु आत्मानम्
- सब प्राणियों में आत्मा को
- सर्वभूतानि आत्मनि
- सब प्राणियों को आत्मा में
- मुनेः जानतः
- जानते हुए मुनि का
- ममत्वम्
- ममता
- अनुवर्तते
- बनी रहती है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जो मुनि सब प्राणियों में आत्मा को और सब प्राणियों को आत्मा में जानता है, उसमें भी ममता का बने रहना आश्चर्य है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
पुस्तक के अनुसार ब्रह्मा से स्थावर तक सब प्राणियों में जिसने अधिष्ठान-रूप आत्मा को जान लिया और सब प्राणियों को आत्मा में रस्सी-साँप की तरह कल्पित जान लिया, उसमें भी यदि विषयों में ममता बनी रहे, तो आश्चर्य की बात है। क्योंकि जिसने सीप में आरोपित चाँदी को पहचान लिया, वह फिर उस चाँदी के लिए प्रयास नहीं करता।
सरल हिन्दी में समझें
गुरु पूछते हैं: जिसने सबमें एक ही चेतना देख ली, उसमें अब भी ‘मेरा-मेरा’ की जकड़ कैसे बची रह सकती है?
यह कसौटी बताती है कि एकत्व की समझ सिर्फ़ विचार नहीं है; वह स्वामित्व की पकड़ ढीली करती है। ढीली करने का मतलब देखभाल बंद करना नहीं है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. श्लोक कहता है कि सबमें आत्मा और आत्मा में सबको देखने वाले में ममता का बना रहना आश्चर्य है। 2. यह एकत्व जानकर भी स्वामित्व और ममता से बँधे रहने की संभावना को परखता है। 3. यह एकत्व-ज्ञान और ममता के अंतर को दिखाता है। 4. अध्याय में यह परीक्षा का चौथा चरण है। 5. 3.4 की आसक्ति-परीक्षा के बाद ममता पर प्रश्न। 6. यह परम दृष्टि से आचरण की परीक्षा है। 7. इसका अर्थ यह नहीं कि अपने लोगों की देखभाल छोड़ दी जाए।
उदाहरण से समझें: जैसे नदी सब किनारों को छूती है पर किसी की मालिक नहीं बनती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या
अहंकार
भूमिकाएँ उपयोगी हैं, लेकिन वे आपके सम्पूर्ण स्वरूप को परिभाषित नहीं करतीं।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति कहता है कि सब बराबर हैं, पर अपने पद, घर या विचार पर कोई सवाल उठे तो तुरंत रक्षात्मक हो जाता है। यह उसे एहसास कराता है कि समानता की बात और स्वामित्व की पकड़ अलग चल रही हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सबको समान कहना आसान है; ‘मेरा’ की पकड़ में उसे परखना कठिन।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ममता कम होने का अर्थ अपने परिवार, मित्रों और ज़िम्मेदारियों से प्रेम और कर्तव्य कम होना नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज एक चीज़ या संबंध चुनिए जिसे आप ‘मेरा’ कहते हैं और देखिए कि यदि वह बदल जाए तो आप किस हद तक बेचैन होंगे। (लगभग 5 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: किस ‘मेरा’ पर सवाल उठने पर मैं सबसे जल्दी रक्षात्मक हो जाता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट एक प्रिय वस्तु या संबंध को याद कीजिए और कहिए: ‘मैं ध्यान रखता हूँ, मैं मालिक नहीं।’
एक पंक्ति में सार: एकत्व की समझ तब पक्की है जब ‘मेरा’ की जकड़ ढीली हो, पर देखभाल बनी रहे।
English
Translation: It is a wonder that one who knows the Self in all beings and all beings in the Self still has the sense of possession.
Simple explanation: The test asks whether seeing oneness loosens ‘mine’. The commentary does not say to stop caring for family and duties.
विषय और संबंधित श्लोक
- वैराग्य
- अद्वैत
- अहंकार
- असंगता
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। यह श्लोक सर्वभूतेषु-रूप में कुछ अन्य ग्रंथों में भी मिलता है; इस पुनर्लेखन में केवल पुस्तक का पाठ और टीका लिया गया है।