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प्रकरण 3: तीसरा प्रकरणश्लोक ७/१४50%

अध्याय 3 · अनुभूति की परीक्षा

अष्टावक्र गीता, श्लोक 3.7

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल नहीं छपा; भावार्थ के संदर्भ से)

उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः । आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत्कालमन्तमनुश्रितः ॥ ७ ॥

IAST लिप्यंतरण

udbhūtaṃ jñānadurmitram avadhāryātidurbalaḥ | āścaryaṃ kāmam ākāṅkṣet kālam antam anuśritaḥ || 7 ||

सरल उच्चारण: udbhootam jnyaanadurmitram avadhaaryaatidurbalah aashcharyam kaamam aakaangkshet kaalam antam anushritah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

उद्भूतम्, ज्ञानदुर्मित्रम्, अवधार्य, अतिदुर्बलः, आश्चर्यम्, कामम्, आकाङ्क्षेत्, कालम्, अन्तम्, अनुश्रितः

उद्भूतम्
उत्पन्न हुए
ज्ञानदुर्मित्रम्
ज्ञान के शत्रु (काम) को
अवधार्य
धारण करके, जानकर
अतिदुर्बलः
अत्यन्त दुर्बल
कामम् आकाङ्क्षेत्
कामना की इच्छा करे
कालम् अन्तम् अनुश्रितः
मृत्यु के निकट पहुँचा हुआ

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

ज्ञान के शत्रु काम को उत्पन्न हुआ जानकर भी, अन्तकाल के निकट पहुँचा हुआ अत्यन्त दुर्बल व्यक्ति कामना की इच्छा करे, यह आश्चर्य है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

पुस्तक के अनुसार जो ज्ञानी पुरुष काम को ज्ञान का अत्यन्त वैरी जानता हुआ भी काम की इच्छा करे, तो इससे बढ़कर क्या आश्चर्य है। जैसे मृत्यु से ग्रसित हुए पुरुष को समीपवर्ती विषय-भोग की इच्छा नहीं होती, वैसे ही विवेकी पुरुष को भी विषय-भोग की इच्छा नहीं होनी चाहिए।

सरल हिन्दी में समझें

पुस्तक की उपमा यह है: जो व्यक्ति मृत्यु के बहुत निकट और बहुत कमज़ोर हो, उसके मन में भोग की इच्छा प्रायः ठंडी हो जाती है। गुरु कहते हैं कि समझदार व्यक्ति को भी भोग की जकड़ वैसी ही ठंडी पड़नी चाहिए।

इसे पढ़ते समय सावधान रहिए: यह मृत्यु को आकर्षक बताने की बात नहीं, केवल एक तुलना है। और यह कमज़ोर या बीमार व्यक्ति की किसी भी भावना की निंदा नहीं है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्लोक काम को ज्ञान का शत्रु जानकर भी उसकी इच्छा रखने को आश्चर्य कहता है और मृत्यु-निकट व्यक्ति से तुलना करता है। 2. यह कामना की पकड़ को सहज और अपरिहार्य मानने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह वासना और ज्ञान के संबंध को प्रकट करता है। 4. अध्याय में यह परीक्षा का छठा चरण है। 5. 3.6 के काम-परीक्षा को एक और उपमा से आगे बढ़ाता है। 6. यह परम दृष्टि से आचरण की परीक्षा है। 7. इसे रोगी, वृद्ध या शोकग्रस्त व्यक्ति की निंदा के रूप में न पढ़ें।

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे बहुत थका हुआ यात्री दावत की ओर नहीं दौड़ता, वैसे ही गहरी समझ वाला मन हर आकर्षण की ओर नहीं भागता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति सुनता है कि देर रात के स्क्रॉल से उसकी नींद और काम बिगड़ते हैं, पर फिर भी वही दोहराता है। जब उसे नुकसान साफ़ दिखने लगता है, तब आदत की पकड़ अपने आप कमज़ोर पड़ती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जब नुकसान साफ़ दिखे, तब चाह की पकड़ ढीली पड़ती है; पहले उसे साफ़ देखना सीखिए।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। मृत्यु-निकटता की उपमा मृत्यु को वांछनीय नहीं बताती, और बीमार या कमज़ोर व्यक्ति की भावनाओं की निंदा नहीं करती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक आदत चुनिए जिसका नुकसान आपको पता है और उसे शांति से, बिना कड़वाहट के, एक बार टालकर देखिए। (लगभग 10 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: किस आदत का नुकसान मैं जानता हूँ पर फिर भी दोहराता हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए उस आदत के बाद की भावना (थकान, पछतावा या हल्कापन) को याद कीजिए और बस देखिए।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: हानि साफ़ दिखे तो चाह की पकड़ अपने आप ढीली पड़ने लगती है।

English

Translation: It is a wonder that one who knows desire to be the enemy of knowledge should still crave it, like a man very weak and close to his end.

Simple explanation: The commentary compares the knower’s freedom from craving to the faded appetite of a person near death. It is only a comparison; it does not praise death or condemn anyone who is ill or weak.

विषय और संबंधित श्लोक

  • वासना
  • चित्त
  • विवेक
  • आत्मचिंतन
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 3.6: कामना की परीक्षा।
  • श्लोक 3.8: मोक्ष की इच्छा में भी भय का प्रश्न।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 83–84 (PDF पृ. 90–91)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया। मृत्यु-निकट व्यक्ति की उपमा के कारण यहाँ संवेदनशील-पाठ सावधानी जोड़ी गई है; यह पुस्तक के भावार्थ में नहीं है।