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अध्याय 4 · आत्मज्ञान की महिमा
अष्टावक्र गीता, श्लोक 4.2
सत्यापित
मूल संस्कृत
यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः । अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति ॥ २ ॥
IAST लिप्यंतरण
yatpadaṃ prepsavo dīnāḥ śakrādyāḥ sarvadevatāḥ | aho tatra sthito yogī na harṣam upagacchati || 2 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
यत्, पदम्, प्रेप्सवः, दीनाः, शक्राद्याः, सर्वदेवताः, अहो, तत्र, स्थितः, योगी, न, हर्षम्, उपगच्छति
- यत् पदम्
- जिस पद को
- प्रेप्सवः
- पाने की इच्छा करने वाले
- दीनाः
- दीन होते हुए
- शक्राद्याः सर्वदेवताः
- इन्द्र आदि सब देवता
- तत्र स्थितः योगी
- उस पद में स्थित योगी
- न हर्षम् उपगच्छति
- हर्ष को प्राप्त नहीं होता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जिस पद को पाने की इच्छा से इन्द्र आदि सब देवता दीन हो जाते हैं, आश्चर्य है कि उसमें स्थित योगी हर्ष को प्राप्त नहीं होता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
पुस्तक के अनुसार यहाँ प्रश्न है कि संसार के व्यवहार में स्थित ज्ञानी अज्ञानी के तुल्य क्यों नहीं हो सकता। उत्तर: अज्ञानी को लाभ और अलाभ में सुख और दुख होते हैं, ज्ञानवान् को नहीं होते, इसीलिए दोनों की तुलना नहीं बन सकती। जनक कहते हैं कि इन्द्र से लेकर सब देवता जिस आत्मपद की प्राप्ति की इच्छा में बड़ी दीनता को प्राप्त होते हैं और उसके न मिलने पर शोक पाते हैं, उस आत्म-पद में स्थित योगी विषय-भोग की प्राप्ति से न हर्ष पाता है और न विषयों के न मिलने या नष्ट होने पर शोक, क्योंकि आत्म-सुख से अधिक कोई सुख नहीं, और वह उसे नित्य प्राप्त है।
सरल हिन्दी में समझें
यहाँ जनक कहते हैं कि जो स्थिति देवता भी पाना चाहते हैं, उसमें टिका व्यक्ति छोटी-बड़ी उपलब्धियों से उछलता नहीं। जिसके भीतर पहले से भरापन है, वह हर लाभ पर खुश और हर हानि पर दुखी होने की जकड़ से मुक्त रहता है।
इसका अर्थ भावशून्यता नहीं है। इसका अर्थ यह है कि उसकी स्थिरता किसी लाभ पर टिकी नहीं है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. श्लोक कहता है कि आत्म-पद में स्थित योगी को सांसारिक लाभ-हानि से हर्ष-शोक नहीं होता। 2. यह सुख को बाहरी प्राप्ति से जोड़ने की पहचान को चुनौती देता है। 3. यह आत्म-सुख की नित्य-प्राप्ति को प्रकट करता है। 4. अध्याय में यह पहले उत्तर का कारण बताता है। 5. 4.1 के ‘अंतर’ की व्याख्या। 6. यह परम दृष्टि है। 7. इसका अर्थ यह नहीं कि योगी को कुछ महसूस ही नहीं होता।
उदाहरण से समझें: जैसे भरपेट व्यक्ति भोजन की हर खबर पर उत्साहित नहीं होता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
प्रतीकात्मक चित्र-व्याख्या
वैराग्य
वस्तु का उपयोग, पर उस पर मानसिक निर्भरता नहीं।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति काम की सराहना या प्रमोशन की खबर पर बहुत उछलता नहीं और किसी असफलता पर बहुत गिरता नहीं। वह खुशी और निराशा महसूस करता है, पर उसकी स्थिरता नतीजों के ऊपर नहीं टिकी। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: स्थिरता लाभ-हानि के ऊपर टिकाइए, तो उपलब्धियाँ आनंद देंगी पर सहारा नहीं बनेंगी।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। समत्व का अर्थ संवेदनहीनता नहीं है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज किसी छोटी उपलब्धि या असुविधा पर अपनी प्रतिक्रिया को एक साँस रुककर देखिए, और फिर अपना काम जारी रखिए। (1–2 मिनट)
आत्मचिंतन प्रश्न: मेरी खुशी और उदासी किन बाहरी घटनाओं पर सबसे अधिक टिकी है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट के लिए आज की एक अच्छी और एक बुरी घटना याद कीजिए और देखिए कि दोनों के नीचे कुछ स्थिर बना रहा।
एक पंक्ति में सार: जिसकी स्थिरता भीतर से है, वह हर लाभ-हानि पर उछलता या गिरता नहीं।
English
Translation: The state that Indra and all the gods long for in distress: how wonderful that the yogi established there feels no elation.
Simple explanation: The knower’s contentment does not rise and fall with gain and loss, so he cannot be equated with the unknowing. This is not emotional numbness or indifference to meaningful work.
विषय और संबंधित श्लोक
- समत्व
- शांति
- आत्मज्ञान
- वैराग्य
- श्लोक 4.1: ज्ञानी और अज्ञानी के अंतर की भूमिका।
- श्लोक 3.12: तृप्त की अतुलनीयता।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पृष्ठ से पढ़ा गया।