अध्याय ११३
श्लोक 1
नर्मदादिमाहात्म्यम् अग्निर् उवाच नर्मदादिकमाहात्म्यं वक्ष्येहं नर्मदां परां(१) ।सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनाद्वारि नार्मदं
narmadādimāhātmyam agnir uvāca narmadādikamāhātmyaṃ vakṣyehaṃ narmadāṃ parāṃ(1) / sadyaḥ punāti gāṅgeyaṃ darśanādvāri nārmadaṃ
हिन्दी अर्थ
२१० अग्निपुराण दक्षिणमें देवव्रत, भारुण्ड, ज्येष्ठसाम, रथन्तरसाम सोनेकी शलाकाद्वारा उस प्रतिमामें दोनों नेत्र तथा पुरुषगीत-इन सबका गान करें। यजुर्वेदी अङ्कित करे। यह कार्य शस्त्र-क्रियाद्वारा सम्पन्न विद्वान् पश्चिम दिशामें रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, होना चाहिए। पहले चिह्न बनानेवाला गुरु नेत्र- श्लोकाध्याय तथा विशेषतः ब्रा्मणभागका पाठ चिह्को अञ्जनसे अङ्कित कर दे; इसके बाद वह
English
I shall describe the greatness of Narmada which yields great pleasure. The water of the Ganges purifies the bather at once. The water of the river Narmada (purifies) at the mere sight of it.