Agni Purana· Agni Purāṇa
113
अध्याय 113 / 381

Adhyaya 113

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अध्याय ११३

श्लोक 1

नर्मदादिमाहात्म्यम् अग्निर् उवाच नर्मदादिकमाहात्म्यं वक्ष्येहं नर्मदां परां(१) ।सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनाद्वारि नार्मदं

narmadādimāhātmyam agnir uvāca narmadādikamāhātmyaṃ vakṣyehaṃ narmadāṃ parāṃ(1) / sadyaḥ punāti gāṅgeyaṃ darśanādvāri nārmadaṃ

हिन्दी अर्थ

२१० अग्निपुराण दक्षिणमें देवव्रत, भारुण्ड, ज्येष्ठसाम, रथन्तरसाम सोनेकी शलाकाद्वारा उस प्रतिमामें दोनों नेत्र तथा पुरुषगीत-इन सबका गान करें। यजुर्वेदी अङ्कित करे। यह कार्य शस्त्र-क्रियाद्वारा सम्पन्न विद्वान् पश्चिम दिशामें रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, होना चाहिए। पहले चिह्न बनानेवाला गुरु नेत्र- श्लोकाध्याय तथा विशेषतः ब्रा्मणभागका पाठ चिह्को अञ्जनसे अङ्कित कर दे; इसके बाद वह

English

I shall describe the greatness of Narmada which yields great pleasure. The water of the Ganges purifies the bather at once. The water of the river Narmada (purifies) at the mere sight of it.

अध्याय ११३

श्लोक 2

विस्तराद्योजनशतं योजनद्वयमायता ।षष्टिस्तीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस् तथापराः

vistarādyojanaśataṃ yojanadvayamāyatā / ṣaṣṭistīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭyas tathāparāḥ

हिन्दी अर्थ

करें। अथर्ववेदी विद्वान् उत्तर दिशामें नीलरुद्र, शिल्पी, जो मूर्ति-निर्माणका कार्य पहले भी कर सूक्ष्मासुक्ष्म तथा अथर्वशीर्षका तत्परतापूर्वक चुका हो, उस नेत्रचिहको शस्त्रद्वारा खोदे (अर्थात्

English

Death at this place (conveys one) to the world of Siva. This excellent sacred place yields everything. Lord iva sports here with his consort. (The demon) Hiranyakasipu performed penance here and became mighty. Tlie sages attained perfection here.

अध्याय ११३

श्लोक 3

पर्वतस्य समन्तात्तु तिष्ठन्त्यमरकण्टके(२) ।कावेरीसङ्गमं पुण्यं श्रीपर्वतमतः शृणु

parvatasya samantāttu tiṣṭhantyamarakaṇṭake(2) / kāverīsaṅgamaṃ puṇyaṃ śrīparvatamataḥ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

आचार्य (अरणी-मन्थनद्वारा) अग्रिका उत्पादन करके उसे प्रत्येक कुण्डमें स्थापित करावें। अग्निके पूर्व आदि भागोंको पूर्व-कुण्ड आदिके क्रमसे लेकर धूप, दीप और चरुके निमित्त अग्निका उद्धार करे। फिर पहले बताये अनुसार भगवान् शंकरका पूजन करके शिवाग्निमें मन्त्र- तर्पण करे। देश, काल आदिको सम्पन्नता तथा दुर्निमित्तकी शान्तिके लिये होम करके मन्त्रज्ञ

English

All around the mountain they stay at Amarakantaka. The meritorious confluence with the Kaveri; now hear of Shriparvata.

अध्याय ११३

श्लोक 4

गौरी श्रीरूपिणी तेपे तपस्तामब्रवीद्धरिः(३) ।अवाप्स्यसि त्वमध्यात्म्यं नाम्ना श्रीपर्वतस्तव

gaurī śrīrūpiṇī tepe tapastāmabravīddhariḥ(3) / avāpsyasi tvamadhyātmyaṃ nāmnā śrīparvatastava

हिन्दी अर्थ

आचार्य मङ्गलकारिणी पूर्णाहुति प्रदान करके, पूर्ववत् चरु तैयार करे और उसे प्रत्येक कुण्डमें निवेदित करे । यजमानसे वस्त्राभूषणोंद्वारा विभूषित एवं सम्मानित मूर्तिपालक ब्राह्मण स्नान-मण्डपमें

English

Gauri, in the form of Shri, performed austerity; Hari said to her: "You will attain the spiritual; Shriparvata will be your name.

अध्याय ११३

श्लोक 5

समन्ताद्योजनशतं महापुण्यं भविष्यति ।अत्र दानन्तपो जप्यं(४) श्राद्धं सर्वमथाक्षयं(५)

samantādyojanaśataṃ mahāpuṇyaṃ bhaviṣyati / atra dānantapo japyaṃ(4) śrāddhaṃ sarvamathākṣayaṃ(5)

हिन्दी अर्थ

जायँ। भद्रपीठपर भगवान् शिवकी प्रतिमाको स्थापित करके ताडून और अवगुण्ठनको क्रिया करें। पूर्वको वेदीपर पूजन करके मिट्टी, काषाय- जल, गोबर और गोमूत्रसे तथा बीच-बीचमें खुदाई करके नेत्रकी आकृतिको स्पष्टरूपसे अभिव्यक्त करे)। अर्चाके तीन अंशसे कम अथवा एक चौथाई भाग या आधे भागमें सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्धिके लिये शुभ लक्षण (चिह्ू)-को अवतारणा

English

Around it a hundred yojanas will be greatly meritorious. Here gift, austerity, recitation, ancestral rites — all are imperishable;

अध्याय ११३

श्लोक 6

१ नर्मदापरमिति झ॥ २ निर्यान्त्यमरकण्टके इति झ॥ ३ तपस्तामब्रवीद्धर इति ग॥ ४ अत्र दानं तथा जप्यमिति झ॥ ५ सर्वमथाक्षरमिति ख॥ , छ॥ च :प् ३७९ मरणं शिवलोकाय सर्वदं तीर्थमुत्तमं ।हरो ऽत्र क्रीडते देव्या हिरण्यकशिपुस् तथा

1 narmadāparamiti jha.. 2 niryāntyamarakaṇṭake iti jha.. 3 tapastāmabravīddhara iti ga.. 4 atra dānaṃ tathā japyamiti jha.. 5 sarvamathākṣaramiti kha.. , cha.. ca :p 379 maraṇaṃ śivalokāya sarvadaṃ tīrthamuttamaṃ / haro 'tra krīḍate devyā hiraṇyakaśipus tathā

हिन्दी अर्थ

करनी चाहिए। शिवलिङ्गकी लंबाईके मानमें तीनसे भाग देकर एक भागको त्याग देनेसे जो मान हो, वही लिङ्गके लक्ष्मदेहका सब ओरसे विस्तार होना चाहिए

English

death here leads to Shiva's world; the best sacred place giving all." Hara sports here with the Goddess, and Hiranyakashipu likewise,

अध्याय ११३

श्लोक 7

तपस्तप्त्वा बली चाभून्मुनयः सिद्धिमाप्नुवन्(१)

tapastaptvā balī cābhūnmunayaḥ siddhimāpnuvan(1) /

हिन्दी अर्थ

एक हाथके प्रस्तरखण्डमें जो लक्ष्मरेखा बनेगी, उसकी गहराई और चौड़ाई उतनी ही होगी, जितनी जौके नौ भागोंमेंसे एकको छोड्ने और आठको लेनेसे होती है। इसी प्रकार डेढ़ हाथ या दो हाथ आदिके लिङ्गसे लेकर नौ हाथतकके लिङ्गमें क्रमशः ३ भागको वृद्धि करके लक्ष्मरेखा बनानी चाहिए। इस तरह नौ हाथवाले लिङ्गमें आठ जौके बराबर मोटी और गहरी लक्ष्मरेखा

English

having performed austerity became mighty; the sages attained accomplishment.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 113
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.