अध्याय १५०
श्लोक 1
मन्वन्तराणि अग्निर् उवाच मन्वन्तराणि वक्ष्यामि आद्याः स्वायम्भुवो मनुः ।अग्नीध्राद्यास्तस्य सुता यमो नाम तदा सुराः
manvantarāṇi agnir uvāca manvantarāṇi vakṣyāmi ādyāḥ svāyambhuvo manuḥ / agnīdhrādyāstasya sutā yamo nāma tadā surāḥ
हिन्दी अर्थ
अब इन्हीं संस्कारोंके बीच ' मृत्युंजय-मन्त्र'को कहता हूँ, जो सब कलाओंसे परिवेष्टित है, अर्थात् उस मन्त्रसे प्रत्येक कार्यका साधन हो सकता है, तथा जो सकारसे प्रबोधित होता है। ३५कार पहले लिखकर फिर बिन्दुके साथ जकार लिखे, पुनः धकारके पेटमें वकारको लिखे, उसे चन्द्रबिन्दुसे अङ्कित करे। अर्थात् ' ॐ जं ध्वम्'-यह मन्त्र सभी दुष्टोंका विनाश
English
In the (period of the fifth Manu) Raivata, Vitatha® (was) the Indra, Amitabhas were the celestials, Hiranya- roma and others were the sages and Balabandha and others were his sons.