Agni Purana· Agni Purāṇa
164
अध्याय 164 / 381

Adhyaya 164

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अध्याय १६४

श्लोक 1

नवग्रहहोमः पुष्कर उवाच श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत् ।वृष्ट्यायुःपुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन् पुनः

navagrahahomaḥ puṣkara uvāca śrīkāmaḥ śāntikāmo vā grahayajñaṃ samārabhet / vṛṣṭyāyuḥpuṣṭikāmo vā tathaivābhicaran punaḥ

हिन्दी अर्थ

विष्णु शयन करते हों, विवाह नहीं करना चाहिए। पौष और चैत्रमासमें भी विवाह निषिद्ध है। मङ्गलके दिन तथा रिक्ता एवं भद्रा तिथियोंमें भी विवाह मना है। जब बृहस्पति और शुक्र स्थानमें सूर्य, शनैश्चर तथा मङ्गल हों और

English

Y.Dh. 1.299.

अध्याय १६४

श्लोक 2

१ मनुष्यादीनिति ख॥ , छ॥ च २ आयुः प्रज्ञाधनमिति ज॥ ।आयुः प्रजां बलमिति घ॥ ३ प्रीताः पितृपितामहा इति ङ॥ :प् १५४ सूर्यः सोमो मङ्गलश् च बुधश्चाथ बृहस्पतिः ।शुक्रः शनैश् चरो राहुः केतुश्चेति ग्रहाः स्मृताः

1 manuṣyādīniti kha.. , cha.. ca 2 āyuḥ prajñādhanamiti ja.. / āyuḥ prajāṃ balamiti gha.. 3 prītāḥ pitṛpitāmahā iti ṅa.. :p 154 sūryaḥ somo maṅgalaś ca budhaścātha bṛhaspatiḥ / śukraḥ śanaiś caro rāhuḥ ketuśceti grahāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

विवाह नहीं करना चाहिए। मृगशिरा, मघा, स्वाती,

English

Y.Dh. 1.299.

अध्याय १६४

श्लोक 3

ताम्रकात् स्फटिकाद्रक्तचन्दनात् स्वर्णर्कादुभौ ।रजतादयसः शीशात् ग्रहाः कार्याः क्रमादिमे

tāmrakāt sphaṭikādraktacandanāt svarṇarkādubhau / rajatādayasaḥ śīśāt grahāḥ kāryāḥ kramādime

हिन्दी अर्थ

रेवती--ये विवाहके नक्षत्र हैं॥ १२--१५॥ भी छठे स्थानका शुक्र उत्तम नहीं होता। चतुर्थी - पुरुषवाची लग्न तथा उसका नवमांश शुभ कर्म भी वैवाहिक नक्षत्रमें ही करना चाहिए। होता है। लग्नसे तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें उसमें लग्न तथा चौथे आदि स्थानोंमें ग्रह न रहें तथा आठवें स्थानमें सूर्य, शनैश्चर और बुध हों तो उत्तम है। पर्वका दिन छोड़कर अन्य समयमें तो शुभ है। आठवें स्थानमें मङ्गलका होना ही स्त्री-समागम करे। इससे सती (या शची) अशुभ है। शेष ग्रह सातवें, बारहवें तथा देवीके आशीर्वादसे सदा प्रसन्नता प्राप्त होती

English

APS. S. 5.28.11.

अध्याय १६४

श्लोक 4

सुवर्णैर् वायजेल्लिख्य गन्धमण्डलकेषु वा ।यथावर्णं प्रदेयानि वासांसि कुसुमानि च

suvarṇair vāyajellikhya gandhamaṇḍalakeṣu vā / yathāvarṇaṃ pradeyāni vāsāṃsi kusumāni ca

हिन्दी अर्थ

आठवें घरमें हों तो शुभकारक होते हैं। इनमें है॥ १६--१९॥

English

ApS. S. 3.13.1.

अध्याय १६४

श्लोक 5

गन्धाश् च वलयश् चैव धूपो देयस्तु गुग्गुलुः ।कर्तव्या मन्त्रयन्तश् च चरवः प्रतिदैवतं

gandhāś ca valayaś caiva dhūpo deyastu gugguluḥ / kartavyā mantrayantaś ca caravaḥ pratidaivataṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विवाहभेद-कथन ” नामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ पुष्कर कहते हैं- परशुरामजी! प्रतिदिन प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर श्रीविष्णु आदि

English

ApS. S. 17.21.7.

अध्याय १६४

श्लोक 6

आकृष्णेन इमं देवा अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत् ।उद्बुद्ध्यस्वेति च ऋचो यथासङ्ख्यं प्रकीर्तिताः

ākṛṣṇena imaṃ devā agnirmūrdhā divaḥ kakut / udbuddhyasveti ca ṛco yathāsaṅkhyaṃ prakīrtitāḥ

हिन्दी अर्थ

मुख करके मल-मूत्रका त्याग करना चाहिए, रातमें दक्षिणाभिमुख होकर करना उचित है और दोनों संध्याओंमें दिनकी ही भाँति उत्तराभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिए। मार्ग

English

V. Saifa. 19.75a.

अध्याय १६४

श्लोक 7

वृहस्पते अतियदर्यस्तथैवाल्पात् परिश्रुतः ।शन्नो देवीस् तथा काण्डात् केतुं कृन्वन्निमास् तथा

vṛhaspate atiyadaryastathaivālpāt pariśrutaḥ / śanno devīs tathā kāṇḍāt ketuṃ kṛnvannimās tathā

हिन्दी अर्थ

आदिपर, जलमें तथा गलीमें भी कभी मलादिका त्याग न करे। सदा तिनकोंसे पृथ्वीको ढककर उसके ऊपर मल-त्याग करे। मिट्टीसे हाथ-पैर आदिकी भलीभाँति शुद्धि करके, कुल्ला करनेके पश्चात्, दन्तधावन करे। नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियाङ्ग, मलकर्षण तथा क्रिया-स्नानये छः प्रकारके स्नान बताये गये हैं। जो स्नान नहीं करता, उसके सब कर्म निष्फल होते हैं; इसलिये

English

Y.Dh. 1.300. RV. 10.9.4a...

अध्याय १६४

श्लोक 8

अर्कः पालाशः खदिरो ह्य् अपामार्गोथ(१) पिप्पलः ।उदुम्बरः शमी दुर्वा कुशाश् च समिधः क्रमात्

arkaḥ pālāśaḥ khadiro hy apāmārgotha(1) pippalaḥ / udumbaraḥ śamī durvā kuśāś ca samidhaḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करना चाहिए

English

APS. S. 16.24.1.

अध्याय १६४

श्लोक 9

एकैकस्यात्राष्टशतमष्टाविंशतिरेव वा ।होतव्या मधुसर्पिर्भ्यां दध्ना चैव समन्विताः

ekaikasyātrāṣṭaśatamaṣṭāviṃśatireva vā / hotavyā madhusarpirbhyāṃ dadhnā caiva samanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

कुएँसे निकाले हुए जलकी अपेक्षा भूमिपर स्थित जल पवित्र होता है। उससे पवित्र झरनेका जल, उससे भी पवित्र सरोवरका जल तथा उससे भी पवित्र नदीका जल बताया जाता है। तीर्थका जल उससे भी पवित्र होता है और गङ्गाका जल तो सबसे पवित्र माना गया है। पहले जलाशयमें

English

ApS. S. 20.16.3. iiV. 1.6.3a.

अध्याय १६४

श्लोक 10

गुडौदनं पायसं च हविष्यं क्षीरयष्टिकं ।दध्योदनं हविः पूपान् मांसं चित्रान्नमेव च

guḍaudanaṃ pāyasaṃ ca haviṣyaṃ kṣīrayaṣṭikaṃ / dadhyodanaṃ haviḥ pūpān māṃsaṃ citrānnameva ca

हिन्दी अर्थ

गोता लगाकर शरीरका मैल धो डाले। फिर आचमन करके जलसे मार्जन करे। ' हिरण्यवर्णाः०' आदि तीन ऋचाएँ, “शं नो देवीरभिष्टये० ' (यजु० ३६। १२) यह मन्त्र, 'आपो हि छ्ठा०'

English

jaggery rice, pudding, haviṣya, milk rice, curd rice, oblation, cakes, meat, and varied foods.

अध्याय १६४

श्लोक 11

दद्याद्ग्रहक्रमदेतद्द्विजेभ्यो भोजनं बुधः ।शक्तितो वा यथालाभं सत्कृत्य विधिपूर्वकं

dadyādgrahakramadetaddvijebhyo bhojanaṃ budhaḥ / śaktito vā yathālābhaṃ satkṛtya vidhipūrvakaṃ

हिन्दी अर्थ

'इदमापः०' (यजु० ६। १७) यह मन्त्र-इन सबसे मार्जन किया जाता है। तत्पश्चात् जलाशयमें डुबकी लगाकर जलके भीतर ही जप करे। उसमें अघमर्षण सूक्त अथवा 'द्रुपदादिव०' (यजु० (यजु० अ० ३१) आदि पुरुष-सूक्तका जप करना चाहिए। विशेषतः गायत्रीका जप करना उचित है। अघमर्षणसूक्तमें भाववृत्त देवता और अघमर्षण ऋषि हैं। उसका छन्द अनुष्टुप् है।

English

The wise one should give food to the Brahmins in this order of the planets, according to ability or what is available, honoring them by rule.

अध्याय १६४

श्लोक 12

धेनुः शङ्खस् तथानड्वान् हेम वासो हयस् तथा ।१ खदिरस्त्वपामार्गो ऽथेति ग॥ , घ॥ , ञ॥ च :प् १५५ कृष्णा गौरायसश्छाग एता वै दक्षिणाः क्रमात्

dhenuḥ śaṅkhas tathānaḍvān hema vāso hayas tathā / 1 khadirastvapāmārgo 'theti ga.. , gha.. , ña.. ca :p 155 kṛṣṇā gaurāyasaśchāga etā vai dakṣiṇāḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

उसके द्वारा भाववृत्त (भक्तिपूर्वक वरण किये हुए) श्रीहरिका स्मरण होता है। तदनन्तर वस्त्र बदलकर भीगी धोती निचोड्नेके पहले ही देवता और पितरोंका तर्पण करे

English

A cow, conch, ox, gold, cloth, horse, black cow, iron, goat — these are the fees in order.

अध्याय १६४

श्लोक 13

यश् च यस्य यदा दूष्यः(१) स तं यत्नेन पूजयेत् ।ब्रह्मणैषां वरो दत्तः पूजिताः पूजितस्य च

yaś ca yasya yadā dūṣyaḥ(1) sa taṃ yatnena pūjayet / brahmaṇaiṣāṃ varo dattaḥ pūjitāḥ pūjitasya ca

हिन्दी अर्थ

फिर पुरुषसूक्त (यजु० अ० ३१)-के द्वारा जलाझलि दे। उसके बाद अग्निहोत्र करे। तत्पश्चात् अपनी शक्तिके अनुसार दान देकर योगक्षेमकी सिद्धिके लिये परमेश्वरकी शरण

English

Whoever is afflicted by a planet at any time, he should honor that planet with effort. Brahma gave the planets a boon: those honored honor the one who honors.

अध्याय १६४

श्लोक 14

ग्रहाधीना नरेन्द्राणा(२) मुछ्रयाः पतनानि च ।भावभावो च जगतस्तस्मात् पूज्यतमा ग्रहाः

grahādhīnā narendrāṇā(2) muchrayāḥ patanāni ca / bhāvabhāvo ca jagatastasmāt pūjyatamā grahāḥ

हिन्दी अर्थ

लिये शुद्ध मानी गयी हैं; दूसरोंकी उपर्युक्त वस्तुएँ अपने लिये शुद्ध नहीं होतीं। राह चलते समय यदि सामनेसे कोई ऐसा पुरुष आ जाय, जो भारसे लदा हुआ कष्ट पा रहा हो, तो स्वयं

English

The rises and falls of kings are under the planets; the existence and non-existence of the world — therefore the planets are most worthy of worship.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 164
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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