Agni Purana· Agni Purāṇa
163
अध्याय 163 / 381

Adhyaya 163

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अध्याय १६३

श्लोक 1

श्राद्धकल्पकथनं पुष्कर उवाच श्राद्धकल्पं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिप्रदं शृणु ।निमन्त्र्य विप्रान् पूर्वेद्युः स्वागतेनापराह्णतः

śrāddhakalpakathanaṃ puṣkara uvāca śrāddhakalpaṃ pravakṣyāmi bhuktimuktipradaṃ śṛṇu / nimantrya viprān pūrvedyuḥ svāgatenāparāhṇataḥ

हिन्दी अर्थ

दान देना, वेद पढ़ानेका कार्य करना, उत्तम प्रतिग्रह लेना तथा स्वाध्याय करना--ये ब्राह्मणके कर्म हैं। दान देना, वेदोंका अध्ययन करना और विधिपूर्वक यञ्ञानुष्ठान करना-ये क्षत्रिय और वैश्यके सामान्य कर्म हैं। प्रजाका पालन करना और दुष्टोंको दण्ड देना-ये क्षत्रियके विशेष धर्म हैं। खेती, गोरक्षा और व्यापार-ये वैश्यके विशेष कर्म बताये गये हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और

English

ApS. S. 3-10-1 d.

अध्याय १६३

श्लोक 2

प्राच्योपवेशयेत् पीठे युग्मान्दैवे ऽथ पित्रके ।अयुग्मान् प्राङ्मुखान्दैवे त्रीन् पैत्रे चैकमेव वा

prācyopaveśayet pīṭhe yugmāndaive 'tha pitrake / ayugmān prāṅmukhāndaive trīn paitre caikameva vā

हिन्दी अर्थ

वैश्य-इन द्विजोंकी सेवा तथा सब प्रकारको शिल्प-रचना-ये शूद्रके कर्म हैं॥ २--९ ॥

English

RV. liS.9.4a.

अध्याय १६३

श्लोक 3

मातामहानामप्येवन्तन्त्रं वा वैश्यदेविकं ।प्राणिप्रक्षालनं दत्त्वा विष्टरार्थं कुशानपि

mātāmahānāmapyevantantraṃ vā vaiśyadevikaṃ / prāṇiprakṣālanaṃ dattvā viṣṭarārthaṃ kuśānapi

हिन्दी अर्थ

मौञ्जी-बन्धन (यज्ञोपवीत-संस्कार) होनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-बालकका द्वितीय जन्म होता है; इसलिये वे 'द्विज' कहलाते हैं। यदि अनुलोम-क्रमसे वर्णोंकी उत्पत्ति हो तो माताके समान बालककी जाति मानी गयी है

English

ApS. S, 7.9.10.

अध्याय १६३

श्लोक 4

आवाहयेदनुज्ञातो विश्वे देवास इत्य् ऋचा ।यवैरन्ववकीर्याथ(?) भाजने सपवित्रके

āvāhayedanujñāto viśve devāsa ity ṛcā / yavairanvavakīryātha(?) bhājane sapavitrake

हिन्दी अर्थ

विलोम-क्रमसे अर्थात् शूद्रके वीर्यसे उत्पन्न हुआ ब्राह्मणीका पुत्र “चाण्डाल' कहलाता है, क्षत्रियके वीर्यसे उत्पन्न होनेवाला ब्राह्मणीका पुत्र 'सूत' कहा गया है और वैश्यके वीर्यसे उत्पन्न

English

ApS.S. 22.28.13.

अध्याय १६३

श्लोक 5

शन्नोदेव्या पयः क्षिप्त्वा यवोसीति यवांस् तथा ।यादिव्या इतिमन्त्रेण हस्ते ह्य् अर्घं विनिक्षिपेत्

śannodevyā payaḥ kṣiptvā yavosīti yavāṃs tathā / yādivyā itimantreṇa haste hy arghaṃ vinikṣipet

हिन्दी अर्थ

होनेपर उसकी 'वैदेहक' संज्ञा होती है। क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके पेटसे शूद्रके द्वारा उत्पन्न हुआ विलोमज पुत्र पुक्कस' कहलाता है । वैश्य और शूद्रके वीर्यसे उत्पन्न होनेपर क्षत्रियाके पुत्रको क्रमशः “मागध' और 'अयोगव' संज्ञा होती है। वैश्य जातिकी स्त्रीके गर्भसे शूद्र एवं विलोमज जातियोंद्वारा उत्पन्न विलोमज संतानोंके हजारों भेद हैं। इन सबका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध

English

ApS.S.8.14.18.

अध्याय १६३

श्लोक 6

दत्वोदकं गन्धमाल्यं धूपदानं प्रदीपकं ।अपसव्यं ततः कृत्वा पितॄणामप्रदक्षिणं

datvodakaṃ gandhamālyaṃ dhūpadānaṃ pradīpakaṃ / apasavyaṃ tataḥ kṛtvā pitṝṇāmapradakṣiṇaṃ

हिन्दी अर्थ

समान जातिवालोंके साथ ही होना चाहिए; अपनेसे ऊँची और नीची जातिके लोगोंके साथ नहीं

English

cf. d jiantu na V. Sam. 19.58 a.

अध्याय १६३

श्लोक 7

द्विगुणांस्तु कुशान् कृत्वा ह्य् उशन्तस्त्वेत्यृचा पितॄन् ।आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदायान्तु नस्ततः

dviguṇāṃstu kuśān kṛtvā hy uśantastvetyṛcā pitṝn / āvāhya tadanujñāto japedāyāntu nastataḥ

हिन्दी अर्थ

वधके योग्य प्राणियोंका वध करना-यह चाण्डालका कर्म बताया गया है। स्त्रियोंके उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंके निर्माणसे जीविका चलाना तथा स्त्रियोंकी रक्षा करना-यह 'वैदेहक' का कार्य है। सूतोंका कार्य है-घोड़ोंका सारथिपना, “पुक्कस' व्याध-वृत्तिसे रहते हैं तथा 'मागध' का कार्य है-स्तुति करना, प्रशंसाके गीत गाना। 'अयोगव'का कर्म है-रङ्गभूमिमें उतरना और

English

Y.Dh. 1.234.

अध्याय १६३

श्लोक 8

यवार्थास्तु तिलैः कार्याः कुर्यादर्घ्यादि पूर्ववत् ।दत्त्वार्घ्यं संश्रवान् शेषान् पात्रे कृत्वा विधानतः

yavārthāstu tilaiḥ kāryāḥ kuryādarghyādi pūrvavat / dattvārghyaṃ saṃśravān śeṣān pātre kṛtvā vidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

शिल्पके द्वारा जीविका चलाना। “चाण्डाल'को गाँवके बाहर रहना और मुर्देसे उतारे हुए वस्त्रको धारण करना चाहिए। चाण्डालको दूसरे वर्णके लोगोंका स्पर्श नहीं करना चाहिए। ब्राह्मणों तथा

English

Y.Dh. 1.237.

अध्याय १६३

श्लोक 9

पितृभ्यः स्थानमसीति न्युब्जं पात्रं करोत्यधः ।अग्नौ करिष्य आदाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतं

pitṛbhyaḥ sthānamasīti nyubjaṃ pātraṃ karotyadhaḥ / agnau kariṣya ādāya pṛcchatyannaṃ ghṛtaplutaṃ

हिन्दी अर्थ

गौओंको रक्षाके लिये प्राण त्यागना अथवा ३१८ अग्निपुराण

English

Y.Dh. 1.237. Ap.S. 2-6-1.

अध्याय १६३

श्लोक 10

कुरुष्वेति ह्य् अनुज्ञातो हुत्वाग्नौ पितृयज्ञवत् ।हुतशेषं प्रदद्यात्तु भाजनेषु समाहितः

kuruṣveti hy anujñāto hutvāgnau pitṛyajñavat / hutaśeṣaṃ pradadyāttu bhājaneṣu samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

स्त्रियों एवं बालकोंकी रक्षाके लिये देह-त्याग माना गया है। वर्णसंकर व्यक्तियोंकी जाति उनके करना वर्ण-बाह्य चाण्डाल आदि जातियोंकी पिता-माता तथा जातिसिद्ध कर्मोसे जाननी सिद्धिका (उनकी आध्यात्मिक उन्नति )-का कारण चाहिए॥ १४--१८ ॥

English

Orh bhdrblmvassuva tatsaviturvarepyarh etc.

अध्याय १६३

श्लोक 11

यथालाभोपपन्नेषु रौप्येषु तु विशेषतः ।दत्वान्नं पृथिवीपात्रमिति पात्राभिमन्त्रणं

yathālābhopapanneṣu raupyeṣu tu viśeṣataḥ / datvānnaṃ pṛthivīpātramiti pātrābhimantraṇaṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वर्णान्तर- धर्मोका वर्णन” नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ पुष्कर कहते हैं- परशुरामजी ! ब्राह्मण अपने शास्त्रोक्त कर्मसे ही जीविका चलावे; क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रके धर्मसे जीवन-निर्वाह न करे। आपत्तिकालमें क्षत्रिय और वैश्यकी वृत्ति ग्रहण कर ले; किंतु

English

Orh bhSfy etc.

अध्याय १६३

श्लोक 12

कृत्वेदं विष्णुरित्यन्ने द्विजाङ्गुष्ठं निवेशयेत् ।सव्याहृतिकां गायत्रीं मधुवाता इति त्यचं

kṛtvedaṃ viṣṇurityanne dvijāṅguṣṭhaṃ niveśayet / savyāhṛtikāṃ gāyatrīṃ madhuvātā iti tyacaṃ

हिन्दी अर्थ

शूद्र-वृत्तिसे कभी गुजारा न करे। द्विज खेती,

English

ApS.S. 16-25-1. tlV. l-90.6a.

अध्याय १६३

श्लोक 13

जप्त्वा यथासुखं वाच्यं भुञ्जीरंस्ते ऽपि वाग्यताः ।अन्नमिष्टं हविष्यञ्च दद्याज्जप्त्वा पवित्रकं

japtvā yathāsukhaṃ vācyaṃ bhuñjīraṃste 'pi vāgyatāḥ / annamiṣṭaṃ haviṣyañca dadyājjaptvā pavitrakaṃ

हिन्दी अर्थ

वृत्तियोंका अनुष्ठान करे; परंतु वह गोरस, गुड़, धरतीको कोड्ने-जोतनेके द्वारा जो कीड़े और चींटी आदिकी हत्या कर डालते हैं और सोहनीके

English

The ekoddifPa (ceremony) (is done) without (the wor¬ ship of) (Vive)devas. There would be only one libation and one purificatory rite. The (offering should be made) in the

अध्याय १६३

श्लोक 14

अन्नमादाय तृप्ताः स्थ शेषं चैवान्नमस्य च ।तदन्नं विकिरेद् भूमौ दद्याच्चापः सकृत् सकृत्

annamādāya tṛptāḥ stha śeṣaṃ caivānnamasya ca / tadannaṃ vikired bhūmau dadyāccāpaḥ sakṛt sakṛt

हिन्दी अर्थ

द्वारा जो पौधोंको नष्ट कर डालते हैं, उससे यज्ञ और देवपूजा करके मुक्त होते हैं

English

MS. 1.6.1.45.

अध्याय १६३

श्लोक 15

सर्वमन्नमुपादाय सतिलं दक्षिणामुखः ।उच्छिष्टसन्निधौ पिण्डान् प्रदद्यात् पितृयज्ञवत्

sarvamannamupādāya satilaṃ dakṣiṇāmukhaḥ / ucchiṣṭasannidhau piṇḍān pradadyāt pitṛyajñavat

हिन्दी अर्थ

आठ बैलोंका हल धर्मानुकूल माना गया है। जीविका चलानेवालोंका हल छः बैलोंका, निर्दयी हत्यारोंका हल चार बैलोंका तथा धर्मका नाश करनेवाले मनुष्योंका हल दो बैलोंका माना गया है । ब्राह्मण ऋत' और अमृतसे' अथवा मृतः और प्रमृतसे या सत्यानृत वृत्तिसे जीविका चलावे। श्वान-वृत्तिसेः कभी जीवन-निर्वाह न करे

English

MS. 11.9.2.

अध्याय १६३

श्लोक 16

मातामहानामप्येवं दद्यादाचमनं ततः ।स्वस्ति वाच्यं ततः कुर्यादक्षय्योदकमेव च

mātāmahānāmapyevaṃ dadyādācamanaṃ tataḥ / svasti vācyaṃ tataḥ kuryādakṣayyodakameva ca

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें 'गुहस्थ-जीविकाका वर्णन” नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

Sec , vv 3-7.

अध्याय १६३

श्लोक 17

दत्वा तु दक्षिणां शक्त्या स्वधाकारमुदाहरेत् ।वाच्यतामित्यनुज्ञातः स्वपितृभ्यः स्वधोच्यतां(१)

datvā tu dakṣiṇāṃ śaktyā svadhākāramudāharet / vācyatāmityanujñātaḥ svapitṛbhyaḥ svadhocyatāṃ(1)

हिन्दी अर्थ

संस्कारोंका वर्णन और ब्रह्मचारीके धर्म पुष्कर कहते हैं-परशुरामजी! अब मैं समागम करे। यह 'गर्भाधान-संस्कार' कहलाता आश्रमी पुरुषोंके धर्मका वर्णन करूँगा; सुनो! है। 'गर्भ' रह गया-इस बातका स्पष्टरूपसे ज्ञान यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है । स्त्रियोंके हो जानेपर गर्भस्थ शिशुके हिलने-डुलनेसे पहले ऋतुधर्मकी सोलह रात्रियाँ होती हैं, उनमें पहलेकी ही 'पुंसवन-संस्कार' होता है। तत्पश्चात् छठे या

English

Y.Dh. 1.245.

अध्याय १६३

श्लोक 18

१ मातामहानामित्यादिः, स्वपितृभ्यः स्वधोच्यतामित्यन्तः पाठः झ॥ पुस्तके नास्ति :प् १५१ कुर्युरस्तु स्वधेत्युक्ते भूमौ सिञ्चेत्ततो जलं ।प्रीयन्तामिति वा दैवं विश्वे देवा जलं ददेत्

1 mātāmahānāmityādiḥ, svapitṛbhyaḥ svadhocyatāmityantaḥ pāṭhaḥ jha.. pustake nāsti :p 151 kuryurastu svadhetyukte bhūmau siñcettato jalaṃ / prīyantāmiti vā daivaṃ viśve devā jalaṃ dadet

हिन्दी अर्थ

तीन रातें निन्दित हैं। शेष रातोंमें जो युग्म अर्थात् आठवें मासमें “सीमन्तोन्नयन' किया जाता है। चौथी, छठी, आठवीं और दसवीं आदि रात्रियाँ उस दिन पुँल्लिङ्ग नामवाले नक्षत्रका होना शुभ हैं, उनमें ही पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष स्त्री- है। बालकका जन्म होनेपर नाल काटनेके पहले

English

IIV. 1.30.7b.

अध्याय १६३

श्लोक 19

दातारो नो ऽभिवर्धन्तां वेदाः सन्ततिरेव च ।श्रद्धा च नो माव्यगमद्बहुदेयं च नो ।स्त्विति

dātāro no 'bhivardhantāṃ vedāḥ santatireva ca / śraddhā ca no māvyagamadbahudeyaṃ ca no .stviti

हिन्दी अर्थ

१. खेत कट जानेपर बाल बीनना अथवा अनाजके एक-एक दानेको चुन-चुनकर लाना और उसीसे जीविका चलाना 'ऋत' कहलाता है। २. बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, वह ' अमृत' है। ३. माँगी हुई भीखको ' मृत' कहते हैं। ४. खेतीका नाम 'प्रमृत' है। ५. व्यापारको 'सत्यानृत' कहते हैं। ६. नौकरीका नाम ' श्वान-वृत्ति' है।

English

The ceremony performed in memory of the manes, preliminary to any festive occasion such as marriage etc.

अध्याय १६३

श्लोक 20

इत्युक्त्वा तु प्रिया वाचः प्रणिपत्य विसर्जयेत् ।वाजे वाज इति प्रीतपितृपूर्वं विसर्जनं(१)

ityuktvā tu priyā vācaḥ praṇipatya visarjayet / vāje vāja iti prītapitṛpūrvaṃ visarjanaṃ(1)

हिन्दी अर्थ

ही विद्वान् पुरुषोंको उसका ' जातकर्म-संस्कार ' करना चाहिए। सूतक निवृत्त होनेपर 'नामकरण- संस्कार' का विधान है । ब्राह्मणके नामके अन्तमें “शर्मा' और क्षत्रियके नामके अन्तमें ' वर्मा' होना

English

The rite performed for one individual deceased not including other ancestors.

अध्याय १६३

श्लोक 21

यस्मिंस्तु संश्रवाः पूर्वमर्घपात्रे निपातिताः ।पितृपात्रं तदुत्तानं कृत्वा विप्रान् विसर्जयेत्

yasmiṃstu saṃśravāḥ pūrvamarghapātre nipātitāḥ / pitṛpātraṃ taduttānaṃ kṛtvā viprān visarjayet

हिन्दी अर्थ

चाहिए। वैश्य और शूद्रके नामोंके अन्तमें क्रमशः “गुप्त! और “दास' पदका होना उत्तम माना गया है। उक्त संस्कारके समय पत्नी स्वामीकी गोदमें पुत्रको दे और कहे-'यह फिर कुलाचारके अनुरूप 'चूडाकरण' करे। ब्राह्मण-बालकका ' उपनयन-संस्कार' गर्भ अथवा जन्मसे आठवें वर्षमें होना चाहिए। गर्भसे ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रिय बालकका तथा गर्भसे बारहवें वर्षमें

English

If the sapindikarana has to be performed for a (dead) person within a year (after death), the food for him should be given to a brahmin the whole year together with a vessel filled with water.

अध्याय १६३

श्लोक 22

प्रदक्षिणमनुब्रज्य भक्त्वा तु पितृसेवितं ।ब्रह्मचारी भवेत्तान्तु रजनीं ब्राह्मणैः सह

pradakṣiṇamanubrajya bhaktvā tu pitṛsevitaṃ / brahmacārī bhavettāntu rajanīṃ brāhmaṇaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

वैश्य-बालकका उपनयन करना चाहिए । ब्राह्मण- बालकका उपनयन सोलहवें, क्षत्रिय-बालकका बाईसवें और वैश्य-बालकका चौबीसवें वर्षसे आगे नहीं जाना चाहिए। तीनों वर्णोके लिये

English

The ceremony should be done on the day of death for every month in a year and should be done for every year as the food (offered) every month.

अध्याय १६३

श्लोक 23

एवं प्रदक्षिणं कृत्वा वृद्धौ नान्दीमुखान् पितॄन् ।यजेत दधिकर्कन्धुमिश्रान् पिण्डान् यवैः क्रिया

evaṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā vṛddhau nāndīmukhān pitṝn / yajeta dadhikarkandhumiśrān piṇḍān yavaiḥ kriyā

हिन्दी अर्थ

क्रमशः मूँज, प्रत्यज्चा तथा वल्कलको मेखला बतायी गयी है। इसी प्रकार तीनों वर्णोके ब्रह्मचारियोंक लिये क्रमशः मृग, व्याघ्र तथा बकरेके चर्म और पलाश, पीपल तथा बेलके दण्ड धारण करने योग्य बताये गये हैं। ब्राह्मणका दण्ड उसके केशतक, क्षत्रियका ललाटतक और वैश्यका मुखतक लंबा होना चाहिए। इस प्रकार क्रमशः दण्डोंकी लंबाई बतायी गयी है। ये दण्ड

English

ApS. S. 1.9.12 a; T. Dh. 1.253.

अध्याय १६३

श्लोक 24

एकोद्दिष्टं दैवहीनमेकार्घैकपवित्रकं ।आवाहनाग्नौकरणरहितं ह्य् अपसव्यवत्

ekoddiṣṭaṃ daivahīnamekārghaikapavitrakaṃ / āvāhanāgnaukaraṇarahitaṃ hy apasavyavat

हिन्दी अर्थ

टेढ़े-मेढ़े न हों। इनके छिलके मौजूद हों तथा ये आगमें जलाये न गये हों॥ ६--९ ॥

English

See p. 453. fn. 7.

अध्याय १६३

श्लोक 25

उपतिष्ठतामित्यक्षय्यस्थाने पितृविसर्जने ।अभिरम्यतामिति वदेद् ब्रूयुस्ते ऽभिरताः स्म ह

upatiṣṭhatāmityakṣayyasthāne pitṛvisarjane / abhiramyatāmiti vaded brūyuste 'bhiratāḥ sma ha

हिन्दी अर्थ

उक्त तीनों वर्णोके लिये वस्त्र और यज्ञोपवीत क्रमशः कपास (रुई), रेशम तथा ऊनके होने चाहिए। ब्राह्मण ब्रह्मचारी भिक्षा माँगते समय वाक्यके आदिमें 'भवत्' शब्दका प्रयोग करे। जैसे माताके पास जाकर कहे --' भवति

English

The rite performed to merge the soul of the dead i|son with the- ancestors.

अध्याय १६३

श्लोक 26

गन्धोदकतिलैर् युक्तं कुर्यात् पात्रचतुष्टयं ।अर्घार्थपितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत्

gandhodakatilair yuktaṃ kuryāt pātracatuṣṭayaṃ / arghārthapitṛpātreṣu pretapātraṃ prasecayet

हिन्दी अर्थ

दें। इसी प्रकार क्षत्रिय ब्रह्मचारी वाक्यके मध्यमे तथा वैश्य ब्रह्मचारी वाक्यके अन्तमें 'भवत्' शब्दका प्रयोग करे। (यथा-क्षत्रिय-भिक्षां

English

one should make four vessels with scented water and sesame; into the arghya ancestor-vessels one should sprinkle the ghost's vessel

अध्याय १६३

श्लोक 27

ये समाना इति द्वाभ्यां शेषं पूर्ववदाचरेत् ।एतत् सपिण्डीकरणमेकोद्दिष्टं स्तिया सह(२)

ye samānā iti dvābhyāṃ śeṣaṃ pūrvavadācaret / etat sapiṇḍīkaraṇamekoddiṣṭaṃ stiyā saha(2)

हिन्दी अर्थ

पहले वहीं भिक्षा माँगे, जहाँ भिक्षा अवश्य प्राप्त होनेकी सम्भावना हो। स्त्रियोंके अन्य सभी संस्कार बिना मन्त्रके होने चाहिए; केवल विवाह- संस्कार ही मन्त्रोच्चारणपूर्वक होता है। गुरुको चाहिए कि वह शिष्यका उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार करके पहले शौचाचार, सदाचार, अग्निहोत्र तथा संध्योपासनाकी शिक्षा दे

English

with the two verses "Ye samanah"; the rest as before. This is the Sapindikarana; the Ekoddishta with women.

अध्याय १६३

श्लोक 28

अर्वाक्सपिण्डीकरणं यस्य संवत्सराद् भवेत् ।१ पितृपूर्वं विसर्जयेदिति ख॥ , छ॥ , झ॥ च २ स्त्र्या अपीति ख॥ , छ॥ च :प् १५२ तस्याप्यन्नं सोदकुम्भं दद्यात् संवत्सरं द्विजे

arvāksapiṇḍīkaraṇaṃ yasya saṃvatsarād bhavet / 1 pitṛpūrvaṃ visarjayediti kha.. , cha.. , jha.. ca 2 stryā apīti kha.. , cha.. ca :p 152 tasyāpyannaṃ sodakumbhaṃ dadyāt saṃvatsaraṃ dvije

हिन्दी अर्थ

जो पूर्वकी ओर मुँह करके भोजन करता है, वह आयुष्य भोगता है, दक्षिणकी ओर मुँह करके खानेवाला यशका, पश्चिमाभिमुख होकर भोजन करनेवाला लक्ष्मी (धन)-का तथा उत्तरको

English

If the Sapindikarana of someone is done earlier than a year, for him too one should give food with a water-pot to a Brahmin for a year.

अध्याय १६३

श्लोक 29

मृताहनि च कर्तव्यं प्रतिमासन्तु वत्सरं ।प्रतिसंवत्सरं कार्यं श्राद्धं वै मासिकान्नवत्

mṛtāhani ca kartavyaṃ pratimāsantu vatsaraṃ / pratisaṃvatsaraṃ kāryaṃ śrāddhaṃ vai māsikānnavat

हिन्दी अर्थ

ओर मुँह करके अन्न ग्रहण करनेवाला पुरुष सत्यका उपभोग करता है। ब्रह्मचारी प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल अग्निहोत्र करे । अपवित्र वस्तुका होम निषिद्ध है। होमके समय हाथको अङ्गुलियोंको परस्पर सटाये रहे। मधु, मांस, मनुष्योंके साथ विवाद, गाना और नाचना आदि

English

On the death day one should do it every month for a year; every year the rite is to be done like the monthly food.

अध्याय १६३

श्लोक 30

हविष्यान्नेन वै मासं पायसेन तु वत्सरं ।मात्स्यहारिणकौरभ्रशाकुनच्छागपार्षतैः(१)

haviṣyānnena vai māsaṃ pāyasena tu vatsaraṃ / mātsyahāriṇakaurabhraśākunacchāgapārṣataiḥ(1)

हिन्दी अर्थ

अश्लील-चर्चा (गाली-गलौज आदि) -का त्याग करे । दण्ड आदि धारण किये रहे। यदि वह टूट जाय तो जलमें उसका विसर्जन कर दे और नवीन दण्ड धारण करे। वेदोंका अध्ययन पूरा

English

With haviṣya food for a month, with pudding for a year; with fish, deer, black antelope, birds, goat and spotted deer,

अध्याय १६३

श्लोक 31

ऐणरौरववाराहशाशैर् मांसैर् यथाक्रमं ।मासवृद्ध्याभितृप्यन्ति दत्तैर् एव(२) पितामहाः

aiṇarauravavārāhaśāśair māṃsair yathākramaṃ / māsavṛddhyābhitṛpyanti dattair eva(2) pitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

करके गुरुको दक्षिणा देनेके पश्चात् व्रतान्त-स्नान करे; अथवा नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर जीवनभर गुरुकुलमें ही निवास करता रहे इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें “ब्रह्मचर्याश्रम-वर्णन नामक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

with the flesh of spotted deer, Raurava deer, boar and hare in order; with increase of months the grandfathers are satisfied by what is given.

अध्याय १६३

श्लोक 32

खड्गामिषं महाशल्कं मधुयुक्तान्नमेव च(३) ।लोहामिषं कालशाकं मांसं वार्धीनसस्य च

khaḍgāmiṣaṃ mahāśalkaṃ madhuyuktānnameva ca(3) / lohāmiṣaṃ kālaśākaṃ māṃsaṃ vārdhīnasasya ca

हिन्दी अर्थ

पुष्कर कहते हैं-- परशुरामजी ! ब्राह्मण अपनी कामनाके अनुसार चारों वर्णोकी कन्याओंसे विवाह कर सकता है, क्षत्रिय तीनसे, वैश्य दोसे तथा शूद्र एक ही स्त्रीसे विवाहका अधिकारी है।

English

Rhinoceros flesh, great shalka fish, food with honey, iron-flesh, kalashaka, and the flesh of the Vardhrinasa bird —

अध्याय १६३

श्लोक 33

यद्ददाति गयास्थञ्च सर्वमानन्त्यमुच्यते(४) ।तथा वर्षात्रयोदश्यां मघासु च न संशयः

yaddadāti gayāsthañca sarvamānantyamucyate(4) / tathā varṣātrayodaśyāṃ maghāsu ca na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

जो अपने समान वर्णकी न हो, ऐसी स्त्रीके साथ किसी भी धार्मिक कृत्यका अनुष्ठान नहीं करना चाहिए। अपने समान वर्णकी कन्याओंसे विवाह करते समय पतिको उनका हाथ पकड़ना चाहिए। यदि क्षत्रियः-कन्याका विवाह ब्राह्मणसे होता हो तो वह ब्राह्मणके हाथमें हाथ न देकर उसके द्वारा पकड़े हुए बाणका अग्रभाग अपने हाथसे पकड़े। इसी प्रकार वैश्य-कन्या यदि ब्राह्मण अथवा

English

what one gives at Gaya is all called endless; likewise on the thirteenth in the rainy season and in Magha, no doubt.

अध्याय १६३

श्लोक 34

कन्यां प्रजां वन्दिनश् च पशून् मुख्यान् सुतानपि ।घृतं कृषिं च वाणिज्यं द्विशफैकशफं तथा

kanyāṃ prajāṃ vandinaś ca paśūn mukhyān sutānapi / ghṛtaṃ kṛṣiṃ ca vāṇijyaṃ dviśaphaikaśaphaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

क्षत्रियसे व्याही जाती हो तो वह वरके हाथमें रखा हुआ चाबुक पकड़े और शूद्र-कन्या वस्त्रका छोर ग्रहण करे। एक ही बार कन्याका दान देना चाहिए। जो उसका अपहरण करता है, वह चोरके

English

Daughters, offspring, bards, chief cattle, sons, ghee, agriculture and trade, cloven-hoofed and one-hoofed,

अध्याय १६३

श्लोक 35

ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रान् स्वर्णरूप्ये सकुप्यके ।ज्ञातिश्रैष्ठ्यं सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा

brahmavarcasvinaḥ putrān svarṇarūpye sakupyake / jñātiśraiṣṭhyaṃ sarvakāmānāpnoti śrāddhadaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

समान दण्ड पानेका अधिकारी है जो संतान बेचनेमें आसक्त हो जाता है, उसका पापसे कभी उद्धार नहीं होता। कन्यादान, शचीयोग (शचीकी पूजा), विवाह और चतुर्थीकर्म-इन चार कर्मोका नाम “विवाह' है।

English

sons of Brahmin splendor, gold and silver and base metals, eminence among kin — the giver of ancestral rites always obtains all desires.

अध्याय १६३

श्लोक 36

प्रतिपत्प्रभृतिष्वेतान्वर्जयित्वा चतुर्दशीं ।शस्त्रेण तु हता ये वै तेषां तत्र प्रदीयते

pratipatprabhṛtiṣvetānvarjayitvā caturdaśīṃ / śastreṇa tu hatā ye vai teṣāṃ tatra pradīyate

हिन्दी अर्थ

(मनोनीत) पतिके लापता होने, मरने तथा

English

From pratipada onward, excepting the fourteenth; for those slain by weapon it is given there.

अध्याय १६३

श्लोक 37

स्वर्गं(५) ह्य् अपत्यमोजश् च शौर्यं क्षेत्रं बलं तथा ।पुत्रश्रैष्ठ्यं ससौभाग्यमपत्यं मुख्यतां सुतान्

svargaṃ(5) hy apatyamojaś ca śauryaṃ kṣetraṃ balaṃ tathā / putraśraiṣṭhyaṃ sasaubhāgyamapatyaṃ mukhyatāṃ sutān

हिन्दी अर्थ

प्रकारको आपत्तियोंके समय (वाग्दत्ता) स्त्रियोंके लिये दूसरा पति करनेका विधान है। पतिके मरनेपर देवरको कन्या देनी चाहिए। वह न हो तो किसी दूसरेको इच्छानुसार देनी चाहिए। वर अथवा कन्याका वरण करनेके लिये तीनों पूर्वा, कृत्तिका, स्वाती, तीनों उत्तरा और रोहिणी ये नक्षत्र सदा शुभ माने गये हैं॥ ४--७॥

English

Heaven, offspring, vigor, valor, land, strength, eminent sons, good fortune, offspring, leadership, sons,

अध्याय १६३

श्लोक 38

१ मात्स्याविहारिणौरभ्रशाकुनच्छागपार्षतैर् इति छ॥ २ दत्तैर् इहेति घ॥ , ङ॥ , ञ॥ च ३ मधुमुद्गान्नमेव वेति ङ॥ ४ सर्वमानन्त्यमश्नुते इति घ॥ , ङ॥ च ५ स्वर्णमिति ख॥ , छ॥ च :प् १५३ प्रवृत्तचक्रतां पुत्रान् वाणिज्यं प्रसुतां तथा ।अरोगित्वं यशो वीतशोकतां परमाङ्गतिं

1 mātsyāvihāriṇaurabhraśākunacchāgapārṣatair iti cha.. 2 dattair iheti gha.. , ṅa.. , ña.. ca 3 madhumudgānnameva veti ṅa.. 4 sarvamānantyamaśnute iti gha.. , ṅa.. ca 5 svarṇamiti kha.. , cha.. ca :p 153 pravṛttacakratāṃ putrān vāṇijyaṃ prasutāṃ tathā / arogitvaṃ yaśo vītaśokatāṃ paramāṅgatiṃ

हिन्दी अर्थ

प्रवरमें उत्पन्न हुई कन्याका वरण न करे । पितासे

English

a continuing line of sons, trade, children, health, fame, freedom from grief, the supreme goal,

अध्याय १६३

श्लोक 39

घनं विद्यां भिषकसिद्धिं रूप्यं गाश्चाप्यजाविकं ।अश्वानायुश् च विधिवत् यः श्राद्धं सम्प्रयच्छति

ghanaṃ vidyāṃ bhiṣakasiddhiṃ rūpyaṃ gāścāpyajāvikaṃ / aśvānāyuś ca vidhivat yaḥ śrāddhaṃ samprayacchati

हिन्दी अर्थ

ऊपरकी सात पीढ़ियोंके पहले तथा मातासे पाँच पीढ़ियोंके बादकी ही परम्यरामें उसका जन्म होना चाहिए। उत्तम कुल तथा अच्छे स्वभावके सदाचारी वरको घरपर बुलाकर उसे कन्याका दान देना 'ब्राह्मविवाह' कहलाता है। उससे उत्पन्न हुआ बालक उक्त कन्यादानजनित पुण्यके प्रभावसे अपने पूर्वजोंका सदाके लिये उद्धार कर देता है। वरसे एक गाय और एक बैल लेकर जो

English

wealth, learning, physician's success, silver, cows, goats and sheep, horses and life — whoever duly gives the ancestral rite

अध्याय १६३

श्लोक 40

कृत्तिकादिभरण्यन्ते स कामानाप्नुयादिमान् ।वसुरुद्रादितिसुताः पितरः श्राद्धदेवताः

kṛttikādibharaṇyante sa kāmānāpnuyādimān / vasurudrāditisutāḥ pitaraḥ śrāddhadevatāḥ

हिन्दी अर्थ

कन्यादान किया जाता है, उसे 'आर्ष-विवाह' कहते हैं। जब किसीके माँगनेपर उसे कन्या दी जाती है तो वह “प्राजापत्य-विवाह' कहलाता है; इससे धर्मकी सिद्धि होती है। कोमत लेकर

English

from Krittika to the end of Bharani obtains these desires. The ancestors, sons of Vasus, Rudras and Aditi, are the deities of the rite;

अध्याय १६३

श्लोक 41

प्रीणयन्ति मनुष्याणां(१) पितॄन् श्राद्धेन तर्पिताः ।आयुः प्रजां धनं(२) विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च

prīṇayanti manuṣyāṇāṃ(1) pitṝn śrāddhena tarpitāḥ / āyuḥ prajāṃ dhanaṃ(2) vidyāṃ svargaṃ mokṣaṃ sukhāni ca

हिन्दी अर्थ

कन्या देना 'आसुर-विवाह' है; यह नीच श्रेणीका कृत्य है। वर और कन्या जब स्वेच्छापूर्वक एक-दूसरेको स्वीकार करते हैं तो उसे ' गान्धर्व- विवाह' कहते हैं। युद्धके द्वारा कन्याके हर लेनेसे ' राक्षस-विवाह' कहलाता है तथा कन्याको धोखा देकर उड़ा लेना 'पैशाच-विवाह' माना गया है॥। ८--११॥

English

satisfied by the ancestral rite they please men's ancestors. Life, offspring, wealth, knowledge, heaven, liberation and pleasures

अध्याय १६३

श्लोक 42

प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नॄणां पितामहाः(३)

prayacchanti tathā rājyaṃ prītā nṝṇāṃ pitāmahāḥ(3) //

हिन्दी अर्थ

विवाहके दिन कुम्हारको मिट्टीसे शचीको प्रतिमा बनाये और जलाशयके तटपर उसकी गाजे-बाजेके साथ पूजा कराकर कन्याको घर ले जाना चाहिए। आषाढ्से कार्तिकतक, जब भगवान्

English

they grant, and kingdom; pleased, the grandfathers of men.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 163
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.