नभस्ये वाथ वैशाखे कुर्यान्मार्गशिरस्यथ(९) ।१ अर्पयेदिति ख॥ , छ॥ च २ तृणराजेक्षुलवणमिति ख॥ , छ॥ , ट॥ च ३ द्विजदाम्पत्यमर्चयेदिति ख॥ , घ॥ , छ॥ , ट॥ च ४ ललिता प्रीयतामिति ट॥ ५ पृष्ठोदकमिति ञ॥ ।कूपोदकमिति ज॥ , झ॥ च ६ परित्याज्यमिति क॥ , ज॥ , ठ॥ च ।परित्यज्येति ख॥ , छ॥ च ।परिग्राह्यमिति ङ॥ ७ गुरुं मिथुनमभर्च्येति ङ॥ ८ वस्त्राद्यैः सर्वमाप्नुयादिति ख॥ , घ॥ , ङ॥ , छ॥ , झ॥ , ञ॥ , ट॥ च ९ कुर्याद्वा मार्गशीर्षके इति ङ॥ , ञ॥ च :प् २०४ शुक्लपक्षे तृतीयायाम् ललितायै नमो यजेत्॥ २२ ॥
nabhasye vātha vaiśākhe kuryānmārgaśirasyatha(9) / 1 arpayediti kha.. , cha.. ca 2 tṛṇarājekṣulavaṇamiti kha.. , cha.. , ṭa.. ca 3 dvijadāmpatyamarcayediti kha.. , gha.. , cha.. , ṭa.. ca 4 lalitā prīyatāmiti ṭa.. 5 pṛṣṭhodakamiti ña.. / kūpodakamiti ja.. , jha.. ca 6 parityājyamiti ka.. , ja.. , ṭha.. ca / parityajyeti kha.. , cha.. ca / parigrāhyamiti ṅa.. 7 guruṃ mithunamabharcyeti ṅa.. 8 vastrādyaiḥ sarvamāpnuyāditi kha.. , gha.. , ṅa.. , cha.. , jha.. , ña.. , ṭa.. ca 9 kuryādvā mārgaśīrṣake iti ṅa.. , ña.. ca :p 204 śuklapakṣe tṛtīyāyām lalitāyai namo yajet
हिन्दी अर्थ
क्लीं ' से प्रारम्भ होनेवाले चतुर्थ्यन्त एवं अन्तमें “नमः संयुक्त मन्त्र सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करनेवाले हैं। नूसिंह भगवानके द्वादशाक्षर एवं अष्टाक्षर मन्त्रका जप पापसमूहोंका विनाश करता है। अग्निपुराणका पठन एवं श्रवण करनेसे भी मनुष्य समस्त पापसमूहोंसे छूट जाता है। इस पुराणमें अग्निदेवका माहात्म्य भी वर्णित है। परमात्मा श्रीविष्णु ही मुखस्वरूप अग्निदेव