Agni Purana· Agni Purāṇa
183
अध्याय 183 / 381

Adhyaya 183

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पूर्ण अध्याय पाठ18 श्लोक

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अध्याय १८३

श्लोक 1

अष्टमीव्रतानि अग्निर् उवाच वक्ष्ये व्रतानि चाष्टम्यां रोहिण्यां प्रथमं व्रतं ।मासि भाद्रपदे ऽष्टभ्यां रोहिण्यामर्धरात्रके

aṣṭamīvratāni agnir uvāca vakṣye vratāni cāṣṭamyāṃ rohiṇyāṃ prathamaṃ vrataṃ / māsi bhādrapade 'ṣṭabhyāṃ rohiṇyāmardharātrake

हिन्दी अर्थ

है। लगातार बारह दिनोंके उपवाससे सम्पन्न होनेवाले व्रतको 'पराक' कहते हैं। यह सब पापोंका नाश करनेवाला है। इससे तिगुने अर्थात् छत्तीस दिनोंतक उपवास करनेपर यही व्रत

English

Fasting on the eighth lunar day in the dark fortnight in (the month of) bhddrapada (September-October) marked by (the asterism) one should worship lord Kfs, the besto- wer of enjoyment and emancipation.

अध्याय १८३

श्लोक 2

कृष्णो जातो यतस्तस्यां जयन्ती स्यात्ततो ऽष्टमी ।सप्तजन्मकृतात् पापात् मुच्यते चोपवासतः

kṛṣṇo jāto yatastasyāṃ jayantī syāttato 'ṣṭamī / saptajanmakṛtāt pāpāt mucyate copavāsataḥ

हिन्दी अर्थ

“महापराक' कहलाता है। पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास भोजन करके प्रतिदिन एक-एक ग्रास घराता रहे; अमावास्याको उपवास करे तथा प्रतिपदाको एक ग्रास भोजन आरम्भ करके नित्य एक-एक ग्रास बढ़ाता रहे, इसे 'चान्द्रायण' कहते हैं। इसके विपरीतक्रमसे भी यह व्रत किया जाता है। (जैसे शुक्ल प्रतिपदाको एक ग्रास भोजन करे; फिर एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए पूर्णिमाको पंद्रह

English

Since Krishna was born on it, the eighth is Jayanti; one is freed from sin done in seven births by fasting.

अध्याय १८३

श्लोक 3

कृष्णपक्षे भाद्रपदे अष्टम्यां रोहिणीयुते ।उपाषितोर्चयेत् कृष्णं(१) भुक्तिमुक्तिप्रदायकं

kṛṣṇapakṣe bhādrapade aṣṭamyāṃ rohiṇīyute / upāṣitorcayet kṛṣṇaṃ(1) bhuktimuktipradāyakaṃ

हिन्दी अर्थ

ग्रास भोजन करे। तत्पश्चात् कुष्ण प्रतिपदासे एक-एक ग्रास घटाकर अमावास्याको उपवास करे)

English

On the eighth in the dark half of Bhadrapada joined with Rohini, having fasted one should worship Krishna, giver of enjoyment and liberation:

अध्याय १८३

श्लोक 4

आवाहयाम्यहं कृष्णं बलभद्रञ्च देवकीं ।वसुदेवं यशोदाङ्गाः(२) पूजयामि नमो ऽस्तु ते

āvāhayāmyahaṃ kṛṣṇaṃ balabhadrañca devakīṃ / vasudevaṃ yaśodāṅgāḥ(2) pūjayāmi namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

कपिला गायका मूत्र एक पल, गोबर अँगूठेके आधे हिस्सेके बराबर, दूध सात पल, दही दो पल, घी एक पल तथा कुशका जल एक पल एकमें मिला दे। इनका मिश्रण करते समय गायत्री-मन्त्रसे गोमूत्र डाले । ' गन्धद्वारां दुराधर्षा० ' (श्रीसूक्त) इस मन्त्रसे गोबर मिलाये। ' आप्यायस्व० ' (यजु० १२। ११२) इस मन्त्रसे दूध डाल दे।

English

"I invoke Krishna, Balabhadra, Devaki, Vasudeva, Yashoda and Gopa; I worship; homage to you.

अध्याय १८३

श्लोक 5

योगाय योगपतये योगेशाय नमो नमः ।योगादिसम्भावयैव गोविन्दाय नमो नमः

yogāya yogapataye yogeśāya namo namaḥ / yogādisambhāvayaiva govindāya namo namaḥ

हिन्दी अर्थ

"दधि क्राव्णो०' (यजु० २३।३२) इस मन्त्रसे

English

Homage, homage to Yoga, lord of yoga, Yogesha; homage, homage to Govinda, the source of yoga and the rest."

अध्याय १८३

श्लोक 6

स्नानं कृष्णाय दद्यात्तु अर्घ्यं चानेन दापयेत् ।यज्ञाय यज्ञेश्वराय यज्ञानां पतये नमः

snānaṃ kṛṣṇāya dadyāttu arghyaṃ cānena dāpayet / yajñāya yajñeśvarāya yajñānāṃ pataye namaḥ

हिन्दी अर्थ

(यजु० २२।१) इस मन्त्रसे घी डाले तथा “देवस्य०' (यजु० २०।३) इस मन्त्रसे कुशोदक मिलाये। इस प्रकार जो वस्तु तैयार होती है, उसका नाम 'ब्रह्मकूर्च' है। ब्रह्मकूर्च तैयार होनेपर दिनभर भूखा रहकर सायंकालमें अधमर्षण-

English

One should give a bath to Krishna and have arghya given with this: "Homage to Yajna, lord of sacrifice, master of sacrifices;

अध्याय १८३

श्लोक 7

यज्ञादिसंभवायैव गोविन्दाय नमो नमः ।गृहाण देव पुष्पाणि सुगन्धीनि प्रियाणि ते

yajñādisaṃbhavāyaiva govindāya namo namaḥ / gṛhāṇa deva puṣpāṇi sugandhīni priyāṇi te

हिन्दी अर्थ

(यजु० ११।५०) इत्यादि ऋचाओंका जप करके उसे पी डाले। ऐसा करनेवाला सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। दिनभर उपवास करके केवल सायंकालमें भोजन करनेवाला, दिनके आठ

English

homage, homage to Govinda, the source of sacrifice and the rest. Accept, god, these fragrant flowers dear to you;

अध्याय १८३

श्लोक 8

सर्वकामप्रदो देव भव मे देववन्दित ।धूपधूपित धूपं त्वं धूपितैस्त्वं गृहाण मे

sarvakāmaprado deva bhava me devavandita / dhūpadhūpita dhūpaṃ tvaṃ dhūpitaistvaṃ gṛhāṇa me

हिन्दी अर्थ

भागोंमेंसे केवल छठे भागमें आहार ग्रहण करनेवाला संन्यासी, मांसत्यागी, अश्वमेधयज्ञ करनेवाला तथा सत्यवादी पुरुष स्वर्गको जाते हैं। अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, देवव्रत, वृषोत्सर्ग, चूडाकरण, मेखलाबन्ध (यज्ञोपवीत), विवाह आदि माङ्गलिक कार्य तथा अभिषेक --ये सब कार्य मलमासमें नहीं करने चाहिए॥ २४--३० ॥

English

be giver of all desires to me, god praised by gods. You who are perfumed by incense, accept this incense by the perfumed;

अध्याय १८३

श्लोक 9

सुगन्ध धूपगन्धाढ्यं कुरु मां सर्वदा हरे ।१ विष्णुमिति ट॥ २ यशोदाञ्चेति ङ॥ , ज॥ च :प् २०९ दीपदीप्त महादीपं दीपदीप्तद सर्वदा(१)

sugandha dhūpagandhāḍhyaṃ kuru māṃ sarvadā hare / 1 viṣṇumiti ṭa.. 2 yaśodāñceti ṅa.. , ja.. ca :p 209 dīpadīpta mahādīpaṃ dīpadīptada sarvadā(1)

हिन्दी अर्थ

अमावास्यासे अमावास्यातकका समय “चान्द्रमास' कहलाता है। तीस दिनोंका “सावन मास' माना गया है । संक्रान्तिसे संक्रान्तिकालतक 'सौरमास' कहलाता है तथा क्रमशः सम्पूर्ण

English

make me fragrant with incense-scent, Hari; shining lamp, great lamp, giver of light, always,

अध्याय १८३

श्लोक 10

मया दत्तं गृहाण त्वं कुरु चोर्ध्वगतिं च मां ।विश्वाय विश्वपतये विश्वेशाय नमो नमः(२)

mayā dattaṃ gṛhāṇa tvaṃ kuru cordhvagatiṃ ca māṃ / viśvāya viśvapataye viśveśāya namo namaḥ(2)

हिन्दी अर्थ

नक्षत्रोंके परिवर्तनसे ' नाक्षत्रमास ' होता है । विवाह आदिमें 'सौरमास', यज्ञ आदिमें 'सावन मास' और वार्षिक श्राद्ध तथा पितृकार्यमें ' चान्द्रमास ' उत्तम माना गया है। आषाढ़की पूर्णिमाके बाद जो पाँचवाँ पक्ष आता है, उसमें पितरोंका श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। उस समय सूर्य कन्याराशिपर गये हैं या नहीं, इसका विचार श्राद्धके लिये अनावश्यक है

English

accept what is given by me and make me move upward. Homage, homage to the universe, lord of the universe, Vishvesha;

अध्याय १८३

श्लोक 11

विश्वादिसम्भवायैव गोविन्दाय निवेदितं ।धर्माय धर्मपतये दर्मेशाय नमो नमः

viśvādisambhavāyaiva govindāya niveditaṃ / dharmāya dharmapataye darmeśāya namo namaḥ

हिन्दी अर्थ

मासिक तथा वार्षिक व्रतमें जब कोई तिथि

English

to Govinda, the source of the universe and the rest, it is offered. Homage, homage to Dharma, lord of dharma, Dharmesha;

अध्याय १८३

श्लोक 12

धर्मादिसम्भवायैव गोविन्दशयनं कुरु ।सर्वाय सर्वपतये सर्वेशाय नमओ नमः

dharmādisambhavāyaiva govindaśayanaṃ kuru / sarvāya sarvapataye sarveśāya namao namaḥ

हिन्दी अर्थ

दो दिनकी हो जाय तो उसमें दूसरे दिनवाली तिथि उत्तम जाननी चाहिए और पहलीको मलिन। 'नक्षत्रत्रत'में उसी नक्षत्रको उपवास करना चाहिए, जिसमें सूर्य अस्त होते हों। 'दिवसब्रत'में दिनव्यापिनी तथा 'नक्तब्रत'में

English

to Govinda the source of dharma, make rest. Homage, homage to Sarva, lord of all, Sarvesha;

अध्याय १८३

श्लोक 13

सर्वादिसम्भवायैव गोविन्दाय च पावनं(३) ।क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव

sarvādisambhavāyaiva govindāya ca pāvanaṃ(3) / kṣīrodārṇavasambhūta atrinetrasamudbhava

हिन्दी अर्थ

हैं । द्वितीयाके साथ तृतीयाका, चतुर्थी-पञ्चमीका, षष्ठीके साथ सप्तमीका, अष्टमी-नवमीका, एकादशीके साथ द्वादशीका, चतुर्दशीके साथ पूर्णिमाका तथा अमावास्याके साथ प्रतिपदाका

English

to Govinda, the source of all and the rest, purification. Born of the milk-ocean, born of Atri's eye,

अध्याय १८३

श्लोक 14

गृहाणार्घ्यं शशाङ्केदं रोहिण्या सहितो मम ।स्थण्डिले स्थापयेद्देवं सचन्द्रां रोहिणीं यजेत्

gṛhāṇārghyaṃ śaśāṅkedaṃ rohiṇyā sahito mama / sthaṇḍile sthāpayeddevaṃ sacandrāṃ rohiṇīṃ yajet

हिन्दी अर्थ

वेध उत्तम है। इसी प्रकार षष्ठी-सप्तमी आदिमें भी समझना चाहिए। इन तिथियोंका मेल महान् फल देनेवाला है। इसके विपरीत, अर्थात् प्रतिपदासे द्वितीयाका, तृतीयासे चतुर्थी आदिका जो युग्मभाव है, वह बड़ा भयानक होता है, वह पहलेके किये हुए समस्त पुण्यको नष्ट कर देता है ॥ ३४--३७॥

English

accept, Shashanka, this arghya, with Rohini, for me." One should install the god on a platform and worship the moon with Rohini:

अध्याय १८३

श्लोक 15

देवकीं वसुदेवं च यशोदां नन्दकं बलं ।अर्धरात्रे परोधाराः पातयेद् गुडसर्पिषा

devakīṃ vasudevaṃ ca yaśodāṃ nandakaṃ balaṃ / ardharātre parodhārāḥ pātayed guḍasarpiṣā

हिन्दी अर्थ

राजा, मन्त्री तथा व्रतधारी पुरुषोंके लिये विवाहमें, उपद्रव आदिमें, दुर्गम स्थानोंमें, संकटके समय तथा युद्धके अवसरपर तत्काल शुद्धि बतायी गयी है। जिसने दीर्घकालमें समाप्त

English

Devaki, Vasudeva, Yashoda, Nanda and Bala. At midnight one should pour streams with jaggery and ghee;

अध्याय १८३

श्लोक 16

वस्त्रहेमादिकं दद्याद्ब्राह्मणान् भोजयेद्व्रती ।जन्माष्टमीव्रतकरः पुत्रवान्विष्णुलोकभाक्(४)

vastrahemādikaṃ dadyādbrāhmaṇān bhojayedvratī / janmāṣṭamīvratakaraḥ putravānviṣṇulokabhāk(4)

हिन्दी अर्थ

होनेवाले व्रतको आरम्भ किया है, वह स्त्री यदि बीचमें रजस्वला हो जाय तो वह रज उसके व्रतमें बाधक नहीं होता। गर्भवती स्त्री, प्रसव- गृहमें पड़ी हुई स्त्री अथवा रजस्वला कन्या जब अशुद्ध होकर व्रत करनेयोग्य न रह जाय तो सदा दूसरेसे उस शुभ कार्यका सम्पादन कराये। यदि क्रोधसे, प्रमादसे अथवा लोभसे व्रत-भङ्ग हो जाय तो तीन दिनोंतक भोजन न करे अथवा मूँड़

English

the vower should give garments, gold and the like, and feed Brahmins. The doer of the Janmashtami vow has sons and shares Vishnu's world.

अध्याय १८३

श्लोक 17

वर्षे वर्षे तु यः कुर्यात् पुत्रार्थी वेत्ति नो भयं(५) ।पुत्रान् देहि धनं देहि आयुरारोग्यसन्ततिं

varṣe varṣe tu yaḥ kuryāt putrārthī vetti no bhayaṃ(5) / putrān dehi dhanaṃ dehi āyurārogyasantatiṃ

हिन्दी अर्थ

मुँडा ले। यदि व्रत करनेमें असमर्थता हो तो पत्नी या पुत्रसे उस व्रतको करावे। आरम्भ किये हुए व्रतका पालन जननाशौच तथा मरणाशौचमें भी करना चाहिए। केवल पूजनका कार्य बंद कर

English

One who does it year after year seeking sons knows no fear: "Give sons, give wealth, life, health, offspring,

अध्याय १८३

श्लोक 18

धर्मं कामं च सौभाग्यं स्वर्गं मोक्षं च देहि मे

dharmaṃ kāmaṃ ca saubhāgyaṃ svargaṃ mokṣaṃ ca dehi me /

हिन्दी अर्थ

देना चाहिए। यदि ब्रती पुरुष उपवासके कारण मूच्छित हो जाय तो गुरु दूध पिलाकर या और किसी उत्तम उपायसे उसे होशमें लाये। जल, फल, मूल, दूध, हविष्य (घी), ब्राह्मणकी इच्छापूर्ति, गुरुका वचन तथा औषध--ये आठ ब्रतके नाशक नहीं हैं॥ ३८--४३ ॥

English

dharma, desire, good fortune, heaven and liberation give me."

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 183
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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