अध्याय २७
श्लोक 1
दीक्षाविधिकथनं नारद उवाच वक्ष्ये दीक्षां सर्वदाञ्च मण्डलेब्जे हरिं यजेत् ।दशम्यामुपसंहृत्य यागद्रव्यं समस्तकं
dīkṣāvidhikathanaṃ nārada uvāca vakṣye dīkṣāṃ sarvadāñca maṇḍalebje hariṃ yajet / daśamyāmupasaṃhṛtya yāgadravyaṃ samastakaṃ
हिन्दी अर्थ
पंद्रह अङ्गुल बडा हो। योनिका मूलभाग तीन एक सिरा रखकर दूसरा छोर पूर्व दिशावाले अङ्गल और उससे आगेका भाग छः अङ्गुल चिह्पर रखे और उसे दक्षिणकी ओरसे घुमाते विस्तृत हो। यह एक हाथ लंबे-चौड़े कुण्डका हुए पश्चिम दिशाके चिहृतक ले जाय। इससे लक्षण कहा गया है। दो हाथ या तीन हाथके अर्धचन्द्राकार चिह्न बन जायगा। फिर उस क्षेत्रको
English
The female energy, contained in every being, in the form of grace is assigned there. Having collected all the herbs and spread, they arc consecrated.