Agni Purana· Agni Purāṇa
296
अध्याय 296 / 381

Adhyaya 297

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अध्याय २९६

श्लोक 1

गोनसादिचिकित्सा अग्निरुचाच गोनसादिचिकित्साञ्च वशिष्ठ शृणु वच्मि ते ।ह्रीं ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा ताम्बूलखादनान्मन्त्री हरेन्मण्डलिनो विषं

gonasādicikitsā agnirucāca gonasādicikitsāñca vaśiṣṭha śṛṇu vacmi te / hrīṃ hrīṃ amalapakṣi svāhā tāmbūlakhādanānmantrī harenmaṇḍalino viṣaṃ

हिन्दी अर्थ

मुद्ठीमें सारी सिद्धियाँ आ जाती हैं। सारी त्रिलोकी उसके चरणोंमें झुक जाती है। वह नौ खण्डोंमें विभक्त जम्बूद्वीपकी सम्पूर्ण भूमिपर अधिकार प्राप्त कर लेता है। कपाल (खप्पर)-पर अथवा

English

After having assigned the five constituents and contemplating Him, the Rudra hymns are repeated in order. The hymn (beginning with) yajjSgrata is known to be repeated mentally. The sage (of that hymn) is HvasaAkalpa (resolve) and the metre is said to be triffubh (consisting of 11 syllables in a quarter).

अध्याय २९६

श्लोक 2

लशुनं रामठफलं कुष्ठाग्निव्योषकं विषे ।स्नुहीक्षीरं गव्यघृतं पक्षं पीत्वाहिजे विषे

laśunaṃ rāmaṭhaphalaṃ kuṣṭhāgnivyoṣakaṃ viṣe / snuhīkṣīraṃ gavyaghṛtaṃ pakṣaṃ pītvāhije viṣe

हिन्दी अर्थ

श्मशानके वस्त्र (शवके ऊपरसे उतारे हुए कपड़े) - पर सब ओर शिवतत्त्व लिखकर मन्त्रवेत्ता पुरुष बाहर निकले और मध्यभागमें कर्णिकाके ऊपर अभीष्ट व्यक्तिविशेषका भोजपत्रपर नाम लिखकर रख दे। फिर खैरकी लकड़ीसे तैयार किये गये अङ्गारोंद्वारा उस भोजपत्रको तपाकर दोनों पैरोंके नीचे दबा दे। यह प्रयोग एक ही सप्ताहमे चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिभुवनको भी

English

RV. 10.901a.

अध्याय २९६

श्लोक 3

अथ राजिलदष्टे च पेया कृष्णा समैन्धवा ।आज्यक्षौद्रशकृत्तोयं पुरीतत्या विषापहं

atha rājiladaṣṭe ca peyā kṛṣṇā samaindhavā / ājyakṣaudraśakṛttoyaṃ purītatyā viṣāpahaṃ

हिन्दी अर्थ

चरणोंमें ला सकता है। वञ्रसम्पुट गर्भसे युक्त द्वादशारचक्रके मध्यमे द्वेष्य व्यक्तिका नाम लिखकर रखे। उस नामको 'सदाशिव' मन्त्रसे विदर्भित (कुशांद्वारा मार्जित) कर दे। उक्त द्वादशारचक्र तथा

English

TA. 3.13.1a. C/. adbhyafy sambhrtab.

अध्याय २९६

श्लोक 4

सकृष्णाखण्डदुग्धाज्यं पातव्यन्तेन माक्षिकं ।व्योषं पिच्छं विडालास्थि नकुलाङ्गरुहैः समैः

sakṛṣṇākhaṇḍadugdhājyaṃ pātavyantena mākṣikaṃ / vyoṣaṃ picchaṃ viḍālāsthi nakulāṅgaruhaiḥ samaiḥ

हिन्दी अर्थ

नाम आदिका उल्लेख हल्दीसे दीवारपर, काष्ठफलकपर अथवा शिलापट्टपर करना चाहिए। ऐसा करनेसे शत्रुके मुख, गमनशक्ति तथा सेनाका भी स्तम्भन (अवरोध) हो जाता है श्मशानके वस्त्रपर विषमिश्रित रक्तसे षट्कोणचक्रका उल्लेख कर उसके मध्यमें शत्रुका नाम लिखे। फिर उस चक्रको चारों ओर शक्तिबीजसे योजित करके उसपर डंडा रख दे। फिर साधक

English

Gould not be traced.

अध्याय २९६

श्लोक 5

चूर्णितैर् मेषदुग्धाक्तैर् धूपः सर्वविषापहः ।रोमनिर्गुण्डिकाकोकवर्णैर् वा लशुनं समं

cūrṇitair meṣadugdhāktair dhūpaḥ sarvaviṣāpahaḥ / romanirguṇḍikākokavarṇair vā laśunaṃ samaṃ

हिन्दी अर्थ

श्मशानभूमिपर रखे हुए उस शत्रुपर शीघ्र दण्डसे प्रहार करे। यह प्रयोग उस शत्रु-राजाके राष्ट्रको खण्डित कर देता है। इसी तरह चक्राकार मण्डल बनाकर उसके मध्यभागमें शत्रुके नामको

English

Same as Rudradhyaya.

अध्याय २९६

श्लोक 6

मुनिपत्रैः कृतस्वेदं दष्टं काञ्चिकपाचितैः ।मूषिकाः षोडश प्रोक्ता रसङ्कार्पासजम्पिवेत्

munipatraiḥ kṛtasvedaṃ daṣṭaṃ kāñcikapācitaiḥ / mūṣikāḥ ṣoḍaśa proktā rasaṅkārpāsajampivet

हिन्दी अर्थ

स्थापित कर दे। चक्रकी धारामें शक्तिबीजका न्यास करे। शत्रुका नाम लेकर उसपर भावनाद्वारा उक्त चक्रधारसे प्रहार करे। इससे शत्रुका हरण होता है। इसी प्रकार खङ्गके मध्यभागमें गरुडबीजके साथ शत्रुका नाम लिखकर उसका पूर्ववत् विदर्भीकरण करे। उक्त नाम शमशानभूमिकी चिताके कोयलेसे लिखना चाहिए। उसपर चिताके

English

RV. 10.90.1a.

अध्याय २९६

श्लोक 7

सतैलं मूषिकार्तिघ्नं फलिनीकुसुमन्तथा ।सनागरगुडम्भक्ष्यं तद्विषारोचकापहं

satailaṃ mūṣikārtighnaṃ phalinīkusumantathā / sanāgaraguḍambhakṣyaṃ tadviṣārocakāpahaṃ

हिन्दी अर्थ

भस्मसे प्रहार करे। ऐसा करनेसे साधक एक ही सप्ताहमें शत्रुके देशको अपने अधिकारमें कर लेता है। वह छेदन, भेदन और मारणमें शिवके समान शक्तिशाली हो जाता है। तारक (फट्)-

English

See 1 above.

अध्याय २९६

श्लोक 8

चिकित्सा विंषतिर्भूता लूताविषहरो गणः ।पद्मकं पाटली कुष्ठं नतमूशीरचन्दनं

cikitsā viṃṣatirbhūtā lūtāviṣaharo gaṇaḥ / padmakaṃ pāṭalī kuṣṭhaṃ natamūśīracandanaṃ

हिन्दी अर्थ

को नेत्र कहा गया है। उसका शान्ति-पुष्टिकर्ममें नियोग करे। यह दहनादि प्रयोग शाकिनीको भी आकर्षित कर लेता है। पूर्वोक्त नौ चक्रोंमें मध्यगत अक्षरोंको वक्रतुण्ड-मन्त्रके साथ जपनेसे कुष्ठ आदि जितने भी चर्मगत रोग हैं, उन सबका नाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। (यह अध- ऊर्ध्व-विभागयोग है।) मध्यकोष्ठसे उत्तरवर्ती

English

Could not be traced.

अध्याय २९६

श्लोक 9

निर्गुण्डी शारिवा शेलु लूतार्तं सेचयेज्जलैः ।गुञ्जानिर्गुण्डिकङ्कोलपर्णं शुण्ठी निशाद्वयं

nirguṇḍī śārivā śelu lūtārtaṃ secayejjalaiḥ / guñjānirguṇḍikaṅkolaparṇaṃ śuṇṭhī niśādvayaṃ

हिन्दी अर्थ

कोष्ठतकके दो अक्षरवाले मन्त्रको करालीबन्ध' के साथ जप करे तो वह द्वब्क्षरी-विद्या, यदि साक्षात् शिव प्रतिवादी हों तो उनसे भी अपनी रक्षा करवाती है। इसी प्रकार पश्चिमगत मन्त्राक्षरको

English

VS. 16.6a; TS.4.5. 1. 2a.

अध्याय २९६

श्लोक 10

करञ्जास्थि च तत्पङ्कैः(१) वृश्चिकार्तिहरं शृणु ।मञ्जिष्ठा चन्दनं व्योषपुष्पं शिरीषकौमुदं

karañjāsthi ca tatpaṅkaiḥ(1) vṛścikārtiharaṃ śṛṇu / mañjiṣṭhā candanaṃ vyoṣapuṣpaṃ śirīṣakaumudaṃ

हिन्दी अर्थ

आदिमें रखकर उत्तर कोष्ठतकके मन्त्राक्षरोंको 'वक्रतुण्ड-मन्त्र'के साथ जप किया जाय तो ज्वर तथा खाँसीका नाश होता है। उत्तरकोष्ठसे लेकर मध्यकोष्ठतकके मन्त्राक्षरोंका एक-एक साथ जप किया जाय तो साधकको इच्छासे वटके बीजमें गुरुता (भारीपन) आ सकती है। इसी तरह पूर्वादि-मध्यमान्त अक्षरोंके जपसे वह तत्काल उसमें लघुता (हल्कापन) ला सकता है।

English

The hymns beginning with namasU rudra maiaiavf. VS. 16.1a; TS. 4.5.1.1a.

अध्याय २९६

श्लोक 11

संयोज्याश् चतुरो योगा लेपादौ वृश्चिकापहाः ।ॐ नमो भगवते रुद्राय चिवि २(२) छिन्द २ किरि २ भिन्द २ खड्गे न छेदय २ शूलेन भेदय २ चक्रेण दारय २ ॐ ह्रूं फट् मन्त्रेण मन्त्रितो देयो गर्धभादीन्निकृन्तति

saṃyojyāś caturo yogā lepādau vṛścikāpahāḥ / oṃ namo bhagavate rudrāya civi 2(2) chinda 2 kiri 2 bhinda 2 khaḍge na chedaya 2 śūlena bhedaya 2 cakreṇa dāraya 2 oṃ hrūṃ phaṭ mantreṇa mantrito deyo gardhabhādīnnikṛntati

हिन्दी अर्थ

भोजपत्रपर गोरोचनाद्वारा वज्रसे व्याप्त भूपुरचक्र लिखकर, अनुलोमक्रमसे स्थित मन्त्र-बीजोंको लिखकर, उसे मन्त्रवत् धारण करके साधक अपने शरीरकी रक्षा करे। भावपूर्वक सुवर्णमें

English

For the two (hymns beginning with) manoy Uma is the single deity and Rudra for rudr&ica. Ekarudra is the deity for the first anuvaka (name of a section of the •collection of hymns ).

अध्याय २९६

श्लोक 12

त्रिफलोशीरमुस्ताम्बुमांसीपद्मकचन्दनं ।अजाक्षीरेण पानादेर्गर्धभादेर्विषं हरेत्

triphalośīramustāmbumāṃsīpadmakacandanaṃ / ajākṣīreṇa pānādergardhabhāderviṣaṃ haret

हिन्दी अर्थ

मढ़ाकर धारण किया गया यह 'रक्षायन्त्र' मृत्युका भी नाश करनेवाला होता है। वह विघ्न, पाप तथा शत्रुओंका दमन करनेवाला है तथा सौभाग्य और दीर्घायु देनेवाला है। यह 'रक्षायन्त्र' धारण किया जाय तो वह जूआ तथा युद्धमें भी विजयदायक होता है। इन्द्रको सेनाके साथ संग्राम हो तो उसमें भी वह विजय दिलाता

English

Could not be traced.

अध्याय २९६

श्लोक 13

हरेत् शिरीषपञ्चाङ्गं व्योषं शतपदीविषं ।सकन्धरं शिरीषास्थि हरेदुन्दूरजं विषं

haret śirīṣapañcāṅgaṃ vyoṣaṃ śatapadīviṣaṃ / sakandharaṃ śirīṣāsthi haredundūrajaṃ viṣaṃ

हिन्दी अर्थ

है, इसमें संशय नहीं है। यह ' रक्षायन्त्र' वन्ध्याको है तथा राज्य और पृथ्वीको जीत लेता है। भी पुत्र देनेवाला तथा दूसरी चिन्तामणिके “फट् स्त्रीं क्षें हूँ इन चार अक्षरोंका एक समान मनोवाञ्छाकी पूर्ति करनेवाला है। इससे लाख जप करनेसे यक्ष आदि भी वशीभूत हो रक्षित हुआ मनुष्य परराष्ट्रोपप भी अधिकार पाता जाते हैं

English

Cf. RV. 10.57 3a.

अध्याय २९६

श्लोक 14

व्योषं ससर्पिः पिण्डीतमूलमस्य विषं हरेत् ।१ तत्पक्षैर् इति ज॥ , ञ॥ , ट॥ च २ चिरि २ इति ज॥ :प् १०२ क्षारव्योषवचाडिङ्गुविडङ्गं सैन्धवन्नतं

vyoṣaṃ sasarpiḥ piṇḍītamūlamasya viṣaṃ haret / 1 tatpakṣair iti ja.. , ña.. , ṭa.. ca 2 ciri 2 iti ja.. :p 102 kṣāravyoṣavacāḍiṅguviḍaṅgaṃ saindhavannataṃ

हिन्दी अर्थ

“इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें "त्वारिता-विद्यासे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन नामक तीन सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ नाना मन्त्रोंका वर्णन

English

Gould not be traced.

अध्याय २९६

श्लोक 15

अम्बष्ठातिबलाकुष्ठं सर्वकीटविषं हरेत् ।यष्टिव्योषगुडक्षीरयोगः(१) शूनो विषापहः

ambaṣṭhātibalākuṣṭhaṃ sarvakīṭaviṣaṃ haret / yaṣṭivyoṣaguḍakṣīrayogaḥ(1) śūno viṣāpahaḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- अब मैं सच्विदानन्दस्वरूप भगवान् विनायक (गणेश)-के पूजनको विधि बताऊँगा। योगपीठपर प्रथम तो आधारशक्तिको पूजा करे। फिर अग्नि आदि कोणों तथा पूर्वादि

English

om namo bhagavate vdsudevdjya.

अध्याय २९६

श्लोक 16

ॐ सुभद्रायै नमः ॐ सुप्रभायै नमः ।यान्यौषधानि गृह्यन्ते विधानेन विना जनैः

oṃ subhadrāyai namaḥ oṃ suprabhāyai namaḥ / yānyauṣadhāni gṛhyante vidhānena vinā janaiḥ

हिन्दी अर्थ

दिशाओंमें क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य-इन आठकी अर्चना करे। तदनन्तर कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका, केसर और सत्त्वादि तीन गुणोंकी और पद्मासनकी पूजा करे। इसके बाद तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, सुयशा (भोगदा), कामरूपिणी, उग्रा,

English

om namo ndrdyoffdya.

अध्याय २९६

श्लोक 17

तेषां वीजन्त्व्या ग्राह्यमिति ब्रह्माब्रवीच्च ताम् ।ताम्प्रणम्यौषधीम्पश्चात् यवान् प्रक्षिप्य मुष्टिना

teṣāṃ vījantvyā grāhyamiti brahmābravīcca tām / tāmpraṇamyauṣadhīmpaścāt yavān prakṣipya muṣṭinā

हिन्दी अर्थ

शक्तियोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् गणेशजीकी मूर्तिका अथवा मूर्तिके अभावमें ध्यानोक्त गणपतिमूर्तिका पूजन करे। इसके बाद हृदयादि अङ्गोंको पूजा करनी चाहिए। पूजनके प्रयोगवाक्य

English

Its seed is to be taken by you, Brahma said to her. Having bowed to that herb, then throwing barley with the fist,

अध्याय २९६

श्लोक 18

दश जप्त्वा मन्त्रमिदं नमस्कुर्यात्तदौषधं ।त्वामुद्धराम्यूर्ध्वनेत्रामनेनैव च भक्षयेत्

daśa japtvā mantramidaṃ namaskuryāttadauṣadhaṃ / tvāmuddharāmyūrdhvanetrāmanenaiva ca bhakṣayet

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार हैं-'गणंजयाय हृदयाय नमः। एकदन्ताय उत्कटाय शिरसे स्वाहा। अचलकर्णिने इन पाँच अङ्गोॉमेंसे चारको तो पूर्वादि चार दिशाओंमें और पाँचवेंकी मध्यभागमें पूजा करे

English

having repeated this mantra ten times one should salute the herb: "I raise you, upward-eyed" — and one should eat it with this.

अध्याय २९६

श्लोक 19

नमः पुरुषसिंहाय नमो गोपालकाय च ।आत्मनैवाभिजानाति रणे कृष्णपराजयं

namaḥ puruṣasiṃhāya namo gopālakāya ca / ātmanaivābhijānāti raṇe kṛṣṇaparājayaṃ

हिन्दी अर्थ

और विकटानन-इन सबकी पद्मदलोंमें पूजा करे। फिर मध्यभागमें --' हूं विघ्ननाशनाय नमः। महेन्द्राय- धूम्रवर्णाय नमः।'-यों बोलकर विध्ननाशन एवं धूम्रवर्णकी पूजा करे। फिर

English

"Homage to Purushasimha; homage to Gopalaka. By the self alone one knows Krishna's defeat in battle;

अध्याय २९६

श्लोक 20

एतेन सत्यवाक्येन अगदो मे ऽस्तु सिध्यतु ।नमो वैदूर्यमाते तन्न २ रक्ष मां सर्वविषेभ्यो गौरि गान्धारि चाण्डालि मातङ्गिनि स्वाहा हरिमाये औषधादौ प्रयोक्तव्यो मन्त्रो ऽयं स्थावरे विषे

etena satyavākyena agado me 'stu sidhyatu / namo vaidūryamāte tanna 2 rakṣa māṃ sarvaviṣebhyo gauri gāndhāri cāṇḍāli mātaṅgini svāhā harimāye auṣadhādau prayoktavyo mantro 'yaṃ sthāvare viṣe

हिन्दी अर्थ

बाह्यभागमें विघ्नेशका पूजन करे अब मैं 'त्रिपुराभैरवी के पूजनकी विधि बताउँगा । इसमें आठ भैरवोंका पूजन करना चाहिए। उनके नाम इस प्रकार हैं-असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव,

English

by this true word may my antidote succeed. Homage to the Vaidurya-mother, tan tan, protect me from all poisons, Gauri, Gandhari, Chandali, Matangini, svaha, Harimaye." This mantra is to be applied at the beginning of medicines in stationary poison.

अध्याय २९६

श्लोक 21

भुक्तमात्रे स्थिते ज्वाले पद्मं शीताम्बुसेवितं ।पाययेत्सघृतं क्षौद्रं विषञ्चेत्तदनन्तरं

bhuktamātre sthite jvāle padmaṃ śītāmbusevitaṃ / pāyayetsaghṛtaṃ kṣaudraṃ viṣañcettadanantaraṃ

हिन्दी अर्थ

भीषणभैरव तथा संहारभैरव । ब्राह्मी आदि मातृकाएँ. भी पूजनीय हैं। (उनके नाम इस प्रकार हैं-

English

For one who has just eaten, standing in flames — lotus served with cold water — one should give with ghee and honey; if it is poison, immediately after.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 296
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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