Agni Purana· Agni Purāṇa
324
अध्याय 324 / 381

Adhyaya 325

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अध्याय ३२४

श्लोक 1

गौर्यादिपूजा ईश्वर उवाच सौभाग्यादेरुमापूजां वक्ष्ये ऽहं भुक्तिमुक्तिदां ।मन्त्रध्यानं मण्डलञ्च मुद्रां होमादिसाधनम्

gauryādipūjā īśvara uvāca saubhāgyāderumāpūjāṃ vakṣye 'haṃ bhuktimuktidāṃ / mantradhyānaṃ maṇḍalañca mudrāṃ homādisādhanam

हिन्दी अर्थ

ध्वनिमें उस प्रसिद्ध स्वरको उत्पन्न करता है, जो प्रातःसवनकर्मके साधनभूत मन्त्रके लिये उपयोगी है तथा जो 'गायत्री' नामक छन्दके आश्रित है। तदनन्तर वह प्राणवायु कण्ठदेशमें भ्रमण करता हुआ "त्रिष्टुप्? छन्दसे युक्त माध्यंदिन-सवन- कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी मध्यम स्वरको उत्पन्न करता है। इसके बाद उक्त प्राणवायु शिरोदेशमें पहुँचकर उच्चध्वनिसे युक्त एवं 'जगती' छन्दके

English

RV. 6.28.5a.

अध्याय ३२४

श्लोक 2

चित्रभानुं शिवं कालं महाशक्तिसमन्वितम् ।इडाद्यं परतोद्वृत्य सदेवः सविकारणम्

citrabhānuṃ śivaṃ kālaṃ mahāśaktisamanvitam / iḍādyaṃ paratodvṛtya sadevaḥ savikāraṇam

हिन्दी अर्थ

आश्रित सायं-सवन-कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी स्वरको प्रकट करता है। इस प्रकार ऊपरकी ओर प्रेरित वह प्राण, मूर्धमें टकराकर अभिघात नामक संयोगका आश्रय बनकर, मुखवर्ती कण्ठादि स्थानोंमें पहुँचकर

English

Gould not be traced.

अध्याय ३२४

श्लोक 3

द्वितीयं द्वारकाक्रान्तं गौरीप्रीतिपदान्वितं ।चतुर्थ्यन्तं प्रकर्तव्यं गौय्या वै मूलवाचकं

dvitīyaṃ dvārakākrāntaṃ gaurīprītipadānvitaṃ / caturthyantaṃ prakartavyaṃ gauyyā vai mūlavācakaṃ

हिन्दी अर्थ

वर्णोंको उत्पन्न करता है। उन वर्णोके पाँच प्रकारसे विभाग माने गये हैं। स्वरसे, कालसे, स्थानसे, आभ्यन्तर प्रयत्नसे तथा वाह्य प्रयत्नसे उन वर्णोमें भेद होता है। वर्णोके उच्चारण-स्थान आठ हैं-हृदय, कण्ठ, मूर्धा, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, ओष्ठ्य तथा तालु। विसर्गका अभाव, विवर्तन, संधिका अभाव, शकारादेश, षकारादेश, सकारादेश, रेफादेश, जिह्वामूलीयत्व और

English

MS. 4.13.7a: 208.10.

अध्याय ३२४

श्लोक 4

ॐ ह्रीं सः शौं गौर्यै नमः तत्रार्णत्रितयेनैव जातियुक्तं षडङ्गुलम् ।आसनं प्रणवेणैव मूर्तिं वै हृदयेन तु

oṃ hrīṃ saḥ śauṃ gauryai namaḥ tatrārṇatritayenaiva jātiyuktaṃ ṣaḍaṅgulam / āsanaṃ praṇaveṇaiva mūrtiṃ vai hṛdayena tu

हिन्दी अर्थ

उपध्मानीयत्व-ये ' ऊष्मा' वर्णोकी आठ प्रकारको गतियाँ हैं '। जिस उत्तरवर्ती पदमें आदि अक्षर 'उकार' हो, वहाँ गुण आदिके द्वारा यदि 'ओ'

English

Tait. Sam. 1.3.6.2a. *

अध्याय ३२४

श्लोक 5

उदकाञ्च तथा कालं शिववीजं समुद्धरेत् ।प्राणं दीर्घस्वराक्रान्तं षडङ्गं जातिसंयुतम्

udakāñca tathā kālaṃ śivavījaṃ samuddharet / prāṇaṃ dīrghasvarākrāntaṃ ṣaḍaṅgaṃ jātisaṃyutam

हिन्दी अर्थ

भावका प्रसंधान (परिज्ञान) हो रहा हो, तो उस ओकार'को स्वरान्त अर्थात् स्वर-स्थानीय जानना चाहिए। जैसे-' गङ्गोदकम्'। इस पदमें जो 'ओ' भावका प्रसंधान है, वह स्वरस्थानीय है। इससे भिन्न संधिस्थलमें जो 'ओभाव'का परिज्ञान होता है, वह 'ओ' भाव ऊष्माका ही गतिविशेष है, यह बात स्पष्टरूपसे जान लेनी चाहिए। जैसे-' शिवो वन्द्यः ' इसमें जो ओकारका श्रवण

English

One pleases (Lord) laAkara (Siva) by repeatii the chdndasi (Sman) hymns well. One will get the grace by repeat¬ ing the skdndi and paitri hymns. '

अध्याय ३२४

श्लोक 6

आसनं प्रणवेनात्र मूर्तिन्यासं हृदाचरेत् ।यामलं कथितं वत्स एकवीरं वदाम्य् अथ

āsanaṃ praṇavenātra mūrtinyāsaṃ hṛdācaret / yāmalaṃ kathitaṃ vatsa ekavīraṃ vadāmy atha

हिन्दी अर्थ

होता है, वह ऊष्मस्थानीय ही है। (यह निर्णय किसी अन्य व्याकरणकी रीतिसे किया गया है, ऐसा जान पड़ता है।) जो वेदाध्ययन कुतीर्थसे प्राप्त हुआ है, अर्थात् आचारहीन गुरुसे ग्रहण

English

(The repetition of the hymn) yata indra bhay&mahe is capable of destroying the harmful effects (of incantations). One who has broken the vow of continence will be released (from the fault) by repeating ( the hymn) agnistigmena-.

अध्याय ३२४

श्लोक 7

व्यापकं सृष्टिसंयुक्तं वह्निमायाकृशानुभिः ।शिवशक्तिमयं वीजं वीजं हृदयादिविवर्जितं

vyāpakaṃ sṛṣṭisaṃyuktaṃ vahnimāyākṛśānubhiḥ / śivaśaktimayaṃ vījaṃ vījaṃ hṛdayādivivarjitaṃ

हिन्दी अर्थ

किया गया है, वह दग्ध-नीरस-सा होता है। उसमें अक्षरोंको खींच-तानकर हठात् किसी अर्थतक पहुँचाया गया है। वह भक्षित-सा हो गया है, अर्थात् सम्प्रदाय-सिद्ध गुरुसे अध्ययन न करनेके कारण वह अभक्ष्य-भक्षणके समान निस्तेज है। इस तरहका उच्चारण या पठन पाप माना गया है। इसके विपरीत जो सम्प्रदायसिद्ध गुरुसे अध्ययन किया जाता है, तदनुसार पठन-

English

(The repetition of the hymn) paritofarh ca ' is known to be capable of destroying all sins. One who has sold (a thing) that should not be sold, should repeat (the hymn) ghrtavati*.

अध्याय ३२४

श्लोक 8

गौरीं यजेद्धेमरूप्यां काष्ठजां शैलजादिकां ।पञ्चपिण्डां तथाव्यक्तां कोणे मध्ये तु पञ्चमं(१)

gaurīṃ yajeddhemarūpyāṃ kāṣṭhajāṃ śailajādikāṃ / pañcapiṇḍāṃ tathāvyaktāṃ koṇe madhye tu pañcamaṃ(1)

हिन्दी अर्थ

पाठन शुभ होता है। जो उत्तम तीर्थ-सदाचारी गुरुसे पढ़ा गया है, सुस्पष्ट उच्चारणसे युक्त है, सम्प्रदायशुद्ध है, सुव्यवस्थित है, उदात्त आदि शुद्ध स्वरसे तथा कण्ठ-ताल्वादि शुद्ध स्थानसे

English

Then it should be tied on the wrist of the child that is born, with (the repetition of the hymn) somarh rdjdnarh. This will make the child free from all diseases.

अध्याय ३२४

श्लोक 9

ललिता सुभगा गौरी क्षोभणी चाग्नितः क्रमात् ।१ पञ्चमी इति ञ॥ :प् १८० वामा ज्येष्ठा क्रिया ज्ञाना वृत्ते पूर्वादितो यजेत्

lalitā subhagā gaurī kṣobhaṇī cāgnitaḥ kramāt / 1 pañcamī iti ña.. :p 180 vāmā jyeṣṭhā kriyā jñānā vṛtte pūrvādito yajet

हिन्दी अर्थ

प्रयुक्त हुआ है, वह वेदाध्ययन शोभित होता है। न तो विकराल आकृतिवाला, न लंबे ओठोंवाला, न अव्यक्त उच्चारण करनेवाला, न नाकसे बोलनेवाला एवं न गद्गद कण्ठ या जिह्वाबन्धसे युक्त मनुष्य ही वर्णोच्चारणमें समर्थ होता है। जैसे व्याघ्री

English

Lalita, Subhaga, Gauri, Kshobhani, and from fire in order Vama, Jyeshtha, Kriya, Jnana — one should worship in the circle from the east.

अध्याय ३२४

श्लोक 10

सपीठे वामभागे तु शिवस्याव्यक्तरूपकम् ।व्यक्ता द्विनेत्रा त्र्यक्षरा शुद्धा वा शङ्करान्विता

sapīṭhe vāmabhāge tu śivasyāvyaktarūpakam / vyaktā dvinetrā tryakṣarā śuddhā vā śaṅkarānvitā

हिन्दी अर्थ

१. जहाँ सकारका 'रुत्व', “यत्व' होकर ' लोप: शाकल्यस्य ।' (पा०सू० ८।३। १९) अथवा ' हलि सर्वेषाम्।' (पा०सू० ८।३।२२) के नियमानुसार वैकल्पिक लोप होता है और उस दशामें संधि नहीं होती, वहाँ उस संधिके अभावको 'विवृत्ति' या 'विवर्तन' कहा गया

English

On the seat, at the left side of Shiva, the unmanifest form; the manifest two-eyed, three-syllabled, pure, or with Shankara.

अध्याय ३२४

श्लोक 11

पीठपद्मद्वयं तारा द्विभुजा वा चतुर्भजा ।सिंहस्था वा वृकस्था(१) वा अष्टाष्टादशसत्करा

pīṭhapadmadvayaṃ tārā dvibhujā vā caturbhajā / siṃhasthā vā vṛkasthā(1) vā aṣṭāṣṭādaśasatkarā

हिन्दी अर्थ

है। जैसा कि 'याज्ञवल्क्य-शिक्षा' में वर्णन है-- २. इन आठोंके उदाहरण क्रमशः इस प्रकार हैं-शिवो वन्द्यः, क ईशः, हरिश्शेते, आविष्कृतम्, कस्कः, अहर्पतिः, क ८ करोति,

English

A pair of seat-lotuses, Tara, two- or four-armed, on a lion or wolf, with eight or eighteen good hands,

अध्याय ३२४

श्लोक 12

स्रगक्षसूत्रकलिका गलकोत्पलपिण्डिका ।शरं धनुर्वा सव्येन पाणिनान्यतमं वहत्

sragakṣasūtrakalikā galakotpalapiṇḍikā / śaraṃ dhanurvā savyena pāṇinānyatamaṃ vahat

हिन्दी अर्थ

अपने बच्चोंको दाढ़ोंसे पकड़कर एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाती है, किंतु उन्हें पीडा नहीं देती, वर्णोका ठीक इसी तरह प्रयोग करे, जिससे

English

with garland, rosary, bud, a throat-lotus ball, bearing in the right hand an arrow or bow, either;

अध्याय ३२४

श्लोक 13

वामेन पुस्तताम्बूलदण्डाभयकमण्डलुम् ।गणेशदर्पणेष्वासान्दद्यादेकैकशः क्रमात्

vāmena pustatāmbūladaṇḍābhayakamaṇḍalum / gaṇeśadarpaṇeṣvāsāndadyādekaikaśaḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

पीड़ित ही हों। वर्णोके सम्यक् प्रयोगसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। “स्वर' तीन प्रकारके माने गये हैं-उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। इनके उच्चारणकालके भी तीन नियम हैं--हस्व, दीर्घ तथा प्लुत। अकार एवं हकार कण्ठस्थानीय हैं। इकार, चवर्ग, यकार एवं शकार-ये तालुस्थानसे उच्चरित होते हैं। उकार और पवर्ग-ये दोनों ओष्ठस्थानसे उच्चरित होनेवाले हैं। ऋकार, टवर्ग,

English

in the left a book, betel, staff, fearlessness, water-pot. One should give Ganesha, mirror and bow one by one in order.

अध्याय ३२४

श्लोक 14

व्यक्ताव्यक्ताथवा कार्या पद्ममुद्रा स्मृतासने ।तिङ्गमुद्रा शिवस्योक्ता मुदा चावाहनी द्वयोः

vyaktāvyaktāthavā kāryā padmamudrā smṛtāsane / tiṅgamudrā śivasyoktā mudā cāvāhanī dvayoḥ

हिन्दी अर्थ

रेफ एवं षकार--ये मूर्धन्य तथा लुकार, तवर्ग, लकार और सकार--ये दन्तस्थानीय होते हैं। कवर्गका स्थान जिह्वामूल है। वकारको विद्वज्जन दन्त और ओष्ठसे उच्चरित होनेवाला बताते हैं।

English

Manifest or unmanifest should be made; the lotus mudra is remembered for the seat; the linga mudra is told for Shiva; the invoking mudra for both;

अध्याय ३२४

श्लोक 15

शक्तिमुद्रा तु योन्याख्या चतुरस्रन्तु मण्डलं ।चतुरस्रं त्रिपत्राब्जं मध्यकोष्ठचतुष्टये

śaktimudrā tu yonyākhyā caturasrantu maṇḍalaṃ / caturasraṃ tripatrābjaṃ madhyakoṣṭhacatuṣṭaye

हिन्दी अर्थ

एकार और ऐकार कण्ठ-तालव्य तथा ओकार एवं औकार कण्ठोष्ठज माने गये हैं। एकार, ऐकार तथा ओकार और औकारमें कण्ठस्थानीय वर्ण अकारकी आधी मात्रा या एक मात्रा होती है। ' अयोगवाह ”' आश्रयस्थानके भागी होते हैं, ऐसा जानना चाहिए। अच् (आ, इ, उ, ऋ लु,

English

the Shakti mudra is called Yoni; the mandala is four-cornered; a four-cornered three-petalled lotus in the four middle compartments;

अध्याय ३२४

श्लोक 16

त्र्यश्रोर्धे चार्धचन्द्रस्तु द्विपदं द्विगुणं क्रमात् ।द्विगुणं द्वारकण्ठन्तु द्विगुणादुपकण्ठतः

tryaśrordhe cārdhacandrastu dvipadaṃ dviguṇaṃ kramāt / dviguṇaṃ dvārakaṇṭhantu dviguṇādupakaṇṭhataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रयत्नवाले हैं। यण् (य, व, र, ल) ' “ईषत्स्पृष्ट' एवं शल् (श, ष, स, ह) ' अर्धस्पृष्ट' अर्थात् “ईषद्विवृत' प्रयत्नवाले हैं। शेष 'हल्' अर्थात् क से लेकर म तकके अक्षर "स्पृष्ट प्रयत्नवाले' माने

English

in the triangle's upper part a half-moon, a two-square, doubling in order; double the door-neck; double from the near-neck;

अध्याय ३२४

श्लोक 17

द्वारत्रयं त्रयं दिक्षु अथ वा भद्रके यजेत् ।स्थण्डिले वाथ संस्याप्य पञ्चगव्यामृतादिना

dvāratrayaṃ trayaṃ dikṣu atha vā bhadrake yajet / sthaṇḍile vātha saṃsyāpya pañcagavyāmṛtādinā

हिन्दी अर्थ

गये हैं। इनमें बाह्य प्रयत्नके कारण वर्णभेद जानना चाहिए ' जम् प्रत्याहारमें स्थित वर्ण (ज, म, ङ ण, न) अनुनासिक होते हैं। हकार और रेफ अनुनासिक नहीं होते। ‘हकार, झकार तथा षकार'के 'संवार', 'घोष' और ' नाद' प्रयत्न हैं। “यण्? और 'जश्'-इनके 'ईषन्नाद' अर्थात् अल्पप्राण' प्रयत्न हैं। ख, फ आदिका 'विवार', ' अघोष' और ' श्वास' प्रयत्न हैं। चर् (च, ट, त,

English

three doors, three in the directions; or one should worship in a Bhadra; or having established on a platform with the five cow-products, nectar and the rest,

अध्याय ३२४

श्लोक 18

रक्तपुष्पाणि देयानि पूजयित्वा ह्य् उदङ्मुखः ।शतं हुत्वामृताज्यञ्च पूर्णादः सर्वसिद्धिभाक्

raktapuṣpāṇi deyāni pūjayitvā hy udaṅmukhaḥ / śataṃ hutvāmṛtājyañca pūrṇādaḥ sarvasiddhibhāk

हिन्दी अर्थ

क, प, श, ष, स)-का 'ईषच्छ्वास' प्रयत्न जानना चाहिए। यह व्याकरणशास्त्र वाणीका धाम कहा जाता है

English

red flowers should be given; having worshipped facing north; having offered a hundred of nectar-ghee and a full oblation, he is a sharer of all success.

अध्याय ३२४

श्लोक 19

बलिन्दत्वा कुमारीश् च तिस्रो वा चाष्ट भोजयेत्(२) ।नैवेद्यं शिवभक्तेषु दद्यान्न स्वयमाचरेत्

balindatvā kumārīś ca tisro vā cāṣṭa bhojayet(2) / naivedyaṃ śivabhakteṣu dadyānna svayamācaret

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिक्षानिरूपण' नामक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ काव्य आदिके लक्षण

English

Having given the offering, one should feed three or eight maidens; the food offering should be given to devotees of Shiva, not eaten oneself.

अध्याय ३२४

श्लोक 20

१ सिंहस्थावाह्यसिंहस्थेति ख॥ , छ॥ , ञ॥ , ट॥ च २ स्त्रियो वाष्ट च भोजयेदिति ख॥ , छ॥ च :प् १८१ कन्यार्थौ लभते कन्यां अपुत्रः पुत्रमाप्नुयात् ।दुर्भगा चैव सौभाग्यं राजा राज्यं जयं रणे

1 siṃhasthāvāhyasiṃhastheti kha.. , cha.. , ña.. , ṭa.. ca 2 striyo vāṣṭa ca bhojayediti kha.. , cha.. ca :p 181 kanyārthau labhate kanyāṃ aputraḥ putramāpnuyāt / durbhagā caiva saubhāgyaṃ rājā rājyaṃ jayaṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं- वसिष्ठ! अब मैं 'काव्य' और नाटक' आदिके स्वरूप तथा ' अलंकारों'का वर्णन करता हूँ। ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य-- यही सम्पूर्ण वाङ्मय माना गया है'। शास्त्र,

English

One seeking a maiden gets a maiden; the sonless gets a son; the unfortunate woman good fortune; a king kingdom and victory in battle;

अध्याय ३२४

श्लोक 21

अष्टलक्षैश् च वाक्सिद्धिर्देवाद्या वशमाप्नुयुः ।न निवेद्य न चास्नीयाद्वामहस्तेन चार्चयेत्

aṣṭalakṣaiś ca vāksiddhirdevādyā vaśamāpnuyuḥ / na nivedya na cāsnīyādvāmahastena cārcayet

हिन्दी अर्थ

इतिहास तथा काव्य-इन तीनोंको समाप्ति इसी वाङ्मयमें होती है। वेदादि शास्त्रोमें शब्दको प्रधानता है और इतिहास-पुराणोंमें अर्थकी। इन दोनोंमें 'अभिधा-शक्ति' (वाच्यार्थ)-को ही मुख्यता होती है; अतः “काव्य' इन दोनोंसे भिन्न है। क्योंकि

English

by eight lakh, speech-success; gods and others come under control. One should not eat without offering, and not worship with the left hand;

अध्याय ३२४

श्लोक 22

अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां तृतीयायां विशेषतः ।मृत्युञ्चयार्चनं वक्ष्ये पूजयेत् कलसोदरे

aṣṭamyāñca caturdaśyāṃ tṛtīyāyāṃ viśeṣataḥ / mṛtyuñcayārcanaṃ vakṣye pūjayet kalasodare

हिन्दी अर्थ

उसमें व्यङ्ग अर्थको प्रधानता दी जाती है?।

English

on the eighth, fourteenth and especially the third. I shall tell the Mrityunjaya worship: one should worship in the belly of a pot.

अध्याय ३२४

श्लोक 23

हूयमानञ्च प्रणवो मूर्तिरोजस ईदृशं ।मूलञ्च वौषडन्तेन कुम्भमुद्रां प्रदर्शयेत्

hūyamānañca praṇavo mūrtirojasa īdṛśaṃ / mūlañca vauṣaḍantena kumbhamudrāṃ pradarśayet

हिन्दी अर्थ

१. अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय और यम --ये “अयोगवाह ' कहलाते हैं । वे जिस स्वरपर आश्रित होते हैं, उसीका स्थान उनका स्थान होता है। जैसे --' राम: "का विसर्ग कण्ठस्थानीय है और “हरि: "का विसर्ग तालुस्थानीय। २. 'सरस्वती-कण्ठाभरण' के रचयिता महाराजाधिराज भोजदेवने अपने ग्रन्थके मङ्गलाचरणमें ' ध्वनिर्वर्णाः पदं वाक्यम् ' (१। १) ३. शब्दप्रधान वेदादिकी आज्ञाको भामह आदि आचार्योने ' प्रभुसम्मित' और अर्थप्रधान इतिहास-पुराणोंकी आज्ञाको ' सुहत्सम्मित' नाम दिया है। इसी तरह शब्द और अर्थको गौण करके जहाँ व्यङ्गयार्थको प्रधानता दी गयी है, उस काव्यके उपदेशको 'कान्तासम्मित'

English

In the one being offered, Pranava, the form is Ojas thus; with the root mantra ending in "vaushat" one should show the pot mudra;

अध्याय ३२४

श्लोक 24

होमयेत् क्षीरदुर्वाज्यममृताञ्च पुनर्नवाम् ।पायसञ्च पुराडाशमयुतन्तु जपेन्मनुं

homayet kṣīradurvājyamamṛtāñca punarnavām / pāyasañca purāḍāśamayutantu japenmanuṃ

हिन्दी अर्थ

७०० » अग्निपुराण

English

one should offer milk, durva, ghee, amrita and punarnava, pudding and pindas; one should recite the mantra ten thousand times:

अध्याय ३२४

श्लोक 25

चतुर्मुखं चतुर्वाहुं द्वाभ्याञ्च कलसन्दधत् ।वरदाभयकं द्वाभ्यां स्नायाद्वैकुम्भमुद्रया

caturmukhaṃ caturvāhuṃ dvābhyāñca kalasandadhat / varadābhayakaṃ dvābhyāṃ snāyādvaikumbhamudrayā

हिन्दी अर्थ

संसारमें मनुष्य-जीवन दुर्लभ है; उसमें भी विद्या इसके दो भेद हैं-'सुबन्त' और 'तिङन्त'। तो और भी दुर्लभ है। विद्या होनेपर भी अभीष्ट अर्थसे व्यवच्छिन्न संक्षित पदावलीका कवित्वका गुण आना कठिन है; उसमें भी नाम “वाक्य है॥ १--६॥ काव्य-रचनाकी पूर्ण शक्तिका होना अत्यन्त जिसमें अलंकार भासित होता हो, गुण कठिन है'। शक्तिके साथ बोध एवं प्रतिभा हो, विद्यमान हो तथा दोषका अभाव हो, ऐसे यह और भी कठिन है; इन सबके होते हुए वाक्यको “काव्य कहते हैं। लोक-व्यवहार विवेकका होना तो परम दुर्लभ है। कोई भी तथा वेद (शास्त्र)-का ज्ञान-ये काव्यप्रतिभाकी

English

four-faced, four-armed, holding a pot in two arms, with boon and fearlessness in two, one should bathe with the pot mudra;

अध्याय ३२४

श्लोक 26

आरोग्यैश् चर्यदीर्घायुरौषधं मन्त्रितं शुभम् ।अपमृत्युहरो ध्यातः पूजितो ऽद्भुत एव सः

ārogyaiś caryadīrghāyurauṣadhaṃ mantritaṃ śubham / apamṛtyuharo dhyātaḥ pūjito 'dbhuta eva saḥ

हिन्दी अर्थ

शास्त्र क्यों न हो, अविद्वान् पुरुषोंके द्वारा उसका योनि” हैं। सिद्ध किये मन्त्रके प्रभावसे जो काव्य अनुसंधान किया जाय तो उससे कुछ भी सिद्ध निर्मित होता है, वह अयोनिज है। देवता नहीं होता'। 'श' आदि वर्ण, अर्थात् 'श ष स ह' आदिके लिये संस्कृत भाषाका और मनुष्योंके तथा वर्गोके द्वितीय एवं चतुर्थ अक्षर “महाप्राण' लिये तीन प्रकारको प्राकृत भाषाका प्रयोग करना

English

health, lordship, long life: the consecrated medicine is auspicious. Meditated on, he removes untimely death; worshipped, he is wonderful indeed.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 324
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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