Agni Purana· Agni Purāṇa
325
अध्याय 325 / 381

Adhyaya 326

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अध्याय ३२५

श्लोक 1

देवालयमाहात्म्यम् ईश्वर+उवाच व्रतेश्वरांश् च सत्यादीनिष्ट्वा व्रतसमर्पणम् ।अरिष्टशमने शस्तमरिष्टं सूत्रनायकम्

devālayamāhātmyam īśvara+uvāca vrateśvarāṃś ca satyādīniṣṭvā vratasamarpaṇam / ariṣṭaśamane śastamariṣṭaṃ sūtranāyakam

हिन्दी अर्थ

कहलाते हैं?। वर्णोके समुदायको “पद' कहते हैं । चाहिए। काव्य आदि तीन प्रकारके होते हैं- 'प्रभुसम्मितशब्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्यः, सुहत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणादीतिहासेभ्यश्च, शब्दार्थयोर्गुणभावेन रसाङ्गभूतव्यापारप्रवणतया विलक्षण यत् काव्यं लोकोत्तरवर्णनानिपुणकविकर्म, तत् कान्तेव सरसतापादनेनाभिमुखीकृत्य रामादिवद्वर्तितव्यं न रावणादिवदित्युपदेशं च यथायोगं कवेः सहृदयानां च करोतीति।' (काव्यप्रकाश-१ उल्लास)

English

One who repeats (the hymn) samamadhydyanti will not die of thirst. One will not get a disease by repeating (the hymn) toamimd ofodhib*.

अध्याय ३२५

श्लोक 2

हेमरत्रमयं भूत्यै महाशङ्खञ्च मारणे ।आप्यायने शङ्खसूत्रं मौक्तिकं पुत्रवर्धनम्

hemaratramayaṃ bhūtyai mahāśaṅkhañca māraṇe / āpyāyane śaṅkhasūtraṃ mauktikaṃ putravardhanam

हिन्दी अर्थ

१. साहित्यदर्पणकार विश्वनाथने अपने ग्रन्थके प्रथम परिच्छेदमें ' काव्यस्योपादेयत्वमग्निपुराणेऽप्युक्तम्।यह लिखकर ' नरत्वं दुर्लभं लोके' इत्यादि श्लोकको पूर्णतः उद्धृत किया है।

English

SV. 1.274a; 2.671a.

अध्याय ३२५

श्लोक 3

स्फाटिकं भूतिदं कौशं मुक्तिदं(१) रुद्रनेत्रजं ।धाधीफलप्रमाणेन रुद्राक्षं चोत्तमन्ततः

sphāṭikaṃ bhūtidaṃ kauśaṃ muktidaṃ(1) rudranetrajaṃ / dhādhīphalapramāṇena rudrākṣaṃ cottamantataḥ

हिन्दी अर्थ

२. भामहपर भी अग्निपुराणकी इन उक्तियोंका प्रभाव पड़ा है। उनका कहना है कि ' गुरुके उपदेशसे जडबुद्धि मनुष्य भी शास्त्रका अध्ययन तो कर लेते हैं, परंतु काव्य करनेकी शक्ति किसी बिरले ही प्रतिभाशाली पुरुषमें होती है।' इस कथनमें ' शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा 'की स्पष्टतः छाप है। भामहका श्लोक इस प्रकार है- काव्यं तु जायते जातु कस्यचित् प्रतिभावतः ॥

English

Tail. Sam. 4.6.1.5a; SV. 1.512a.

अध्याय ३२५

श्लोक 4

समेरुं मेरुहीनं वा सूत्रं जप्यन्तु मानसम् ।अनामाङ्गुष्ठमाक्रम्य जपं भाष्यन्तु कारयेत्

sameruṃ meruhīnaṃ vā sūtraṃ japyantu mānasam / anāmāṅguṣṭhamākramya japaṃ bhāṣyantu kārayet

हिन्दी अर्थ

३. यह एक श्लोकका भाव शिक्षासे सम्बद्ध है। जान पड़ता है, लेखकके प्रमादसे उसका पाठ इस अध्यायमें समाविष्ट हो गया है।

English

Of. partto fifUatd SV. 1.512a.

अध्याय ३२५

श्लोक 5

तर्जन्यङ्गुष्ठमाक्रम्य न मेरुं लङ्घ्येज्जपे ।प्रमादात् पतिते सूत्रे जप्तव्यन्तु शतद्वयम्

tarjanyaṅguṣṭhamākramya na meruṃ laṅghyejjape / pramādāt patite sūtre japtavyantu śatadvayam

हिन्दी अर्थ

४. अग्निपुराणकी इसी उक्तिको उपजीव्य मानकर भोजदेवने 'सरस्वतीकण्ठाभरण'में इस प्रकार लिखा है- निर्दोषं गुणवत्काव्यमलंकारैरलंकृतम्। (१।२) ५. भामहने इसी कथनको कुछ पल्लवित करके लिखा है कि 'व्याकरण', छन्द, कोष, अर्थ, इतिहासाश्रित कथाएँ, लोकव्यवहार, युक्ति (तर्क) तथा कलाओंका काव्य-रचनामें प्रवृत्त होनेवाले कविजनोंको मनन करना चाहिए। यथा--

English

SV. 1.378a.

अध्याय ३२५

श्लोक 6

सर्ववाद्यमयी घण्टा तस्या वादनमर्थकृत् ।गोशकृन्मूत्रवल्मीकमृत्तिकाभस्मवारिभिः

sarvavādyamayī ghaṇṭā tasyā vādanamarthakṛt / gośakṛnmūtravalmīkamṛttikābhasmavāribhiḥ

हिन्दी अर्थ

शब्दश्छन्दोऽभिधानार्था इतिहासाश्रयाः कथा: । लोको युक्तिः कलाश्चेति मन्तव्या काव्यगैरह्यमी ॥

English

SV. 1.141a.

अध्याय ३२५

श्लोक 7

वेस्मायतनलिङ्गादेः कार्यमेवं विशोधनम् ।स्कन्दो नमः शिवायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः

vesmāyatanaliṅgādeḥ kāryamevaṃ viśodhanam / skando namaḥ śivāyeti mantraḥ sarvārthasādhakaḥ

हिन्दी अर्थ

तीन हेतुओंका उल्लेख किया है-लोक, विद्या और प्रकीर्ण। “लोक'से उन्होंने “लोकवृत्त' लिया है। 'विद्या' शब्दसे शब्दस्मृति (व्याकरण), शब्दकोष, छन्दोविचिति, कलाशास्त्र, कामशास्त्र तथा दण्डनीति आदिका ग्रहण किया है तथा 'प्रकीर्ण' शब्दसे प्रतिभा और अवधान (चित्तकी एकाग्रता)-को लिया है। यथा-(काव्यालंकारसूत्राख्ये ग्रन्थे प्रथमेऽधिकरणे तृतीयाध्याये)- लोको विद्या प्रकीर्ण च काव्याङ्गानि'॥ १॥ “लोकवृत्तं लोकः'॥ २॥ 'शब्दस्मृत्यभिधानकोशच्छन्दोविचितिकलाकामशास्त्रदण्डनीतिपूर्वा विद्याः '॥ ३ ॥ ' लक्ष्यज्ञत्वमभियोगो वृद्धसेवावेक्षणं प्रतिभानमवधानं च प्रकीर्णम्' ॥ ११॥ इसी प्रकार आचार्य मम्मटने शक्ति (प्रतिभा) - को तथा लोकवृत्त, व्याकरणादिशारत्र तथा पूर्ववर्ती कवियोंके काव्य आदिके अवलोकनसे प्राप्त हुई व्युत्पत्तिको काव्यका हेतु बताया है। “साथ ही काव्यवेत्ताओंकी शिक्षाके अनुसार किया जानेवाला अभ्यास भी काव्यनिर्माणमें हेतु होता है,' यह उनका कथन है । अन्यान्य परवर्ती आचार्योने भी काव्यके इन हेतुओंपर विचार किया है। इन सबके मतोंपर अग्निपुराणके ' वेदश्च लोकश्च' इस कथनका ही प्रभाव

English

Houses, temples, lingas and the like should be purified thus. "Skanda, homage to Shiva" — the mantra accomplishing all aims.

अध्याय ३२५

श्लोक 8

गीतः पञ्चाक्षरो वेदे लोके गीतःषडक्षरः ।ओमित्यन्ते स्थितः शम्भुर्मुद्रार्थं वटवीजवत्

gītaḥ pañcākṣaro vede loke gītaḥṣaḍakṣaraḥ / omityante sthitaḥ śambhurmudrārthaṃ vaṭavījavat

हिन्दी अर्थ

परिलक्षित होता है।

English

The five-syllabled is sung in the Veda; in the world the six-syllabled is sung. Shambhu stands at the end as "Om"; for the mudra's sake like a banyan seed.

अध्याय ३२५

श्लोक 9

क्रमान्नमः शिवायेति ईशानाद्यानि वै विदुः ।षडक्षरस्य सूत्रस्य भाष्यद्विद्याकदम्बकं

kramānnamaḥ śivāyeti īśānādyāni vai viduḥ / ṣaḍakṣarasya sūtrasya bhāṣyadvidyākadambakaṃ

हिन्दी अर्थ

६. मन्त्रसिद्धिसे भी अद्भुत काव्य-रचनाकी शक्तिका उदय होता है, इसकी चर्चा रसगङ्गाधरकारने भी की है। 'नैषध' महाकाव्यके रचयिता श्रीहर्षने भी अपने काव्यमें चिन्तामणिबीजकी उपासनासे अकस्मात् श्लोक-रचनाकी शक्तिका आविर्भाव होना बताया है। MITTEE फ फो की की की पी फक फाफा फा कक कीकी की कफ कफी फी की की

English

In order "namah Shivaya" — they know Ishana and the rest. A commentary-collection of knowledge on the sutra of six syllables:

अध्याय ३२५

श्लोक 10

यद्ॐनमः शिवायेति एतावत् परमं पदम् ।अनेन पूजयेल्लिङ्गं लिङ्गे यस्मात् स्थितः शिवः

yadoṃnamaḥ śivāyeti etāvat paramaṃ padam / anena pūjayelliṅgaṃ liṅge yasmāt sthitaḥ śivaḥ

हिन्दी अर्थ

गद्य, पद्य और मिश्र' । पादविभागसे रहित पदोंका प्रवाह 'गद्य' कहलाता है। वह भी चूर्णक, उत्कलिका और वृत्तगन्धि भेदसे तीन प्रकारका होता है'। छोटी-छोटी कोमल पदावलीसे युक्त

English

"Om namah Shivaya" — this much is the supreme station. With this one should worship the linga, since Shiva abides in the linga,

अध्याय ३२५

श्लोक 11

अनुग्रहाय लोकानां धर्मकामार्थमुक्तिदः ।यो न पूजयते लिङ्गन्न स धर्मादिभाजनं

anugrahāya lokānāṃ dharmakāmārthamuktidaḥ / yo na pūjayate liṅganna sa dharmādibhājanaṃ

हिन्दी अर्थ

और अत्यन्त मृदु संदर्भसे पूर्ण गद्यको 'चूर्णक' कहते हैं। जिसमें बड़े-बड़े समासयुक्त पद हों, उसका नाम उत्कलिका' हैः । जो मध्यम श्रेणीके संदर्भसे युक्त हो तथा जिसका विग्रह अत्यन्त कुत्सित (क्लिष्ट) न हो, जिसमें पद्यकी छायाका आभास मिलता हो-जिसको पदावली किसी पद्य या छन्दके खण्ड-सी जान पड़े, उस गद्यको ' वृत्तगन्धि’ कहते हैं। यह सुननेमें अधिक उत्कट

English

for the favor of the worlds, giving dharma, desire, wealth and liberation. One who does not worship the linga is not a vessel of dharma and the rest.

अध्याय ३२५

श्लोक 12

लिङ्गार्चनाद्भुक्तिमुक्तिर्यावज्जीवमतो यजेत् ।वरं प्राणपरित्यागो भुञ्जीतापूज्य नैव तं

liṅgārcanādbhuktimuktiryāvajjīvamato yajet / varaṃ prāṇaparityāgo bhuñjītāpūjya naiva taṃ

हिन्दी अर्थ

नहीं होतां। गद्य-काव्यके पाँच भेद माने जाते हैं-आख्यायिका, कथा, खण्डकथा, परिकथा एवं कथानिका“। जहाँ गद्यके द्वारा विस्तारपूर्वक ग्रन्थ-निर्माता कविके वंशकी प्रशंसा को गयी हो,

English

From worship of the linga, enjoyment and liberation; therefore one should worship as long as life lasts. Better to abandon life than to eat without worshipping him.

अध्याय ३२५

श्लोक 13

१ भक्तिदमिति ख॥ :प् १८३ रुद्रस्य पूजनाद्रुद्रो विष्णुः स्याद्विष्णुपूजनात् ।सूर्यः स्यात् सुर्यपूजातः शक्त्यादिः शक्तिपूजनात्

1 bhaktidamiti kha.. :p 183 rudrasya pūjanādrudro viṣṇuḥ syādviṣṇupūjanāt / sūryaḥ syāt suryapūjātaḥ śaktyādiḥ śaktipūjanāt

हिन्दी अर्थ

जिसमें कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ (वियोग) और विपत्ति (मरणादि) प्रसङ्गोंका वर्णन हो, वृत्तियोंकी प्रवृत्तियोंपर विशेषरूपसे प्रकाश पड़ता हो, जिसमें 'उच्छास 'के नामसे परिच्छेद (खण्ड) किये गये हों, जो 'चूर्णक' नामक गद्यशैलीके कारण अधिक उत्कृष्ट जान पड़ती हो, अथवा

English

By worship of Rudra one becomes Rudra; by worship of Vishnu, Vishnu; by worship of the Sun, the Sun; by worship of Shakti, Shakti and the rest.

अध्याय ३२५

श्लोक 14

सर्वयज्ञतपोदाने तीर्थे वेदेषु यत् फलं ।तत् फलं कोटिगुणितं स्थाप्य लिङ्गं लभेन्नरः

sarvayajñatapodāne tīrthe vedeṣu yat phalaṃ / tat phalaṃ koṭiguṇitaṃ sthāpya liṅgaṃ labhennaraḥ

हिन्दी अर्थ

जिसमें 'वक्त्र' या “अपरवक्त्र' नामक छन्दका

English

Whatever fruit in all sacrifices, austerities, gifts, holy places and Vedas, that fruit a man obtains crore-fold by installing a linga.

अध्याय ३२५

श्लोक 15

त्रिसन्ध्यं योर्चयेल्लिङ्गं कृत्वा विल्वेन पार्थिवम् ।शतैकादशिकं यावत् कुलमुद्धृत्य नाकभाक्

trisandhyaṃ yorcayelliṅgaṃ kṛtvā vilvena pārthivam / śataikādaśikaṃ yāvat kulamuddhṛtya nākabhāk

हिन्दी अर्थ

प्रयोग हुआ हो, उसका नाम 'आख्यायिका' है (जैसे 'कादम्बरी' आदि) । जिस काव्यमें कवि श्लोकोंद्वारा संक्षेपसे अपने वंशका गुणगान करता हो, जिसमें मुख्य अर्थको उपस्थित करनेके लिये कथान्तरका संनिवेश किया गया हो, जहाँ परिच्छेद हो ही नहीं, अथवा यदि हो भी तो कहीं लम्बकोंद्वारा ही हो, उसका नाम 'कथा' है (जैसे “कथा-सरित्सागर' आदि)। उसके मध्यभागमें

English

One who at the three twilights worships a linga made of earth with bilva — up to eleven hundred, having lifted the family, shares heaven.

अध्याय ३२५

श्लोक 16

भक्त्या वित्तानुसारेण कुर्यात् प्रसादसञ्चयम् ।अल्पे महति वा तुल्यफलमाढ्यदरिद्रयोः

bhaktyā vittānusāreṇa kuryāt prasādasañcayam / alpe mahati vā tulyaphalamāḍhyadaridrayoḥ

हिन्दी अर्थ

चतुष्पदी (पद्य)-द्वारा बन्ध-रचना करे। जिसमें कथा खण्डमात्र हो, उसे 'खण्डकथा' कहते हैं। खण्डकथा और परिकथा-इन दोनों प्रकारको कथाओंमें मन्त्री, सार्थवाह (वैश्य) अथवा ब्राह्मणको

English

One should make a store of grace with devotion according to wealth; in small or great the fruit is equal for rich and poor.

अध्याय ३२५

श्लोक 17

भागद्वयञ्च धर्मार्थं कल्पयेज्जीवनाय च ।धनस्य भागमेकन्तु(१)अनित्यं जीवितं यतः

bhāgadvayañca dharmārthaṃ kalpayejjīvanāya ca / dhanasya bhāgamekantu(1)anityaṃ jīvitaṃ yataḥ

हिन्दी अर्थ

ही नायक मानते हैं। उन दोनोंका ही प्रधान रस “करुण' जानना चाहिए। उसमें चार प्रकारका 'विप्रलम्भ' (विरह) वर्णित होता है । (प्रवास, शाप, मान एवं करुण-भेदसे विप्रलम्भके चार प्रकार हो जाते हैं।) उन दोनोंमें ही ग्रन्थके भीतर कथाकी समाप्ति नहीं होती। अथवा 'खण्डकथा' कथाशैलीका ही अनुसरण करती है। कथा एवं आख्यायिका दोनोंके लक्षणोंके मेलसे जो कथावस्तु

English

One should arrange two parts for dharma and wealth and for livelihood — and one part of wealth, since life is impermanent.

अध्याय ३२५

श्लोक 18

त्रिसप्तकुलमुद्धृत्य देवागारकृदर्थभाक् ।मृत्काष्ठेष्टकशैलाद्यैः क्रमात् कोटिगुणं फलम्

trisaptakulamuddhṛtya devāgārakṛdarthabhāk / mṛtkāṣṭheṣṭakaśailādyaiḥ kramāt koṭiguṇaṃ phalam

हिन्दी अर्थ

प्रस्तुत होती है, उसे 'परिकथा' नाम दिया गया है। जिसमें आरम्भमें भयानक, मध्यमें करुण तथा अन्तमें अद्भुत रसको प्रकट करनेवाली रचना होती है, वह “कथानिका' (कहानी) है। उसे उत्तम

English

The builder of a temple of gods lifts twenty-one families and shares the wealth; with clay, wood, brick, stone and the like the fruit is in order a crore-fold.

अध्याय ३२५

श्लोक 19

अष्टेष्टकसुरागारकारी स्वर्गमवाप्नुयात् ।पांशुना क्रीडमानोपि देवागारकृदर्थभाक्

aṣṭeṣṭakasurāgārakārī svargamavāpnuyāt / pāṃśunā krīḍamānopi devāgārakṛdarthabhāk

हिन्दी अर्थ

१. भामहने काव्यके दो भेद बताये हैं-गद्य और पद्य। फिर भाषाको दृष्टिसे इनके तीन-तीन भेद और होते हैं-संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश। वामनने ' काव्य गद्यं पद्यं च' (३-२१) -इस सूत्रके द्वारा काव्यके गद्य और पद्य दो ही मूलभेद माने हैं दण्डीने अपने ' काव्यादर्श ' में अग्निपुराणकथित गद्य, पद्य और मिश्र-तीनों भेदोंको उद्धृत किया है। भाषाकी दृष्टिसे भी उन्होंने काव्यके चार भेद माने हैं-संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र। अग्निपुराणमें जो “पादसंतानो गद्यम्।'-इस प्रकार गद्यका लक्षण किया है, दण्डीने अपने “काव्यादर्श ' में इसे अविकलरूपसे उद्धृत किया है।

English

The maker of a temple of eight bricks attains heaven. Even playing with dust, the builder of a temple of gods shares the wealth.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 325
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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