Agni Purana· Agni Purāṇa
332
अध्याय 332 / 381

Adhyaya 333

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अध्याय ३३२

श्लोक 1

समवृत्तनिरूपणं अग्निर् उवाच यतिर्विच्छेद इत्य् उक्तस्तत्तन्मध्यान्तयौ गणौ ।यौसः कुमारलालिता तौ गौ चित्रपदा स्मृता

samavṛttanirūpaṇaṃ agnir uvāca yatirviccheda ity uktastattanmadhyāntayau gaṇau / yausaḥ kumāralālitā tau gau citrapadā smṛtā

हिन्दी अर्थ

परिवर्तन “ वैवर्ण्य’ कहा गया है। दुःख अथवा आनन्द आदिसे उद्भूत नेत्रजलको 'अश्रु' कहते हैं। उपवास आदिसे इन्द्रियोंकी संज्ञाहीनताको “प्रलय' कहा जाता है वैराग्य आदिसे उत्पन्न मानसिक खेदको “निर्वेद? कहा जाता है। मानसिक पीड़ा आदिसे

English

Cf. Tait. Sam. 4.4.2.2.

अध्याय ३३२

श्लोक 2

विद्युन्माला मममागणैर् भूतगणैर् भवेत् ।माणवका क्रीडितकं वनौ हलमुखी वसः

vidyunmālā mamamāgaṇair bhūtagaṇair bhavet / māṇavakā krīḍitakaṃ vanau halamukhī vasaḥ

हिन्दी अर्थ

'स्तम्भ'का यही लक्षण विश्वनाथने भी लिया है।

English

SV. 1.186a.

अध्याय ३३२

श्लोक 3

स्याद्भुजङ्गशिशुसूतानौ मेहनं मरुतं ननौ ।भवेच्छुद्धविराड्वृत्तं समौ जगौ

syādbhujaṅgaśiśusūtānau mehanaṃ marutaṃ nanau / bhavecchuddhavirāḍvṛttaṃ samau jagau

हिन्दी अर्थ

जनित शैथिल्यको 'ग्लानि' कहते हैं; वह शरीरमें ही व्याप्त होती है। अनिष्टप्राप्तिकी सम्भावनाको “शङ्का' और मत्सर (दूसरेका उत्कर्ष सहन न करने)-को 'असूया' कहा जाता है। मदिरा आदिके उपयोगसे उत्पन्न मानसिक मोह 'मद' कहलाता है। अधिक कार्य करनेसे शरीरके भीतर उत्पन्न क्लान्तिको ' श्रम' कहते हैं। शृङ्गार आदि धारण करनेमें चित्तकी उदासीनताको

English

One will get rid of all the diseases by offering oblations to ( the gods of) the remedial class. One will get free from all sins by offering oblations to ( the gods of) the trisaptiya cls.

अध्याय ३३२

श्लोक 4

पणवोमलयोमः(१) स्याज्जौ गौ मयूरसारिणी ।सत्तामभसगा वृत्तं भजताद्युपरिस्थिता

paṇavomalayomaḥ(1) syājjau gau mayūrasāriṇī / sattāmabhasagā vṛttaṃ bhajatādyuparisthitā

हिन्दी अर्थ

'आलस्य' कहते हैं। धैर्ये भ्रष्ट हो जाना 'हैन्य' तथा अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे जो बार-बार उसकी ओर ध्यान जाता है, उसे 'चिन्ता' कहते हैं। किसी कार्य (भयसे छूटने या इष्टवस्तुको

English

SV. 1. 184a; 2.1190a.

अध्याय ३३२

श्लोक 5

रुक्मवती भससगाविन्द्रावज्रा तजौ गजौ ।जतौ जगौ गूपपूर्वावाद्यन्ताद्युपजातयः

rukmavatī bhasasagāvindrāvajrā tajau gajau / jatau jagau gūpapūrvāvādyantādyupajātayaḥ

हिन्दी अर्थ

पाने आदि)-के लिये उपाय न सूझना 'मोह' कहलाता है अनुभूत वस्तुका चित्तमें प्रतिबिम्बित होना 'स्मृति' कहलाता है। तत्त्वज्ञानके द्वारा अर्थोके निश्चयको “मति' कहते हैं। अनुराग आदिसे होनेवाला जो कोई अकथनीय मानसिक संकोच

English

SV. 1. 51a; 2.867a.

अध्याय ३३२

श्लोक 6

दोधकं भगभागौ स्यात् शालिनी मतभागगौ ।यतिः समुद्रा ऋषयः वातोर्मी मभतागगौ

dodhakaṃ bhagabhāgau syāt śālinī matabhāgagau / yatiḥ samudrā ṛṣayaḥ vātormī mabhatāgagau

हिन्दी अर्थ

होता है, उसका नाम “ब्रीडा' या 'लज्जा' है। चित्तकी अस्थिरताको 'चपलता' और प्रसन्नताको 'हर्ष? कहते हैं। प्रतीकारकी आशासे उद्भूत अन्तःकरणकी विकलताको 'आवेश' कहा जाता

English

SV. 1.256a; 2.923a.

अध्याय ३३२

श्लोक 7

चतुःस्वरा स्याद्भ्रमरी विलासिता मभौनलौ ।समुद्रा अथ ऋषयो वनौ लौगौ रथोद्धता

catuḥsvarā syādbhramarī vilāsitā mabhaunalau / samudrā atha ṛṣayo vanau laugau rathoddhatā

हिन्दी अर्थ

है। कर्तव्यके विषयमें कुछ प्रतिभान न होना “जडता' कही जाती है। अभीष्ट वस्तुको प्राप्तिसे बढ़े हुए आनन्द या संतोषके अभ्युदयको ' धृति' कहते हैं। दूसरोंमें निकृष्टता और अपनेमें उत्कृष्टताको भावनाको 'गर्व' कहा जाता है। इच्छित वस्तुके लाभमें हैव आदिसे जनित विघ्नके कारण जो दुःख होता है, उसे 'विषाद' कहते हैं। अभीष्ट पदार्थकी इच्छासे जो मनकी चञ्चल स्थिति होती

English

SV. 1.233a; 2.30a.

अध्याय ३३२

श्लोक 8

सामताधनभागोगोवृत्ताननसमाश् च सः ।श्येनी वजवनागः स्याद्रम्या नपरगागगः

sāmatādhanabhāgogovṛttānanasamāś ca saḥ / śyenī vajavanāgaḥ syādramyā naparagāgagaḥ

हिन्दी अर्थ

है, उसका नाम 'उत्कण्ठा' या 'उत्सुकता' है। अस्थिर हो उठना चित्त और इन्द्रियोंका ' अपस्मार'

English

Could not be traced.

अध्याय ३३२

श्लोक 9

जगती वंशस्था वृत्तं जतौ जावथ तौ जवौ ।इन्द्रवंशा तोटकं सैश् चतुर्भिः प्रतिपादतः

jagatī vaṃśasthā vṛttaṃ jatau jāvatha tau javau / indravaṃśā toṭakaṃ saiś caturbhiḥ pratipādataḥ

हिन्दी अर्थ

है। युद्धमें बाधाओंके उपस्थित होनेसे स्थिर न रह पाना “त्रास' माना गया है तथा चित्तके चमत्कृत होनेको ' वीप्सा' कहते हैं। क्रोधके शमन न होनेको 'अमर्ष' तथा चेतनताके उदयको “प्रबोध' या “जागरण” कहते हैं। चेष्टा और आकारसे प्रकट होनेवाले भावोंका गोपन ' अवहित्थ' कहलाता है । क्रोधसे गुरुजनोंपर कठोर वाग्दण्डका प्रयोग 'उग्रता' कहलाता है। चित्तके ऊहापोहको

English

MS. 4.9.11:132.10.

अध्याय ३३२

श्लोक 10

भवेद्द्रुतविलम्बिता नभौ भवावथौ नलौ ।स्यौ श्रीपुठो वसुवेदा जलोगतिजलौ जमौ

bhaveddrutavilambitā nabhau bhavāvathau nalau / syau śrīpuṭho vasuvedā jalogatijalau jamau

हिन्दी अर्थ

“वितर्क' तथा मानस एवं शरीरकी प्रतिकूल परिस्थितिको “व्याधि' कहते हैं। काम आदिके कारण असम्बद्ध प्रलाप करनेको 'उन्माद' कहा गया है। तत्त्वज्ञान होनेपर चित्तगत वासनाकी

English

Drutavilambita would be "na bha bha ra" — then "na la" (formula listing). Shripuṭa "va su ve da" — jalogati, jala, "ja ma";

अध्याय ३३२

श्लोक 11

जसौ वसर्ववश्चाथ ततं ननमराः स्मृतं ।कुसुमविचित्रा न्यौ द्यौ नौ नौ रौ स्याच्चलाम्बिका(२)

jasau vasarvavaścātha tataṃ nanamarāḥ smṛtaṃ / kusumavicitrā nyau dyau nau nau rau syāccalāmbikā(2)

हिन्दी अर्थ

शान्तिको “शम' कहते हैं । कविजनोंको काव्यादिमें रस एवं भावोंका निवेश करना चाहिए। जिसमें 'रति’' आदि स्थायी भावोंकी विभावना हो, अथवा जिसके द्वारा इनकी विभावना हो, वह 'विभाव' कहा गया है; यह 'आलम्बन' और 'उद्दीपन'के भेदसे दो प्रकारका माना जाता है। 'रति' आदि भावसमूह जिसका आश्रय लेकर निष्पन्न होते हैं, वह 'आलम्बन' नामक विभाव

English

"ja sa" and "va sa ra va" and "tata nanamara" are remembered. Kusumavichitra "na yau, dyau nau nau rau" — Chalambika;

अध्याय ३३२

श्लोक 12

भुजङ्गप्रयातं थैः स्याच्चतुर्भिः स्रग्विनीभवैः ।प्रमिताक्षरा गजौ सौ कान्तोत्पीडा मतौ समौ(३)

bhujaṅgaprayātaṃ thaiḥ syāccaturbhiḥ sragvinībhavaiḥ / pramitākṣarā gajau sau kāntotpīḍā matau samau(3)

हिन्दी अर्थ

है। यह नायक आदिका आलम्बन लेकर आविर्भूत होता है। धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशान्त-ये चार प्रकारके नायक माने गये हैं । ये धीरोदात्तादि नायक अनुकूल, दक्षिण, शठ

English

Bhujangaprayata with four "tha"; Sragvini born of the same; Pramitakshara "ga jau sau"; Kantotpida held "sa mau sama";

अध्याय ३३२

श्लोक 13

वैश्वदेवी(४) ममयायाः पञ्चाङ्गा नवमालिनी ।१ मलघाग इति ख॥ २ चरणात्मिका इति ख॥ ।चञ्चलाम्बिका इति ट॥ ३ ममाविति ख॥ ४ विश्वदेवीति ख :प् १९३ नजौ भयौ प्रतिपादं गणा यदि जगत्यपि

vaiśvadevī(4) mamayāyāḥ pañcāṅgā navamālinī / 1 malaghāga iti kha.. 2 caraṇātmikā iti kha.. / cañcalāmbikā iti ṭa.. 3 mamāviti kha.. 4 viśvadevīti kha :p 193 najau bhayau pratipādaṃ gaṇā yadi jagatyapi

हिन्दी अर्थ

एवं धृष्टके भेदसे सोलह प्रकारके कहे जाते हैं। पीठमर्द, विट और विदूषक-ये तीनों शृङ्गाररसमें नायकके नर्मसचिव--अनुनायक होते हैं। ' पीठमर्द? श्रीमान् एवं नायक 'के समान बलशाली (सहायक) होता है। 'विट' (धूर्त) नायकके देशका कोई व्यक्ति होता है। “विदूषक? प्रहसनसे नायकको प्रसन्न करनेवाला होता है। नायककी नायिकाएँ भी तीन प्रकारकी होती हैं-स्वकोया, परकोया

English

Vaishvadevi "ma ma ya ya" five-limbed; Navamalini "na jau bha yau" each foot, if Jagati too;

अध्याय ३३२

श्लोक 14

प्रहर्षणी मवजवा गोपतिर्वह्निदिक्षु च ।रुचिरा जभसजगा च्छिन्ना वेदैर् ग्रहैः स्मृता

praharṣaṇī mavajavā gopatirvahnidikṣu ca / rucirā jabhasajagā cchinnā vedair grahaiḥ smṛtā

हिन्दी अर्थ

एवं पुनर्भू। “पुनर्भू? नायिका कौशिकाचार्यके मतसे

English

Praharshini "ma va ja va" — Gopati and the fire-directions; Ruchira "ja bha sa ja ga" cut by four (and) nine is remembered;

अध्याय ३३२

श्लोक 15

मत्तमयूरं मतया सगौ वेदरहे यतिः ।गौरीनलनसागः स्यादसम्बाधा नतौ नगौ

mattamayūraṃ matayā sagau vedarahe yatiḥ / gaurīnalanasāgaḥ syādasambādhā natau nagau

हिन्दी अर्थ

है। कुछ “पुनर्भू? नायिकाको न मानकर उसके स्थानपर 'सामान्य'की गणना करते हैं। इन्हीं नायिकाओंके अनेक भेद होते हैं। “उद्दीपन विभाव' विविध संस्कारोंके रूपमें स्थित रहते हैं। ये ' आलम्बन विभाव'में भावोंको उद्दी् करते हैं

English

Mattamayura "ma ta ya sa ga", caesura at four and nine; Gauri "na la na sa ga"; Asambadha "na ta na ga";

अध्याय ३३२

श्लोक 16

गोग इन्द्रियनवकौ ननौ वसनगाः स्वराः ।स्वराश्चापराजिता स्यान्ननभाननगाः स्वराः

goga indriyanavakau nanau vasanagāḥ svarāḥ / svarāścāparājitā syānnanabhānanagāḥ svarāḥ

हिन्दी अर्थ

चौंसठ कलाएँ कर्म्मादि एवं गीतिकादिके भेदसे दो प्रकारकी होती हैं। 'कुहक' और 'स्मृति’ प्रायः हासोपहारक हैं। आलम्बन विभावके उद्बुद्ध संस्कारयुक्त भावोंके द्वारा स्मृति, इच्छा,

English

"go ga indriya navakau nanau vasanagah svarah"; Aparajita "na na bha na na ga" — notes;

अध्याय ३३२

श्लोक 17

द्विःप्रहरणकलिता(१) वसन्ततिलका नभौ ।जौ गौ सिंहोन्नता सा स्यान्मुनेरुद्धर्षणी च सा

dviḥpraharaṇakalitā(1) vasantatilakā nabhau / jau gau siṃhonnatā sā syānmuneruddharṣaṇī ca sā

हिन्दी अर्थ

द्वेष और प्रयतके संयोगसे किये हुए मन, वाणी, बुद्धि तथा शरीरके कार्यको विद्वज्जन ' अनुभाव' मानते हैं-स अत्र अनुभूयते उत अनुभवति।' (आलम्बनमें जो अनुभूयमान है, अथवा आलम्बनमें जो दर्शनके बाद प्रकट होता है)-इस प्रकार ' अनुभाव? शब्दकी निरुक्ति (व्युत्पत्ति)-को जाती है। मानसिक व्यापारकी बहुलतासे युक्त कार्य “मनका कार्य? कहा जाता है। वह “पौरुष'

English

Prahara-nakalita twice; Vasantatilaka "na bha"; "ja gau" — Simhonnata, that is the sage's Uddharshini;

अध्याय ३३२

श्लोक 18

चन्द्रावर्ता ननौ सोमावर्तर्तुनवकः स्मृतः ।मणिगुणनिकरा सौ मालिनौ नौ मयौ ययः

candrāvartā nanau somāvartartunavakaḥ smṛtaḥ / maṇiguṇanikarā sau mālinau nau mayau yayaḥ

हिन्दी अर्थ

दो प्रकारका होता है। वह इस प्रकार भी प्रसिद्ध है—

English

Chandravarta "na nau", Somavarta is remembered nine and sixth; Manigunanikara "sau"; Malini "nau mayau ya yah";

अध्याय ३३२

श्लोक 19

यतिर्वसुस्वरा भौ वौ नतलमित्रसग्रहाः(२) ।ऋषभगजविलासितं ज्ञेया शिखरिणी जगौ

yatirvasusvarā bhau vau natalamitrasagrahāḥ(2) / ṛṣabhagajavilāsitaṃ jñeyā śikhariṇī jagau

हिन्दी अर्थ

ललित, औदार्य तथा तेज--ये आठ पौरुष कर्म" हैं। नीच जनोंकी निन्दा, उत्तम पुरुषोंसे स्पर्धा, शौर्य और चातुर्य-इनके कारण मानसिक कार्यके रूपमें शोभाका आविर्भाव होता है। जैसे ' भवनकी शोभा होती है'

English

caesura eight, vowel; "bha vau na ta la mitra sagrahah"; Rishabhagajavilasita is to be known; Shikharini "ja gau";

अध्याय ३३२

श्लोक 20

रसभालभृगुरुद्राः पृथ्वीजसजसा जनौ ।गोवसुग्रहविच्छिन्ना पिङ्गलेनेरिता पुरा

rasabhālabhṛgurudrāḥ pṛthvījasajasā janau / govasugrahavicchinnā piṅgaleneritā purā

हिन्दी अर्थ

भाव, हाव, हेला, शोभा, कान्ति, दीसि,

English

"rasa bhala bhrigu rudra"; Prithvi "ja sa ja sa ja nau"; "go vasugraha vichchhinna" told by Pingala of old;

अध्याय ३३२

श्लोक 21

वंशपत्रपतितं स्याद् भवना भौ नगौ सदिक् ।हरिणी नसमारः सो नगौ रसचतुःस्वराः

vaṃśapatrapatitaṃ syād bhavanā bhau nagau sadik / hariṇī nasamāraḥ so nagau rasacatuḥsvarāḥ

हिन्दी अर्थ

गम्भीरता-ये बारह 'स्त्रियोंके विभाव' कहे गये हैँ। विलास और हावको 'भाव' कहते हैं। यह “भाव' किंचित् हर्षसे प्रादुर्भूत होता है। वाणीके योगको 'वागारम्भ' कहते हैं। उसके भी बारह भेद होते हैं। उनमें भाषणको 'आलाप', अधिक भाषणको 'प्रलाप', दुःखपूर्ण वचनको 'विलाप', बारंबार कथनको 'अनुलाप', कथोपकथनको 'संलाप', निरर्थक भाषणको 'अपलाप', वात्तकि

English

Vamshapatrapatita would be "bha na bha ga sa dik"; Harini "na sa ma ra sa na ga" — six, four, vowels;

अध्याय ३३२

श्लोक 22

मन्दाक्रान्ता नभनतं तगौगछिरसस्वराः ।कुसुमितलता वेल्लिता यययाः शराः

mandākrāntā nabhanataṃ tagaugachirasasvarāḥ / kusumitalatā vellitā yayayāḥ śarāḥ

हिन्दी अर्थ

परिवहनको 'संदेश' और विषयके प्रतिपादनको “निर्देश कहते हैं। तत्त्वकथनको 'अतिदेश'

English

Mandakranta "na bha na ta ta ga gah" ten, six, seven; Kusumitalata, Vellita "ya ya yah"; arrows (five);

अध्याय ३३२

श्लोक 23

रथाः स्वराः प्रतिरथससजाः सतताश् च गः ।शार्दूलविक्रीडितं स्यादादित्यमुनयो यतिः

rathāḥ svarāḥ pratirathasasajāḥ satatāś ca gaḥ / śārdūlavikrīḍitaṃ syādādityamunayo yatiḥ

हिन्दी अर्थ

एवं निस्सार वस्तुके वर्णनको 'अपदेश' कहा जाता है। शिक्षापूर्ण वचनको “उपदेश' और व्याजोक्तिको “व्यपदेश' कहते हैं। दूसरोंको अभीष्ट अर्थका ज्ञान करानेके लिये उत्तम बुद्धिका आश्रय लेकर वागारम्भका व्यापार होता है। उसके भी रीति, वृत्ति और प्रवृत्ति-ये तीन भेद होते हैं

English

chariots (six), vowels; Pratirathasa-sajasah; Shardulavikridita — caesura twelve and seven;

अध्याय ३३२

श्लोक 24

१ द्विःप्रहरणञ्चलितेति ख॥ २ लननागात्रसग्रहा इति ञ॥ :प् १९४ कृतिः सुवदना मोरो भनया भनगाः सुराः ।यतिर्मुनिरसाश्चाथ इति वृत्तं क्रमात् स्मृतम्

1 dviḥpraharaṇañcaliteti kha.. 2 lananāgātrasagrahā iti ña.. :p 194 kṛtiḥ suvadanā moro bhanayā bhanagāḥ surāḥ / yatirmunirasāścātha iti vṛttaṃ kramāt smṛtam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणे “श्रङ्गारादि रस, भाव तथा नायक आदिका तिरूपण' नामक तीन सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

Kriti, Suvadana, "mo ra bha na ya bha na ga" — gods; caesura — thus the metres are remembered in order;

अध्याय ३३२

श्लोक 25

स्नग्धरा मरतानोमोयपौ त्रिःसप्तका यतिः ।समुद्रकं भरजानोवनगो दशभास्कराः

snagdharā maratānomoyapau triḥsaptakā yatiḥ / samudrakaṃ bharajānovanago daśabhāskarāḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं--वसिष्ठ! अब मैं “वाग्विद्या' (काव्यशास्त्र)-के सम्यक् परिज्ञानके लिये 'रीति'का वर्णन करता हूँ। उसके भी चार भेद होते हैं-पाञ्चाली, गौडी, वैदर्भी तथा लाटी। इनमें “पाञ्चाली रीति' उपचारयुक्त, कोमल एवं लघु-समासोंसे समन्वित होती है। 'गौडी रीति'में संदर्भकी अधिकता और लंबे-लंबे समासोंकी बहुलता होती है। वह अधिक उपचारोंसे

English

Sragdhara "ma ra bha na ya ya ya" with caesura three times seven; Samudraka "bha ra ja na vo na ga" — ten, twelve;

अध्याय ३३२

श्लोक 26

अश्वललितं नजभा जभजा भनमीशतः ।मत्ताक्रीडा ममनना नौनग्नौ गोष्टमातिथिः

aśvalalitaṃ najabhā jabhajā bhanamīśataḥ / mattākrīḍā mamananā naunagnau goṣṭamātithiḥ

हिन्दी अर्थ

युक्त नहीं होती। 'वैदभी रीति' उपचाररहित, सामान्यतः कोमल संदभाँसे युक्त एवं समासवर्जित होती है। “लाटी रीति' संदर्भकी स्पष्टतासे युक्त होती है, किंतु उसमें समास अत्यन्त स्पष्ट नहीं

English

Ashvalalita "na ja bha ja bha ja"; "bha na ma ishatah"; Mattakrida "ma ma na na na na ga"; Atithi...

अध्याय ३३२

श्लोक 27

तन्वी भनतसाभोभो लयो वाणसुरार्ककाः ।क्रौञ्चपदा भमतता नौ नौ वाणशराष्टतः

tanvī bhanatasābhobho layo vāṇasurārkakāḥ / krauñcapadā bhamatatā nau nau vāṇaśarāṣṭataḥ

हिन्दी अर्थ

होते। बह यद्यपि अनेक विद्वानोंद्वारा परित्यक्त है, तथापि अतिबहुल उपचारयुक्त लाटी रीतिकी रचना उपलब्ध होती है (अब वृत्तियोंका वर्णन किया जाता है) जो क्रियाओंमें विषमताको प्राप्त नहीं होती, वह

English

Tanvi "bha na ta sa bho bho la"; arrows, suras, suns; Krauñchapada "bha ma ta ta nau nau" — five, arrows, eight;

अध्याय ३३२

श्लोक 28

भुजङ्गविजृम्भितं ममतना ननवासनौ ।गोष्टेशमुनिभिश्छेदो ह्य् उपहाराख्यमीदृअशम्

bhujaṅgavijṛmbhitaṃ mamatanā nanavāsanau / goṣṭeśamunibhiśchedo hy upahārākhyamīdṛaśam

हिन्दी अर्थ

वाक्यरचना “वृत्ति कही गयी है। उसके चार भेद हैं- भारती, आरभटी, कैशिकी एवं सात्वती। “भारती वृत्ति" वाचिक अभिनयकी प्रधानतासे युक्त होती है। यह प्रायः (नट) पुरुषके आश्रित

English

Bhujangavijrimbhita "ma ma ta na na va sa nau"; the cut with ... — the Upahara is thus;

अध्याय ३३२

श्लोक 29

मननानतानः सो गगौ ग्रहरसो रसात्(१) ।नौ सप्तरोदण्डदः स्याच्चण्डवृष्टिप्रघातकं(२)

mananānatānaḥ so gagau graharaso rasāt(1) / nau saptarodaṇḍadaḥ syāccaṇḍavṛṣṭipraghātakaṃ(2)

हिन्दी अर्थ

होती है, किंतु कभी-कभी स्त्री (नटी)-के आश्रित होनेपर यह प्राकृत उक्तियोंसे संयुक्त होती है। भरतके द्वारा प्रयुक्त होनेके कारण इसे “ भारती' कहा जाता है। भारतीके चार अङ्ग माने गये हैं-बीथी, प्रहसन, आमुख एवं नाटकादिकी प्ररोचना। वीथीके तेरह अङ्ग होते हैं-उद्धातक, लपित, असत्प्रलाप, वाकूश्रेणी, नालिका, विपण,

English

"ma na na na ta na sa ga gau" — nine, six; "nau sapta ro" — Dandada, Chandavrishti-praghataka;

अध्याय ३३२

श्लोक 30

रेफवृद्ध्या णणवा स्युर्व्यालजीमूतमुख्यकाः ।शेषे वै प्रचिता ज्ञेया गाथाप्रस्तार उच्यते

rephavṛddhyā ṇaṇavā syurvyālajīmūtamukhyakāḥ / śeṣe vai pracitā jñeyā gāthāprastāra ucyate

हिन्दी अर्थ

एवं उचित। तापस आदिके परिहासयुक्त वचनको “प्रहसन' कहते हैं। 'आरभटी वृत्ति'में माया, इन्द्रजाल और युद्ध आदिकी बहुलता मानी गयी है। आरभटी वृत्तिके भेद निम्नलिखित हैं-

English

by increase of "ra" the Vyala, Jimuta and the rest; in the rest they are to be known as Prachita; the Gatha-prastara is declared.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 332
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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