अध्याय ३३१
श्लोक 1
अर्धसमनिरूपणम् अग्निर् उवाच उपचित्रकं ससमनामथभोजभगामथ(१) ।द्रूतमध्या ततभगागथोननजयाः स्मृताः
ardhasamanirūpaṇam agnir uvāca upacitrakaṃ sasamanāmathabhojabhagāmatha(1) / drūtamadhyā tatabhagāgathonanajayāḥ smṛtāḥ
हिन्दी अर्थ
शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रस: । वीराच्चैवाद्भुतोत्पत्ति्बी भत्साच्च भयानकः ॥ (नाट्यशास्त्र ६। ३९) ३. भरतमुनिने नाट्यशास्त्रमें यह प्रश्न उठाया है कि ' किं रसेभ्यो भावानामभिनिर्वृत्तिरुताहो भावेभ्यो रसानाम्।' (क्या रसोंसे भावोंको अभिव्यक्ति होती है अथवा भावोंसे रसोंकी।) इसके उत्तरमें वे कहते हैं कि ' भावोंसे ही रसोंकी अभिव्यक्ति देखी जाती है, रसोंसे भावोंकी नहीं।' रसके उद्धावक होनेके कारण ही वे भाव' कहे जाते हैं । यह उत्तर ही अग्निपुराणकी उक्तियोंमें मुखरित हुआ है । “न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः ।'--यह उक्ति भी नाट्यशास्त्रकी कारिकाका ही अंश है। (देखिये ६। ३६) ।
English
See 14.1.