अध्याय ३३४
श्लोक 1
शिक्षानिरूपणम् अग्निर् उवाच वक्ष्ये शिक्षान्त्रिषष्टिः स्युर्वर्णा वा चतुराधिकाः ।स्वरा विंशतिरेकश् च स्पर्शानां पञ्चविंशतिः
śikṣānirūpaṇam agnir uvāca vakṣye śikṣāntriṣaṣṭiḥ syurvarṇā vā caturādhikāḥ / svarā viṃśatirekaś ca sparśānāṃ pañcaviṃśatiḥ
हिन्दी अर्थ
रीतिके चार भेद उपलब्ध होते हैं-पाञ्चाली, गौड़ी, वैदर्भी और लाटी और इन चारोंके पृथक्-पृथक् लक्षण भी दिये हैं। यद्यपि वामनने इन चार भेदोंमेंसे “लाटी 'को ग्रहण नहीं किया है, तथापि परवर्ती आलोचकोंने लाटीपर भी विचार किया है । वामनने ' पाञ्चाली 'का लक्षण किया है-—'माधुर्यसौकुमार्योपपन्ना पाञ्चाली ।' अर्थात् “माधुर्य तथा सौकुमार्य गुणसे सम्पन्न रचना “पाञ्चाली रीति” है।' अग्निपुराणमें “उपचारयुता मृद्वी पाञ्चाली हस्वविग्रहा।'-यों कहकर छोटे समासवाली मृदु रचनाको 'पाञ्चाली' बताया गया है। इसकी मृदुताको ही वामनने ' माधुर्य' नामसे व्यक्त किया है । छोटे समासवाली रचनामें कर्कशताका अभाव होता है, अतः वह 'सुकुमार' मानी गयी है। इसी गुणका वामनने ' सौकुमार्य ' शब्दसे बोध कराया है । व्यासजीने लंबे समासवाली रचनाको 'गौड़ीया' कहा है; उसीको शब्दान्तरसे वामनने ' ओजःकान्तिमती ' कहकर व्यक्त किया है। दीर्घसमासवाली रचनामें ही ' ओज' और 'कान्ति' नामक गुण प्रकट होते हैं। जो समाससे शून्य तथा कोमल संदर्भवाली रचना होती है, उसको 'वैदर्भी' कहा गया है। वैदर्भीके इसी लक्षणको वामनने
English
Tait. Sam.2.3.10.2.