Agni Purana· Agni Purāṇa
345
अध्याय 345 / 381

Adhyaya 346

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अध्याय ३४५

श्लोक 1

काव्यदोषविवेकः अग्निर् उवाच उद्वेगजनको दोषः सभ्यानां स च सप्तधा ।वक्तृवाचकवाच्यानामेकद्वित्रिनियोगतः

kāvyadoṣavivekaḥ agnir uvāca udvegajanako doṣaḥ sabhyānāṃ sa ca saptadhā / vaktṛvācakavācyānāmekadvitriniyogataḥ

हिन्दी अर्थ

५-—वह्नेः, वह्निभ्याम्, वह्विभ्यः। ६--वह्ेः, वह्नयोः, वह्वीनाम्। ७--वह्नौ, वह्णथोः, वह्विषु। सम्बो०-हे बह्ने, है वह्नी, है वह्लयः। 'वहि'का अर्थ है अग्नि। इसी तरह अग्नि, रवि, कवि,

English

This sharp-edged and stainless Sudai'sana disc (of Visnu) revolves. His garland of rays is imperceivable. "May you kill the evil spirits and those who wander in the night."

अध्याय ३४५

श्लोक 2

तत्र वक्ता कविर्नाम प्रथते स च भेदतः ।सन्दिहानो ऽविनीतः सन्नज्ञो ज्ञाता चतुर्विधः

tatra vaktā kavirnāma prathate sa ca bhedataḥ / sandihāno 'vinītaḥ sannajño jñātā caturvidhaḥ

हिन्दी अर्थ

गिरि, पवि इत्यादि शब्दोंके रूप होंगे। इकारान्त शब्दोंमें “सखि' और “पति' शब्दोंके रूप कुछ भिन्नता रखते हैं। जैसे--१--सखा, सखायौ, सखायः । २-सखायम्, सखायौ, सखीन्। तृतीयाके यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिए कि यदि किसीका नाम “सर्व” रख दिया जाय तो उस 'सर्व' का रूप वृक्षकी तरह ही होगा। 'सब' इस अर्थमें प्रयुक्त सर्व’ शब्दका ही रूप ऊपर बताये अनुसार होगा। यही बात अन्य सर्वनामोंके विषयमें भी समझनी चाहिए । संज्ञा एवं उपसर्जनीभूत ' सर्व’ आदि शब्दोंकी सर्वनामोंमें गणना नहीं होती। ' अतिसर्व' आदि शब्दोंमें जो “सर्व शब्द है; बह उपसर्जन है।

English

This mace has the lustre of the flames given out by the Sun. It is capable of destroying the demons, goblins, spirits and female spirits.

अध्याय ३४५

श्लोक 3

निमित्तपरिभाषाभ्यामर्थसंस्पर्शिवाचकम् ।तद्भेदो पदवाक्ये द्वे कथितं लक्षणं द्वयोः

nimittaparibhāṣābhyāmarthasaṃsparśivācakam / tadbhedo padavākye dve kathitaṃ lakṣaṇaṃ dvayoḥ

हिन्दी अर्थ

एकवचनमें --सख्या, चतुर्थीके एकवचनमें सख्ये, पञ्चमी और षष्ठीके एकवचनमें सख्युः तथा सप्तमीके एकवचनमें सख्यौ रूप होते हैं। शेष सभी रूप 'बह्नि' शब्दके समान हैं। “पति'

English

May the bow of Vasudeva (Vi§nu), that is striking suddenly, kill all my enemies, such as birds, men, kUmSiia and the spii'its of the dead.

अध्याय ३४५

श्लोक 4

असाधुत्वाप्रयुक्त्वे द्वावेव पदनिग्रहौ ।शब्दशास्त्रविरुद्धत्वमसाधुत्वं विदुर्बुधाः

asādhutvāprayuktve dvāveva padanigrahau / śabdaśāstraviruddhatvamasādhutvaṃ vidurbudhāḥ

हिन्दी अर्थ

शब्दके प्रथमा और द्वितीया विभक्तियोंमें वह्निवत् रूप होते हैं, शेष विभक्तियोंमें वह 'सखि' शब्दके समान रूप रखता है। 'अहर्पतिः' का अर्थ है सूर्य। यहाँ 'पति' शब्द समासमें आबद्ध है। समासमें उसका रूप वह्ितुल्य ही होता है।

English

Those who have been shaken by the shining lustre of the stroke of the sword, let those assembed (enemies) be subdued at once, like serpents by Garuda (vehicle of Vifiu).

अध्याय ३४५

श्लोक 5

व्युत्पन्नैर् अनिबद्वत्वमप्रयुक्तत्वमुच्यते ।छान्दसत्वमविस्पष्टत्वञ्च कष्टत्वमेव च

vyutpannair anibadvatvamaprayuktatvamucyate / chāndasatvamavispaṣṭatvañca kaṣṭatvameva ca

हिन्दी अर्थ

(अब उकारान्त शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं।) पहले पुँल्लिङ्ग 'पटु' शब्दके रूप दिये जाते हैं। पटुका अर्थ है-कुशल-निपुण। १-पटुः,

English

May my intellect, mind and sense-organs be healthy by the singing of (the glory of) lord of lords, Vasudeva.

अध्याय ३४५

श्लोक 6

तदसामयिकत्वञ्च ग्राम्यत्वञ्चेति पञ्चधा ।छान्दसत्वं न भाषायामविस्पष्टमबोधतः

tadasāmayikatvañca grāmyatvañceti pañcadhā / chāndasatvaṃ na bhāṣāyāmavispaṣṭamabodhataḥ

हिन्दी अर्थ

पटुषु। सम्बो०-हे पटो, है पटू, है पटवः। इसी तरह भानु, शम्भु विष्णु आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिए। दीर्घ ईकारान्त 'ग्रामणी' शब्द है। इसका अर्थ है--गाँवका मुखिया। इसका रूप इस प्रकार है--१--ग्रामणीः, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः। २ग्रामणीम्, ग्रामण्यौ, ग्रामण्यः

English

May (Lord) Janardana, Hari, be behind me, in my front, on the south and north and at the angular points. One that makes obeisance to (the Lord) Janardana, one worthy of worship, I Sana, endless and undecaying will not have grief.

अध्याय ३४५

श्लोक 7

गूडार्थता विपर्यस्तार्थता संशयितार्थता ।अविष्पष्टार्थता भेदास्तत्र गूढार्थतेति सा

gūḍārthatā viparyastārthatā saṃśayitārthatā / aviṣpaṣṭārthatā bhedāstatra gūḍhārthateti sā

हिन्दी अर्थ

ग्रामण्याम् । ७--ग्रामण्याम्, ग्रामणीषु। इसी तरह “प्रधी' आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिए। दीर्घ ऊकारान्त 'दृन्भू' शब्द है । इसका अर्थ है-राजा, वज्र, सूर्य, सर्प और चक्र। इसका रूप-दून्भूः,

English

The number of hymns of the (wrfa), Tajur (veda), SOma {veda) and Atharva {oeda) that yield all (the desires) and confer the four ends of the human life is one lakh.

अध्याय ३४५

श्लोक 8

यत्रार्थो दुःखसवेद्यो विपर्यस्तार्थता पुनः ।विवक्षितान्यशब्दार्थप्रतिपातिर्मलीमसा(१)

yatrārtho duḥkhasavedyo viparyastārthatā punaḥ / vivakṣitānyaśabdārthapratipātirmalīmasā(1)

हिन्दी अर्थ

या भूमिको शुद्ध-स्वच्छ करनेवाला । इसके रूप मित्रसे उत्पन्न । इसका रूप है-मित्रभूः, मित्रभुवौ, मित्रभुवः इत्यादि। 'स्वभू' का अर्थ है--

English

{The gveda) is divided into two branches, Sahkhyayana and Aivalayana. The br&kmans (of this Veda) (contain) two thousand one hundred and ten hymns.

अध्याय ३४५

श्लोक 9

अन्यार्थत्वासमर्थत्वे एतामेवोपसर्पतः ।१ मनीषयेति ज॥ :प् २३२ सन्दिह्यमानवाच्यत्वमाहुः संशयितार्थतां

anyārthatvāsamarthatve etāmevopasarpataḥ / 1 manīṣayeti ja.. :p 232 sandihyamānavācyatvamāhuḥ saṃśayitārthatāṃ

हिन्दी अर्थ

स्वयम्भूः-स्वतः प्रकट होनेवाला। इसके रूप स्वभूः, स्वभुवौ, स्वभुवः इत्यादि हैं॥ ४--६॥

English

The first (branch) of the Sdmaveda is known as Kauthuma and the second as Atharvanayanl. The songs of this Veda consist of dranyaka uktha and uha. The extent of the {Sdmaveda) is said to be a collection of nine thousand four hundred and twentyfive.

अध्याय ३४५

श्लोक 10

दोषत्वमनुबध्नाति सज्जनोद्वेजनादृते ।असुखोच्चार्यमाणत्वं कष्टत्वं समयाच्युतिः

doṣatvamanubadhnāti sajjanodvejanādṛte / asukhoccāryamāṇatvaṃ kaṣṭatvaṃ samayācyutiḥ

हिन्दी अर्थ

“सुश्रीः'का अर्थ है-सुन्दर शोभासे सम्पन्न। इसके रूप हैं-सुश्रीः, सुश्रियौ, सुश्रियः इत्यादि। “सुधीः' का अर्थ है--उत्तम बुद्धिसे युक्त विद्वान्। इसके रूप हैं-सुधीः, सुधियौ, सुधियः इत्यादि। (अब ऋकारान्त पुँल्लिङ्ग 'पितृ' तथा 'भ्रातृ' शब्दोंके रूप दिये जाते हैं-“पिता' का अर्थ हैबाप और 'भ्राता' का अर्थ है-भाई। “पितृ' शब्दके सब रूप इस प्रकार हैं-१--पिता,

English

The Brahma {purdna) and other Purds are eighteen. (They are known to be) learning relating to (Lord) Hari

अध्याय ३४५

श्लोक 11

असामयिकता नेयामेताञ्च मुनयो जगुः ।ग्राम्यता तु जघन्यार्थप्रतिपातिः खलीकृता

asāmayikatā neyāmetāñca munayo jaguḥ / grāmyatā tu jaghanyārthapratipātiḥ khalīkṛtā

हिन्दी अर्थ

पितरौ, है पितरः। इसी तरह ' भ्रातृ’ और 'जामातृ' शब्दोंके भी रूप होते हैं। 'नृ' शब्द नरका वाचक है। इसके रूप ना, नरौ, नरः इत्यादि “पितृ' शब्दवत् होते हैँ । केवल षष्ठीके बहुवचनमें

English

One would get enjoyment and emancipation by wor¬ shipping and praising Him, who is immanent, transcendent and bears the gross and subtle forms.

अध्याय ३४५

श्लोक 12

वक्तव्यग्राम्यवाच्यस्य वचनात्स्मरणादपि ।तद्वाचकपदेनाभिसाम्याद्भवति सा त्रिधा

vaktavyagrāmyavācyasya vacanātsmaraṇādapi / tadvācakapadenābhisāmyādbhavati sā tridhā

हिन्दी अर्थ

दो रूप होते हैं-नृणाम् नृणाम्। 'कर्तृ' शब्दका अर्थ है करनेवाला। यह 'तृजन्त' शब्द है। इसके दो विभक्तियोंमें रूप इस प्रकार हैं-कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः। कर्तारम्, कर्तारौ, कर्तृन्। शेष “पितृ शब्दकी भाँति। 'क्रोष्टु' शब्द सियारका वाचक है। क्रोष्टु विकल्पसे 'क्रोष्ट्र' शब्दके रूपमें प्रयुक्त होता है। उस दशामें इसका रूप 'कर्तू' शब्दकी भाँति होता है। 'कोष्टु' के रूपमें

English

(That) all-pervasive, triumphant (lord) wishing for prosperity is of the forms of Fire, Sun etc. (Lord) Vi§5iu, that is the mouth of the gods in the form of the Fire (god), is the supreme state.

अध्याय ३४५

श्लोक 13

दोषः साधारणः प्रातिस्विको ऽर्थस्य स तु द्विधा ।अनेकभागुपालम्भः साधारण इति स्मृतः

doṣaḥ sādhāraṇaḥ prātisviko 'rthasya sa tu dvidhā / anekabhāgupālambhaḥ sādhāraṇa iti smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

ही यदि इसके रूप लिये जायँ तो 'पटु' शब्दकी तरह लेने चाहिए। 'नप्त' शब्द नातीका वाचक है। इसके रूप 'कर्तृ' शब्दकी भाँति होते हैं। “सुरै' शब्दका अर्थ उत्तम धनवान् है। 'रै' शब्दका

English

A fault is general and specific; the latter is of meaning, twofold. Reproach of many parts is remembered as general;

अध्याय ३४५

श्लोक 14

क्रियाकारकयोर्भ्रंशो विसन्धिः पुनरुक्ता ।व्यस्तसम्बन्धता चेति पञ्च साधारणा मताः(१)

kriyākārakayorbhraṃśo visandhiḥ punaruktā / vyastasambandhatā ceti pañca sādhāraṇā matāḥ(1)

हिन्दी अर्थ

अर्थ है--धन। ये ऐकारान्त पुँल्लिङ्ग हैं। इन दोनोंके रूप एक-से होते हैं-१--सुराः, सुरायौ, सुरायः। रायः इत्यादि। हलादि विभक्तियोंमें रै' को जगह 'रा' हो जाता है। ओकारान्त 'गो' शब्दपर विचार कीजिये। 'गो' का अर्थ है-बैल। इसके

English

failure of action and agent, faulty juncture, repetition, and disconnected relation — five are held general;

अध्याय ३४५

श्लोक 15

अक्रियत्वं क्रियाभ्रंशो भ्रष्टकारकता पुनः ।कर्त्र्यादिकारकाभावो विसन्धिःसन्धिदूषणम्

akriyatvaṃ kriyābhraṃśo bhraṣṭakārakatā punaḥ / kartryādikārakābhāvo visandhiḥsandhidūṣaṇam

हिन्दी अर्थ

इत्यादि हैं। औकारान्त पुँल्लिङ्ग-'द्यौ' का अर्थ है--आकाश और 'ग्लौ' का अर्थ है-चन्द्रमा। इनके रूप-द्यौः, द्यावौ, द्यावः इत्यादि। ग्लौः, ग्लावौ, ग्लावः इत्यादि हैं। ये पुँल्लिड्रमें “स्वरान्त

English

non-action, failure of action, fallen agency again; absence of agent and the like: faulty juncture is defect of sandhi;

अध्याय ३४५

श्लोक 16

विगतो वा विरुद्धो वा सन्धिः स भवति द्विधा ।सन्धेर्विरुद्धता कष्टपादादर्थान्तरागमात्(२)

vigato vā viruddho vā sandhiḥ sa bhavati dvidhā / sandherviruddhatā kaṣṭapādādarthāntarāgamāt(2)

हिन्दी अर्थ

(अब हलन्त पुँल्लिङ्ग शब्दोंका परिचय कराया नरेश), जन्मभाक् (जन्म ग्रहण करनेवाला), सुराट् (श्रेष्ठ राजा), अयम् (यह), मरुत् (वायु), भवन् (होता हुआ), दीव्यन् (क्रीडा करता हुआ), भवान् (आप), मघवान् (इन्द्र), पिबन्

English

the juncture is either lost or contradictory, twofold; contradictoriness of juncture from harsh foot or arrival of another meaning;

अध्याय ३४५

श्लोक 17

पुनरुक्तत्वमाभीक्ष्ण्यादभिधानं द्विधैव तत् ।अर्थावृत्तिः पदावृत्तिरर्थावृत्तिरपि द्विधा

punaruktatvamābhīkṣṇyādabhidhānaṃ dvidhaiva tat / arthāvṛttiḥ padāvṛttirarthāvṛttirapi dvidhā

हिन्दी अर्थ

(पीता हुआ), भगवान् (समग्र ऐश्वर्यसे सम्पन्न), अघवान् (पापयुक्त), अर्वा (अश्व), वहिमान्

English

repetition is statement by frequency, twofold; repetition of meaning and of word; repetition of meaning too is twofold;

अध्याय ३४५

श्लोक 18

प्रयुक्तवरशब्देन(३) तथा शब्दान्तरेण च ।नावर्तते पदावृत्तौ वाच्यमावर्तते पदम्

prayuktavaraśabdena(3) tathā śabdāntareṇa ca / nāvartate padāvṛttau vācyamāvartate padam

हिन्दी अर्थ

(अग्नियुक्त), सर्ववित् (सर्वज्ञ), सुपृत् (भलीभाँति पालन करनेवाला), सुसीमा (उत्तम सीमावाला), कुण्डी (कुण्डधारी शिव), राजा, श्वा (कुत्ता), सुकर्मा (उत्तम कर्म करनेवाला), यज्चा (यज्ञकर्ता), सुवर्मा (उत्तम कवचधारी), सुधर्मा (उत्तम धर्मवाला), अर्यमा (सूर्य), वृत्रहा (इन्द्र),

English

by the word used and by another word; in word-repetition the word is repeated, not the speakable;

अध्याय ३४५

श्लोक 19

व्यस्तसम्बन्धता सुष्ठुसम्बन्धो व्यवधानतः ।सम्बन्धान्तरनिर्भाषात् सम्बन्धान्तरजन्मनः

vyastasambandhatā suṣṭhusambandho vyavadhānataḥ / sambandhāntaranirbhāṣāt sambandhāntarajanmanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्यङ् इत्यादि। सुद्यौः (शोभन आकाशवाला काल), सुभ्राट् (विशेष शोभाशाली), सुपूः

English

disconnected relation is good relation through intervening, by expression of another relation or arisen from another relation;

अध्याय ३४५

श्लोक 20

१ मला इति क॥ , ज॥ च २ कष्टपादादर्थान्तरक्रमादिति ट॥ ३ प्रयुक्तचरशब्देनेति ज॥ , ञ॥ च :प् २३३ अभावेपि तयोरन्तर्व्यवधानास्त्रिधैव सा ।अन्तरा पदवाक्याभ्यां प्रतिभेदं पुनर्द्विधा

1 malā iti ka.. , ja.. ca 2 kaṣṭapādādarthāntarakramāditi ṭa.. 3 prayuktacaraśabdeneti ja.. , ña.. ca :p 233 abhāvepi tayorantarvyavadhānāstridhaiva sā / antarā padavākyābhyāṃ pratibhedaṃ punardvidhā

हिन्दी अर्थ

(पूर्वकालमें जिसने पाचन किया हो), अनड्वान्- गाड़ी खींचनेवाला बैल, गोधुक् (गायको सभी हलन्त पुँल्लिङ्गके 'नायक' (आदर्श या प्रमुख शब्द) हैं

English

even in absence of those two, by intervention — threefold; again twofold according to intervening word or sentence;

अध्याय ३४५

श्लोक 21

वाच्यमर्थार्थ्यमानत्वात्तद्द्विधा पदवाक्ययोः ।व्युत्पादितपूर्ववाच्यं व्युत्पाद्यञ्चेति भिद्यते

vācyamarthārthyamānatvāttaddvidhā padavākyayoḥ / vyutpāditapūrvavācyaṃ vyutpādyañceti bhidyate

हिन्दी अर्थ

'सुवाक्' यह ' सुवाच्' शब्दका प्रथम विभक्तिमें एकवचनान्तरूप है । जिज्ञासुओंकी सुविधाके लिये इन शब्दोंके कतिपय रूप

English

the speakable, by being in need of meaning, twofold: of word and of sentence; divided into earlier-explained speakable and to-be-explained.

अध्याय ३४५

श्लोक 22

इष्टव्याघातकारित्वं हेतोः स्यादसमर्थता ।असिद्धत्वं विरुद्धत्वमनैकान्तिकता तथा

iṣṭavyāghātakāritvaṃ hetoḥ syādasamarthatā / asiddhatvaṃ viruddhatvamanaikāntikatā tathā

हिन्दी अर्थ

यहाँ उदाहरणके तौरपर दिये जाते हैं-१. 'सुवाक्', सुवाग्, सुवाचौ, सुवाचः ।' २. सुवाचम्, सुवाचौ, सुवाचः । ३. सुवाचा, सुवागभ्याम्, सुवाग्भिः इत्यादि। सप्तमीके बहुवचनमें ' सुवाक्षु' यह रूप होता है। इसी तरह 'त्वच्' शब्दके--त्वक्, त्वचौ, त्वचः इत्यादि, ' पृषत् ' शब्दके-पृषत्, पृषतौ, पृषतः इत्यादि, ' सम्राज्’ शब्दके-सम्राट् सम्राङ्, सम्राजौ, सम्राजः इत्यादि, ' जन्मभाज्' शब्दके-' जन्मभाक्, जन्मभाग्, जन्मभाजौ, जन्मभाजः, इत्यादि तथा 'सुराज्' शब्दके-सुराट्, सुराङ्, सुराजौ, सुराजः इत्यादि रूप होते हैं। “अयम् यह 'इदम्' शब्दका प्रथमविभक्तीय एकवचनान्त रूप है । व्यवहारमें इसके रूपोंकी अधिक आवश्यकता रहती है। इसलिये इसके पूरे रूप यहाँ दिये जाते हैं-

English

Causing contradiction to the desired is incapacity of the reason: unestablished, contradictory, inconclusive,

अध्याय ३४५

श्लोक 23

एवं सत्प्रतिपक्षत्वं कालातीतत्वसङ्करः ।पक्षे सपक्षेनास्तितत्वं विपक्षे ऽस्तित्वमेव तत्

evaṃ satpratipakṣatvaṃ kālātītatvasaṅkaraḥ / pakṣe sapakṣenāstitatvaṃ vipakṣe 'stitvameva tat

हिन्दी अर्थ

१. अयम्, इमौ, इमे। २. इमम्, इमौ, इमान्। (अन्वादेशमें) एनम्, एनौ, एनान्। ३. अनेन (अन्वादेशमें) एनेन, आभ्याम्, एभिः । ४. अस्मै, आभ्याम्, एभ्यः। ५. अस्मात् अस्माद्, आभ्याम्, एभ्यः। ६.अस्य, अनयोः (अन्वादेशमें) एनयोः, एषाम्। ७. अस्मिन्, अनयोः (एनयोः), एषु। त्यदादि गणके शब्दोंमें सम्बोधन नहीं होता।

English

counter-balanced, past-time, mixed; in the party, in the similar, not existing; in the dissimilar existing — that.

अध्याय ३४५

श्लोक 24

काव्येषु परिषद्यानां न भवेदप्यरुन्तुदम् ।एकादशनिरर्थत्वं(१) दुष्करादौ न दुष्यति

kāvyeṣu pariṣadyānāṃ na bhavedapyaruntudam / ekādaśanirarthatvaṃ(1) duṣkarādau na duṣyati

हिन्दी अर्थ

“मरुत्? आदि शब्दोंके प्रथमान्त रूप क्रमसे इस प्रकार जानने चाहिए-मरुत्, मरुद्, मरुतौ, मरुतः। भवन्, भवन्तौ, सुपृत्, सुपृद्, सुपृतौ, सुपृतः । सुसीमा, सुसीमानौ, सुसीमानः। कुण्डी, कुण्डिनौ, कुण्डिनः। ' राजन्' आदि शब्दोंके तीन विभक्तियोंके रूप दिये जाते हैं। शेष रूप तदनुसार ही समझ लेने चाहिए। १. राजा, राजानौ, राजानः । २. राजानम्, राजानौ, राज्ञः । ३. राज्ञा, राजभ्याम्, राजभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें--राज्ञि, राजनि। १. श्वा, श्वानौ, श्वानः । २. श्वानम्, श्वानौ, शुनः। ३. शुना, श्वभ्याम् श्वभिः। १. युवा,

English

In poems, for those in assemblies there would be no grating; eleven kinds of meaninglessness are not faulted in the hard-to-do (dushkara);

अध्याय ३४५

श्लोक 25

दुःखीकरोति दोषज्ञान्गूढार्थत्वं न दुष्करे ।न ग्राम्यतोद्वेगकारी प्रसिद्धेर् लोकशास्त्रयोः

duḥkhīkaroti doṣajñāngūḍhārthatvaṃ na duṣkare / na grāmyatodvegakārī prasiddher lokaśāstrayoḥ

हिन्दी अर्थ

अब स्त्रीलिङ्गमें नायकस्वरूप शब्दोंको उपस्थित किया जा रहा है--जाया (स्त्री), जरा (वृद्धावस्था), बाला (नूतन अवस्थाको स्त्री), एडका (भेड़), वृद्धा (बूढ़ी), क्षत्रिया (क्षत्रिय जातिको स्त्री),

English

it pains those who know faults; hidden meaning is not a fault in the difficult; vulgarity does not distress by the fame of world and scripture.

अध्याय ३४५

श्लोक 26

क्रियाभ्रंशेन लक्ष्मास्ति क्रियाध्याहारयोगतः ।भ्रष्टकारकताक्षेपबलाध्याहृतकारके

kriyābhraṃśena lakṣmāsti kriyādhyāhārayogataḥ / bhraṣṭakārakatākṣepabalādhyāhṛtakārake

हिन्दी अर्थ

बहुराजा (जहाँ बहुतसे राजा निवास करते हों, वह नगरी), बहुदा (अधिक देनेवाली), मा या दीसिवाली), बालिका (लड़को), माया (भगवान्की शक्ति या प्रकृति), कौमुदगन्धा (कुमुदको-सी सुगन्धवाली), सर्वा (सब), पूर्वा

English

There is a mark by failure of action through supplying an action; fallen agency by the force of implication supplies the agent;

अध्याय ३४५

श्लोक 27

प्रगृह्ये गृह्यते नैव क्षतं विगतसन्धिना ।कष्टपाठाद्विसन्धित्वं दुर्वचादौ न दुर्भगम्

pragṛhye gṛhyate naiva kṣataṃ vigatasandhinā / kaṣṭapāṭhādvisandhitvaṃ durvacādau na durbhagam

हिन्दी अर्थ

(क्रीडा करती हुई), भाती, भान्ती (शोभमाना),

English

in the unseparable (pragrihya) it is not taken; a defect is not by lost juncture; faulty juncture by harsh reading is not unfortunate in hard speech and the like.

अध्याय ३४५

श्लोक 28

अनुप्रासे पदावृत्तिर्व्यस्तसम्बन्धता शुभा ।नार्थसंग्रहणे दोषो व्युत्क्रमाद्यैर् न लिप्यते

anuprāse padāvṛttirvyastasambandhatā śubhā / nārthasaṃgrahaṇe doṣo vyutkramādyair na lipyate

हिन्दी अर्थ

तुदती, तुदन्ती (व्यथित करती हुई), कत्री (करनेवाली), कुर्वती (करती हुई), मही (पृथ्वी), रुन्धती (अवरोध करती हुई), क्रोडन्ती (खेलती हुई), दान्ती (दाँतकी बनी हुई वस्तु), पालयन्ती वधू: (स्त्री), देवता, भूः (पृथ्वी), तिस्रः (तीन), द्वे (दो), कति, वर्षाभूः (वर्षाकालमें उत्पन्न होनेवाली मेढको), स्वसा (बहिन), माता

English

In alliteration word-repetition and disconnected relation are good; no fault in gathering of meaning; not stained by inversions and the like.

अध्याय ३४५

श्लोक 29

विभक्तिसंज्ञालिङ्गानां यत्रोद्वेगो न धीमतां ।संख्यायास्तत्र भिन्नत्वमुपमानोपमेययोः

vibhaktisaṃjñāliṅgānāṃ yatrodvego na dhīmatāṃ / saṃkhyāyāstatra bhinnatvamupamānopameyayoḥ

हिन्दी अर्थ

(नदी), योषित् (स्त्री), अग्निवित् (अग्निको

English

Where case-endings, names and genders do not distress the wise, the number's difference between the standard and the subject

अध्याय ३४५

श्लोक 30

अनेकस्य तथैकेन बहूनां बहुभिः शुभा ।कवीमां समुदाचारः समयो नाम गीयते

anekasya tathaikena bahūnāṃ bahubhiḥ śubhā / kavīmāṃ samudācāraḥ samayo nāma gīyate

हिन्दी अर्थ

एषा (यह), सा (वह), वेदवित् (वेदज्ञा), (रानी), त्वया, मया (युष्मद्-अस्मद् शब्दोंके तीनों लिङ्गोंमें समान रूप होते हैं, ये तृतीयाके एक वचनके रूप हैं)। सीमा (अवधि), पञ्च आदि (संख्यावाचक नान्त शब्द), राका

English

is good: one with many, many with many. The usage of poets is called Samaya (convention).

अध्याय ३४५

श्लोक 31

१ एकादशनिरस्तत्वमिति ञ॥ :प् २३४ समान्यश् च विशिष्टश् च धर्मवद्भवति द्विधा ।सिद्धसैद्धान्तिकानाञ्च कवीनाञ्चाविवादतः

1 ekādaśanirastatvamiti ña.. :p 234 samānyaś ca viśiṣṭaś ca dharmavadbhavati dvidhā / siddhasaiddhāntikānāñca kavīnāñcāvivādataḥ

हिन्दी अर्थ

(पण्डिता), का (कौन), इयम् (यह), दिक्

English

It is general and special, twofold like dharma. By lack of dispute among the Siddhantins and poets,

अध्याय ३४५

श्लोक 32

यः प्रसिध्यति सामान्य इत्य् असौ समयो मतः ।सर्वेसिद्धान्तिका येन सञ्चरन्ति निरत्ययं

yaḥ prasidhyati sāmānya ity asau samayo mataḥ / sarvesiddhāntikā yena sañcaranti niratyayaṃ

हिन्दी अर्थ

३. मघोना, मघवभ्याम्, मघवभिः । १. पूषा, पूषणौ, पूषणः । २. पूषणम्, पूषणौ, पूष्णः । ३. पूष्णा, पूषभ्याम्, पूषभिः । सप्तमीके एकवचनमें पूष्णि, पूषणि। १. सुकर्मा, सुकर्माणौ, सुकर्माणः। २. सुकर्माणम्, सुकर्माणौ, सुकर्मणः । ३. सुकर्मणा, सुकर्मभ्याम्, सुकर्मभिः । १. यज्चा, ' यज्चन्' शब्दके समान हैं। सुधर्मा, सुधर्माणौ, सुधर्माणः इत्यादि। १. अर्यमा, अर्यमणौ, अर्यमणः । २. अर्यमणम्, अर्यमणौ, अर्यम्णः । ३. अर्यम्णा, अर्यमभ्याम्, अर्यमभिः इत्यादि। सप्तमीके एकवचनमें-अर्यम्णि, अर्यमणि। १. वृत्रहा, वृत्रहणौ, वृत्रहणः । २. वृत्रहणम्,

English

what is well established is held the general convention; by which all Siddhantins proceed without fault,

अध्याय ३४५

श्लोक 33

कियन्त एव वा येन सामान्यस्तेन सद्विधा ।छेदसिद्धन्ततो ऽन्यः स्यात् केषाञ्चिद्भ्रान्तितो यथा

kiyanta eva vā yena sāmānyastena sadvidhā / chedasiddhantato 'nyaḥ syāt keṣāñcidbhrāntito yathā

हिन्दी अर्थ

१-२. पञ्च, पञ्च। ३. ' पञ्चभिः ' इत्यादि । 'अष्टन्', ' पञ्चन्' आदि शब्द नित्य बहुवचनान्त हैं । प्रशान्, प्रशामौ, प्रशामः । प्रशान्भ्याम् इत्यादि।

English

or only some; by that it is twofold. A cut-established, another, is from the error of some, as:

अध्याय ३४५

श्लोक 34

तर्कज्ञानं मुनेः कस्य कस्यचित् क्षणभङ्गिका ।भूतचैतन्यता कस्य ज्ञानस्य सुप्रकाशता

tarkajñānaṃ muneḥ kasya kasyacit kṣaṇabhaṅgikā / bhūtacaitanyatā kasya jñānasya suprakāśatā

हिन्दी अर्थ

'असौ'-ये स्त्रीलिङ्गके नायक शब्द हैं। अब नपुंसकलिङ्गके नायक शब्द बताये जा रहे हैं॥ १२--१९॥ (सर्वप्रथम स्वरान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके प्रारम्भिक सिद्ध रूप दिये जाते हैं-- )' कुण्डम् यह अकारान्त नपुंसकलिङ्ग ' कुण्ड' शब्दका प्रथमान्त एकवचनरूप है। इसके प्रथम दो विभक्तियोंमें

English

logical knowledge of some sage; momentariness for some; consciousness of elements for some; clarity of knowledge for some;

अध्याय ३४५

श्लोक 35

प्रज्ञातस्थूलताशब्दानेकान्तत्वं तथार्हतः ।शैववैष्णवशाक्तेयसौरसिद्धान्तिनां मतिः

prajñātasthūlatāśabdānekāntatvaṃ tathārhataḥ / śaivavaiṣṇavaśākteyasaurasiddhāntināṃ matiḥ

हिन्दी अर्थ

क्रमशः एकवचन, द्विवचन और बहुवचनके रूप इस प्रकार जानने चाहिए-कुण्डम्, कुण्डे, कुण्डानि। तृतीया आदि शेष विभक्तियोंके रूप पुँल्लिङ्गवत् जानने चाहिए। यथा-कुण्डेन, कुण्डाभ्याम्, कुण्डैः

English

the many-sidedness of the Arhat; the view of Shaiva, Vaishnava, Shakta and Saura Siddhantins;

अध्याय ३४५

श्लोक 36

जगतः कारणं ब्रह्म साङ्ख्यानां सप्रधानकं ।अस्मिन् सरस्वतीलोके सञ्चरन्तः परस्परम्

jagataḥ kāraṇaṃ brahma sāṅkhyānāṃ sapradhānakaṃ / asmin sarasvatīloke sañcarantaḥ parasparam

हिन्दी अर्थ

इत्यादि। सम्बोधनमें-हे कुण्ड, है कुण्डे, हे कुण्डानि। 'कुण्डम्' का अर्थ है-पानीसे भरा हुआ गहरा गड्ढा। यह नदी और तालाब आदिमें होता है। मिट्टीके बड़े और गहरे पात्रविशेषको स्त्रीलिङ्गमें नामतः निर्दिष्ट 'नायक' शब्दोंके रूपोंका दिग्दर्शन मात्र कराया जा रहा है। 'जाया' शब्दका पूरा रूप इस प्रकार है--१. जाया जाये जाया: । २. जायाम् जाये जाया: । ३. जायया जायाभ्याम् जायाभिः । ४. जायायै जायाभ्याम् जायाभ्यः । ५. जायायाः जायाभ्याम् जायाभ्यः। ६. जायायाः जाययोः जायानाम् । ७. जायायाम् जाययोः जायासु। सम्बोधनमें-हे जाये है जाये है जायाः । ‘जरा’ शब्दका, स्वादि विभक्तियाँ परे हों तो 'जरस्' आदेश होता है। यह आदेश वैकल्पिक है। अतः 'जरा' का एक रूप तो “जाया! की

English

Brahman is the cause of the world; the Sankhyas' with Pradhana. In this world of Sarasvati, moving mutually,

अध्याय ३४५

श्लोक 37

बध्नन्ति व्यतिपश्यन्तो यद्विशिष्टैः स उच्यते ।परिग्रहादप्यसतां सतामेवापरिग्रहात्

badhnanti vyatipaśyanto yadviśiṣṭaiḥ sa ucyate / parigrahādapyasatāṃ satāmevāparigrahāt

हिन्दी अर्थ

तरह ही होगा। औ, जस्, अम्, शस्, टा, डे आदि विभक्तियोंमें क्रमशः-जरसौ, जरसः, जरसम्, जरसः, जरसा, जरसे इत्यादि वैकल्पिक रूप भी होंगे। बाला, एडका, वृद्धा आदिसे लेकर कौमुदगन्धातकके सभी शब्दोंका रूप जायावत् होगा। 'सर्वा' शब्दका रूप--सर्वा सर्वे सर्वाः । सर्वाम् सर्वे सर्वाः । सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः । ङिद्-विभक्तियोंमें सर्वस्यै, सर्वस्याः, सर्वस्याः, सर्वस्याम् रूप होंगे। 'आम्' विभक्तिमें सर्वासाम्। शेष सब जगह जायावत् रूप चलेंगे। “पूर्वा' और ' अन्या’ शब्दोंके रूप 'सर्वा' की तरह होंगे।

English

they bind, seeing across, what is by the distinguished. From acceptance even of the false, from non-acceptance of the true only,

अध्याय ३४५

श्लोक 38

भिद्यमानस्य तस्यायं द्वैविध्यमुपगीयते ।प्रत्यक्षादिप्रमाणैर् यद् बाधितं तदसद्विदुः

bhidyamānasya tasyāyaṃ dvaividhyamupagīyate / pratyakṣādipramāṇair yad bādhitaṃ tadasadviduḥ

हिन्दी अर्थ

द्वितीया-तृतीया शब्द ङिद्-विभक्तियोंमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं। जैसे 'ङे' विभक्तिमें 'द्वितीयायै', “द्विती यस्यै'। इसी प्रकार अन्य पञ्चमी आदिके एकवचनमें भी। 'बुद्धि' शब्दके रूप बुद्धिः, बुद्धीः, बुद्धयः । बुद्धिम्, बुद्धी, बुद्धीः । बुद्धया, बुद्धिभ्याम्, बुद्धिभिः । बुद्धयै इत्यादि। 'डि/विभक्तिमें बुद्धाम्, बुद्धौ । इसी तरह 'मति' शब्दके भी रूप हैं। 'स्त्री' शब्दकी 'ई'को अजादि विभक्तियोंमें 'इयङ्' आदेश होता है। यथा स्त्रियौ, स्त्रियः इत्यादि। अम्-शसमें विकल्प है- स्त्रियम्, स्त्रीम्। स्त्रियः स्त्रीः । “सु? विभक्तिमें 'स्त्री' रूप होता है। “सु 'का लोप हो जाता है। 'श्री' शब्दका रूप-श्री: श्रियौ श्रियः इत्यादि। ' नदी' शब्दका रूप--

English

for that which is divided this twofoldness is sung. What is contradicted by perception and other means of knowledge they know as false;

अध्याय ३४५

श्लोक 39

कविभिस्तत् प्रतिग्राह्यं ज्ञानस्य द्योतमानता ।यदेवार्थक्रियाकारि तदेव परमार्थसत्

kavibhistat pratigrāhyaṃ jñānasya dyotamānatā / yadevārthakriyākāri tadeva paramārthasat

हिन्दी अर्थ

नद्याम्, नद्योः नदीषु। है नदि है नद्यौ है नद्यः। 'सुधी 'का रूप सुधीः सुधियौ सुधियः इत्यादि। ' भवन्ती 'का रूप नदीवत्। यहाँसे लेकर “पुत्रबती' शब्दतकके रूप नदीवत् ही होंगे। 'नौ' शब्दका रूप--नौः नावौ नाव: इत्यादि। वधू-वधूः वध्वौ वध्वः इत्यादि। 'देवता' का रूप जायावत्। ' भू'--भूः भुवौ भुवः इत्यादि। तिसृ-१. ति्रः। २. ति्रः। ३. तिसृभिः ४-५. तिसृभ्यः । ६. तिसृणाम्। ७. तिसृषु। इसी प्रकार 'चतसृ 'के रूप जानने चाहिए। 'द्वि' शब्दके स्त्रीलिङ्गमें-ट्वे, दवे, द्वाभ्याम् ३, द्वयो: २ रूप होते हैं। 'कति'--कति, कति,

English

that should be accepted by poets, the shining of knowledge. What alone performs a purposeful action is alone ultimately real;

अध्याय ३४५

श्लोक 40

अज्ञानाज्ज्ञानतस्त्वेकं ब्रह्मैव परमार्थसत् ।विष्णुः स्वर्गादिहेतुः स शब्दालङ्काररूपवान् ।अपरा च परा विद्या तां ज्ञात्वा मुच्यते भवात्

ajñānājjñānatastvekaṃ brahmaiva paramārthasat / viṣṇuḥ svargādihetuḥ sa śabdālaṅkārarūpavān / aparā ca parā vidyā tāṃ jñātvā mucyate bhavāt

हिन्दी अर्थ

इत्यादि। ' अवरा'का रूप पूर्वावत्। ' गो '--गौ: गावौ गावः । गाम् गावौ गा: । गवा गोभ्याम् गोभिः । इत्यादि। द्यौः द्यावौ द्यावः इत्यादि। वाक् वाग्, वाचौ वाचः इत्यादि । त्वक् --' वाक् 'के समान। 'प्राची ' से लेकर “उदीची ' तकके रूप-नदीवत्। शरत्-शरत् शरद् शरदौ शरदः इत्यादि । विद्युत्--विद्युत् विद्युद् विद्युतौ विद्युतः इत्यादि। सरित्-सरित् सरिद् सरितौ सरितः इत्यादि। ' अग्निवित्' शरत्के समान। 'सस्यदा' जायावत्। ' सम्पत्’ शरत्के समान। ' दूषत्' शरत्के समान। या ये याः, याम् ये याः! यया याभ्याम् इत्यादि। यस्याः यासाम्, यस्याम् इत्यादि। एषा एते एताः इत्यादि। सा ते ताः इत्यादि। ' वेदविद्' शरत्के समान। “ संवित्' भी शरत्के समान। ‘बह्वी’, “राज्ञी नदीके समान । त्वम् युवाम् यूयम्। त्वां युवाम् युष्मान्। त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः । तुभ्यम् युवाभ्याम् युष्मभ्यम् । त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्। तव युवयोः युष्माकम्। त्वयि युवयोः युष्मासु । इसी तरह ' अस्मद्' शब्दके अहं आवाम् वयम्। माम् आवाम् अस्मान्। मया आवाभ्याम् अस्माभिः । मह्यम्, मत्, मम, अस्माकम् मयि इत्यादि रूप हैं। 'सीमा' टाबन्त हो तो सीमा सीमे सौमाः। नान्त हो तो सीमा सीमानौ

English

from ignorance and from knowledge, Brahman alone is ultimately real. Vishnu is the cause of heaven and the rest, having the form of word-ornament; the lower and the higher knowledge — having known it one is freed from existence.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 345
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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