Agni Purana· Agni Purāṇa
344
अध्याय 344 / 381

Adhyaya 345

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अध्याय ३४४

श्लोक 1

काव्यगुणविवेकः अग्निर् उवाच अलंकृतमपि प्रीत्यै न काव्यं निर्गुणं भवेत् ।वपुष्यललिते स्त्रीणां हारो भारायते परं

kāvyaguṇavivekaḥ agnir uvāca alaṃkṛtamapi prītyai na kāvyaṃ nirguṇaṃ bhavet / vapuṣyalalite strīṇāṃ hāro bhārāyate paraṃ

हिन्दी अर्थ

' भवाञ्छेते' रह जाता है। 'लोप' और 'छत्व' वैकल्पिक हैं, अतः इनके अभावमें ' भवाञ्च्शेते' बना। तुगागम भी वैकल्पिक है; उसके न होनेपर ' भवाञ् शेते ' बना। भवान्+डीनः=भवाण्डीनः । यहाँ ष्टुत्वविधानके अनुसार न्' की जगह 'ण्' हो गया है । ' त्वं+ भर्ता=त्वम्भर्ता ' त्वं करिष्यसि=त्वङ्करिष्यसि'ये दोनों वैकल्पिक परसवर्णके उदाहरण हैं। यहाँ अनुस्वारकी जगह “वा पदान्तस्य।' (पा० सू० ८।४।५९) के नियमानुसार परसवर्ण क्रमशः भ्’ और 'ङू' हो गये है। व्यञ्जनसंधि 'के कुछ और भी भेद हैं, जो यहाँ कौमार व्याकरणमें निर्दिष्ट नहीं हैं- जैसे ' पूर्वसवर्ण-संधि'। इसके दो प्रकारके स्थल हैं । 'झयो होऽन्यतरस्याम्' (८।४।६२)-इस सूत्रके अनुसार 'झय्' से परे हकारके स्थानमें पूर्वसवर्ण होता है । इसके ' वाग्घरिः ' इत्यादि उदाहरण हैं। यहाँ ' वाक्+हरिः' इस अवस्थामें ' ह' की जगह पूर्वसवर्ण-' घ' हो गया है। “उद: स्थास्तम्भोः पूर्वस्य।'—इस पा० सूत्र (८।४।६१) के अनुसार 'उद्' उपसर्गसे परे 'स्थ' और 'स्तम्भ'के आदि वर्णकी जगह पूर्व-सवर्ण होता है। इसके उदाहरण हैं

English

O Horse! You were born in the race of the Gandharvas (a kind of semi-divine beings). May you not be¬ come a defiler of the race. You be glorious by the true words of Brahmi, Soma and Varupa and the power of Fire (god) as well as the splendour of the Sun, the penance of the sages, the

अध्याय ३४४

श्लोक 2

न च वाच्यं गुणो दोषो भाव एव भविष्यति ।गुणाः श्लेषादयो दोषा गूडार्थाद्याः पृथक्कृताः

na ca vācyaṃ guṇo doṣo bhāva eva bhaviṣyati / guṇāḥ śleṣādayo doṣā gūḍārthādyāḥ pṛthakkṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

उत्थानम्, उत्तम्भनम् । 'सम्' के मकारका भी रुत्वविधान होता है, “सुट ' परे रहनेपर। इसके 'संस्कर्ता' आदि उदाहरण हैं। विसर्गसंधिके भी अनेक प्रकार-भेद हैं-यहाँ लगभग दस प्रकारकी कार्य-विधि वर्णित हुई है-(१) विसर्गस्थाने सत्वविधान (इसका विधायक है--' विसर्जनीयस्य स: ।' पा० सू० ८। ३। ३४) । (२) वैकल्पिकविसर्गत्वविधान (इसका निर्देशक है--' वा शरि यह पा० सूत्र ८। ३। ३६)। (३) 4 क ; प-विधान (यह ' कुप्वोः क पौ च।'--इस पाणिनिसूत्र ८। ३ । ३७ पर आधारित है) ।

English

Supposed to guard the quarters.

अध्याय ३४४

श्लोक 3

यः काव्ये महतीं छायामनुगृह्णात्यसौ गुणैः ।सम्भवत्येष सामान्यो वैशेषिक इति द्विधा

yaḥ kāvye mahatīṃ chāyāmanugṛhṇātyasau guṇaiḥ / sambhavatyeṣa sāmānyo vaiśeṣika iti dvidhā

हिन्दी अर्थ

(४) रुत्वविधान (इसका आधार है-'ससजुषो रु: ।' यह पा० सूत्र ८। २। ६६) । (५) रोरुत्वविधान (यह ' अतो रोरप्लुतादप्लुते।' ६। १ । ११३, “हशि च।' ६।१। ११४ इत्यादि सूत्रोंपर अवलम्बित है) । (६) रोर्यत्वविधान (जो ' भो भगो अघो अपूर्वस्य योऽशि।' इस पा० सूत्र ८।३। १७ तथा अतो रोरप्लुतादप्लुते ६। १। ११३ पर आधारित है)। (७) यलोपविधान (इसका आधार 'हलि सर्वेषाम्? यह पा० सूत्र ८।३।२२ है)। (८) रकार-विसर्गविधान (इसका विधायक ' खरवसानयोर्विसर्जनीयः।'यह पा० सूत्र ८।३। १५ है)। (९) सुलोपविधान (इसके आधार हैं-' एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ् समासे हलि।', 'सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम् ।' इत्यादि ६। १। १३२, ३४ सूत्र) । (१०) ढूलोपदीर्घविधान (इसके आधारभूत पा० सूत्र है'रोरि।', 'ढो ढे लोपः।', ' ढलोपे पूर्वस्य

English

May the festoons used by the enemy for deco¬ ration everywhere, fall down being struck by your splendour. In the same way as you have shone at the time of killing (the demon) Kalanemi, the destruction of Tripura®, the battle with Hiranyakasipu® and the killing of all the demons, may you shine now. You remember the opportune moment. May the enemies of the king be destroyed quickly. (May the enemies) be conquered by different kinds of terrible diseases and wea¬ pons. May (the names) Putana, Revati, Lekha and Kalaratri that we have read (as terrible forces) burn all the enemies quickly with your help.

अध्याय ३४४

श्लोक 4

सर्वसाधारणीभूतः सामन्य इति मन्यते ।शब्दमर्थमुभौ प्राप्तः सामान्यो भवति त्रिधा

sarvasādhāraṇībhūtaḥ sāmanya iti manyate / śabdamarthamubhau prāptaḥ sāmānyo bhavati tridhā

हिन्दी अर्थ

१. "कः+छिन्द्यात्'=कशिछि्द्यत्। यहाँ विसर्गके स्थानमें “स' और ्रुत्वविधानके अनुसार 'स्' के स्थानमें 'शू' हुआ है। क:+चरेत्=कश्चरेत्। यहाँ भी पूर्ववत् विसर्गके स्थानमें 'स्' और श्चुत्वेन 'श्' हुआ है। २. कः+टः=कष्टः। ३. कः+ठ:=कष्ठः -इन दोनों उदाहरणोमें विसर्गके स्थानमें सकार होकर ष्ट्त्वविधानके अनुसार 'सकार'के स्थानमें 'षकार' हो गया है। ४. कः+स्थः=कः स्थः, कस्स्थः। यहाँ वैकल्पिक विसर्गताका विधान है। 'वा शरि' (पा० सूत्र ८। ३। ३६)-के नियमानुसार यदि विसर्गसे परे 'श', 'ष' और 'स'--ये अक्षर हों

English

A demon killed by Vifpu.

अध्याय ३४४

श्लोक 5

शब्दमाश्रयते काव्यं शरीरं यः स तद्गुणः ।श्लोषो लालित्यागाम्भीर्यसौकुमार्यमुदारता

śabdamāśrayate kāvyaṃ śarīraṃ yaḥ sa tadguṇaḥ / śloṣo lālityāgāmbhīryasaukumāryamudāratā

हिन्दी अर्थ

तो एक पक्षके मतानुसार उस विसर्गके स्थानमें “स्' न होकर विसर्ग ही रह जाता है। पक्षान्तरसे 'सकार' हो जाता है। उक्त उदाहरणोंमें पहले विसर्गरूप, फिर सकाररूपका साक्षात्कार कराया गया है। ५. कः+चलेतू=कश्चलेत्।' यहाँ भी सब बातें “कश्चरेत्' के अनुसार समझनी चाहिए। ६-७. 'कः+खनेत्'=कः खनेत्। क:+करोति-क करोति-इन दोनों उदाहरणोंमें ' क प विधान'के अनुसार विसर्गके स्थानमें “क : ख हो गये हैं। कवर्ग और पवर्गके प्रथम-द्वितीय अक्षर परे हों तो विसर्गके स्थानमें क्रमश: क : प होते हैं--ऐसा नियम है। ८-९. "कः+पठेत्', 'कः+फलेत्’-इस अवस्थामें अभी बताये हुए नियमके अनुसार विसर्गकी जगह '/ प फ'-हो गये हैं। १०-११. इन उदाहरणांमें “वा शारि' (पा० सू० ८।३। ३६) के नियमानुसार एक पक्षमें विसर्गका विसर्ग ही रह गया है; पक्षान्तरमें ' विसर्ग' की जगह 'स्' होकर ' श्वशुर: ' के शकारका योग मिलनेसे श्रुत्वेन 'स्' की जगह “श्' हो गया है। “स्वर: ' के साथ विसर्गका सकार उसी रूपमें दृष्टिगोचर होता है। १२. 'क:+फलेत्'--इस जगह : फ प्राप्त था; परंतु वह वैकल्पिक है, अतः पक्षान्तरके अनुसार विसर्गके स्थानमें

English

The three cities destroyed by Siva.

अध्याय ३४४

श्लोक 6

सत्येव यौगिकी चेति गुणाः शब्दस्य सप्तधा ।सुश्लिष्टसन्निवेशत्वं शब्दानां श्लेष उच्यते

satyeva yaugikī ceti guṇāḥ śabdasya saptadhā / suśliṣṭasanniveśatvaṃ śabdānāṃ śleṣa ucyate

हिन्दी अर्थ

विसर्ग ही रह गया है। १३. यहाँ भी वही बात है। विसर्गकी जगह 'स्' या “शू' नहीं हुआ है। १४. “कस् अत्र योधः।' यह पदच्छेद है। यहाँ “कस्' के सकारकी जगह 'रु' तथा 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है; फिर गुण और पूर्वरूप होकर “कोऽत्र योधः ' बना है । रोरुत्वविधानका नियम यह है-अप्लुत 'अ' से परे रु' हो तो उसकी जगह “उ' होता है, अप्लुत अकार परे विद्यमान हो तब। १५. कस् उत्तमः-इस अवस्थामें “स्' के स्थानमें रु' हुआ। फिर 'रोर्यत्वविधान' के अनुसार ' रु 'के स्थानमें 'य' हो गया। फिर य-लोपविधानसे “यू' का लोप हो गया। “लोपः

English

A demon killed by Vifnu.

अध्याय ३४४

श्लोक 7

गुणादेशादिना पूर्वं पदसम्बद्धमक्षरं ।यत्रसन्धीयते नैव तल्लालित्यमुदाहृतं

guṇādeśādinā pūrvaṃ padasambaddhamakṣaraṃ / yatrasandhīyate naiva tallālityamudāhṛtaṃ

हिन्दी अर्थ

शाकल्यस्य।' (८ । ३। १९)--इस पा० सूत्रके अनुसार यहाँ ' यू' लोप हुआ है, अत: “क उत्तमः ' प्रयोग सिद्ध हुआ है। १६. “देवास्+एते'- भो इह। स्वदेवा यान्ति“ । भगो व्रज सु पूः ।

English

O Armour! You cause (the enemy fojces) to feel ashamed in the battle. I will have fame in the army today. O Sinless one! Protect me, worthy of being protected by you! Obeisance to you.

अध्याय ३४४

श्लोक 8

विशिष्टलक्षणोल्लेखलेख्यमुत्तानशब्दकम् ।गाम्भीर्यं कथयन्त्यार्यास्तदेवान्येषु शब्दतां

viśiṣṭalakṣaṇollekhalekhyamuttānaśabdakam / gāmbhīryaṃ kathayantyāryāstadevānyeṣu śabdatāṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें 'संधिसिद्धरूपकथन' नामक तीन सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

O Foremost among brahmins! This (hymn) Vi§nu- pafijara was prescribed by Brahma for the protection of Siva, who was desirous of destroying Tripura in olden days.

अध्याय ३४४

श्लोक 9

अनिष्ठुराक्षरप्रायशब्दता सुकुमारता ।उत्तानपदतौदर्ययुतश्लाघ्यैर् विशेषणैः

aniṣṭhurākṣaraprāyaśabdatā sukumāratā / uttānapadataudaryayutaślāghyair viśeṣaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

स्कन्द कहते हैं कात्यायन! अब मैं तुम्हारे सम्मुख विभक्ति-सिद्ध रूपोंका वर्णन करता हूँ। विभक्तियाँ दो हैं--'सुप्' और 'तिङ्'। 'सुप्' विभक्तियाँ सात हैं। “सु औ जस्'--यह प्रथमा विभक्ति है। ' अम् औट् शस्'यह द्वितीया, टा भ्याम् भिस्'-यह तृतीया, ' ङे भ्याम् भ्यस्'- यह चतुर्थी, “ङसि भ्याम् भ्यस्'--यह पञ्चमी, “ङस् ओस् आम्' यह षष्ठी तथा 'ङि ओस्

English

Absence of harsh letters, mostly (soft) words, tenderness; with plain words, generosity and praiseworthy qualifiers —

अध्याय ३४४

श्लोक 10

ओजः समासभूयस्त्वमेतत्पद्यादिजीवितं ।आब्रह्म स्तम्भपर्यन्तमोजसैकेन पौरुषं

ojaḥ samāsabhūyastvametatpadyādijīvitaṃ / ābrahma stambhaparyantamojasaikena pauruṣaṃ

हिन्दी अर्थ

सुप्'--यह सप्तमी विभक्ति है। ये सातों विभक्तियाँ प्रातिपदिक संज्ञावाले शब्दोंसे परे प्रयुक्त होती हैं

English

Ojas is abundance of compounds; this is the life of verse and the rest. From Brahma to a blade of grass, manliness is by Ojas alone;

अध्याय ३४४

श्लोक 11

उच्यमानस्य शब्देन येन केनापि वस्तुनः ।उत्कर्षमावहन्नर्थो गुण इत्य् अभिधीयते

ucyamānasya śabdena yena kenāpi vastunaḥ / utkarṣamāvahannartho guṇa ity abhidhīyate

हिन्दी अर्थ

“प्रातिपदिक' दो प्रकारका होता है--' अजन्त' और 'हलन्त'। इनमेंसे प्रत्येक पुँल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्गके भेदसे तीन-तीन प्रकारका है। उन पुँल्लिङ्ग आदि शब्दोंके नायकोंका यहाँ दिग्दर्शन कराया जाता है। जो शब्द नहीं कहे गये हैं(किंतु जिनके रूप इन्हींके समान होते हैं) उन्हींके ये 'वृक्ष' आदि शब्द सामर्थ्यतः नायक

English

the meaning that, by whatever word it is said of a thing, brings out excellence is called a "quality" (guna).

अध्याय ३४४

श्लोक 12

माधुर्यं सम्बिधानञ्च कोमलत्वमुदारता ।प्रौढिः सामयिकत्वञ्च तद्भेदाः षट्चकाशति

mādhuryaṃ sambidhānañca komalatvamudāratā / prauḍhiḥ sāmayikatvañca tadbhedāḥ ṣaṭcakāśati

हिन्दी अर्थ

हैं । ‘वृक्ष’ शब्द पेड़का वाचक है। यह अकारान्त पुल्लिङ्ग है। इसके सात विभक्तियोंमें तथा सम्बोधनमें एकवचन, द्विवचन और बहुवचनके भेदसे कुल मिलाकर चौबीस रूप होते हैं। उन सबको यहाँ

English

Sweetness, arrangement (sambidhana), softness, generosity, maturity (praudhi) and conventionality — these six divisions shine.

अध्याय ३४४

श्लोक 13

क्रोधेर्ष्याकारगाम्भीर्यात्माधुर्यं धैर्यगाहिता ।सम्बिधानं परिकरः स्यादपेक्षितसिद्धये

krodherṣyākāragāmbhīryātmādhuryaṃ dhairyagāhitā / sambidhānaṃ parikaraḥ syādapekṣitasiddhaye

हिन्दी अर्थ

उद्धत किया जाता है। १--वृक्ष:, वृक्षौ, वृक्षाः। सम्बोधने-हे वृक्ष, है वृक्षौ, है वृक्षाः। इसी

English

From anger, envy, appearance and depth, sweetness; entry into steadiness; sambidhana is the apparatus for accomplishing the needed;

अध्याय ३४४

श्लोक 14

यत्काठिन्यादिनिर्मुक्तसन्निवेशविशिष्टता ।तिरस्कृत्यैव मृदुता भाति कोमलतेति सा

yatkāṭhinyādinirmuktasanniveśaviśiṣṭatā / tiraskṛtyaiva mṛdutā bhāti komalateti sā

हिन्दी अर्थ

इस पदच्छेदमें “स्? की जगह 'रु' और रु'की जगह य्' हो गया। फिर पूर्ववत् “य' लोप होनेसे “देवा एते'-ऐसा प्रयोग सिद्ध हुआ। १७-१८-१९. ' भोस् इह', ' भगोस् व्रज' तथा ' अघोस् याहि’, ' स्वदेवास् यान्ति'--इन वाक्यॉंमें 'स्' की जगह रुत्व-यत्व हुआ। फिर पहलेमें तो “लोपः शाकल्यस्य ।'--इस सूत्रसे और अन्य उदाहरणोंमें हलि सर्वेषाम्।' (पा० सू० ८।३।२२)-इस सूत्रसे 'य' लोप होनेपर निर्दिष्ट रूप बनते हैं। २०. “सुपूः ' यहाँ ' सुपूर'-इस अवस्थामें रकार 'के स्थानमें ' विसर्ग' हुआ है। २१. ' सुदुर+रात्रिरत्र=सुदूरात्रित्र।

English

where distinguished arrangement free of hardness and the like, putting it down, tenderness shines — that is Komalata;

अध्याय ३४४

श्लोक 15

लक्ष्यते स्थूललक्षत्वप्रवृत्तेर्यत्र लक्षणम् ।गुणस्य तदुदारत्वमाशयस्यातिसौष्ठवं

lakṣyate sthūlalakṣatvapravṛtteryatra lakṣaṇam / guṇasya tadudāratvamāśayasyātisauṣṭhavaṃ

हिन्दी अर्थ

यहाँ 'रोरि' से ' र्? लोप होकर पूर्वस्वरको दीर्घत्व प्राप्त हुआ है। २२. इस उदाहरणमें ' वायुस्+याति'-ऐसा पदच्छेद है। यहाँ 'स्' के स्थानमें “रु उकारकी इत्संज्ञा और रेफका यकारसे मिलन हुआ है। २३. इस उदाहरणमें यह दिखाया गया है कि यहाँ 'खरबसानयोर्विसर्जनीय: । (पा० सू० ८।३।१५) से रकारका विसर्ग नहीं हो सकता; क्योंकि न रेफ अवसानमें है और न उससे परे 'खर्' प्रत्याहारका ही कोई अक्षर है । २४. 'पुनर्+राति'-इस अवस्थामें “रो रि।' (पा० सू० ८। ३। १४) से रकारका लोप हुआ और पूर्व ' अण्' को दीर्घत्व प्राप हुआ है । २५. “सस् याति इह '--इस अवस्थामें “एतत्तदोः सुलोपो ।'--इस (पा० सूत्र ६। १। १३२) के अनुसार तत्'-शब्दसम्बन्धी 'सु' विभक्तिसे सकारका लोप हो गया है । २६. "सस् एषस् याति’, “क ईश्वरः '--इस अवस्थामें ' सस्'के सकारका लोप श्लोककी पादपूर्तिके लिये हुआ है, 'एषस्'--के सकारका लोप पूर्ववत् हुआ है। २७. 'ज्योतिर्+रूपम्'-यहाँ रलोप और दीर्घ हुआ है। २८. “तव + छत्रम्।' यहाँ ' छे च।'--इस (पा० सू० ६। १।७३) सूत्रसे तुगागम हुआ है, फिर त' का श्चुत्वेन 'च' हो गया है। (यह व्यञ्जनसंधिका उदाहरण

English

it is seen where there is mark of operating on gross marks: the quality's generosity, excess of fineness of intention;

अध्याय ३४४

श्लोक 16

अभिप्रेतं प्रति यतो निर्वाहस्योपपादिकाः ।युक्तयो हेतुगर्भिण्यः प्रौढाप्रौढिरुदाहृता

abhipretaṃ prati yato nirvāhasyopapādikāḥ / yuktayo hetugarbhiṇyaḥ prauḍhāprauḍhirudāhṛtā

हिन्दी अर्थ

है।) २९. यहाँ भी ' दीर्घात्, ' पदान्ताद्वा’ (पा०सू० ६। १। ७५-७६) से तुगागम हुआ है । शेष पूर्ववत् (यहाँ भी व्यञ्जनसंधि ही है) ।

English

toward the intended, the arguments that accomplish its fulfillment, full of reasons, are declared maturity and immaturity;

अध्याय ३४४

श्लोक 17

स्वतन्त्रस्यान्यतन्त्रस्य वाह्यान्तःसमयोगतः ।तत्र व्युत्पत्तिरर्थस्य या सामयिकतेति सा

svatantrasyānyatantrasya vāhyāntaḥsamayogataḥ / tatra vyutpattirarthasya yā sāmayikateti sā

हिन्दी अर्थ

अकारान्तसे लेकर औकारान्ततक जितने शब्द हैं, सब ' अजन्त' हैं। ऐसे शब्द असंख्य हैं, उन सबका उल्लेख असम्भव है। अतः कुछ शब्द यहाँ नमूनेके तौरपर दिये गये हैं, उन्हींके समान अन्य शब्दोंके रूप भी होंगे। इन नमूनेके तौरपर दिये गये शब्दोंको ही यहाँ नायक' कहा गया है। प्रकार राम, देव, इन्द्र, वरुण, भव आदि शब्दोंके रूप जानने चाहिए। 'देव' आदि शब्दोंके तृतीयाके एकवचनमें 'देवेन' तथा षष्ठीके बहुवचनमें 'देवानाम्' इत्यादि रूप होते हैं। वहाँ 'न' के

English

of the independent and the dependent, by union of outer and inner agreement — the learning of meaning there is Samayikata (conventionality).

अध्याय ३४४

श्लोक 18

शब्दार्थवुपकुर्वाणो नाम्नोभयगुणः स्मृतः ।तस्य प्रसादः सौभाग्यं यथासङ्ख्यं प्रशस्तता

śabdārthavupakurvāṇo nāmnobhayaguṇaḥ smṛtaḥ / tasya prasādaḥ saubhāgyaṃ yathāsaṅkhyaṃ praśastatā

हिन्दी अर्थ

स्थानमें “ण' नहीं होता। रेफ और षकारके बाद जो 'न' हो, उसीके स्थानमें “ण' होता है। अकारान्त शब्दोंमें जो सर्वनाम हैं, उनके रूपोंमें कुछ भिन्नता होती है। उस भिन्नताका परिचय

English

One benefiting both word and meaning is remembered as having the quality of both. Its Prasada, Saubhagya, in order Prashastata,

अध्याय ३४४

श्लोक 19

पाको राग इति प्राज्ञैः षट्प्रपञ्चविपञ्चिताः ।सुप्रसिद्धर्थपदता प्रसाद इति गीयते

pāko rāga iti prājñaiḥ ṣaṭprapañcavipañcitāḥ / suprasiddharthapadatā prasāda iti gīyate

हिन्दी अर्थ

देनेके लिये सर्वनामका “प्रथम या “नायक' जो 'सर्व' शब्द है, उसके रूप यहाँ दिये जाते हैं; उसी तरह अन्य सर्वनामोंके भी रूप होंगे। यथा--१-- सर्वः सर्वौ सर्वे। २--सर्वम् सवौ सर्वान् सर्वेषु। सम्बोधनमें-हे सर्व है सौ है सर्वे। यहाँ रेखाङ्कित रूपोंपर दृष्टिपात कोजिये। साधारण अकारान्त शब्दोंकी अपेक्षा सर्वनाम शब्दोंके रूपोंमें भिन्नताके पाँच ही स्थल हैं। इसके बाद

English

Paka, Raga — thus sixfold expansion by the wise. Use of well-known meaning words is sung as Prasada;

अध्याय ३४४

श्लोक 20

उत्कर्षवान् गुणः कश्चिद्यस्मिन्नुक्ते प्रतीयते ।तत्सौभाग्यमुदारत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः

utkarṣavān guṇaḥ kaścidyasminnukte pratīyate / tatsaubhāgyamudāratvaṃ pravadanti manīṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्व” शब्द आता है। यह सर्वनाम होनेपर भी अन्य सर्वनामोंसे कुछ विलक्षण रूप रखता है।

English

some quality with excellence, understood when it is stated — that the wise call Saubhagya, generosity;

अध्याय ३४४

श्लोक 21

यथासङ्ख्यमनुद्देशः सामन्यमतिदिश्यते ।समये वर्णनीयस्य दारुणस्यापि वस्तुनः

yathāsaṅkhyamanuddeśaḥ sāmanyamatidiśyate / samaye varṇanīyasya dāruṇasyāpi vastunaḥ

हिन्दी अर्थ

ये व्यवस्था और असंज्ञामें सर्वनाम हैं । 'स्व' तथा 'अन्तर' शब्द भी अर्थ-विशेषमें ही सर्वनाम हैं। अतः उससे भिन्न अर्थमें वे असर्वनामवत् रूप धारण करते हैं । प्रथमाके बहुवचनमें तथा पञ्चमी- सप्तमीके एकवचनमें पूर्वादि शब्दोंके रूप सर्वनामवत् होते हैं, किंतु विकल्पसे। अतः पक्षान्तरमें उनके असर्वनामवत् रूप भी होते ही हैं-जैसे पूर्वे

English

by order without enumeration the common is directed; even of a dreadful thing, at the time of description,

अध्याय ३४४

श्लोक 22

अदारुणेन शब्देन प्राशस्त्यमुपवर्णनं ।उच्चैः परिणतिः कापि पाक इत्य् अभिधीयते

adāruṇena śabdena prāśastyamupavarṇanaṃ / uccaiḥ pariṇatiḥ kāpi pāka ity abhidhīyate

हिन्दी अर्थ

ये शब्द सर्वनाम नहीं हैं, तथापि 'प्रथम' शब्दके

English

description with a non-dreadful word is Prashastata. Some high ripening is called Paka;

अध्याय ३४४

श्लोक 23

मृद्वीकानारिकेलाम्बुपाकभेदाच्चतुर्विधः ।आदावन्ते च सौरस्यं मृद्वीकापाक एव सः

mṛdvīkānārikelāmbupākabhedāccaturvidhaḥ / ādāvante ca saurasyaṃ mṛdvīkāpāka eva saḥ

हिन्दी अर्थ

प्रथमा बहुवचनमें प्रथमे प्रथमाः--यह रूप होता है। “चरम' आदि शब्दोंके लिये भी यही बात है। 'द्वितीय' तथा 'तृतीय' शब्द चतुर्थी, पञ्चमी तथा सप्तमीके एकवचनमें विकल्पसे सर्वनामवत् रूप धारण करते हैं । यथा-द्वितीयस्मै द्वितीयाय।

English

by the differences of grape, coconut and water ripening it is fourfold; sweetness at the beginning and end — that is grape-ripening.

अध्याय ३४४

श्लोक 24

काव्येच्छया विशेषो यः सराग इति गीयते ।अभ्यासोपहितः कान्तिं सहजामपि वर्तते

kāvyecchayā viśeṣo yaḥ sarāga iti gīyate / abhyāsopahitaḥ kāntiṃ sahajāmapi vartate

हिन्दी अर्थ

अब आकारान्त शब्दका एक रूप उपस्थित करते हैं-खड्गपाः- खड्गं पातीति खड्गपाः अर्थात् ' खड्ग-रक्षक'। इसका रूप यों समझना चाहिए--१--खड्गपाः, खड्गपौ, खड्गपाः। २--

English

A special thing by poetic wish is sung as Raga; accompanied by practice it persists as natural radiance;

अध्याय ३४४

श्लोक 25

हारिद्रश् चैव कौसुम्भो नीली रागश् च स त्रिधा ।वैशेषिकः परिज्ञेयो यः स्वलक्षणगोचरः

hāridraś caiva kausumbho nīlī rāgaś ca sa tridhā / vaiśeṣikaḥ parijñeyo yaḥ svalakṣaṇagocaraḥ

हिन्दी अर्थ

खड्गपासु। सम्बो०-हे खड्गपाः, है खड्गपौ, हे खड्गपाः। इसी तरह विश्वपा (विश्वपालक), गोपा (गोरक्षक), कीलालपा (जल पीनेवाला), शङ्कुध्मा (शङ्ख बजानेवाला) आदि शब्दोंके रूप होंगे। (अब हृस्व इकारान्त 'वह्ि' शब्दका रूप प्रस्तुत करते हैं-) १--वह्निः, वल्ली, वह्नयः । २-वह्निम्, बह्वी, बह्लीन्। ३-वहिना, वह्निभ्याम्, वह्िभिः। ४- वह्दये, वह्लिभ्याम्, वह्विभ्यः।

English

turmeric-colored, safflower-colored, and indigo-colored — Raga is threefold. The distinctive is to be known as what is within the range of its own marks.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 344
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.