अध्याय ३४४
श्लोक 1
काव्यगुणविवेकः अग्निर् उवाच अलंकृतमपि प्रीत्यै न काव्यं निर्गुणं भवेत् ।वपुष्यललिते स्त्रीणां हारो भारायते परं
kāvyaguṇavivekaḥ agnir uvāca alaṃkṛtamapi prītyai na kāvyaṃ nirguṇaṃ bhavet / vapuṣyalalite strīṇāṃ hāro bhārāyate paraṃ
हिन्दी अर्थ
' भवाञ्छेते' रह जाता है। 'लोप' और 'छत्व' वैकल्पिक हैं, अतः इनके अभावमें ' भवाञ्च्शेते' बना। तुगागम भी वैकल्पिक है; उसके न होनेपर ' भवाञ् शेते ' बना। भवान्+डीनः=भवाण्डीनः । यहाँ ष्टुत्वविधानके अनुसार न्' की जगह 'ण्' हो गया है । ' त्वं+ भर्ता=त्वम्भर्ता ' त्वं करिष्यसि=त्वङ्करिष्यसि'ये दोनों वैकल्पिक परसवर्णके उदाहरण हैं। यहाँ अनुस्वारकी जगह “वा पदान्तस्य।' (पा० सू० ८।४।५९) के नियमानुसार परसवर्ण क्रमशः भ्’ और 'ङू' हो गये है। व्यञ्जनसंधि 'के कुछ और भी भेद हैं, जो यहाँ कौमार व्याकरणमें निर्दिष्ट नहीं हैं- जैसे ' पूर्वसवर्ण-संधि'। इसके दो प्रकारके स्थल हैं । 'झयो होऽन्यतरस्याम्' (८।४।६२)-इस सूत्रके अनुसार 'झय्' से परे हकारके स्थानमें पूर्वसवर्ण होता है । इसके ' वाग्घरिः ' इत्यादि उदाहरण हैं। यहाँ ' वाक्+हरिः' इस अवस्थामें ' ह' की जगह पूर्वसवर्ण-' घ' हो गया है। “उद: स्थास्तम्भोः पूर्वस्य।'—इस पा० सूत्र (८।४।६१) के अनुसार 'उद्' उपसर्गसे परे 'स्थ' और 'स्तम्भ'के आदि वर्णकी जगह पूर्व-सवर्ण होता है। इसके उदाहरण हैं
English
O Horse! You were born in the race of the Gandharvas (a kind of semi-divine beings). May you not be¬ come a defiler of the race. You be glorious by the true words of Brahmi, Soma and Varupa and the power of Fire (god) as well as the splendour of the Sun, the penance of the sages, the